Tuesday, May 28, 2013

भक्ति का तत्त्व

भक्ति का तत्त्व

[ १ ] भगवान शरणागत भक्त से कभी अलग नहीं हो सकते | भगवान का सर्वस्व उसका हो जाता है | वह परम पवित्र हो जाता है , उसके दर्शन , भाषण और चिंतन से भी लोग पवित्र हो जाते हैं | वह तीर्थों के लिए तीर्थरूप बन जाता है | उसके संम्पूर्ण अवगुण , पाप , और दुखों का अत्यंत नाश हो जाता है और उसके आनंद और शान्ति का पार नहीं रहता |

[ २ ] नवधा - भक्ति का तत्त्व रहस्य महापुरुषों से समझकर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक तत्परता के साथ भक्ति का साधन करना चाहिए | बिना अभ्यास किये साधक प्रेमलक्षणा भक्ति का सच्चा पात्र नहीं बन सकता | ईश्वर की स्मृति निरंतर रहनी चाहिए | भगवान के स्मरण के अभ्यास से पापी का भी एक क्षण में उद्धार हो सकता है | 


[ ३ ] भगवान में चित्त लगाकर भगवान के लिए ही कर्म करनेवाले को भगवान की कृपा से भगवान शीघ्र मिल जाते हैं , यह बात जगह - जगह गीता में भगवान ने कही है [ ८ / ७ ; ११ / ५५ ; १२ / ६ , ७ , ८ ; १८ / ५६ , ५७ ,५८; १८ / ६२ ] | सब काम करते हुए निरंतर भगवतस्मरण करने की चेष्टा करनी चाहिए | स्मरण तेलधारावत लगातार होना चाहिए |


[ ४ ] भगवान के किये हुए प्रत्येक विधान में निरंतर उनका स्मरण करता हुआ परम संतोष मानकर हर समय प्रसन्न रहे | अपने मस्तक पर प्रभु का हाथ समझकर आनन्दित होता रहे | सबसे मुख्य बात है अनन्य मनसे युक्त होकर भगवान को निरंतर भजना | अनन्य भजन का स्वरूप भगवान ने गीता [ ९ / १४ ] में बतलाया है | नित्य - निरंतर चिंतन ही मुख्य है |


[ ५ ] भगवान का साक्षात दर्शन तो अनन्य भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से नहीं हो सकता [ गीता ११ / ५४ ] | अनन्य भक्त को भक्ति का तत्त्व परमेश्वर स्वयं समझा देते हैं | 

[ ६ ] यदि घर में एक भी पुरुष को अनन्य भक्ति से परमात्मा का साक्षात्कार हो जाय तो उसका समस्त कुल पवित्र समझा जाता है | भक्ति के द्वारा सब कुछ हो सकता है | साकार भगवान नेत्रों से देखे जाते हैं , सगुण - निराकार बुद्धि द्वारा समझे जाते हैं और निर्गुण - निराकार अनुभव से प्राप्त किये जाते हैं | ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानीजन ही भगवान को तत्त्व से जान सकते हैं | 

[ ७ ] केवल भगवान के नाम का जप , उनके स्वरूप का पूजन और ध्यान करने से भी अति उत्तम गति की प्राप्ति हो सकती है | 

[ ८ ] अनन्य - भक्त को भगवान स्वयं ज्ञान प्रदान कर उसके अज्ञानरुपी अंधकार का नाश कर देते हैं | भक्त जिस रूप में उन्हें देखना चाहता है , वे उसी रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन देते हैं | 

[ ९ ] श्री नरसी मेहता की तरह लज्जा , मान , बडाई और भय को छोड़कर भगवान के गुण - गान में मग्न होकर विचरने से भगवान प्रत्यक्ष मिल सकते हैं | कहते हैं कि मेहताजी के जीवन में कुल ५४ बार भगवान सशरीर प्रकट हुए और उनका कार्य सिद्ध किया | 

[ १० ] दयामय भगवान केवल भाव के भूखे हैं | भावरहित के लिए उनका द्वार सदा बंद है | 

[ ११ ] उपासना या भक्तिमार्ग बड़ा ही सुगम और महत्त्वपूर्ण है | इसमें ईश्वर का सहारा रहता है और उनका बल प्राप्त होता रहता है | 

[ १२ ] सात्विक आचरण और भगवान की विशुद्ध भक्ति से अंत:करण की शुद्धि होने पर , जिस समय भ्रम मिट जाता है उस समय साधक कृत - कृत्य हो जाता है , यही परमात्मा की प्राप्ति है | 

[ १३ ] भक्ति के लिए भगवान ने पहली शर्त यह बतलाई है की भक्ति के साधन करनेवालों को दैवी - संपत्ति का आश्रय लेना चाहिए | 

[ १४ ] भक्ति दिखाने की चीज नहीं है , वह तो हृदय का परम गुप्त धन है | भक्ति का स्वरूप जितना गुप्त रहता है , उतना ही वह अधिक मूल्यवान समझा जाता है | 

[ १५ ] गीता का प्रारंभ [ २/ ७ ] और पर्यावसान [ १८ / ६६ ] भक्ति में ही है | इसलिए वास्तव में भगवान में अनन्य प्रेम का होना ही भक्ति है | 

[ १६ ] अतिशय समता , शान्ति , दया , प्रेम , क्षमा , माधुर्य , वात्सल्य , गम्भीरता , उदारता , सुहृदता आदि भगवान के गुण हैं | 

[ १७ ] सम्पूर्ण विभूति , बल , ऐश्वर्य , तेज , शक्ति , सामर्थ्य और असम्भव को भी सम्भव कर देना आदि भगवान का प्रभाव है | 

[ १८ ] जैसे परमाणु , भाप , बादल , बूँदें , और बर्फ आदि सब जल ही हैं , वैसे ही सगुण , निर्गुण , साकार , निराकार , व्यक्त , अव्यक्त , जड , चेतन , स्थावर , जंगम , सत , असत , आदि जो कुछ भी है तथा जो इससे भी परे है , वह सब भगवान ही है | यह भगवान का तत्त्व है |

[ १९ ] भगवान के दर्शन , भाषण , स्पर्श , चिंतन , कीर्तन , अर्चन , वन्दन , स्तवन आदि से पापी भी परम पवित्र हो जाता है , यह विश्वास करना तथा सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान , सर्वत्र समभाव से स्थित मनुष्य आदि शरीरों में प्रकट होनेवाले और अवतार लेनेवाले परमात्मा को पहचानना , यह रहस्य है | 

[ २० ] भक्ति से ज्ञान - वैराग्य आप ही हो सकते हैं क्योंकि भक्ति माता है और ज्ञान - वैराग्य दोनों उसके पुत्र हैं | अत: भक्ति में ही सुख है | 

Saturday, May 18, 2013

भगवान पर विश्वास रखे

भगवद्भक्ति के पथपर चलने वाले पुरुषों को अपने मन में खूब उत्साह रखना चाहिये | इस बात का सदा स्मरण रखना चाहिये की समस्त विघ्नों के नाश करने वाले और साधन में सतत सहायता पहुँचानेवाले भगवान हमारे पीछे स्तिथ रहकर सदा हमारी रक्षा करते है | रणांगनमें रण-प्रवृत योद्धाके मन में इस स्मृति से महान उत्साह बना रहता है की मेरे पीछे विशाल सैन्यको साथ लिये सेनापति स्थित है | भक्तों को तो इससे भी अनन्तगुण अधिक उत्साह होना चाहिये | क्योंकि उसके पीछे अनन्त शक्ति-संपन्न भगवान का बल है | शक्तिशाली सैन्य का सहारा पाकर जब निर्बल भी बलवान बन जाता है, जब कायर भी शूरवीर-सा काम कर दिखाता है | निर्बल, निरुत्साही मनुष्य इस बात को भली-भाँती समझता हुआ ही मुझमे बड़ीभारी शत्रु-सेना का सामना करने की शक्ति नहीं है, किन्तु शत्रु-सेना की अपेक्षा अपनी सेना को अधिक बलवती देखकर उसके भरोसे लड़ने को तैयार हो जाता है | फिर, जिसके भगवान सहायक हो उसको तो भीषण विषय-सैन्य को तुच्छ समझकर उसके नाश के लिए बद्ध-परिकर ही हो जाना चाहिये | परमात्मा श्रीकृष्ण अपने प्रेमी भक्तों को आश्वासन देते हुए घोषणा करते है ‘जो अनन्यभाव से मुझमे स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते है, उन नित्य एकीभाव में मुझमे स्थिति वाले पुरुषों को योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त करा देता हूँ | 

भगवान की इस घोषणा पर विश्वासकर कठिन-से-कठिन मार्गपर अग्रसर होने में संकोच नहीं करना चाहिये | शंख, चक्र, गदा आदि धारण करनेवाले भगवान जब हमारे प्राप्त साधन की रक्षा और अप्राप्त की प्राप्ति करने का स्वयं जिम्मा ले रहे हैं, जब पद-पद पर हमे बचाने के लिए तैयार है, तब इस घोर अंधकारमय संसार-अरण्य से भर निकलने के लिए हमने जिस साधनमय पथ का अवलंबन किया है, उसमे विघ्न करने वाले काम-क्रोध-रूप सिंह-व्याघ्रादी से भय करने की क्या आवश्यकता है ? जब भगवान सदा-सर्वदा हमारे है तब भय किस बात का ? जैसे छोटा बालक माता की गोद में आते ही अपने को निर्भय और निश्चिन्त मानता है, इसी प्रकार हमे भी अपने को परमपिता परमात्मा की गोद में स्थित समझकर निर्भय और निश्चिन्त रहना चाहिये | भगवान तो बल, प्रेम, सुहृदयता आदि में सभी प्रकार सबसे अधिक है | कारण, ये सारे सद्गुण उन्हीं गुणसागरके तो गुण-कण है अतएव सब तरह से शोक, भय आदि को त्याग कर, बड़े उत्साह और उमंग के साथ एक वीर की भाँती अपने अभीष्ट मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिये |

यह सदा स्मरण रखना चाहिये की जिस प्रकार भक्तप्रवर अर्जुन ने भगवान को सहायता से भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि द्वारा सुरक्षित ग्यारह अक्षोहिणी कौरव-सेना को विध्वंशकर विजय प्राप्त की थी, उसी प्रकार उनकी सहायता से हम भी काम-क्रोधादिरूप कौरव-सेना का सहज ही में विनाशकर परमात्मा की प्राप्तिरूप सच्चे स्वराज्य को प्राप्त कर सकते है | बस, भगवान को अपना सच्चा अवलम्बन बनाकर भीमार्जुन की भाँती प्राणविसर्जन तक का प्रणकर भगवदाज्ञानुसार कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होने भर की देर है | 

Wednesday, May 15, 2013

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है | भूत और भविष्य गौओं के ही हाथ में है | वे ही सदा रहने वाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मी की जड हैं | गौओं की सेवा में जो कुछ दिया जाता है, उसका फल अक्षय होता है | अन्न गौओं से उत्पन्न होता है, देवताओं को उत्तम हविष्य (घृत) गौएँ देती है तथा स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषटकार (इन्द्रयाग) भी सदा गौओं पर ही अवलंबित है | गौएँ ही यज्ञ का फल देने वाली है | उन्हीं में यज्ञौ की प्रतिष्ठा है | ऋषियों को प्रात:काल और सांयकाल में होम के समय गौएँ ही हवंन के योग्य घृत आदि पदार्थ देती है | जो लोग दूध देने वाली गौ का दान करते है, वे अपने समस्त संकटों और पाप से पार हो जाते है | जिनके पास दस गायें हो वह एक गौ का दान करे,जो सौ गाये रखता हो, वह दस गौ का दान करे और जिसके पास हज़ार गौएँ मौजूद हो, वह सौ गाये दान करे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है |

