Saturday, March 16, 2013

क्या देवता भोग ग्रहण करते है ?

क्या देवता भोग ग्रहण करते है ?

हिन्दू धर्म में भगवान् को भोग लगाने का विधान है ...

क्या सच में देवतागण भोग ग्रहण करते ?
हां , ये सच है ..शास्त्र में इसका प्रमाण भी है ..
गीता में भगवान् कहते है ...'' जो भक्त मेरे लिए प्रेम से
पत्र, पुष्प, फल, जल आदि अर्पण करता है , उस शुध्द
बुध्दी निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेम पूर्वक अर्पण
किया हुआ , वह पत्र पुष्प आदि मैं ग्रहण करता हूँ ...गीता ९/२६

अब वे खाते कैसे है , ये समझना जरुरी है

हम जो भी भोजन ग्रहण करते है , वे चीजे पांच तत्वों से
बनी हुई होती है ....क्योकि हमारा शरीर भी पांच
तत्वों से बना होता है ..इसलिए अन्न, जल, वायु,
प्रकाश और आकाश ..तत्व की हमें जरुरत होती है ,
जो हम अन्न और जल आदि के द्वारा प्राप्त करते है ...

देवता का शरीर पांच तत्वों से नहीं बना होता , उनमे
पृथ्वी और जल तत्व नहीं होता ...मध्यम स्तर के देवताओ
का शरीर तीन तत्वों से तथा उत्तम स्तर के
देवता का शरीर दो तत्व --तेज और आकाश से बना हुआ
होता है ...इसलिए देव शरीर वायुमय और तेजोमय होते
है ...

यह देवता वायु के रूप में गंध, तेज के रूप में प्रकाश को ग्रहण
और आकाश के रूप में शब्द को ग्रहण करते है ...

यानी देवता गंध, प्रकाश और शब्द के द्वारा भोग ग्रहण
करते है ..जिसका विधान पूजा पध्दति में होता है ...
जैसे जो हम अन्न का भोग लगाते है , देवता उस अन्न
की सुगंध को ग्रहण करते है ,,,उसी से
तृप्ति हो जाती है ..जो पुष्प और धुप लगाते है ,
उसकी सुगंध को भी देवता भोग के रूप में ग्रहण करते है ... जो हम दीपक जलाते है , उससे देवता प्रकाश तत्व
को ग्रहण करते है ,,,आरती का विधान भी उसी के लिए
है ..
जो हम मन्त्र पाठ करते है , या जो शंख बजाते है या घंटी घड़ियाल बजाते है , उसे देवता गण ''आकाश '' तत्व के रूप में ग्रहण करते है ...

यानी पूजा में हम जो भी विधान करते है , उससे देवता वायु,तेज और आकाश तत्व के रूप में '' भोग '' ग्रहण
करते है ......

जिस प्रकृति का देवता हो , उस प्रकृति का भोग लगाने का विधान है . !!!

इस तरह हिन्दू धर्म की पूजा पध्दति पूर्ण ''वैज्ञानिक '' है !!!
,
,
,
|| जय श्री कृष्ण ||

अवतार और कला


अवतार और कला

गर्गसंहिता के अनुसार श्रीहरि के अंशांश, अंश, आवेश, कला, पूर्ण और परिपूर्णतम- ये छः प्रकार के अवतार माने गये हैं।

महर्षि मरीचि आदि अंशांशावतार माने गये हैं। ब्रह्मादिदेवशिरोमणि अंशावतार माने गये हैं। श्रीकपिल, कूर्मादि कलावतार माने गये हैं। श्रीपरशुराम आदि आवेशावतार माने गये हैं। श्रीनृसिंह, राम, श्वेतद्वीपाधिपति हरि, वैकुण्ठ, यज्ञ, नर-नारायण पूर्णावतार माने गये हैं। श्रीकृष्णचन्द्र परिपूर्णतम पुरुषोत्तमावतार माने गये हैं-

“अंशांशोंऽशस्तथावेशः कला पूर्णः प्रकथ्यते।
व्यासाद्यैश्च स्मृतः षष्ठः परिपूर्णतमः स्वयम्।।” (श्रीगर्गसंहिता १।१६)

ब्रहम निर्गुण, निष्कल, निष्क्रिय, निर्विकल्प, निरञ्जन, निरवद्य, शान्त और सूक्ष्म है, तथापि त्रिगुणमयी माया के योग से उसे सकल भी कहा जाता है।
 ब्रह्म के अभिव्यञ्जक और अभिव्यक्त स्वरुप का नाम कला है।

प्रश्नोपनिषद् (६।१-४) के अनुसार पुरुष (ब्रह्मात्मतत्व) षोडशकलासम्पन्न है- “षोडशकलं भारद्वाज पुरुषं॰॰॰॰॰॰॰॰”।

प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक तथा नाम-ये षोडश कलाएँ हैं।

संस्कार का अर्थ क्या है ?


संस्कार का अर्थ क्या है ?
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संस्कार - सम् अर्थात् सम्यक अर्थात् अच्छे, अच्छी, कार - अर्थात् कार्य, कृति
प्रत्येक कार्य ही अच्छा अर्थात् संस्कारयुक्त होना चाहिए ।

उदा. केला खाकर हम छिलका फेंक देते हैं यह कृत्य है । केला खाकर छिलका कूडेदान में फेंकना यह प्रकृति । केला खाकर छिलका सडक पर फेंक देना, यह विकृति । अन्य व्यक्तिद्वारा रास्तेपर फेंका हुआ छिलका कूडेदान में फेकना यह संस्कृति ।

भूख लगने के उपरांत खाना यह प्रकृति । अन्य व्यक्ति के लिए रखे खाने का भाग भी स्वयं खा जाना यह विकृति एवं अतिथि तथा घरके सभी सदस्य अर्थात नौकर, गाय इत्यादि का खाना हुआ अथवा नहीं यह देखकर बाद में भगवान को नैवेद्य समर्पित कर प्रसाद समझकर खाना यह संस्कृति ।
मनन (चिंतन) कर सर्वांगीण विचार कर कृति करने वाला अर्थात् मानव । विचार एवं कृति अच्छी होने के लिए संस्कारों की आवश्यकता है । भारतीय शास्त्र के अनुसार प्रत्येक कृति ही संस्कारयुक्त होनी चाहिए ।

संस्कार अर्थात सदगुणों को गुणा करना अर्थात् बढाना एवं दोषों का भागफल अर्थात् दोषों को घटाना । संस्कार करना अर्थात् अच्छी आदतें लगाना एवं बुरी आदतें निकाल कर फेंकना । बच्चों पर अच्छे संस्कार करना अर्थात् उन्हें 'मां-पिताजी को प्रतिदिन नमस्कार करें', 'अन्यो की निंदा न करें' इत्यादि सिखाना; परंतु वह भी कैसे सिखाना चाहिए । मात्र तत्त्वज्ञान कहकर नहीं, कथाएं कहकर नहीं, चॉकलेट, आईस्क्रीम का लालच दिखाकर नहीं, अपितु अपनी कृतिद्वारा । आठ साल के बच्चों को प्रतिदिन आयु से बडों को नमस्कार करने की आज्ञा देंगे, तो चार दिन करेंगे । पांचवे दिन कहेगा ''मैं नही करूंगा’’। उसे नमस्कार करने से होने वाले लाभ के बारे में तत्त्वज्ञान बताया, तो भी उपयोग नहीं होगा । यदि आपको लगता है कि,आपके बच्चे ज्येष्ठों को नमस्कार करें, तो एक मात्र उपाय है, कि आजसे आप घर के सर्व बडों को प्रतिदिन एक बार नमस्कार करें । बच्चे को एक बार भी नमस्कार करने के लिए न कहें । चार दिनों के उपरांत ही आपका बच्चा आपके पीछे आकर घरके ज्येष्ठों को नमस्कार करने लगेगा । उसे लज्जा आएगी, कि मेरे मां-पिताजी प्रतिदिन दादा-दादी को नमस्कार करते हैं । मैं मात्र बेशरम की तरह खडा हूं । संस्कार करना अर्थात् मौन रहकर कृत्य करते रहना...