जो सौ गौओं का स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हज़ार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कंजूसी नहीं छोड़ता-ये तीनो मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पाने के अधिकारी नही है |
प्रात:काल और सांयकाल में प्रतिदिन गौओं को प्रणाम करना चाहिये | इससे मनुष्य के शरीर और बल की पुष्टि होती है | गोमूत्र और गोबर देखर कभी घ्रणा न करे | गौओं के गुणों का कीर्तन करे | कभी उसका अपमान न करे | यदि बुरे स्वप्न दीखायी दे तो गोमाता का नाम ले | प्रतिदिन शरीर में गोबर लगा के स्नान करे | सूखे हुए गोबर पर बैठे | उस पर थूक न फेकें | मल-मूत्र न त्यागे | गौओं के तिरस्कार से बचता रहे | अग्नि में गाय के घृत का हवन करे, उसीसे स्वस्तिवाचन करावे | गो-घृत का दान और स्वयं भी उसका भक्षण करे तो गौओं की वृद्धि होती हैं | (महा० अनु० ७८ |५-२१)

गौओं को यज्ञ का अंग और साक्षात् यज्ञस्वरूप बतलाया गया है | इनके बिना यज्ञ किसी तरह नहीं हो सकता | ये अपने दूध और घी से प्रजा का पालन-पोषण करती है तथा इनके पुत्र (बैल) खेती के काम आते है और तरह तरह के अन्न एवं बीज पैदा करते है, जिनसे यज्ञ संपन्न होते है और हव्य-कव्य का भी काम चलता है | इन्हीं से दूध, दही और घी प्राप्त होते है | ये गौए बड़ी पवित्र होती है और बैल भूक प्यास कष्ट सह कर अनेको प्रकार के बोझ ढोते रहते है | इस प्रकार गौ-जाति अपने काम से ऋषियों तथा प्रजाओं का पालन करती रहती है | उसके व्यवहार में शठता या माया नहीं होती | वह सदा पवित्र कर्म में लगी रहती है | इसी से ये गौएँ हम सब लोगों के उपर स्थान में निवास करती है | इसके सिवा गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी है तथा प्रसन्न होने पर वे दूसरों को वरदान भी देती है | (महा० अनु० ८३ |१७-२१)

गौएँ सम्पूर्ण तपस्विओं से भी बढकर है | इसलिए भगवान शंकर ने गौओं के साथ रहकर तप किया था | जिस ब्रह्मलोक में सिद्ध ब्रह्मर्षि भी जाने की इच्छा करते हैं, वहीँ ये गौएँ चन्द्रमा के साथ निवास करती है | ये अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालों से भी जगत का उपकार करती है | इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षा का कष्ट विचलित नहीं करता | ये गौएँ सदा ही अपना काम किया करती है | इसलिए ये ब्राह्मणों के साथ ब्रह्मलोक में जाकर निवास करती है | इसे से गौ और ब्राह्मण को विद्वान पुरुष एक बताते है | (महा० अनु० ६६ |३७-४२)

Tuesday, May 14, 2013

प्रभु पर विश्वास कैसे हो ?

प्रश्न यह है कि प्रभु पर विश्वास कैसे हो ? बच्चे को कैसे विश्वास हो जाता है कि अमुक मेरी माँ है ! बच्चा जब क्रन्दन करता है तब सभी को उससे सहानूभूति होती है पर जो भागती हुयी आती है, वह ही उसकी माँ है; ठीक इसी प्रकार जब माँ पुकारे तो सैकड़ों बच्चों की भीड़ में से भी जॊ भागकर जाये और माँ के आँचल में छुप जाये, वही उस माँ का बालक है। जब इस नश्वर जगत में हम स्वीकार कर लेते हैं कि अमुक मेरी माँ है और अमुक पिता। हमारा मन उसी समय यह भी बिना किसी के बताये, यह स्वीकार कर लेता है कि वे जो भी सॊचेंगे, हमारे भले की ही सोचेंगे। तब भला, जब सारे संत कह रहे हैं कि प्रभु, हमारे पिता, माता, बंधु, सखा, प्रियतम, लाला इत्यादि हैं तो भी हम विश्वास नहीं कर पा रहे, इसका कारण इस दास की अल्पबुद्धि से परे है क्यॊंकि कभी भी दास के साथ ऐसी स्थिति आयी ही नहीं। अब दुविधा यह है कि जाके पैर न फ़टी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। दास का मानना है कि यदि तनिक भी संदेह है तो विश्वास है ही नहीं। विश्वास के साथ संदेह का होना ऐसा ही है जिस प्रकार सूर्य और अंधकार का एक साथ होना, जो संभव ही नहीं है। प्रेम और विश्वास जब भी होंगे, १००% ही होंगे, कम हो ही नहीं सकते। यह पूर्ण ब्रह्म का ही एक रूप है, या तो पूर्ण होगा या नहीं। जब तक संदेह है तभी तक की ही देरी है। मैं देह नहीं हूँ, देह से अधिक महत्वपूर्ण उसी चेतन का अंश हूँ। मैं बूँद हूँ, वह सागर है, प्रभु ने कृपा करके हमें अपनी लीला में सम्मिलित किया है; वह निर्देशक हैं, मैं एक पात्र। मेरा प्रयास यही हो कि मैं निर्देशक पर पूर्ण विश्वास रखते हुए अपने पात्र के अनूकूल अभिनय करूँ और उस अभिनय को इतनी सम्पूर्णता, लगन से करूँ कि जब स्टॆज से ग्रीनरूम में जाऊँ तो निर्देशक प्रसन्न होकर मेरी पीठ पर हाथ फ़ेरे और आगे भी अपने साथ ही रखे। यदि मैने निर्देशक पर विश्वास न करते हुए अपने संवाद या वेशभूषा बदल दी जो पात्र के अनूकूल न हो तो क्या हश्र होगा। पात्र की तो सुताई जनता करेगी ही, निर्देशक भी उसके नाम से हाथ जोड़ देगा।
जैसे किसी नाटक में अलग-अलग स्वाँग धरकर लोग आते हैं और अपनी-अपनी भूमिका निभाकर चले जाते हैं, वैसे ही इस संसाररुपी नाटक में हम लोग आते हैं, सम्बन्ध जोड़ते हैं और अपनी भूमिका पूरी होते ही चले जाते हैं। रंगमंच पर पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका, भाई-बहन, नौकर-मालिक की भूमिका करने वाले, नाटक समाप्त होने के बाद अपने पूर्व रुप में आ जाते हैं और अपने द्वारा अभिनीत पात्रों के अनुसार ही आपस में आचरण नहीं करते। यहाँ वास्तव में कोई किसी का पिता या पुत्र नहीं है। एकमात्र परमात्मा ही सबके परम पिता हैं। प्रभु के लीलामय रंगमंच के पात्र बने हम कभी कोई चेहरा लगाकर कोई पात्र निभा रहे हैं और कभी कोई। इस आनंदमयी लीला में पात्र भी निर्देशक का सानिध्य पाकर अभिभूत हैं और दर्शक भी। सत्य तो यह है कि प्रभु, विश्वास तो करने से ही होता है।
सड़कों पर मदारी, एक छोटे बच्चे के साथ कुछ विस्मयकारी खेल दिखाते हैं जिसमें मदारी, जमूरा बने लड़के को कपड़े से ढककर काट कर दिखाता है। एक बार भारत सेवाश्रम संघ, हरिद्वार के पूज्यवर श्री सत्यमित्रानंदजी ने रूककर जमूरे को बुलाकर पूछा कि क्या तुम्हें इतने खतरनाक खेल दिखाते हुए डर नहीं लगता तो जमूरे बने लड़के का उत्तर था कि नहीं ! मैं अपने उस्ताद की सारी ट्रिक जानता हूँ। यह ऐसी सारगर्भित बात है जो बताती है कि विश्वास क्या है, कैसा हो।
सतों के लिये यह जगत इतना सहज कैसे हो जाता है वह इसलिये कि वह भी अपने उस्ताद की सारी ट्रिक समझते हुए खुद को खेल में शामिल करते हुए भी, खेल की ही भावना से उस्ताद की बाजीगरी के द्वारा, इस जगत को प्रभु के लीलामय रंगमंच पर आमन्त्रित करते रहते है कि आओ, मेरे उस्ताद पर विश्वास करो और जमूरा बनकर आनंद लो, तुम्हारा बाल भी बांका न होगा।
जय जय श्री राधे !

जो उलझा रहा है, वह धर्म नहीं हो सकता

जो उलझा रहा है, वह धर्म नहीं हो सकता या हम धर्म की परिभाषा नहीं जानते । धर्म सुलझाता है, तब, जब हम सुलझना चाहते हैं । यह प्रश्न तो हमारा स्वयं से होना चाहिये कि क्या हम वास्तव में धर्म को जानना चाहते हैं या आत्म-प्रशंसा के लिये धर्म-धर्म का नाटक कर रहे हैं । वस्तुस्थिति तो यह है कि धर्म हमसे दूर नहीं हो रहा, हम धर्म से दूर हो रहे हैं क्योंकि धर्म के साथ चलते हुए हमें अपनी कुत्सित भावनाओं और स्वार्थ की पूर्ति संभव नहीं दिखती अत: "सब यही कर रहे हैं, केवल हमने ही तो धर्म का ठेका नहीं ले रखा है" यह सोचकर हम स्वयं अपने धर्म का परित्याग करते हैं । दास का अनुभव है कि आज जितने सत्संग-कथा-प्रवचन स्थान-स्थान पर हो रहे हैं, उतने कभी भी नहीं हुए। आखिर क्या कारण है कि भगवद-कृपा से इतने कथा-सत्संग-प्रवचनों की उपलब्धता के बाद भी दिन-ब-दिन पाप बढ़ता ही जा रहा है। हर स्थान पर कथा-प्रवचनों में भारी भीड़ के बाद भी मनुष्य-मात्र के आचरण में कोई विशेष बदलाव नहीं दिखायी दे रहा है; बहुत बड़ी संख्या में लोग ठाकुरजी की मंगला आरति के दर्शन करते हैं; बहुत से श्रीहरि के दर्शन के बिना खाते-पीते नहीं। बहुतों ने दर्शन का नियम ले रखा है, बहुतों ने साप्ताहिक दर्शन एवं परिक्रमा का; बहुत से लोग मिलकर कथा का आयोजन करवाते हैं अन्य भंडारों का आयोजन करते हुए स्वयं को गौरवशाली अनुभव करते हैं। श्रीमदभागवत प्रवक्ता बार-बार कहते हैं कि यह कथा मोक्षदायिनी है हमने कथाओं, सत्संग-प्रवचनों में जो भी सुना, उस समय तन्मय होकर सुना, बड़ा आनन्द आया। ह्रदय बार-बार कहता है कि सब सत्य ही तो कहा जा रहा है, प्रभु के प्रति सुप्त प्रेम अनायास छलकने लगता है। मन-मयूर आहलादित होकर नृत्य करने लगता है, अश्रुपात होने लगता है, पाँव स्वयं ही थिरकने लगते हैं परन्तु कथा -प्रवचन से लौटते हुए यह मस्ती शनै: शनै: उतरने लगती है। कुछ देर बाद ही संसार हमारे ऊपर हावी होने लगता है और कुछ ही देर में हमें पूर्णरुप से अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। हम मानो एक बड़े ही मीठे स्वपन से मुक्त होकर "जाग्रत अवस्था" में आ जाते हैं। कटु सत्य तो यह है कि हम धार्मिक हैं ही नहीं। कथा-प्रवचनों को हम एक आनन्द के साधन के रुप में ले रहे हैं जिस प्रकार हम सिनेमा देखते है और अच्छे अभिनय, और पटकथा की प्रशंसा करते हैं, फ़िल्म के कई "डायलाँग्स" को हम रट लेते हैं, और अपनी प्रसन्नता के लिये, दूसरों पर शेखी बघारने के लिये, दोहराते हैं; लेकिन उस कथा की किसी भी अच्छी बात या डायलाँग को किसी भी रुप में अपनाते नहीं; ठीक यही हम कर रहे हैं। कथा तारेगी कब ? जब प्रथम तो वह वक्ता के आचरण में उतरेगी। यदि वक्ता पर भगवद-कृपा है और वह प्रभु-कृपा से प्रभु की लीलाओं के मर्म को समझ गया है तो नि:सन्देह ऐसे वक्ता की कथा का प्रभाव जन-मानस पर पड़ेगा ही। खेद की बात है कि कुछ वक्ताओं ने इसे भी एक "ऐन्टरटेन्मेंन्ट पैकेज" बना दिया है जिसमें कथा का सार कम और सभी रसों का थोड़ा-थोड़ा समावेश करके एक "हिट फ़ार्मूला" बना दिया है जिससे किसका "कल्याण" हो रहा है, वह ही जानें। उससे भी अधिक दोषी हम हैं। हम भी तो कहाँ किसी भी अच्छी बात को अपने आचरण में उतार रहे हैं। परिजनों में हम शेखी बघारते हैं कि - " अरे ! तुम कथा में नहीं गये ? बड़ी अच्छी कथा हो रही है, महाराजश्री ऐसा वर्णन करते हैं कि आत्मा प्रसन्न हो जाती है। अरे भाई ! कभी तो मिला करो। नहीं-नहीं, कल नहीं मिल पाऊँगा, उस समय तो मैं कथा सुनने जाता हूँ।" हम उन्हें जताना चाहते हैं कि हममें और तुममें क्या अन्तर है ? हम कहाँ और तुम कहाँ ? अब हम धार्मिक होने के कारण मन्दिर नहीं जाते, दान नहीं करते, सहायता नहीं करते वरन अधिकाशत: हम यह सब "डर" के कारण करते हैं। शहरों में तो अधिकांशत: ऐसे आयोजन वैभव का प्रदर्शन बन गये हैं; लाखों रुपयों का खर्च, "स्टेट्स सिम्बल" बन गया है। पहिले जिस प्रकार विवाह समारोहों में वैभव का प्रदर्शन होता है अब उससे कहीं अधिक ऐसे आयोजनों में दिखायी देता है और धर्म की मूल भावना ही जब गौड़ हो जाये तो हमारा कल्याण कैसे संभव है ? भागते-दौड़ते हम सोमवार को कहीं हाजिरी लगाते हैं, मंगल को कहीं और, बृहस्पतिवार को कहीं, और शनिवार को कहीं। हमें डर है कि हमारे द्वारा जाने या अनजाने में नित्य ही अपराधों की मात्रा बढ़ती जा रही है, यह ऐसा युग है कि दौड़ में यदि आपने किसी को धक्का नहीं दिया तो वह आपको दे देगा, क्या सही, क्या गलत, क्या नैतिक, क्या अनैतिक; बस, किसी प्रकार आगे निकलना है। लक्ष्य पर पहुँचकर सोचेंगे, अभी तो सब जायज है और यह सब करते हुए जब हमारी आत्मा, हमें कचोटती है तो हम स्वयं ही स्वयं को कुतर्कों की "ऐनस्थिसिया" देकर सुला देते हैं। पर आत्मा कुछ समय बाद पुन: जाग्रत होकर प्रश्न करती है और हमारे पास उत्तर नहीं होता। अपने अन्तर में झाँकने से जब हम घबराने लगते है तब हम भागते हैं किसी संत के पास, मन्दिर में दर्शन करने, कुछ दान-पुण्य करने। हमारा अपराध-बोध हमें दौड़ाता है। विडंबना यह भी है कि ऐसा करने के बाद जब हम वापस अपनी दुनिया में आते हैं तब स्वय़ं पर गर्व अनुभव करते हैं कि हम कितने धार्मिक हैं, हमारे विचार कितने पवित्र हैं: हमारे जैसा तो हमारे आस-पास कोई दिखायी भी नहीं देता ? हम अपनी आत्मा से कहते हैं कि लो कर ली तेरे मन की, अब प्रसन्न ! यदि "अनजाने में" हमसे कुछ गलत भी हो गया हो, किसी का ह्रदय दु:खा हो तो अब तो दान-पुण्य के द्वारा हमने अपना "प्रायश्चित" कर लिया। स्वयं ही स्वयं को दिलासा देकर हम पुन: उन्हीं कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं क्योंकि अब तो हम पवित्र हो ही चुके हैं।
पुनश्च, इसे आत्म-प्रलाप ही समझें। यदि मुझ पतित के इन कठोर शब्दों से किसी भी भक्त ह्रदय को वेदना पहुँचे तो अपना ही नादान, दुष्ट, नालायक बालक समझकर क्षमा करने की कृपा कीजियेगा। जो विक्षिप्त के प्रकार का व्यवहार करता हो और जिसे अपना कल्याण ही समझ न आ रहा हो, उसकी बातों को ह्रदय से मत लगाइयेगा।
हे प्रभु ! हे नाथ ! हे करुणा सागर ! हे जीवनधन ! हे प्रियतम ! हे प्राणनाथ ! मुझ अधम शिरोमणि की एकमात्र आशा ! तुम्हीं अपने कर-कमलों से मुझ पतित को इस पंक से उबारो तो ही उबर सकता हूँ। जिस प्रकार शूकर को पंक में, वैकुण्ठ से भी बढ़कर सुख प्रतीत होता है, हे मोहन ! मुझे भी सांसारिक भोगों ने ऐसे ही मोह लिया है। संतजनों के वचन क्षणिक आनन्द के पश्चात एक कर्ण में प्रवेश कर दूसरे से निकल जाते हैं, भीतर कुछ भी नहीं जा रहा और ढ़ोंग मैं ऐसा करता हूँ मानो कितना विनयी, सरल और पवित्र आचरण वाला तुम्हारा प्रिय भक्त हूँ। हे दीनबंधु ! हे अशरणशरण ! संतों के सम्मुख जब मैं, भक्त होने का नाटक करता हूँ और उस समय जो दो-चार बार तुम्हारा नाम लेता हूँ, चूँकि मुझ पतित से तुम्हें अधिक आशा भी नहीं है अत: तुम इतने से ही मुझ अधम पर प्रसन्न होकर मुसकराते हुए मेरी ओर इंगित कर किसी अपने प्रिय संत को/ भक्त को मेरे कल्याण का भार सौंप देते हो। तुम्हारी कृपा से इतना तो विश्वास हो ही गया है कि तुम मुझे छोड़ोगे नहीं परन्तु नाथ ! यदि ऐसा हो जाये कि मैं आपको नहीं छोडू तो अत्युत्तम होगा। यह होगा भी तभी जब आप करवाओगे। मेरी क्षमता भी नहीं, बुद्धि भी नहीं, अपने कल्याण का मार्ग भी तो नहीं जानता और आप जना भी दो तो भोगों में प्रबल आसक्ति के कारण मैं चलने वाला भी तो नहीं। आज चेतना कुछ जाग्रत सी प्रतीत होती है अत: आपसे आज ही यह प्रार्थना है कि प्रभु ! इतनी दया बनाये रखना कि यह दुष्ट, आपकी चरण-धूलि से पवित्र हो जाये और इसका एकमात्र अवलम्बन आपके चरण-कमल बने रहे, उनसे विलग न होने पावे। सब आप पर ही छोड़ता हूँ, मेरे बस में तो वैसे भी कुछ है ही नहीं। हे पतितपावन ! मुझ पतित को आप निश्चय ही अपने नाम की लाज रखते हुए स्वीकारेंगे क्योंकि राम से बड़ा राम का नाम.......। दीनबंधु ! दीन तुम्हें छोड़कर किसके पास जाये ? हे अशरणशरण ! तुम्हीं शरण न दोगे तो कौन देगा ? 
जय जय श्री राधे !

Thursday, May 9, 2013

भगवान की दया

भगवान की दया

दयामय परमात्मा की सब जीवों पर इतनी दया है की सम्पूर्णरूप से तो उस दयाको मनुष्य समझ ही नहीं सकता | वह अपनी समझके अनुसार अपने ऊपर जितनी अधिक-से-अधिक दया समझता हैं, वह भी नितान्त अल्प ही होती हैं | मनुष्य ईश्वरदया का यथार्थ कल्पना ही नहीं कर सकता | भगवान की वह अनन्त दया सबके ऊपर समभाव से गंगाके प्रवाहकी भाँती नित्य-निरन्तर चारों और से बह रही है | इस दया से जो मनुष्य जितना लाभ उठाना चाहता है, उतना ही उठा सकता है | खेद की बात है की लोग इस रहस्य को न जानने के कारण ही दुखी हो रहे है | यह उनकी मूर्खता है | इन लोगो किन वही दशा समझनी चाहिये, जैसी उस मूर्ख प्यासे मनुष्य की है जो नित्य-निरन्तर शीतल सुमधुर जल को प्रवाहित करने वाली भगवती गंगा के किनारे पड़ा हो, परन्तु ज्ञान न होने के कारण जल न ग्रहण कर प्यास के मारे तड़प रहा हों |

ईश्वर की दया अपार है परन्तु जो जितनी मानता है उतनी ही दया उसको फलती है, इसलिए उस ईश्वर की जितनी अधिक-से-अधिक दया तुम अपने ऊपर समझ सको उन्ती समझनी चाहिये | तुम्हारी कल्पना जितनी अधिक होगी, तुम्हे उतना ही अधिक लाभ होगा | यद्यपि भगवान की दया का थाह उसी प्रकार किसीको नहीं मिलता, जैसे विमान पर बैठ कर आकाशमें उड़ने वाले मनुष्य को आकाश का थाह नहीं मिलता, परन्तु इस दया का थोडा-सा रहस्य जानने पर भी मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है | जैसे अथाह गंगा के प्रवाहमें से मनुष्य की प्यास बुझानेके लिए एक लोटा गंगाजल ही पर्याप्त है वैसे ही अपार, अपरिमित दयासागरकी दया के एक कारण से ही मनुष्य की अनन्त-जन्मों की शोकाअग्नि सदा के लिए शान्त हो जाती है | यह तुलना भी पर्याप्त नहीं है, क्योकि साधारण जलबुद्धि से पीये हुए गंगाजल के एक लोटे जल से तो मनुष्य की प्यास थोड़ी देर के लिए शान्त होती है, परन्तु ईश्वर की दया के कण से तो भय, शोक और दुखों की निवृति एवं शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति सदा के लिए हो जाती है | अतएव सबको चाहिये की उस परमेश्वर के शरण होकर उसकी दया की खोज करे |

Saturday, April 27, 2013

दान

प्रश्न‒दान देनेमें, सेवा करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं ?