Sunday, March 10, 2013

भगवान शिव को जलधारा

वेद मंत्रों के साथ भगवान शिव को जलधारा चढ़ाने से साधक का स्वयं कल्याण तो होता ही है साथ ही वह समस्तसंसार के कल्याण के लिए भी महाऔषधि तैयार कर लेता है। पांच तत्व में जल तत्व बहुतमहत्वपूर्ण है। पुराणों में शिवाभिषेक का बहुत पवित्र महत्व बताया गया है।

जल में भगवान विष्णु का वासहै, जल का एक नाम 'नार' भी है। इसीलिए भगवान विष्णु को नारायण कहते हैं। जल से ही धरती का ताप दूर होता हैऔर जो भक्त शिव को जलधारा चढ़ाते हैं उनके ताप, संताप,रोग-शोक, दुःख दरिद्र सभी दूर हो जाते हैं।
भगवान शिव की आराधना वैदिक आराधना है। भारत वर्ष में जितने भी शिवधाम हैं वहां वेद मंत्रों के साथ ही पूजाकी जाती है। अतः यह कहा जा सकता है शिव आराधना के माध्यम से वेद के ज्ञान का विस्तार निरंतर होता आ रहा है।

भगवान शिव को महादेव इसीलिए कहते हैं कि वह देव,दानव, यक्ष, किन्नर, नाग, मनुष्य, सभी द्वारा पूजित हैं। वस्तुतः भगवान शिव, कल्याण और समन्वय के देवता है, वही किसी का अहित नहीं करते लेकिन अपने द्वारा कर्मगति की चक्की में पिसता मनुष्य इसके लिए स्वयं दोषी है। इस‍लिए कहा जाता है कि जो सभी द्वारा पूजित वही महादेव है।

यदि मन से शिव उपासना करेंगे तो अपने शुभ-अशुभ कर्मों को शिवार्पण करने वालों का कर्मगति का चक्र छूट जाता है। भगवान शिव तो ऐसे कृपालु देवता हैं जो एकलोटा जल से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

हम भगवान की पूजा पाठ, व्रत, जप, तप आदि तो करते हैं, परंतु हमें उनके बारे में ठीक से ज्ञान न होने केकारण फल प्राप्त नहीं होता है। सही तरीके से व्रत पूजाकरने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है।

शिव और मंत्र का वाच्य वाचकभाव अनादिकाल से चला आ रहा है। जैसे यह घोर संसार सागरअनादिकाल से चला आ रहा है, उसी प्रकार संसार से छ़ुडानेवाले भगवान शिव भी अनादिकाल से ही नित्य विराजमान हैं। जैसे औषध रोगों का स्वभावतः शत्रु है, उसी प्रकार भगवान शिव संसार दोषों के स्वाभाविक शत्रु माने गए हैं।
शिव पुराण संहिता में कहा है कि सर्वज्ञ शिव ने संपूर्ण देहधारियों के सारे मनोरथों की सिद्धि के लिए इस 'ॐ नमः शिवाय' मंत्र का प्रतिपादन किया है। यह आदि षडाक्षर मंत्र संपूर्णविद्याओं का बीज है। जैसे वट बीज में महान वृक्ष छिपाहुआ है, उसी प्रकार अत्यंत सूक्ष्म होने पर भी यह मंत्र महान अर्थ से परिपूर्ण है।
ॐ इस एकाक्षर मंत्र में तीनों गुणों से अतीत, सर्वज्ञ, सर्वकर्ता, द्युतिमान सर्वव्यापी प्रभु शिव ही प्रतिष्ठित हैं। ईशान आदि जो सूक्ष्म एकाक्ष रूप ब्रह्म हैं, वे सब 'नमः शिवाय' इस मंत्र मेंक्रमशः स्थित हैं। सूक्ष्मषड़क्षर मंत्र में पंचब्रह्मरूपधारी साक्षात्‌ भगवान शिव स्वभावतः वाच्य और वाचक भाव से विराजमान हैं। अप्रमेय होने के कारण शिव वाच्य है और मंत्र उनका वाचक माना गया है।

यदि भगवान विश्वनाथ न होते तो यह जगत अंधकारमय हो जाता, क्योंकि प्रकृति जड़ है और जीवात्मा अज्ञानी। अतः इन्हें प्रकाश देने वाले परमात्मा ही हैं। उनके बंधन और मोक्ष भी देखेजाते हैं। अतः विचार करने से सर्वज्ञ परमात्मा शिव के बिना प्राणियों के आदिसर्व की सिद्धि नहीं होती। जैसे रोगी वैद्य के बिना सुख से रहित हो क्लेश उठाते हैं, उसी प्रकार सर्वज्ञ शिव का आश्रय न लेने से संसारी जीव नाना प्रकार के क्लेश भोगते हैं।

अतः यह सिद्ध हुआ कि जीवों का संसार सागर से उद्धार करने वाले स्वामी अनादि सर्वज्ञ परिपूर्ण सदाशिव विद्यमान हैं। भगवान शिव आदि मध्य और अंत से रहित हैं। स्वभाव से ही निर्मल हैं तथा सर्वज्ञ एवं परिपूर्ण हैं। उन्हें शिव नाम से जानना चाहिए। शिव गममें उनके स्वरूप का विशदरूप से वर्णन है। यह पच्चाक्षर मंत्र उनका ही नाम है और वे शिव अभिधेय हैं। अभिधान और अभिरधेय रूप होने के कारण परम शिवस्वरूप यह मंत्र सिद्ध माना गया है।

' ॐ नमः शिवाय' यह जो षड़क्षर शिव वाक्य है, शिव का विधि वाक्य है, अर्थवाद नहीं है।यह उन्हीं शिव का स्वरूप हैजो सर्वज्ञ, परिपूर्ण और स्वभावतः निर्मल हैं। सर्वज्ञ शिव ने जिस निर्मल वाक्य पच्चाक्षर मंत्र का प्रणयन किया है, वह प्रमाणभूत ही है, इसमें संयम नहीं है। इसलिए विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह ईश्वर के वचनों पर श्रद्धा करे। मंत्रों की संख्या बहुत होने पर भी जिसविमल षडाक्षर मंत्र का सर्वज्ञ शिव ने किया है, उसके समान कहीं कोई दूसरा मंत्र नहीं है।

जिसके हृदय में 'ॐ नमः शिवाय' यह षड़क्षर मंत्र प्रतिष्ठित है, उसे दूसरे बहुसंख्यक मंत्रों और अनेकविस्तृत शास्त्रों से क्याप्रयोजन है? जिसने 'ॐ नमः शिवाय' इस मंत्र का जप दृढ़तापूर्वक अपना लिया है, उसने संपूर्ण शास्त्र पढ़ लिया और समस्त शुभ कृत्यों का अनुष्ठान पूरा कर लिया। आदि में 'नमः' पद से युक्त 'शिवाय' ये तीन अक्षर जिसकी जिह्वा के अग्रभाग में विद्यमान हैं, उसका जीवन सफल हो गया।