उत्तर‒अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका विचार नहीं करना चाहिये । जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है । परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश, काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये ।

अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें यदि हम पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो जायगा ! अतः हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल आदि दे देना चाहिये । यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा ।

प्रश्न‒दूसरोंको देनेसे लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अतः देनेसे क्या लाभ ?

उत्तर‒दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात्‌ उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय । यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात्‌ देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है । यदि देनेवाला निःस्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा ! 

रामायणमें आया है‒
सर्बस दान दीन्ह सब काहू ।
जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥
(मानस, बाल॰ १९४/४)

शीघ्र कल्याण चाहने वाले मनुष्य को


शीघ्र कल्याण चाहने वाले मनुष्य को परमात्माकी प्राप्ति के सिवा और किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि इसके सिवा सब इच्छाएँ जन्म-मृत्यु रूप संसार-सागर में भरमाने वाली हैं ।

परमात्मा की प्राप्ति के लिये मनुष्य को अर्थ और भाव के सहित शास्त्रों का अनुशीलन और एकान्त में बैठकर जप-ध्यान तथा आध्यात्मिकविषय का विचार नियमपूर्वक  नित्य करना चाहिये ।

अनिच्छा या परेच्छा से होने वाली घटना को भगवान् का भेजा हुआ पुरस्कार मान लेने पर काम- क्रोध आदि शत्रु पास नहीं आ सकते, जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धकार नहीं आ सकता ।

जीव, ब्रह्म और माया के तत्त्व को समझनेके लिये एकान्त में बैठकर विवेक और वैराग्ययुक्त चित्तसे नित्यप्रति परमात्मा का चिंतन करते हुए अध्यात्म-विषय का विचार करना चाहिये ।

जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्त्व-रहस्य को जान लिया है, उसके शान्ति और आनन्द की सीमा नहीं रहती ।

जो अपने-आप को ईश्वरके अर्पण कर चुका है और ईश्वरपर ही निर्भर है, उसकी सदा-सर्वदा सब प्रकार से ईश्वर रक्षा करता है, इससे वह सदा के लिये निर्भय-पदको प्राप्त हो जाता है ।

प्रेमपूर्वक जप सहित भगवान् के ध्यान का अभ्यास, श्रद्धापूर्वक सत्पुरुषोंका संग, विवेकपूर्वक भावसहित सत- शास्त्रों का स्वाध्याय, दु:खी, अनाथ, पूज्यजन तथा वृद्धों की नि:स्वार्थभावसे सेवा — इनको यदि कर्तव्यबुद्धिसे किया जाय तो ये एक-एक साधन शीघ्र कल्याण करने वाले हैं ।

भगवान् बहुत बड़े दयालु और प्रेमी हैं । जो साधक उनका तत्त्व समझ जायगा, वह भगवान् की शरण होकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जायगा ।

सर्वत्र भगवद्भावके सामान कोई भाव नहीं है और सर्वत्र भगवद्भाव होने से दुर्गुण और दुरुचारों का अत्यंत अभाव होकर सद्गुण और सदाचार अपने –आप ही आ जाते हैं ।

वस्तुमात्र को भगवान् का स्वरुप और चेष्टामात्र को भगवान् की लीला समझने समझने से भगवान् का तत्त्व समझ में आ जाता है ।

Monday, April 15, 2013

हनुमान जी की उपासना


हनुमान जी की उपासना केवल भारत भूमि में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य भाग जैसे जावा-सुमित्रा’ लंका, थाई, मारीशस, बर्मा अफगानिस्तान, जापान आदि से लेकर यूरोप व समस्त विश्व में होती है। श्री हनुमान उन सप्तऋषि में से एक है जिन्हें वरदान प्राप्त है कि चिरंजीवी रहेंगे- (अश्ववत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, शक, कृपाचार्य परशुराम)

हनुमान वेग में वायु देवता तथा गति में गरुड़ देवता के सक्षम हैं। भगवान के उत्तर दिशा के पार्षद कुबेर की गदा इन पर रहती है जिसमें अधर्म करने को दण्ड देने के अधिकारी हैं। इनकी गदा संग्राम में विजय दिलाने वाली हैं अतः साधकों को धर्मच्युत व्यवहार के लिए मारुति की गदा का भी ध्यान व पूजन अभीष्ट है।

यदि साधक मृत्युतुल्य कष्ट से ग्रस्त हो, तो मंगलमूर्ति का ध्यान हाथ में संजीवनी का पहाड़ लिये, साथ में सुषेण वैद्य का भी ध्यान करना चाहिये।

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।

यह हमेशा याद रखें कि हनुमत सिद्ध के लिये राम उपासना की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि भगवान राम के अयोध्या से साकेत को प्रस्थान करते समय हनुमान को आदेश दिया था कि तुम मेरी कथा का प्रचार-प्रसार करते हुये मेरे भक्तों के समीप रहो, कल्पपर्यन्त पृथ्वी पर निवास करते रहो। अतः जहाँ भी रामकथा होती है हनुमान अपने लूक्ष्म शरीर से उपस्थित रहते हैं। तुलसी बाबा ने इनके सान्निध्य से ही रामकथा मानस पूरी की।

==== जय श्री राम ====
हनुमान जी की उपासना केवल भारत भूमि में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य भाग जैसे जावा-सुमित्रा’ लंका, थाई, मारीशस, बर्मा अफगानिस्तान, जापान आदि से लेकर यूरोप व समस्त विश्व में होती है। श्री हनुमान उन सप्तऋषि में से एक है जिन्हें वरदान प्राप्त है कि चिरंजीवी रहेंगे- (अश्ववत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, शक, कृपाचार्य परशुराम)

हनुमान वेग में वायु देवता तथा गति में गरुड़ देवता के सक्षम हैं। भगवान के उत्तर दिशा के पार्षद कुबेर की गदा इन पर रहती है जिसमें अधर्म करने को दण्ड देने के अधिकारी हैं। इनकी गदा संग्राम में विजय दिलाने वाली हैं अतः साधकों को धर्मच्युत व्यवहार के लिए मारुति की गदा का भी ध्यान व पूजन अभीष्ट है।

यदि साधक मृत्युतुल्य कष्ट से ग्रस्त हो, तो मंगलमूर्ति का ध्यान हाथ में संजीवनी का पहाड़ लिये, साथ में सुषेण वैद्य का भी ध्यान करना चाहिये।

दुर्गम काज जगत के जेते। 
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।

यह हमेशा याद रखें कि हनुमत सिद्ध के लिये राम उपासना की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि भगवान राम के अयोध्या से साकेत को प्रस्थान करते समय हनुमान को आदेश दिया था कि तुम मेरी कथा का प्रचार-प्रसार करते हुये मेरे भक्तों के समीप रहो, कल्पपर्यन्त पृथ्वी पर निवास करते रहो। अतः जहाँ भी रामकथा होती है हनुमान अपने लूक्ष्म शरीर से उपस्थित रहते हैं। तुलसी बाबा ने इनके सान्निध्य से ही रामकथा मानस पूरी की। 

==== जय श्री राम ====

Thursday, April 11, 2013

राम राज्याभिषेक.

नव संवत्सर के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी। 

....राम राज्याभिषेक....



अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई।
देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी।
श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ ॥

भगवान् के वचनसुनते ही सेवक जहाँ -तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया।
फिर करुणानिधान श्री रामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया ॥

तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया।
भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥

फिर श्री रामजी ने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया।
स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए।
उनके (सुशोभित) अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गए ॥

(इधर) सासुओं ने जानकीजी को आदर के साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भली- भाँतिसजा दिए (पहना दिए) ॥

श्री राम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान रमा (श्री जानकीजी) शोभित हो रही हैं।
उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥

(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए, उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानों पर चढ़कर सब देवता आनंदकंद भगवान् के दर्शन करने के लिए आए ॥

प्रभु को देखकर मुनि वशिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया।
उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान था।
उसका सौंदर्य वर्णन नहीं किया जा सकता।
ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्री रामचंद्रजी उस पर विराज गए ॥

श्री जानकीजी के सहित रघुनाथजी को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यंत ही हर्षित हुआ।
तब ब्राह्मणों ने वेदमंत्रों का उच्चारण किया।
आकाश में देवता और मुनि'जय, हो , जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥

(सबसे) पहले मुनि वशिष्ठजी ने तिलक किया।
फिर उन्होंने सब ब्राह्मणों को (तिलक करने की ) आज्ञा दी।
पुत्र को राजसिंहासन पर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥

उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए और संपूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)।
त्रिभुवन के स्वामी श्री रामचंद्रजी को (अयोध्या के) सिंहासन पर (विराजित) देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए ॥

आकाश में बहुत से नगाड़े बज रहे हैं।
गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं।
अप्सराओं के झुंड के झुंड नाच रहे हैं।
देवता और मुनि परमानंद प्राप्त कर रहे हैं।
भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी , विभीषण, अंगद, हनुमान् और सुग्रीव आदि सहित क्रमशः छत्र, चँवर, पंखा , धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए हुए सुशोभित हैं ॥

श्री सीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्री रामजी के शरीर में अनेकों कामदेवों की छबि शोभा दे रही है।
नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुंदर श्याम शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को भी मोहित कर रहा है।
मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए हैं।
कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥

हे पक्षीराज गरुड़जी ! वह शोभा , वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता।
सरस्वतीजी , शेषजी और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनंद) महादेवजी ही जानते हैं॥

सब देवताअलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए।
तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥

कृपानिधानसर्वज्ञ प्रभु ने (उन्हें पहचानकर) उनका बहुत ही आदर किया।
इसका भेद किसी ने कुछ भी नहीं जाना।
वेद गुणगान करने लगे ॥

सगुण और निर्गुण रूप!
हे अनुपम रूप- लावण्ययुक्त!
हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो।
आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला।
आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया।
हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो।
मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥

हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता , राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए)दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं।
हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि) से देख लिया , वे (माया जनित) तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गए।
हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्री रामजी ! हमारी रक्षा कीजिए।
हम आपको नमस्कार करते हैं॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव- दुर्लभ(देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं।
हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर (शिला बनी हुई) गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गई, जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जाने से घट्ठे पड़ गए हैं, हे मुकुन्द!
हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं ॥

वेदशास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है,
जो (प्रवाह रूप से) अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं, जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है, जिसमें नित्य नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्व रूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥॥

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-(जो इस प्रकार कहकर उस) ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किंतु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं।
हे करुणा के धाम प्रभो ! हे सद्गुणों की खान!
हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें॥॥

वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की।
फिर वे अंतर्धान हो गए और ब्रह्मलोक को चले गए ॥

काकभुशुण्डिजी कहते हैं- हे गरुड़जी ! सुनिए, तब शिवजी वहाँ आए जहाँ श्री रघुवीर थे और गद्गद् वाणी से स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया-॥॥

हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकांत)! हे जन्म- मरण के संताप का नाश करने वाले! आपकी जय हो, आवागमन के भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिए।
हे अवधपति ! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिए॥॥

हे दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्री रामजी! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गए॥॥

आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर आभूषण हैं,
आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किए हुए हैं।
महान् मद, मोह और ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह के नाश करने के लिए आप सूर्य के तेजोमय किरण समूह हैं ॥॥

कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरनों के हृदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है।
हे नाथ! हे (पाप- ताप का हरण करने वाले) हरे !
उसे मारकर विषय रूपी वन में भूल पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए ॥॥

लोग बहुत से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं।
ये सब आपके चरणों के निरादर के फल हैं।
जो मनुष्य आपके चरणकमलों में प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागर में पड़े हैं ॥

जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥॥

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ, न मान है, न मद।
उनको संपत्ति सुख और विपत्ति (दुःख) समान है।
इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिए त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरंतर शुद्ध हृदय सेआपके चरणकमलों की सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदर को समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वी पर विचरते हैं ॥॥

हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्री रघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)
हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ।
आप जन्म-मरण रूपी रोग की महान् औषध और अभिमान के शत्रु हैं॥॥

आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं।
आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ।
हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख- दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए।
हे पृथ्वी का पालन करने वाले राजन्।
इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥॥

मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरण कमलों की अचल भक्ति और आपके भक्तों का सत्संग सदा प्राप्त हो।
हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिए॥

श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलास को चले गए।
तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाए ॥॥

हे गरुड़जी ! सुनिए यह कथा (सबको) पवित्र करने वाली है, (दैहिक, दैविक, भौतिक) तीनों प्रकार के तापों का और जन्म-मृत्यु के भयका नाश करने वाली है।

महाराज श्री रामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र (निष्कामभाव से) सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥॥

और जो मनुष्य सकामभाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकार के सुख और संपत्ति पाते हैं।
वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में श्री रघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं ॥॥

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे (क्रमशः ) भक्ति, मुक्ति और नवीन संपत्ति (नित्य नए भोग) पाते हैं।
हे पक्षीराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो (जन्म- मरण) भय और दुःख हरने वाली है ॥॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है तथा मोह रूपी नदी के (पार करने) के लिए सुंदर नाव है।
अवधपुरी में नित नए मंगलोत्सव होते हैं।
सभी वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं॥॥

श्री रामजी के चरणकमलों में- जिन्हें श्री शिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं, सबकी नित्य नवीन प्रीति है।
भिक्षुकों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाए गए और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाए ॥

Saturday, April 6, 2013

हनुमान् जी के स्वरूप का परिचय

हनुमान् जी के स्वरूप का परिचय
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आजकल बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग शंका करते हैं कि क्या हनुमान् जी वानर थे ?इस विषय पर कुछ निर्णय देने के पूर्व हम यह बतलाना चाहेंगे कि किसी वस्तु केविषय में हम उसका स्वरूप या गुण आदि किसी न किसी प्रमाण के आधार परनिश्चित करते हैं ।जैसे किसी व्यक्ति के रूप का परिचय पाने के लिए हमें नेत्ररूपी प्रमाणकीआवश्यकता होती है ।अब उसका रूप काला है या गोरा ? इसका निश्चय कान, घ्राण,श्रोत्र आदि इन्द्रियरूपी प्रमाण नही करा सकते । यह तो नेत्र से ही ज्ञात होगा कि रूप काला हैया गोरा ।ठीक इसी प्रकार हमें हनुमान् जी के विषय में समझना होगा । कि उनका ज्ञान हमेंकिस प्रमाण से हुआ ?प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द -- प्रसिद्ध इन चारों प्रमाणों में शब्द प्रमाणको छोड़कर कोई दूसरा प्रमाण ऐसा नही है जो उनका ज्ञान हमें करा सके ।उस शब्दप्रमाण में वेदावतार वाल्मीकि रामायण जो परम आप्त महर्षि वाल्मीकिप्रणीत है । उस शब्दप्रमाणीभूत रामायण से हमें सर्वप्रथम हनुमान् जी का ज्ञानहोता है ।वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग में हनुमान् जी का प्रथम परिचय हमें उस समय मिलता है जब श्रीराम उनसे पम्पा सरोवर के समीप मिलते हैं ।उस समय उनका स्वरूप निरूपित करते हुए महर्षि कहते हैं कि श्रीराम हनुमान् नामक वानर से मिले --

पम्पातीरे हनुमता संगतो वानरेण ह।। -1/58,
जिस प्रमाण से हमें हनुमान् जी का ज्ञान हो रहा है ,उसी से वे वानर भी सिद्ध हो रहे हैं ,जैसे रूप के काले या गोरे होने की सिद्धि चक्षुरूपी प्रमाण से ।जब मारुति लंका में जानकी जी का अन्वेषण करते हुए मन्दोदरी को देखते है तब वे उसे सीता समझकर प्रसन्नता के कारण अपनी पूछ चूमते है और खम्भे पर चढकर नीचे कूदते है तथा अपने वानरोचित स्वभाव को दिखलाते हैं --

आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम ।

स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन्स्वां प्रकृतिं कपीनाम् ।।

[वा0रा0सुन्दरकाण्ड--10/54,]
इससे ये वानर सिद्ध होते हैं ।किन्तु आजकल के वानरों की भांति लड्डू चुराने वाले प्रवृत्ति वाला वानर समझने की भूल मत कर बैठना ।ये समस्त सिद्धियों से सम्पन्न महातेजस्वी, बालि सुग्रीव की अपेक्षया अप्रमेय बलशाली हैं ।

अशोकवाटिका में इनके अद्भुत कार्यों की बात सुनकर लंकापति रावण व्यथित
होकर कहता है कि मैं उसके कार्यों पर विचारकर यही मानता हूं कि वह वानर नही है ----
नह्यहं तं कपिं मन्ये कर्मणा प्रतितर्कयन् ।

सर्वथा तन्महद्भूतं महाबल परिग्रहम् । ।

[सुन्दरकाण्ड-46/6.]

रावण कहता है कि मैने बालि सुग्रीव जाम्बवान् सेनिपति नील जैसे विपुल बलशाली वानरों को देखा है --

दृष्टा हि हरयः पूर्वं मया विपुलविक्रमाः ।

बाली च सह सुग्रीवो जाम्बवाश्च महाबलाः ।। 46/12,

किन्तु उन सबकी गति इतनी भयंकर नही थी ,न ऐसा तेज और पराक्रम ही था।उनमें इसके जैसा बल उत्साह बुद्धि और रूप बदलने की ऐसी शक्ति भी नही थी--

नैव तेषां गतिर्भीमा न तेजो न पराक्रमः ।।
न मतिर्न बलोत्साहो न रूप परिकल्पनम् ।
महत्सत्वमिदं ज्ञेयं कपिरूपं व्यवस्थितम् । ।
--[ सु0का046/13-14,]

जब रावण जैसा विद्वान् हनुमान् जी की अद्भुत कार्यक्षमता परम पराक्रम आदि
को देखकर वानर मानने को तैयार नही है ।तो आजकल के बुद्धिजीवी उन्हे वानर मानने में सन्देह करें तो क्या आश्चर्य!
रावण का मन्त्री भी सभा में मारुति से कहता है कि तुम्हारा तेज वानरों जैसा नहीहै केवल रूप ही वानर का है --

नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं हि वानरम् । --50/10/

पर हनुमान् जी का जब रावण आदि को दर्शन होता है तब वे सब उन्हें वानर
मानने को विवश हो जाते हैं ।अत एव रावण उनके लिए आगे वानर शब्द का ही प्रयोग करता है--
तस्मादिमं वधिष्यामि वानरं पापकारिणम् । --52/11,

हनुमान् जी माँ जानकी को अपना परिचय रामदूत के रूप में अपने को वानर कहत हुए ही देते हैं ---

वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः ।

[सुन्दरकाण्ड--36/2,]
अतः हनुमान् जी वानर ही थे ।उन्हे मानव या अन्य जातीय माना शास्त्रप्रमाण विरुद्ध है ।किन्तु ये साधारण वानर नही अपितु उपदेव हैं ।जिनके कुल में शिक्षा आदि का प्रचुर प्रचलन था । अत एव ये " गायत्रीजापक "नाम से अभिहित किये गये हैं ।ये साक्षात् भगवान् शंकर तथा कालके भी काल हैं --
नूमांस्तु महादेवः कालकालः सदाशिवः।

------रुद्रयामल, हनुमत्सहस्रनाम,8,

विनयपत्रिका में इन्हे " वानराकार विग्रह पुरारी" कहा गया है ।ये वानर रूप में साक्षात्महाकाल भगवान् शंकर हैं ।किन्तु ये देवेन्द्रवन्दित होने के साथ ही गायत्रीजापक रामनाममय तथा 7 करोड़महामन्त्र से युक्त विग्रह वाले हैं ।-----

सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवः प्रभुः |
-[-ह्० स०नाम् --७]
इनके सहस्रनाम में इनका एक नाम "भक्तांहःसहनो" आया है । जिसका अर्थ है---"भक्तों का अपराध सहन करने वाले" ।नारियां भी इनकी उपासना मन्त्र आदि का जप कर सकती हैं ---"नागकन्याभयध्वंसी" "सप्तमातृनिषेवितः" ये दोनों नाम तथा लोपामुद्रा को अगस्त्य जी द्वारा प्रदत्त कवच, पार्वती जी को भगवान् शिव से प्राप्त कवच इस कथन में प्रमाण है ।

»»»»जय श्रीराम««««

इस तरह रामचरित मानस बना धर्म शास्त्र

ramayan करीब पांच सौ साल पहले तक कोई धर्म ग्रंथ हिंदी में नहीं था। सभी धर्म ग्रंथ संस्कृत में थे और चूंकि मध्य काल में शिक्षा दीक्षा का चलन काफी कम हो गया था, भक्ति भावना या धर्म श्रद्धा के लिए लोग संस्कृत विद्वानों की ओर ही ताकते थे।

ऐसा कोई शास्त्र नहीं था, जो लोगों की अपनी भाषा में हो। गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस लिख कर एक समाधान दिया था, लोकिन कठिनाई यह थी कि विद्वानों और धर्माचार्यों ने इसे मान्यता नहीं दी।

इसलिए धर्म भावना से भरे लोगों के मन में यह फांस अटकी रहती थी कि वे राम कथा से तो प्रेरणा ले रहे हैं लेकिन उनकी जानकारी का जो स्त्रोत है, वह धर्म शास्त्र नहीं है। क्योंकि धर्मशास्त्र तो संस्कृत में ही हो सकता है। पुरानी मान्यता है कि कोई शास्त्र अथवा ग्रंथ लोकप्रिय होने से स्वीकार्य नहीं हो जाता। 

स्वीकार्य वह रचना होती है जिसे विद्वतजनों ने मान्यता दी हो। तुलसीदास के मन में मानस की शुरुआत करते ही यह बात आई थी। उन्होंने हिंदी में ही रामकथा की रचना शुरू की। दो वर्ष सात महीने और छब्बीस दिन में सन् 1576 में यह रचना पूरी हुई।

कहते हैं कि रचना लेकर गोस्वामी जी काशी चले गए। वहां विश्वनाथ मंदिर में पहली बार इसका पाठ किया। वहां पंडितों ने रचना को सराहा तो सही लेकिन संस्कृत में नहीं होने की वजह से इसे काव्य की मान्यता नहीं दी। 

गोस्वामीजी इससे क्षुब्ध हो गए। मानस के संबंध में प्रचलित किवदंतियों के अनुसार काशी विश्वनाथ मंदिर में रखे जाने के बाद ग्रंथ पर सत्यम, शिवम सुंदरम के साथ भगवान शिव का नाम लिखा मिला। अनुश्रुति के अनुसार यह काशी विश्वनाथ की स्वीकृति थी।