षडाक्षर मंत्र में छहों अंगों सहित संपूर्ण वेद और शास्त्र विद्यमान हैं, अतः उसके समान दूसरा कोई मंत्र कहीं नहीं है। सात करोड़ महामंत्रों और अनेकानेक उपमंत्रों से यह षडाक्षर मंत्र उसी प्रकार भिन्न है,जैसे वृत्ति से सूत्र। जितने शिवज्ञान हैं और जो-जो विद्यास्थान हैं, वे सब षडाक्षर मंत्र रूपी सूत्र के संक्षिप्त भाष्य हैं।

Saturday, March 9, 2013

फ्रीज में रखा आटा आमंत्रित करता है भूतों को


फ्रीज में रखा आटा आमंत्रित करता है भूतों को

भोजन केवल शरीर को ही नहीं, अपितु मन-मस्तिष्क को भी गहरे तक प्रभावित करता है। दूषित अन्न-जल का सेवन न सिर्फ आफ शरीर-मन को बल्कि आपकी संतति तक में असर डालता है। ऋषि-मुनियों ने दीर्घ जीवन के जो सूत्र बताये हैं उनमें ताजे भोजन पर विशेष जोर दिया है।

ताजे भोजन से शरीर निरोगी होने के साथ-साथ तरोताजा रहता है और बीमारियों को पनपने से रोकता है। लेकिन जब से फ्रीज का चलन बढा है तब से घर-घर में बासी भोजन का प्रयोग भी तेजी से बढा है। यही कारण है कि परिवार और समाज में तामसिकता का बोलबाला है। ताजा भोजन ताजे विचारों और स्फूर्ति का आवाहन करता है जबकि बासी भोजन से क्रोध, आलस्य और उन्माद का ग्राफ तेजी से बढने लगा है।

शास्त्रों में कहा गया है कि बासी भोजन भूत भोजन होता है और इसे ग्रहण करने वाला व्यक्ति जीवन में नैराश्य, रोगों और उद्विग्नताओं से घिरा रहता है। हम देखते हैं कि प्रायःतर गृहिणियां मात्र दो से पांच मिनट का समय बचाने के लिए रात को गूंथा हुआ आटा लोई बनाकर फ्रीज में रख देती हैं और अगले दो से पांच दिनों तक इसका प्रयोग होता है। गूंथे हुए आटे को उसी तरह पिण्ड के बराबर माना जाता है जो पिण्ड मृत्यु के बाद जीवात्मा के लिए समर्पित किए जाते हैं।

किसी भी घर में जब गूंथा हुआ आटा फ्रीज में रखने की परम्परा बन जाती है तब वे भूत और पितर इस पिण्ड का भक्षण करने के लिए घर में आने शुरू हो जाते हैं जो पिण्ड पाने से वंचित रह जाते हैं। ऐसे भूत और पितर फ्रीज में रखे इस पिण्ड से तृप्ति पाने का उपक्रम करते रहते हैं।

जिन परिवारों में भी इस प्रकार की परम्परा बनी हुई है वहां किसी न किसी प्रकार के अनिष्ट, रोग-शोक और क्रोध तथा आलस्य का डेरा पसर जाता है। इस बासी और भूत भोजन का सेवन करने वाले लोगों को अनेक समस्याओं से घिरना पडता है। आप अपने इष्ट मित्रों, परिजनों व पडोसियों के घरों में इस प्रकार की स्थितियां देखें और उनकी जीवनचर्या का तुलनात्मक अध्ययन करें तो पाएंगे कि वे किसी न किसी उलझन से घिरे रहते हैं।

आटा गूंथने में लगने वाले सिर्फ दो-चार मिनट बचाने के लिए की जाने वाली यह क्रिया किसी भी दृष्टि से सही नहीं मानी जा सकती। पुराने जमाने से बुजुर्ग यही राय देते रहे हैं कि गूंथा हुआ आटा रात को नहीं रहना चाहिए। उस जमाने में फ्रीज का कोई अस्तित्व नहीं था फिर भी बुजुर्गों को इसके पीछे रहस्यों की पूरी जानकारी थी। यों भी बासी भोजन का सेवन शरीर के लिए हानिकारक है ही।
आइये आज से ही संकल्प लें कि आयन्दा यह स्थिति सामने नहीं आए। तभी आप और आपकी संतति स्वस्थ और प्रसन्न रह सकती है और औरों को भी खुश रखने लायक व्यक्तित्व का निर्माण कर सकती है।

पहला विषय लिया है - पूजा


कृप्या धयान दे---

मित्रों,

जैसा कि हमारा उद्देश्य है - "सनातन हिंदू धर्मं का उत्त्थान'.
(कृप्या इस पेज की कवर फोटो देखे)

इसी कड़ी में इश्वर की प्रेरणा से मै विडियो व ऑडियो के माध्यम से कई धार्मिक विषयों पर प्रकाश डालने का प्रयास करूँगा.

मैंने पहला विषय लिया है - पूजा.

मित्रों आपसे निवेदन है कि इस "पूजा" शब्द को सुनते ही आपके मन में क्या क्या जिज्ञासा प्रगट होती है, वह प्रश्न के रूप में आप कमेन्ट में लिख दे ....

मै कल को सभी प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास करूँगा (जितना मै जनता हू). सभी उत्तर का आधार केवल अपने सनातन ग्रन्थ ही रहेंगे.

अत: आप सब से अनुरोध है कि ज्यादा से ज्यादा प्रश्न करे. और ध्यान दे विषय "पूजा" होना चाहिए.

जय श्री राम
पंडित गौरव शर्मा, हरिद्वार

https://www.facebook.com/UnderstandHinduDharma

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम

भोजन सम्बन्धी कुछ नियम
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भोजन सम्बन्धी कुछ नियम
१ पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल , वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए !
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे !
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन , अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य , आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए !
२३. कुत्ते का छुवा , रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन , अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे !
२४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !
भोजन सम्बन्धी कुछ नियम ------------
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भोजन सम्बन्धी कुछ नियम
१ पांच अंगो ( दो हाथ , २ पैर , मुख ) को अच्छी तरह से धो कर ही भोजन करे !
२. गीले पैरों खाने से आयु में वृद्धि होती है !
३. प्रातः और सायं ही भोजन का विधान है !
४. पूर्व और उत्तर दिशा की ओर मुह करके ही खाना चाहिए !
५. दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है !
६ . पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है !
७. शैय्या पर , हाथ पर रख कर , टूटे फूटे वर्तनो में भोजन नहीं करना चाहिए !
८. मल मूत्र का वेग होने पर , कलह के माहौल में , अधिक शोर में , पीपल , वट वृक्ष के नीचे , भोजन नहीं करना चाहिए !
९ परोसे हुए भोजन की कभी निंदा नहीं करनी चाहिए !
१०. खाने से पूर्व अन्न देवता , अन्नपूर्णा माता की स्तुति कर के , उनका धन्यवाद देते हुए , तथा सभी भूखो को भोजन प्राप्त हो इस्वर से ऐसी प्राथना करके भोजन करना चाहिए !
११. भोजन बनने वाला स्नान करके ही शुद्ध मन से , मंत्र जप करते हुए ही रसोई में भोजन बनाये और सबसे पहले ३ रोटिया अलग निकाल कर ( गाय , कुत्ता , और कौवे हेतु ) फिर अग्नि देव का भोग लगा कर ही घर वालो को खिलाये !
१२. इर्षा , भय , क्रोध , लोभ , रोग , दीन भाव , द्वेष भाव , के साथ किया हुआ भोजन कभी पचता नहीं है !
१३. आधा खाया हुआ फल , मिठाईया आदि पुनः नहीं खानी चाहिए !
१४. खाना छोड़ कर उठ जाने पर दुबारा भोजन नहीं करना चाहिए !
१५. भोजन के समय मौन रहे !
१६. भोजन को बहुत चबा चबा कर खाए !
१७. रात्री में भरपेट न खाए !
१८. गृहस्थ को ३२ ग्रास से ज्यादा न खाना चाहिए !
१९. सबसे पहले मीठा , फिर नमकीन , अंत में कडुवा खाना चाहिए !
२०. सबसे पहले रस दार , बीच में गरिस्थ , अंत में द्राव्य पदार्थ ग्रहण करे !
२१. थोडा खाने वाले को --आरोग्य , आयु , बल , सुख, सुन्दर संतान , और सौंदर्य प्राप्त होता है !
२२. जिसने ढिढोरा पीट कर खिलाया हो वहा कभी न खाए !
२३. कुत्ते का छुवा , रजस्वला स्त्री का परोसा , श्राध का निकाला , बासी , मुह से फूक मरकर ठंडा किया , बाल गिरा हुवा भोजन , अनादर युक्त , अवहेलना पूर्ण परोसा गया भोजन कभी न करे !
२४. कंजूस का , राजा का , वेश्या के हाथ का , शराब बेचने वाले का दिया भोजन कभी नहीं करना चाहिए !