लेकिन इस कहानी को मनगढंत माना गया है। रामचरितमानस के संबंध में इस तरह की कितनी ही कहानियां प्रचलित है जो उसकी महिमा को व्यक्त करती है। जैसे एक तो यही कि रामचरित मानस को चुराने के लिए चोर गए, वहां तुलसी की कुटिया में राम और लक्ष्मण पहरा देते हुए दिखाई दिए।

इस तरह की तमाम किवदंतियों के बावजूद मानस को शास्त्र की मान्यता नहीं मिली थी। उस समय के प्रसिद्ध रामभक्त संत नाभादास ने मानस के महत्व को समझा और इस ग्रंथ को लेकर विद्वानों के पास गए।

स्वामी ज्ञानानंद, हरीराम तर्कवागीश, गदाधर भट्टाचार्य, विश्वेश्वर सरस्वती, माधव सरस्वती, नारायण तीर्थ आदि विद्वानों ने रामचरित मानस को देखा पढ़ा और सराहा, किंतु उसे शास्त्र की मान्यता देने में असमर्थता जताई।

असमर्थता इसलिए कि इनमें से कोई भी विद्वान रामचरितमानस पर टिप्पणी करता तो यह उसकी अपनी राय होती। हरीराम तर्कवागीश ने राय दी कि प्रयाग कुंभ के समय सभी संतजन और विद्वान एकत्रित होंगे। ग्रंथ को उनके सामने रखा जाए, सभी संत और धर्माचार्य विचार करें फिर इस संबंध में सर्वसम्मति से इस विषय में कोई निर्णय लिया जाए।

कुंभ पर्व में अभी सात वर्ष की देर थी। इसलिए साल भर बाद 1577 में होने वाले समष्टि समारोह (संत समागम) पर अर्धकुंभ पर उस बारे में विचार की बात सोची गई। यह अर्धकुंभ का अवसर भी था।

संगीति की अध्यक्षता अद्वैत वेदांत के प्रमुख विद्वान मधुसूदन सरस्वती कर रहे थे। उन्होंने संगीति में उपस्थित सभी विद्वानों से ग्रंथ की परीक्षा के लिए कहा। इस काम में लगभग एक माह लगा।

परीक्षा में ग्रंथ के चरितनायक, सर्ग अर्थात सृष्टि का वर्णन, धर्म मर्यादा, अर्थ, काम और मोक्ष तथा लोकरीतियों के संपूर्ण मार्गदर्शन की संभावना को परखना था। एक माह बाद सभी विद्वानों ने अपने अपने निष्क र्ष आचार्य मधुसूदन सरस्वती को सौंपे।

माघ मेला समाप्त होने को था और उस वर्ष प्रयाग के तट पर कुंभ का आयोजन चल रहा था। आचार्य ने घोषणा की कि सभी विद्वानों ने रामचरितमानस में शास्त्र में निर्धारित विशेषताएं देखी और प्रमाणित की हैं।

इसलिए मानस को धर्म शास्त्र माना जा सकता है। उल्लेखनीय है कि रामचरितमानस के बाद से अब तक किसी और ग्रंथ को धर्मशास्त्र की मान्यता नहीं मिली है।

सिर्फ इसी ग्रंथ के सप्ताह नवाह्न और मास पारायण के विधि विधान निर्धारित हैं। हिंदी या भाषा का पहला धर्मशास्त्र है जिसके छंदों को मंत्रों की मान्यता मिली है। और बहुतों ने उनकी� साधना की है उसके सत्परिणाम देखे हैं। 

Thursday, April 4, 2013

गुरु गोरखनाथ

गुरु गोरखनाथ हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथ समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर माँ पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है। इन्हें चौरासी सिद्धों में प्रमुख माना जाता है। इनके उपदेशों में योग और शैव तंत्रों का सामंजस्य है। ये नाथ साहित्य के आरम्भकर्ता माने जाते हैं। गोरखनाथ की लिखी गद्य-पद्य की चालीस रचनाओं का परिचय प्राप्त है। इनकी रचनाओं तथा साधना में योग के अंग क्रिया-योग अर्थात् तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान को अधिक महत्व दिया है। गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए। शून्य समाधि अर्थात् समाधि से मुक्त हो जाना और उस परम शिव के समान स्वयं को स्थापित कर ब्रह्मलीन हो जाना, जहाँ पर परम शक्ति का अनुभव होता है। हठयोगी कुदरत को चुनौती देकर कुदरत के सारे नियमों से मुक्त हो जाता है और जो अदृश्य कुदरत है, उसे भी लाँघकर परम शुद्ध प्रकाश हो जाता है।
गोरखनाथ के जीवन से सम्बंधित एक रोचक कथा इस प्रकार है- एक राजा की प्रिय रानी का स्वर्गवास हो गया। शोक के मारे राजा का बुरा हाल था। जीने की उसकी इच्छा ही समाप्त हो गई। वह भी रानी की चिता में जलने की तैयारी करने लगा। लोग समझा-बुझाकर थक गए पर वह किसी की बात सुनने को तैयार नहीं था। इतने में वहां गुरु गोरखनाथ आए। आते ही उन्होंने अपनी हांडी नीचे पटक दी और जोर-जोर से रोने लग गए। राजा को बहुत आश्चर्य हुआ। उसने सोचा कि वह तो अपनी रानी के लिए रो रहा है, पर गोरखनाथ जी क्यों रो रहे हैं। उसने गोरखनाथ के पास आकर पूछा, ‘महाराज, आप क्यों रो रहे हैं?’ गोरखनाथ ने उसी तरह रोते हुए कहा, ‘क्या करूं? मेरा सर्वनाश हो गया। मेरी हांडी टूट गई है। मैं इसी में भिक्षा मांगकर खाता था। हांडी रे हांडी।’ इस पर राजा ने कहा, ‘हांडी टूट गई तो इसमें रोने की क्या बात है? ये तो मिट्टी के बर्तन हैं। साधु होकर आप इसकी इतनी चिंता करते हैं।’ गोरखनाथ बोले, ‘तुम मुझे समझा रहे हो। मैं तो रोकर काम चला रहा हूं तुम तो मरने के लिए तैयार बैठे हो।’ गोरखनाथ की बात का आशय समझकर राजा ने जान देने का विचार त्याग दिया।
कहा जाता है कि राजकुमार बप्पा रावल जब किशोर अवस्था में अपने साथियों के साथ राजस्थान के जंगलों में शिकार करने के लिए गए थे, तब उन्होंने जंगल में संत गुरू गोरखनाथ को ध्यान में बैठे हुए पाया। बप्पा रावल ने संत के नजदीक ही रहना शुरू कर दिया और उनकी सेवा करते रहे। गोरखनाथ जी जब ध्यान से जागे तो बप्पा की सेवा से खुश होकर उन्हें एक तलवार दी जिसके बल पर ही चित्तौड़ राज्य की स्थापना हुई।
गोरखनाथ जी ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे राँझा ने गोरखनाथ से योग दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथ से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। उत्तरप्रदेश के गोरखपुर शहर का नाम गोरखनाथ जी के नाम पर ही पड़ा है। यहाँ पर स्थित गोरखनाथ जी का मंदिर दर्शनीय है।
गोरखनाथ जी से सम्बंधित एक कथा राजस्थान में बहुत प्रचलित है। राजस्थान के महापुरूष गोगाजी का जन्म गुरू गोरखनाथ के वरदान से हुआ था। गोगाजी की माँ बाछल देवी निःसंतान थी। संतान प्राप्ति के सभी यत्न करने के बाद भी संतान सुख नहीं मिला। गुरू गोरखनाथ ‘गोगामेडी’ के टीले पर तपस्या कर रहे थे। बाछल देवी उनकी शरण मे गईं तथा गुरू गोरखनाथ ने उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया और एक गुगल नामक फल प्रसाद के रूप में दिया। प्रसाद खाकर बाछल देवी गर्भवती हो गई और तदुपरांत गोगाजी का जन्म हुआ। गुगल फल के नाम से इनका नाम गोगाजी पड़ा। गोगाजी वीर और ख्याति प्राप्त राजा बने। गोगामेडी में गोगाजी का मंदिर एक ऊंचे टीले पर मस्जिदनुमा बना हुआ है, इसकी मीनारें मुस्लिम स्थापत्य कला का बोध कराती हैं। कहा जाता है कि फिरोजशाह तुगलक सिंध प्रदेश को विजयी करने जाते समय गोगामेडी में ठहरे थे। रात के समय बादशाह तुगलक व उसकी सेना ने एक चमत्कारी दृश्य देखा कि मशालें लिए घोड़ों पर सेना आ रही है। तुगलक की सेना में हाहाकार मच गया। तुगलक की सेना के साथ आए धार्मिक विद्वानों ने बताया कि यहां कोई महान सिद्ध है जो प्रकट होना चाहता है। फिरोज तुगलक ने लड़ाई के बाद आते समय गोगामेडी में मस्जिदनुमा मंदिर का निर्माण करवाया। यहाँ सभी धर्मो के भक्तगण गोगा मजार के दर्शनों हेतु भादौं (भाद्रपद) मास में उमड़ पडते हैं।

Tuesday, April 2, 2013

51 शक्तिपीठों में कामाख्या

हिन्दू धर्म में देवी के 51 शक्तिपीठों में से कामाख्या या कामरूप शक्तिपीठ का विशेष महत्व है। यह भारत की पूर्व-उत्तर दिशा में असम प्रदेश के गुवाहाटी में स्थित होकर कामाख्या देवी मन्दिर के नाम से प्रसिद्ध है। पुराणों के अनुसार यह देवी का महाक्षेत्र है। यह मन्दिर नीलगिरी नामक पहाड़ी पर स्थित है। यह क्षेत्र कामरूप भी कहलाता है। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि देवी कृपा से कामदेव को अपना मूल रूप प्राप्त हुआ।

देश में स्थित विभिन्न पीठों में से कामाख्या पीठ को महापीठ माना जाता है। इस मंदिर में 12 स्तम्भों के मध्य देवी की विशाल मूर्ति है। मंदिर एक गुफा में स्थित है। यहां जाने का मार्ग पथरीला है, जिसे नरकासुर पथ भी कहा जाता है।

मंदिर के पास ही एक कुण्ड है, जिसे सौभाग्य कुण्ड कहते हैं। इस स्थान को योनि पीठ के नाम से भी जाना जाता है। क्योंकि यहां देवी की देह का योनि भाग गिरा था। यहां पर देवी का शक्ति स्वरूप कामाख्या है एवं भैरव का रूप उमानाथ या उमानंद है। उमानंद को भक्त माता का रक्षक मानते हैं।

कथा- शिव जब सती के मृत देह लेकर वियोगी भाव से घूम रहे थे, तब भगवान विष्णु ने उनका वियोग दूर करने के लिए अपने सुदर्शन चक्रसे सती के मृत देह के टुकड़े कर दिए। इसके बाद ब्रह्मदेव और भगवान विष्णु ने उन्हें सती के अपार शक्ति के बारे में ज्ञान दिया। तब भगवान शंकर ने कहा मुझे ज्ञान प्राप्त होने पर भी मेरे मन से सती के अलगाव का दु:ख समाप्त नहीं हो रहा। तब ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शंकर ने देवी भगवती की प्रसन्नता के लिए इसी कामरूप स्थान पर तपस्या की, जिससे प्रसन्न होकर देवी ने भगवान शंकर को वर दिया कि वे हिमवान के यहां गंगा और पार्वती के रूप में जन्म लेकर उनसे विवाह करेंगी और ऐसा ही हुआ।