शास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन है



शास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन बतलाये गए है जिन में से एक है “नमस्कारम”।

नमस्कार को कई प्रकार से देखा और समझा जा सकता है। संस्कृत में इसे विच्छेद करे तो हम पाएंगे की नमस्ते दो शब्दों से बना है नमः + ते।

नमः का मतलब होता है मैं (मेरा अंहकार) झुक गया। नम का एक और अर्थ हो सकता है जो है न + में यानी की मेरा नही। आध्यात्म की दृष्टी से इसमें मनुष्य दुसरे मनुष्य के सामने अपने अंहकार को कम कर रहा है। नमस्ते करते समय में दोनों हाथो को जोड़ कर एक कर दिया जाता है जिसका अर्थ है की इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्ति के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गये।
हम बड़ों के पैर क्यों छूते है ?

भारत में बड़े बुजुर्गो के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ये दरअसल बुजुर्ग, सम्मानित व्यक्ति के द्वारा किए हुए उपकार के प्रतिस्वरुप अपने समर्पण की अभिव्यक्ति होती है। अच्छे भावः से किया हुआ सम्मान के बदले बड़े लोग आशीर्वाद देते है जो एक सकारात्मक ऊर्जा होती है।
आदर के निम्न प्रकार है :

* प्रत्युथान : किसी के स्वागत में उठ कर खड़े होना

* नमस्कार : हाथ जोड़ कर सत्कार करना

* उपसंग्रहण : बड़े, बुजुर्ग, शिक्षक के पाँव छूना

* साष्टांग : पाँव, घुटने, पेट, सर और हाथ के बल जमीन पर पुरे लेट कर सम्मान करना

* प्रत्याभिवादन : अभिनन्दन का अभिनन्दन से जवाब देना

किसे किसके सामने किस विधि से सत्कार करना है ये शास्त्रों में विदित है। उदाहरण के तौर पर राजा केवल ऋषि मुनि या गुरु के सामने नतमस्तक होते थे।

गौतम मुनि की प्रिय पत्नी - अहिल्या

अहिल्या पंच देव कन्याओं में से एक हैं । ये अनुपम सुन्दरी और गौतम मुनि की प्रिय पत्नी व पतिव्रता थीं । इंद्र पूर्णतयः दोषी थे, इसलिए उन्हें मुनि ने तत्काल शाप दे दिया । फिर सोचा कि इतने दिनों से साथ में रहकर भी अहिल्या मेरे स्वभाव को नहीं जान सकी । व्रह्म बेला की रोज की मेरी जो दिनचर्या है, उसके प्रतिकूल आचरण न ही मैंने कभी किया और न ही कर सकता हूँ । इसने इतना भी बिचार नहीं किया । इसकी मति पथरा गई है , अतः यह भी पत्थर हो जाए । इस प्रकार अहिल्या को भी शाप मिल गया ।
अहिल्या निर्जन वन में वर्षा, शीत, आतप आदि सहती हुई, भगवान श्रीराम के आने की प्रतीक्षा करने लगी । अब कोई एकमात्र श्रीराम की ही प्रतीक्षा कर रहा हो और श्रीराम न आएँ । ऐसा कहीं सम्भव है । श्रीरामजी सोचविमोचन हैं । वे सबके सोच संताप मिटाते हैं । लेकिन जो एकमात्र उन्हीं के भरोसे पड़ा हो । उसे वे कैसे भूल सकते हैं ?
आगे-आगे ऋषि विश्वामित्र चले जा रहे हैं । बीच में दीन-मलीनों का उद्धार करने वाले श्रीरामजी और सबसे पीछे लक्ष्मण जी । मुनि तो आगे थे ही, वे चलते जा रहे थे । परन्तु श्रीरामजी तो अब आगे जा ही नहीं सकते थे । उन्हें तो अहिल्या का उद्धार करना था । परन्तु कैसे ? गुरू जी चलते जाएँ और राम जी अहिल्या का उद्धार करने लग जाय, ऐसा कहीं सम्भव हो सकता है ?
श्रीरामजी दया, करूणा, शील, विनम्रता, कृतज्ञता, आदर्श, मर्यादा आदि जितने गुण हैं । सबके भंडार हैं, मूर्तिमान स्वरूप हैं । ऐसे में पहले तो गुरू की आज्ञा लेनी/मिलनी चाहिए । क्योंकि गुरू जी साथ हैं । यदि साथ न होते तब दूसरी बात थी । इसलिए श्रीरामजी ने स्वयं मुनिराज से पूछा कि मुनिवर यह शिला कैसी है ? यह स्थान इतना सूना-सूना क्यों है ? तब विश्वामित्र जी ने अहिल्या की सारी कथा कह सुनाई । और आज्ञा भी दिया कि “चरण कमल रज चाहत कृपा करो रघुवीर” ।
भगवान श्रीराम की चरण रज लगते ही अहिल्या शाप मुक्ति हो गई । अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर भगवान का गुण गान करने लगी । उसे गौतम ऋषि का शाप वरदान लगा । क्योंकि उसे देव दुर्लभ श्रीराम जी के चरण रज की प्राप्ति हुई थी । जिसे मुनि लोग अनेक जन्मों की तपस्या से भी जल्दी प्राप्त नहीं कर पाते । अहिल्या सोचती है कि जिन भगवान के चरणों से निकली हुई गंगाजी को श्रीशिवजी हमेशा शीस पर रखते हैं । व्रह्मा जी हमेशा कमण्डल में लिए घूमते हैं । आज उन्हीं भगवान ने हमें चरण रज दे दिया । इस प्रकार मुक्त होकर अहिल्या अपने पति गौतम ऋषि को पुनः प्राप्त हुई ।
अहिल्या पंच देव कन्याओं में से एक हैं । ये अनुपम सुन्दरी और गौतम मुनि की प्रिय पत्नी व पतिव्रता थीं । इंद्र पूर्णतयः दोषी थे, इसलिए उन्हें मुनि ने तत्काल शाप दे दिया । फिर सोचा कि इतने दिनों से साथ में रहकर भी अहिल्या मेरे स्वभाव को नहीं जान सकी । व्रह्म बेला की रोज की मेरी जो दिनचर्या है, उसके प्रतिकूल आचरण न ही मैंने कभी किया और न ही कर सकता हूँ । इसने इतना भी बिचार नहीं किया । इसकी मति पथरा गई है , अतः यह भी पत्थर हो जाए । इस प्रकार अहिल्या को भी शाप मिल गया ।
अहिल्या निर्जन वन में वर्षा, शीत, आतप आदि सहती हुई, भगवान श्रीराम के आने की प्रतीक्षा करने लगी । अब कोई एकमात्र श्रीराम की ही प्रतीक्षा कर रहा हो और श्रीराम न आएँ । ऐसा कहीं सम्भव है । श्रीरामजी सोचविमोचन हैं । वे सबके सोच संताप मिटाते हैं । लेकिन जो एकमात्र उन्हीं के भरोसे पड़ा हो । उसे वे कैसे भूल सकते हैं ?
आगे-आगे ऋषि विश्वामित्र चले जा रहे हैं । बीच में दीन-मलीनों का उद्धार करने वाले श्रीरामजी और सबसे पीछे लक्ष्मण जी । मुनि तो आगे थे ही, वे चलते जा रहे थे । परन्तु श्रीरामजी तो अब आगे जा ही नहीं सकते थे । उन्हें तो अहिल्या का उद्धार करना था । परन्तु कैसे ? गुरू जी चलते जाएँ और राम जी अहिल्या का उद्धार करने लग जाय, ऐसा कहीं सम्भव हो सकता है ?
श्रीरामजी दया, करूणा, शील, विनम्रता, कृतज्ञता, आदर्श, मर्यादा आदि जितने गुण हैं । सबके भंडार हैं, मूर्तिमान स्वरूप हैं  । ऐसे में पहले तो गुरू की आज्ञा लेनी/मिलनी चाहिए । क्योंकि गुरू जी साथ हैं । यदि साथ न होते तब दूसरी बात थी । इसलिए श्रीरामजी ने स्वयं मुनिराज से पूछा कि मुनिवर यह शिला कैसी है ? यह स्थान इतना सूना-सूना क्यों है ? तब विश्वामित्र जी ने अहिल्या की सारी कथा कह सुनाई । और आज्ञा भी दिया कि “चरण कमल रज चाहत कृपा करो रघुवीर” ।
भगवान श्रीराम की चरण रज लगते ही अहिल्या शाप मुक्ति हो गई । अपने पूर्व स्वरूप को प्राप्त होकर भगवान का गुण गान करने लगी । उसे गौतम ऋषि का शाप वरदान लगा । क्योंकि उसे देव दुर्लभ श्रीराम जी के चरण रज की प्राप्ति हुई थी । जिसे मुनि लोग अनेक जन्मों की तपस्या से भी जल्दी प्राप्त नहीं कर पाते । अहिल्या सोचती है कि जिन भगवान के चरणों से निकली हुई गंगाजी को श्रीशिवजी हमेशा शीस पर रखते हैं । व्रह्मा जी हमेशा कमण्डल में लिए घूमते हैं । आज उन्हीं भगवान ने हमें चरण रज दे दिया ।  इस प्रकार मुक्त होकर अहिल्या अपने पति गौतम ऋषि को पुनः प्राप्त हुई ।

Tuesday, March 5, 2013

बौधायन की पायथागोरस प्रमेय



बौधायन की पायथागोरस प्रमेय ! ------

ग्रीक गणितज्ञ पायथागोरस (जन्म 570 ईसा पूर्व) की पायथागोरस प्रमेय को कोन नहीं जनता |
जबकि यह कम लोग ही जानते होंगे कि वास्तव में इसके रचयिता पायथागोरस नहीं वरन हमारे वैदिक
ऋषि बौधायन (जन्म 800 ईसा पूर्व.) हैं, जिऩ्होंने यह रचना पायथागोरस से लगभग 250 वर्ष पहले की थी। 
ऐसा भी नहीं है कि पायथागोरस ने इसकी रचना स्वतंत्र रूप से की हो अपितु शुल्ब सूत्र के अध्यन से ही प्राप्त की थी। इस प्रमेय का वर्णन शुल्ब सूत्र (अध्याय १, श्लोक १२) में मिलता है।

शुल्बसूत्र, स्रौत सूत्रों के भाग हैं ; स्रौतसूत्र, यह वेदों के उपांग (appendices) हैं। शुल्बसूत्र ही भारतीय गणित के सम्बन्ध में जानकारी देने वाले प्राचीनतम स्रोत हैं। शुल्ब सूत्र में यज्ञ करने के लिये जो भी साधन आदि चाहिये उनके निर्माण या गुणों का वर्णन है। यज्ञार्थ वेदियों के निर्माण का परिशुद्ध होना अनिवार्य था। अत: उनका समुचित वर्णन शुल्ब सूत्रों में दिया गया है। भिन्न आकारों की वेदी बनाते समय ऋषि लोग मानक सूत्रों (रस्सी) का उपयोग करते थे । ऐसी प्रक्रिया में रेखागणित तथा बीजगणित का आविष्कार हुआ।

शुल्बसूत्र का एक खण्ड बौधायन शुल्ब सूत्र है। बौधायन शुल्ब सूत्र में ऋषि बौधायन ने गणित
ज्यामिति सम्बन्धी कई सूत्र दिए | बौधायन का एक सूत्र इस प्रकार है: दीर्घचतुरश्रस्याक्ष्णया रज्जु:
पार्श्वमानी तिर्यंगमानी च यत्पृथग्भूते कुरुतस्तदुभयं करोति। (बो। सू० १-४८)
एक आयत का विकर्ण उतना ही क्षेत्र इकट्ठा बनाता है जितने कि उसकी लम्बाई और चौड़ाई अलग-अलग बनाती हैं। अर्थात किसी आयत के विकर्ण द्वारा व्युत्पन्न क्षेत्रफल उसकी लम्बाई एवं चौड़ाई
द्वारा पृथक-पृथक व्युत्पन्न क्षेत्र फलों के योग के बराबर होता है।

यहीं तो पाइथेगोरस का प्रमेय है। स्पष्ट है कि इस प्रमेय की जानकारी भारतीय गणितज्ञों को पाइथेगोरस के पहले से थी। जो प्रमेय पायथागोरस ने दी वो है :
The sum of the areas of the two squares on the legs (a and b) equals the area of the square on the hypotenuse (c). a2 + b2 = c2
ज्यामितिक साहित्य मूलतः ऋग्वेद से उत्पन्न हुआ है जिसके अनुसार अग्नि के तीन स्थान होते
हैं- वृत्ताकार वेदी में गार्हपत्य, वर्गाकार में अंह्यान्या तथा अर्धवृत्ताकार में दक्षिणाग्नि। तीनों वेदियों में से प्रत्येक का क्षेत्रफल समान होता है। अतः वृत्त वर्ग एवं कर्णी वर्ग का ज्ञान भारत में ऋग्वेद काल में था। इन वेदियों के निर्माण के लिए भिन्न-भिन्न ज्यामितीय क्रियाओं का प्रयोग किया जाता था। जैसे किसी सरल रेखा पर वर्ग का निर्माण, वर्ग के कोणों एवं भुजाओं का स्पर्च्च करते हुए वृत्तों का निर्माण, वृत्त का दो गुणा करना। इस हेतु इनका मान ज्ञात होना जरूरी था।

इनके अतिरिक्त उऩ्होंने २ के वर्गमूल निकालने का सूत्र भी दिया है, जिससे उसका मान दशमलव
के पाँच स्थान तक सही आता है तथा कई अन्य
ज्यामितीय रचनाओं के क्षेत्रफल ज्ञात करने,
ज्यामितीय आकारों के बारे तथा एक ज्यामितीय
आकार को दूसरे समक्षेत्रीय आकार में
परिवर्तित करना आदि |

उदाहरण के लिए एक आयत को एक समक्षेत्रीय
वर्ग के रूप में अथवा उसके अंश या गुणित
(Multiple) में प्राप्त करने का तरीका।


भाई श्री मुकुल शुक्ल जी द्वारा प्रेषित महत्वपूर्ण लेख , जो आपकी आँखें खोल देगा


पांच शब्दों मैं सूरज से दूरी को बता दिया तुलसीदास जी ने

Monday, March 4, 2013

क्या रावण जगद्जननी मां जानकी का हरण कर सकता था?