महत्व- कामाख्या देवी मंदिर में मान्यता है कि यहां देवी को लाल चुनरी या वस्त्र चढ़ाने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं । देवी की मात्र पूजा एवं दर्शन से सभी विघ्न, कष्ट दूर हो जाते हैं। यहां कन्या पूजन की भी परंपरा है।
कामाख्या देवी मंदिर आषाढ़ माह में तीन दिवस के लिए बंद रहता है। पौष माह के कृष्ण पक्ष की द्वितीया-तृतीया को हर-गौरी महोत्सव भी मनाया जाता है। जिसमें देवी के अनुष्ठान, पूजा व यज्ञ आदि होते हैं।

रोगों से मुक्ति दिलाती हैं माता शीतला और उनका मंत्र


रोगों से मुक्ति दिलाती हैं माता शीतला और उनका मंत्र

चैत्र कृष्णपक्ष अष्टमी तिथि को महाशक्ति के एक प्रमुख रूप शीतलामाता की पूजा पुराने समय से की जाती रही है।

इस वर्ष यह तिथि तीन अप्रैल को है शीतला की आराधना दैहिक तापों ज्वर, राजयक्ष्मा, संक्रमण तथा अन्य विषाणुओं के दुष्प्रभावों से मुक्ति दिलाती हैं।

मान्यता है कि ज्वर, चेचक, एड्स, कुष्ठरोग, दाहज्वर, पीतज्वर, विस्फोटक, दुर्गन्धयुक्त फोड़े तथा अन्य चर्मरोगों से आहत होने पर मां की आराधना रोगमुक्त कर देती है।

यही नहीं व्रती के कुल में भी यदि कोई इन रोंगों से पीड़ित हो तो ये रोग-दोष दूर हो जाते हैं। इन्हीं की कृपा से मनुष्य अपना धर्माचरण कर पाता है बिना शीतला माता की अनुकम्पा के देहधर्म संभव नहीं है।

मां का पौराणिक मंत्र 'हृं श्रीं शीतलायै नमः' भी प्राणियों को सभी संकटों से मुक्ति दिलाते हुए समाज में मान सम्मान दिलाता है। मां के वंदना मंत्र में भाव व्यक्त किया गया है कि शीतला स्वच्छता की अधिष्ठात्री देवी हैं।

शीलता माता के हाथ में झाड़ू और कलश होता है। हाथ में झाडू होने का अर्थ है कि हम लोगों को भी सफाई के प्रति जागरूक होना चाहिए।

कलश में सभी तैतीस करोड देवी देवताओं का वास रहता है अतः इसके स्थापन-पूजन से घर परिवार में समृद्धि आती है। स्कन्द पुराण में इनकी अर्चना का स्तोत्र शीतलाष्टक के रूप में मिलता है।

इस स्तोत्र की रचना भगवान शंकर ने जनकल्याण के लिए की थी। शीतलाष्टक शीतला देवी की महिमा गान करता है, साथ ही उनकी उपासना के लिए भक्तों को प्रेरित भी करता है।

इनकी आराधना मध्य भारत एवं उत्तरपूर्व के राज्यों में बड़े धूम-धाम से की जाती है!
-पं जय गोविन्द शास्त्री

http://www.amarujala.com/news/spirituality/religion-festivals/get-relief-from-diseases-by-sheetla-mata-mantra-and-pooja/

Sunday, March 31, 2013

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम

सनातन धर्म के अनुसार भोजन ग्रहण करने के कुछ नियम है

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम

१ पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल , वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए !
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे !
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन , अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य , आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए !
२३. कुत्ते का छुवा , रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन , अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे !
२४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !

Saturday, March 30, 2013

कैलाश पर्वत .......दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डारक



कैलाश पर्वत .......दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डारक

Axis Mundi (एक्सिस मुंडी ) .............प्रश्न पहेली रहस्य ...

एक्सिस मुंडी को ब्रह्मांड का केंद्र, दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव के रूप में, यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है जहाँ चारों दिशाएं मिल जाती हैं। और यह नाम, असली और महान, दुनिया के सबसे पवित्र और सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से सम्बंधित हैं। एक्सिस मुंडी वह स्थान है अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं रूसिया के वैज्ञानिक ने वह स्थान कैलाश पर्वत बताया है।

भूगोल और पौराणिक रूप से कैलाश पर्वत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714 मीटर है। और यह पास की हिमालय सीमा की चोटियों जैसे माउन्ट एवरेस्ट के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता पर इसकी भव्यता ऊंचाई में नहीं, लेकिन अपनी विशिष्ट आकार में निहित है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के चार दिक् बिन्दुओं के सामान है और एकान्त स्थान पर स्थित है जहाँ कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत पर चड़ना निषिद्ध है पर 11 सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चड़ाई की थी।

कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के सामान है। ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करते हैं जिसका सम्बन्ध सकारात्मक और नकारात्मक उर्जा से है। जब दक्षिण चेहरे से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिन्ह वास्तव में देखा जा सकता है.

कैलाश पर्वत और उसके आस पास के बातावरण पर अध्यन कर रहे रसिया के वैज्ञानिक Tsar Nikolai Romanov और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमे तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ telepathic संपर्क करते है।

" In shape it (Mount Kailas) resembles a vast cathedral… the sides of the mountain are perpendicular and fall sheer for hundreds of feet, the strata horizontal, the layers of stone varying slightly in colour, and the dividing lines showing up clear and distinct...... which give to the entire mountain the appearance of having been built by giant hands, of huge blocks of reddish stone. "

(G.C. Rawling, The Great Plateau, London, 1905).

रूसिया के वैज्ञानिकों का दावा है की कैलाश पर्वत प्रकृति द्वारा निर्मित सबसे उच्चतम पिरामिड है। जिसको तीन साल पहले चाइना के वैज्ञानिकों द्वारा सरकारी चाइनीज़ प्रेस में नकार दिया था। आगे कहते हैं " कैलाश पर्वत दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी, पवित्र स्थान है जिसके आस पास अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डार है। इस पवित्र पर्वत सभी धर्मों ने अलग अलग नाम दिए हैं। "

रूसिया वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट UNSpecial! Magzine में January-August 2004 को प्रकाशित की गयी थी।

With deep thanks to Mr. Wolf Scott, former Deputy Director of UNRISD,


।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।
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कैलाश पर्वत .......दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डारक

Axis Mundi (एक्सिस मुंडी ) .............प्रश्न पहेली रहस्य ...

एक्सिस मुंडी को ब्रह्मांड का केंद्र, दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव के रूप में, यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है जहाँ चारों दिशाएं मिल जाती हैं। और यह नाम, असली और महान, दुनिया के सबसे पवित्र और सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से सम्बंधित हैं। एक्सिस मुंडी वह स्थान है अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं रूसिया के वैज्ञानिक ने वह स्थान कैलाश पर्वत बताया है।

भूगोल और पौराणिक रूप से कैलाश पर्वत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714 मीटर है। और यह पास की हिमालय सीमा की चोटियों जैसे माउन्ट एवरेस्ट के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता पर इसकी भव्यता ऊंचाई में नहीं, लेकिन अपनी विशिष्ट आकार में निहित है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के चार दिक् बिन्दुओं के सामान है और एकान्त स्थान पर स्थित है जहाँ कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत पर चड़ना निषिद्ध है पर 11 सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चड़ाई की थी।

कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के सामान है। ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करते हैं जिसका सम्बन्ध सकारात्मक और नकारात्मक उर्जा से है। जब दक्षिण चेहरे से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिन्ह वास्तव में देखा जा सकता है.

कैलाश पर्वत और उसके आस पास के बातावरण पर अध्यन कर रहे रसिया के वैज्ञानिक Tsar Nikolai Romanov और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमे तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ telepathic संपर्क करते है।

" In shape it (Mount Kailas) resembles a vast cathedral… the sides of the mountain are perpendicular and fall sheer for hundreds of feet, the strata horizontal, the layers of stone varying slightly in colour, and the dividing lines showing up clear and distinct...... which give to the entire mountain the appearance of having been built by giant hands, of huge blocks of reddish stone. "

(G.C. Rawling, The Great Plateau, London, 1905).

रूसिया के वैज्ञानिकों का दावा है की कैलाश पर्वत प्रकृति द्वारा निर्मित सबसे उच्चतम पिरामिड है। जिसको तीन साल पहले चाइना के वैज्ञानिकों द्वारा सरकारी चाइनीज़ प्रेस में नकार दिया था। आगे कहते हैं " कैलाश पर्वत दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी, पवित्र स्थान है जिसके आस पास अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डार है। इस पवित्र पर्वत सभी धर्मों ने अलग अलग नाम दिए हैं। "

रूसिया वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट UNSpecial! Magzine में January-August 2004 को प्रकाशित की गयी थी।

With deep thanks to Mr. Wolf Scott, former Deputy Director of UNRISD,


।। जयतु संस्‍कृतम् । जयतु भारतम् ।।

Friday, March 29, 2013

काबा और भगवान शिव

सनातन धर्म से ही सब संस्कृतियो का अविर्भाव हुआ है यह शत प्रतिशत सत्य है बाद मे कुछ आपापंथी सिरपिरो ने अपना2 पंथ चला लिया

हिन्दुओं की भांति इस्लाम में

भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान

भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान

का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के

“चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात”

शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने

की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था,

तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और

शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम

में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।




काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस

पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं,

दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई

परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक

मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने

की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह

“परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से

चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम

श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise)

करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़

यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक

सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस

प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज

पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में

“सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में

पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं।

“मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम

एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे

लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?







काबा से जुड़ी एक और हिन्दू

संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा।

जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ

गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग

नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र

गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के

पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है,

इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक

काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म)

ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के

दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले

जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले

हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे

बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज

की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे

क्या कारण है।




जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक

समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही,

जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं।

ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब

देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर

उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?




आज भी मक्का के काबा में प्राचीन

शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है

कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते

और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने

अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के

चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज

विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है

जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है।










कोई यह न समजे की भगवान शिव

केवल भारत में पूजित है । विदेशो में भी कई स्थानों पर

शिव मुर्तिया अथवा शिवलिंग प्राप्त हुए है कल्याण के

शिवांक के अनुसार उत्तरी अफ्रीका के इजिप्त में

तथा अन्य कई प्रान्तों में नंदी पर विराजमान शिव




की अनेक मुर्तिया है वहा के लोग बेल पत्र और दूध से

इनकी पूजा करते है । तुर्किस्थान के बबिलन नगर में

१२०० फिट का महा शिवलिंग है । पहले

ही कहा गया की शिव सम्प्रदायों से ऊपर है। मुसलमान

भाइयो के तीर्थ मक्का में भी मक्केश्वर नमक शिवलिंग

होना शिव का लीला ही है वहा के जमजम नमक कुएं में

भी एक शिव लिंग है जिसकी पूजा खजूर की पतियों से

होती है इस कारण यह है की इस्लाम में खजूर का बहूत

महत्व है । अमेरिका के ब्रेजील में न जाने कितने प्राचीन

शिवलिंग है । स्क्यात्लैंड में एक स्वर्णमंडित शिवलिंग है

जिसकी पूजा वहा के निवासी बहूत श्रदा से करते है ।

indochaina में भी शिवालय और शिलालेख उपलब्ध है ।

यहाँ विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं । शिव निश्चय

ही विश्वदेव है




जब इस्लाम मूर्तिपूजा के विरुद्ध है,
फिर इसका क्या कारण है कि मुसलमान अपनी नमाज़ में
काबा की ओर झुकते हैं और उसकी पूजा करते हैं????