क्या रावण जगद्जननी मां जानकी का हरण कर सकता था???
बहुत दिन से इस विषयपर लिखने का सोच रहा था, जिसकी कई वजहें थी कुछ मूर्खों और अधर्मियों द्वारा माता सीता के बारे में निंदनीय बात कहना तथा मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्री राम के बारे में निराधार बातें कहना...
ये उन मूर्खों के लिए प्रत्युत्तर है.. जिन्होंने रामायण या रामचरित मानस का पठन तो क्या ढंग से रामायण सीरियल भी नहीं देखा और बातें ब्रहम की करते हैं... साथ ही अश्लील बातें करने वाले तथाकथित शांति के धर्म वालों के लिए भी सादर जानकारी है... जिनके लिए सो कॉल्ड खुदा की पुस्तक ही अंतिम सत्य है, बाकी सब मिथ्या॥
तथा ये जानकारी अपने हिंदु भाइयों के ज्ञानवर्धन के लिए भी सादर प्रस्तुत है....



अब बात करते हैं सिया-हरण की। सीता हरण तो बहुत दूर की बात है, उन जैसी पतिव्रता नारी को छूना तक असम्भव था। उनके सतीत्व में इतना बल था कि अगर कोई भी उनको स्पर्श तक करता तो तत्काल भस्म हो जाता। रावण ने जिनका हरण किया वो वास्तविक माता सीता ना होकर उनकी प्रतिकृति छाया मात्र थी। इसके पीछे एक गूढ रहस्य है, जिसका महर्षि बाल्मीकि कृत रामायण व गोस्वामी तुलसी कृत रामचरित मानस में स्पष्ट वर्णन है...
पंचवटी पर निवास के समय जब श्री लक्ष्मण वन में लकडी लेने गये थे तो प्रभु श्री राम ने माता जानकी से कहा-

"तब तक करो अग्नि में वासा।
जब तक करुं निशाचर नाशा॥"

प्रभु जानते थे कि रावण अब आने वाला है, इसलिए उन्होंने कहा- हे सीते अब वक्त आ गया है, तुम एक वर्ष तक अग्नि में निवास करो, तब तक मैं इस राक्षसों का संहार करता हूँ..

यह रहस्य स्वयं लक्ष्मण भी नहीं जानते थे..

"लक्ष्मनहु ये मरम न जाना।
जो कछु चरित रचा भगवाना॥"

इसीलिए रावण वध के पश्चात जब श्री राम ने लक्ष्मन से अग्नि प्रज्वलित करने के लिए कहा कि सीता अग्नि पार करके ही मेरे पास आयेंगी.. तो सुमित्रानंदन क्रोधित हो गये कि भइया आप मेरी माता समान भाभी पर संदेह कर र्हे हैं.. मैं ऐसा नहीं होने दुंगा.. तब राम ने लक्ष्मण को सारा रहस्य बताया और कहा हे लक्ष्मण सीता और राम तो एक ही हैं.. सीता पर संदेह का अर्थ है मैं स्वयं पर संदेह कर रहा हूँ... और छायारुपी सीता की बात बताई और कहा कि रावण वास्तविक सीता को अगर छू भी लेता तो तत्काल भस्म हो जाता...
इसके बाद स्वयं माता जानकी ने लक्ष्मण से कहा...

"लक्ष्मन हो तुम धर्म के नेगी।
पावक प्रगट करो तुम वेगी॥"

हे लक्ष्मण अगर तुमने धर्म का पालन किया है तो शीघ्रता से अग्नि उत्पन्न करो... उसके बाद छायारुप मां जानकी अग्नि में प्रविष्ट हो गई और वास्तविक सीता मां श्री राम के पास आ गई..॥

वैसे तो उपरोक्त वृतांत रामचरितमानस की चौपाइयों को आधार बनाकर मैंने वर्णन किया है, फिर भी बहुत से ज्ञानी या कहूं मतिमूढ, नकली(छायारुप) सीता वाली बात पर विश्वास नहीं करेंगे... उनके लिए कुछ तथ्य व प्रमाण नीचे सादर प्रस्तुत हैं...


आधुनिक विज्ञान ने ज़ेरोक्स (Xerox) मशीने बनायीं। एक पेपर मशीन में डालो और उसकी जितनी चाहो ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) निकाल लो। आधुनिक विज्ञान ने बॉयलर, कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर जैसी सुविधाजनक तकनीकों को भी आयाम दिया। बॉयलर में ठोस बर्फ डालो और उसे चुटकियों में भाप में बदल दो। इसी तरह भाप को कंदैंसर और रेफ्रिज़रेटर की मदद से वापिस बर्फ में भी बदला जा सकता है।

परन्तु क्या विज्ञानी कोई ऐसी तकनीक बना पाए हैं, जिससे पलक झपकते ही अपनी देह, एक मानव शरीर की ज़ेरोक्स कापियाँ (प्रतिलिपियाँ) बनायी जा सकें? क्या आज की उन्नत लैबोरेटि्यों (प्रयोगशालाओं) में कोई ऐसी तकनीक विकसित हुई है, जिससे अपनी साकार देह को भाप और फिर उसी भाप को ठोस आकार देकर साकार बनाया जा सके? निःसंदेह, वर्तमान वैज्ञानिकों के लिए ये अभी एक परी-कथा ही है। बहुत संभव है कि आपको भी ये बातें कल्पना-जगत की बेलगाम दौड़ लगे।

परन्तु वास्तविकता बिल्कुल अनूठी और विराट है! वास्तव में, एक क्षेत्र ऐसा है जिसके शीश पर इन परमोन्नत तकनीकों के आविष्कारों का सेहरा बंधा है। यह क्षेत्र है- अध्यात्म ज्ञान अथवा वैदिक विज्ञान का! अध्यात्म- पोषित हमारे संत-सत्गुरु और प्राचीन कालीन ऋषिगण इन विलक्षण तकनीकों के कुशल आविष्कारक एवं अनुभवी रहे हैं। वे अपनी देह को इच्छानुसार अदृश्य और प्रकट- वह भी मनचाही गिनती में कई स्थानों पर एक साथ करते रहे हैं।

त्रेताकाल के एक बहु-चर्चित देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का प्रसंग इसका उदाहरण है, वर्णानानुसार देवी-सीता के लंका से लौटने पर श्री राम ने उन्हें ज्यों-का-त्यों स्वीकार नहीं किया। रूखे वचन कहकर उन्हें अपनी चारित्रिक विशुधता प्रमाणित करने को कहा। देवी सीता ने तुरंत इस चुनौती को स्वीकार किया और प्रचण्ड अग्नि से गुज़रकर ‘अग्नि परीक्षा’ दी। यह ऐतिहासिक दृष्टांत विद्वानों, समाजवादियों, खासकर तथा-कथित नारी-संरक्षकों के लिए सदा से विवाद का विषय रहा है। वे इसे नारी की अस्मिता के प्रति घोर अन्याय मानते आए हैं।

परन्तु ऐसा केवल इसलिए है, क्यूँकि वे इस परीक्षा के तल में छिपे वैज्ञानिक सत्य को नहीं जानते। दरअसल यह लीला एक अनुपम विज्ञान था। इसकी भूमि सीता हरण से पहले ही रची जा चुकी थी।

अध्यात्म रामायाण (अरण्य काण्ड, सप्तम सर्ग) में स्पष्ट रूप से वर्णित है-
अथ रामः अपि ---- शुभे
अर्थात रावण के षड़यंत्र को समझ, प्रभु श्री राम देवी सीता से एकांत में कहते हैं- ‘है शुभे! मैं जो कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो। रावण तुम्हारे पास भिक्षु रूप में आएगा। अतः तुम अपने समान आकृति वाली प्रतिबिम्ब देह कुटी में छोड़कर अग्नि में विलीन हो जाओ। एक वर्ष तक वहीं अदृश्य रूप में सुरक्षित वास करो। रावण वध के पश्चात्त तुम मुझे अपने पूर्ववत स्वरुप में पा लोगी।’ आगे (अरण्य काण्ड २३/२) में लिखा है कि प्रभु का यह सुझाव पाकर श्री सीता जी अग्नि में अदृश्य हो गयी व अपनी छायामुर्ति कुटी में पीछे छोड़ गयीं-
जबही राम ---------- सुबिनीता
माँ सीता के इस वास्तविक स्वरुप को पुनः प्राप्त करने के लिए ही अग्नि-परीक्षा हुई थी। सो, यही अग्नि-परीक्षा के पीछे की सच्ची वास्तविकता है।


परन्तु आज का बौधिक व युवा वर्ग इसे एक अलंकारिक अतिशयोक्ति या जादुई चमत्कार मान बैठता है। किन्तु ऐसा बिल्कुल नहीं है। दार्शनिक स्पिनोजा कहतें हैं'Nothing happens in nature which is in contradiction with its Universal laws'. डॉ. हर्नाक कहते है'जिन्हें हम चमत्कार समझते हैं, वे घटनाएँ भी इस सृष्टि और काल के व्यापक नियमों के आधीन हैं। हाँ, यह बात अलग है कि हम उन उच्च कोटि के नियमों को नहीं जानते हों।'


ऋषि पातंजलि इस प्रतिबिम्ब शरीर को निर्माण देह, बोध शास्त्र निर्माण काया कहते हैं। ‘ एकोअहं बहुस्याम’ की ताल पर श्री कृष्ण का रासलीला के अंतर्गत अनेक स्वरूपों में प्रकट होना; कौशल्यानंदन का शयनकक्ष व रसोईघर में एक समय में ही विद्यमान होना- ये सभी योगविज्ञान के साधारण से प्रयोग हैं। विपत्ति काल में सत्गुरु अपने दीक्षित शिष्यों की पुकार पर वे एक ही समय में विश्व के अनेकों भागों में समान रूप, रंग, गुण, कौशल व अभेद देह में प्रकट होते रहे हैं और अपना विरद निभाने के लिए आगे भी यूँ ही प्रकट होते रहेंगे।


किस प्रकार यह प्रकटिकरण होता है? दरअसल, इस सृष्टि में जीव, वस्तु या किसी भी प्रकार की सत्ता के निर्माण में दो अनादी तत्त्वों का मेल चाहिए होता है।


उपादान तत्त्व- यह प्रकृति का सूक्ष्म जड़ तत्त्व है। इसके स्थूल रूप को विज्ञान ‘मैटर’ कहता है। यह तत्त्व त्रिगुण (सत्त्व, रजस, तमस) से युक्त होता है। यह एक तरह से सृष्टि की प्रत्येक सत्ता का raw material माना जाता है।

निमित्त तत्त्व- यह एक चैतन्य शक्ति है, जो चेतना के रूप में सम्पूर्ण सृष्टि व उसके कण-कण में समाई हुई है। इसे वैज्ञानिक शब्दावली में'cosmic precociousness' -भी कहा गया है।

इन दोनों तत्वों के परस्पर संयोग से ही ‘निर्माण’ सधता है। किस प्रकार? आईये, इसके लिए हम एक सरसरी दृष्टि'Creation of Universe'पर डालें, जहाँ ये दोनों तत्त्व अपने शुद्धतम रूप में प्रकट थे और ‘सृष्टि निर्माण’ में विशुद्ध भूमिका निभा रहे थे।
उपादान( Matter ) + निमित्त ( Conciousness ) = सृष्टि (Universe)

दरअसल इस देह रचना में भी ठीक ‘सृष्टि रचना’ का ही विज्ञान काम करता है। वही दो अनादी तत्वों का प्रयोग होता है-ब्रह्मचेतना तथा प्रकृति के उपादान तत्त्व। यूँ तो चेतना प्रत्येक मनुष्य में क्रियाशील रहती है। परन्तु यह प्रगाढ़ वासनाओं, करम- संस्कारों, अविद्या, अज्ञानता से ढ़की और दबी रहती है। अध्यात्म-ज्ञान या ब्रह्मज्ञान की साधना से ये समस्त आवरण दूर होते हैं व चेतना शुद्धतम प्रखर रूप में प्रकट होती है।


पूर्ण आध्यात्मिक विभूतियों ने चेतना के इसी ब्रह्ममय स्वरुप को पाया हुआ होता है। जब भी आवश्यक होता है, ये पूर्ण चैतन्य विभूतियाँ अपनी ब्रह्ममयी चेतना को प्रकृति के उपादान-तत्त्वों -पर आरूढ़ करती हैं। उनकी यह चेतना प्रकृति के परमाणुओं पर लगाम कसती है ओर उनमें विक्षोभ पैदा कर देती है। फिर अपनी इच्छानुसार परमाणुओं में आकर्षण- विकर्षन कर स्वयं अपनी आकृति की देह निर्मित्त कर लेती हैं। वह भी मनचाही संख्या में!! अंततः इस ‘निर्माण देह’ में ‘निर्माण चित्त’ को भी प्रवेश कराके उसे पूर्ण रूप से सजीव कर देती हैं।


देवी सीता के विषय में भी ठीक यही अनादी विज्ञान प्रयोग में लाया गया था। सीता स्वयं में साक्षात चेतना-स्वरूपिणी -माँ भगवती थीं। उनके लिए प्रकृति के जड़- तत्त्वों से छेड़छाड़ करके एक प्रतिबिम्ब देह निर्मित कर्म दर्पण देखने के समान सहज था।


परन्तु उनके सन्दर्भ को पूरी तरह प्रकाशित करने के लिए हमें एक तथ्य और जानना होगा। वह यह की वेदों में आदिकालीन ब्रह्म-चेतना को ‘वैश्वानर अग्नि’ भी कहा गया है। ब्रह्मसूत्र में इस अग्नि के विषय में यह बताया गया की यह अग्नि न तो कोई दैविक अग्नि है, न ही भौतिक है। यह निःसंदेह आदिकाल की ब्रह्म-अग्नि ही है।

ऋगवेद में कहा गया है (१-५८-१)-
जब यह अग्नि प्रकट होती है, तो अंतरिक्ष में फैल जाती है। यह प्रकृति के परमाणुओं को सही मार्गों पर ले चलती है और उनका निर्माण कार्य में प्रयोग करती है।

यहीं नहीं ऋग्वेद में एक अन्य ऋषि का कहना है –
केवल प्रकृति के कण-कण में ही नहीं, यह अग्नि मनुष्य के अंग-अंग में भी विद्यमान होती है। परन्तु ध्यान दें, यह अग्नि विद्यमान तो सब में होती है। लेकिन विशुद्ध रूप से प्रकट केवल विकसित आत्माओं में ही होती है-
(ऋग्वेद १-१-२)
यह अग्नि पूर्व (कल्प) के ऋषियों को ज्ञात थी। इस युग के ऋषियों को भी ज्ञात है। यह सभी दैव-स्वरुप आत्माओं को ज्ञात होती है।
अब इन समस्त जानकारियों को साथ लेकर हम सीता-अग्नि-परीक -्षा के प्रसंग का वैज्ञानिक विश्लेषण करते हैं।

देवी सीता की अग्नि-परीक्षा का वैज्ञानिक विश्लेषण :