इस्लाम मजहब के प्रवर्तक मोहम्मद स्वयं भी वैदिक परिवार में

हिन्दू के रूप में जन्में थे, और जब उन्होंने अपने हिन्दू

परिवार की परम्परा और वंश से संबंध तोड़ने और स्वयं

को पैगम्बर घोषित करना निश्चित किया, तब संयुक्त




हिन्दू परिवार छिन्न-भिन्न हो गया और काबा में स्थित

महाकाय शिवलिंग (संगे अस्वद) के रक्षार्थ हुए युद्ध में

पैगम्बर मोहम्मद के चाचा उमर-बिन-ए-हश्शाम

को भी अपने प्राण गंवाने पड़े। उमर-बिन-ए-हश्शाम

का अरब में एवं केन्द्र काबा (मक्का) में इतना अधिक

सम्मान होता था कि सम्पूर्ण अरबी समाज,

जो कि भगवान शिव के भक्त थे एवं वेदों के उत्सुक

गायक तथा हिन्दू देवी-देवताओं के अनन्य उपासक थे,

उन्हें अबुल हाकम अर्थात ‘ज्ञान का पिता’ कहते थे।

बाद में मोहम्मद के नये सम्प्रदाय ने उन्हें ईष्यावश अबुल

जिहाल ‘अज्ञान का पिता’ कहकर उनकी निन्दा की।

जब मोहम्मद ने मक्का पर आक्रमण किया, उस समय

वहाँ बृहस्पति, मंगल, अश्विनी कुमार, गरूड़, नृसिंह

की मूर्तियाँ प्रतिष्ठित थी। साथ ही एक

मूर्ति वहाँ विश्वविजेता महाराजा बलि की भी थी, और

दानी होने की प्रसिद्धि से उसका एक हाथ सोने

का बना था। ‘Holul’ के नाम से अभिहित यह

मूर्ति वहाँ इब्राहम और इस्माइल की मूर्त्तियो के बराबर

रखी थी। मोहम्मद ने उन सब मूर्त्तियों को तोड़कर

वहाँ बने कुएँ में फेंक दिया, किन्तु तोड़े गये शिवलिंग

का एक टुकडा आज भी काबा में सम्मानपूर्वक न केवल

प्रतिष्ठित है, वरन् हज करने जाने वाले मुसलमान उस

काले (अश्वेत) प्रस्तर खण्ड अर्थात ‘संगे अस्वद’

को आदर मान देते हुए चूमते है।




भगवान शिव के जितने रूप और
उपासना के जितने विधान संसार भर में प्रचलित रहे हैं, वे
अवर्णनीय हैं। हमारे देश में ही नहीं, भगवान शिव
की प्रतिष्ठा पूरे संसार में ही फैली हुई है। उनके विविध
रूपों को पूजने का सदा से ही प्रचलन रहा है। शिव के मंदिर

अफगानिस्तान के हेमकुट पर्वत से लेकर मिस्र, ब्राजील,
तुर्किस्तान के बेबीलोन, स्कॉटलैंड के ग्लासगो, अमेरिका,
चीन, जापान, कम्बोडिया, जावा, सुमात्रा तक हर जगह
पाए गए हैं। अरब में मुहम्मद पैगम्बर से पूर्व शिवलिंग
को 'लात' कहा जाता था। मक्का के कावा में संग अवसाद
के यप में जिस काले पत्थर की उपासना की जाती रही है,
भविष्य पुराण में उसका उल्लेख मक्केश्वर के रूप में हुआ
है। इस्लाम के प्रसार से पहले इजराइल और अन्य
यहूदियों द्वारा इसकी पूजा किए जाने के स्पष्ट प्रमाण
मिले हैं। ऐसे प्रमाण भी मिले हैं कि हिरोपोलिस में वीनस
मंदिर के सामने दो सौ फीट ऊंचा प्रस्तर लिंग था।
यूरोपियन फणिश और इबरानी जाति के पूर्वज बालेश्वर
लिंड के पूजक थे। बाईबिल में इसका शिउन के रूप में
उल्लेख हुआ है







सऊदी अरब के पास
ही यमन नामक राज्य है इसका उल्लेख श्रीमद्भागवत
में मिलता है श्री कृष्ण ने कालयवन नामक राक्षस के
विनाश किया था यह यमन राज्य उसी द्वीप पर स्थित है ।।



हजारों वर्षों से जीवित है सात महामानव


हजारों वर्षों से जीवित है सात महामानव

यह दुनिया का एक आश्चर्य है। विज्ञान इसे नहीं मानेगा, योग और आयुर्वेद कुछ हद तक इससे सहमत हो सकता है, लेकिन जहाँ हजारों वर्षों की बात हो तो फिर योगाचार्यों के लिए भी शोध का विषय होगा। इसका दावा नहीं किया जा सकता और इसके किसी भी प्रकार के सबूत नहीं है। यह आलौकिक है। किसी भी प्रकार के चमत्कार से इन्कार नहीं किया जा सकता। सिर्फ शरीर बदल-बदलकर ही हजारों वर्षों तक जीवित रहा जा सकता है। यह संसार के सात आश्चर्यों की तरह है। 

हिंदू इतिहास और पुराण अनुसार ऐसे सात व्यक्ति हैं, जो चिरंजीवी हैं। यह सब किसी न किसी वचन, नियम या शाप से बंधे हुए हैं और यह सभी दिव्य शक्तियों से संपन्न है। योग में जिन अष्ट सिद्धियों की बात कही गई है वे सारी शक्तियाँ इनमें विद्यमान है। यह परामनोविज्ञान जैसा है, जो परामनोविज्ञान और टेलीपैथी विद्या जैसी आज के आधुनिक साइंस की विद्या को जानते हैं वही इस पर विश्वास कर सकते हैं। आओ जानते हैं कि हिंदू धर्म अनुसार कौन से हैं यह सात जीवित महामानव।

1. बलि : राजा बलि के दान के चर्चे दूर-दूर तक थे। देवताओं पर चढ़ाई करने राजा बलि ने इंद्रलोक पर अधिकार कर लिया था। बलि सतयुग में भगवान वामन अवतार के समय हुए थे। राजा बलि के घमंड को चूर करने के लिए भगवान ने ब्राह्मण का भेष धारण कर राजा बलि से तीन पग धरती दान में माँगी थी। राजा बलि ने कहा कि जहाँ आपकी इच्छा हो तीन पैर रख दो। तब भगवान ने अपना विराट रूप धारण कर दो पगों में तीनों लोक नाप दिए और तीसरा पग बलि के सर पर रखकर उसे पाताल लोक भेज दिया।

2. परशुराम : परशुराम राम के काल के पूर्व महान ऋषि रहे हैं। उनके पिता का नाम जमदग्नि और माता का नाम रेणुका है। पति परायणा माता रेणुका ने पाँच पुत्रों को जन्म दिया, जिनके नाम क्रमशः वसुमान, वसुषेण, वसु, विश्वावसु तथा राम रखे गए। राम की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें फरसा दिया था इसीलिए उनका नाम परशुराम हो गया।

भगवान पराशुराम राम के पूर्व हुए थे, लेकिन वे चिरंजीवी होने के कारण राम के काल में भी थे। भगवान परशुराम विष्णु के छठवें अवतार हैं। इनका प्रादुर्भाव वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को हुआ, इसलिए उक्त तिथि अक्षय तृतीया कहलाती है। इनका जन्म समय सतयुग और त्रेता का संधिकाल माना जाता है।
3. हनुमान : अंजनी पुत्र हनुमान को भी अजर अमर रहने का वरदान मिला हुआ है। यह राम के काल में राम भगवान के परम भक्त रहे हैं। हजारों वर्षों बाद वे महाभारत काल में भी नजर आते हैं। महाभारत में प्रसंग हैं कि भीम उनकी पूँछ को मार्ग से हटाने के लिए कहते हैं तो हनुमानजी कहते हैं कि तुम ही हटा लो, लेकिन भीम अपनी पूरी ताकत लगाकर भी उनकी पूँछ नहीं हटा पाता है।

4. विभिषण : रावण के छोटे भाई विभिषण। जिन्होंने राम की नाम की महिमा जपकर अपने भाई के विरु‍द्ध लड़ाई में उनका साथ दिया और जीवन भर राम नाम जपते रहें। 

5. ऋषि व्यास : महाभारतकार व्यास ऋषि पराशर एवं सत्यवती के पुत्र थे, ये साँवले रंग के थे तथा यमुना के बीच स्थित एक द्वीप में उत्पन्न हुए थे। अतएव ये साँवले रंग के कारण 'कृष्ण' तथा जन्मस्थान के कारण 'द्वैपायन' कहलाए। इनकी माता ने बाद में शान्तनु से विवाह किया, जिनसे उनके दो पुत्र हुए, जिनमें बड़ा चित्रांगद युद्ध में मारा गया और छोटा विचित्रवीर्य संतानहीन मर गया। 

कृष्ण द्वैपायन ने धार्मिक तथा वैराग्य का जीवन पसंद किया, किन्तु माता के आग्रह पर इन्होंने विचित्रवीर्य की दोनों सन्तानहीन रानियों द्वारा नियोग के नियम से दो पुत्र उत्पन्न किए जो धृतराष्ट्र तथा पाण्डु कहलाए, इनमें तीसरे विदुर भी थे। व्यासस्मृति के नाम से इनके द्वारा प्रणीत एक स्मृतिग्रन्थ भी है। भारतीय वांड्मय एवं हिन्दू-संस्कृति व्यासजी की ऋणी है। 

6. अश्वत्थामा : अश्वथामा गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र हैं। अश्वस्थामा के माथे पर अमरमणि है और इसीलिए वह अमर हैं, लेकिन अर्जुन ने वह अमरमणि निकाल ली थी। ब्रह्मास्त्र चलाने के कारण कृष्ण ने उन्हें शाप दिया था कि कल्पांत तक तुम इस धरती पर जीवित रहोगे, इसीलिए अश्वत्थामा सात चिरन्जीवियों में गिने जाते हैं। माना जाता है कि वे आज भी जीवित हैं तथा अपने कर्म के कारण भटक रहे हैं। हरियाणा के कुरुक्षेत्र एवं अन्य तीर्थों में यदा-कदा उनके दिखाई देने के दावे किए जाते रहे हैं। मध्यप्रदेश के बुरहानपुर के किले में उनके दिखाई दिए जाने की घटना भी प्रचलित है। 

7. कृपाचार्य : शरद्वान् गौतम के एक प्रसिद्ध पुत्र हुए हैं कृपाचार्य। कृपाचार्य अश्वथामा के मामा और कौरवों के कुलगुरु थे। शिकार खेलते हुए शांतनु को दो शिशु प्राप्त हुए। उन दोनों का नाम कृपी और कृप रखकर शांतनु ने उनका लालन-पालन किया। महाभारत युद्ध में कृपाचार्य कौरवों की ओर से सक्रिय थे।