ऋग्वेद (१-५८-२ ) में वैश्वानर अग्नि की त्रि-स्तरीय भूमिका दर्शायी गई है।

वैश्वानर अग्नि शाश्वत चेतना है । यह प्रकृति के परमाणुओं को -
1. Integrate - संयुक्त करती है।
2. Disintegrate- पृथक भी करती है ।
3. Preserve- सुरक्षित भी रखती है।
यह तीनों वही भूमिकाएँ हैं, जो सृष्टि-निर्माण- -कार्य में ब्रह्म-चेतना की थीं। और यही वे वैज्ञानिक क्रियाएँ हैं, जो सीता-अग्नि-परीक -्षा में भी प्रयोग की गईं। सीता-हरण से पूर्व जब श्री राम ने देवी सीता को अपना प्रतिबिम्ब पीछे छोड़कर अग्नि में निवास करने को कहा , तो वास्तव में क्या हुआ? क्या वैज्ञानिक-लीला घटी ? सीता ने तत्क्षण अग्नि प्रकट की। कदाचित यह कोई लौकिक अग्नि नहीं, वैश्वानर अग्नि ही थी। अर्थात सीता ने अपनी ब्रह्म चेतना को सक्रिय किया। फिर उसके द्वारा प्रकृति के परमाणुओं में हस्तक्षेप किया। उन्हें प्रयोजनानुसार जोड़कर एक अन्य निज-देह प्रकट कर ली। यह पहली वैज्ञानिक क्रिया थी।

इसके पश्चात माँ सीता ने ब्रह्म-चेतना या वैश्वानर अग्नि के द्वारा अपनी वास्तविक देह के परमाणुओं को अलग-अलग कर दिया। प्रसंग के अनुसार माँ सीता कि वास्तविक देह अग्नि में विलीन हो गयी थी। अग्नि में यह विलीनता वैज्ञानिक स्तर पर वैश्वानर अग्नि द्वारा देह का उपादान तत्व में बिखर जाना अर्थात'disintegration -of body'ही था। यह दूसरी वैज्ञानिक क्रिया थी।

फिर ये पृथक तत्त्व या परमाणु एक वर्ष तक उनकी वैश्वानर अग्नि के संरक्षण में रहे। उसी वैश्वानर अग्नि अथवा ब्रह्म-चेतना के, जो सकल सृष्टि के परमाणुओं की रक्षा करती है व जिसका आह्वान कर ऋषियों ने कहा- (ऋग्वेद १-१-१) - हे अग्नि स्वरूप ब्रह्म-चेतना! पिता स्वरुप में , अपनी संतान की तरह हमारी रक्षा करो। कहने का आशर्य यह है कि सीता सशरीर नहीं, परमाणुओं के रूप में ब्रह्माण्ड की वैश्वानर अग्नि में समाहित रहीं। यह तीसरी वैज्ञानिक प्रक्रिया थी ।

एक वर्ष बाद ... विजय बिगुल बजे और पुनर्मिलन की बेला आई। तब पुनः यहीं विज्ञान दोहराया गया। रामायण (युद्धकाण्ड सर्ग १२/७५ ) के प्रसंगानुसार -

राघव ने एक विशेष कार्य के लिए निर्मित मायावत सीता को देखा और अग्नि-परीक्षा देने को कहा। श्री राम का यह कथन, वास्तव में देवी सीता को पुनः उसी वैज्ञानिक प्रक्रिया का संधान करने की प्रेरणा ही थी। उस समय प्रतीकात्मक रूप में भौतिक अग्नि जलाई गयी। परन्तु सीता जी का आह्वान तो वैश्वानर अग्नि के प्रति ही था।
(युद्धकाण्ड सर्ग -१३ )- हे सर्वव्यापक! अति पावन! लोक साक्षी अग्नि !...स्पष्ट है, ये संबोधन लौकिक अग्नि के लिए नहीं हो सकते थे। अतः लौकिक अग्नि की आड़ मेंवैश्वानर-अग् -नि (ब्रह्मचेतना) पुनः सक्रिय हुई। उसने सीता जी की प्रतिबिम्ब देह के परमाणुओं को बिखेर कर पुनः प्रकृति में मिला दिया। फिर वास्तविक देह के परमाणुओं को एकत्र कर पूर्ववत जोड़ दिया। देवी सीता को सुरक्षित रूप में श्री राम के समक्ष प्रकट किया। यहीं वैज्ञानिक विलास प्रतीकात्मक शैली में इस प्रकार रखा गया- लोक साक्षी भगवन वास्तविक जानकी को पिता के समान गोद में बिठाए हुए प्रकट हुए और रघुनाथ जी से बोले- मेरे पितास्वरूप संरक्षण में सौंपी हुई जानकी को पुनः ग्रहण कीजिये।
वह प्रतिबिंबरुपिणी -सीता जिस कार्य के लिए रची गयी थी, उसे पूरा करके पुनः अदृश्य हो गयी है।

यह वचन सुनकर श्री राम ने अत्यंत प्रसन्नता से जानकी जी को स्वीकार कर लिया। उसी क्षण इस विज्ञान के ज्ञाताओं - ब्रह्मा, महेश आदि देवताओं ने आकाश से फूल बरसाए। परन्तु अवैज्ञानिक दृष्टिकोण रखने वालों ने उस काल से आज तक कभी सीता पर कलंक, तो कभी राम पार आक्षेप लगाए।

Sunday, March 3, 2013

भाव से जुड़ी याद रखने योग्य 3 अहम जरूरी बातें

भगवान में आस्था रखने वाला इंसान दु:ख में, किसी विशेष इच्छा को पूरा करने, किसी देव साधना से जुड़े नित्य कर्म या खास मौके पर धार्मिक कर्मों में भगवान को याद जरूर करता है। किंतु अक्सर व्यक्ति भगवान की पूजा, उपासना या भक्ति के दौरान कुछ जरूरी बातों पर गौर नहीं करता। जिससे अनेक लोग परेशानियां पूरी तरह से दूर न होने या इच्छाएं अधूरी होने से निराश होकर नियमित भगवान के ध्यान से दूरी बना लेते हैं। ऐसी हालात में वह यह नहीं सोच पाता कि भगवान की कृपा से ही संभव हो कि उसकी दिक्कतें बढ़ी नहीं और कुछ हद तक कामनाएं भी पूरी हुईं।

आखिर कौन-सी हैं वे अहम बातें, जिन पर ध्यान न देने से भक्ति के बाद भी व्यक्ति बेचैन और परेशान रहता है? धर्म के नजरिए से जानिए भगवान को स्मरण करने में इच्छाओं, भाव से जुड़ी याद रखने योग्य 3 अहम जरूरी बातें -

- पहली बात जब भी भगवान या अपने इष्ट का ध्यान करें या मंत्र जप करें। वह नाम और जप उजागर न करें। क्योंकि धार्मिक महत्व की दृष्टि से भगवान के नाम का ध्यान जितना गुप्त रखा जाता है वह उतना ही असरदार और फलदायी होता है।

- दूसरी बात आप जिस भी देवता या इष्ट का नाम लें उस नाम का मतलब और देव स्वरूप का ध्यान कर जप करें। जिससे मन शांत और एकाग्र्र रहता है।

- तीसरी और अंतिम बात जो व्यावहारिक रूप से अजीब लगती है, किंतु धार्मिक रूप से अहम है। वह है भगवान का ध्यान या उनका नाम किसी इच्छा, कामना के मकसद से न लेकर बिना किसी स्वार्थ या हितपूर्ति की कामना से पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करें। धार्मिक दृष्टि से इस भाव से नाम स्मरण भक्त को भगवान की प्रसन्नता और अदृश्य कृपा मिलती है। साथ ही वह शांत और सहज हो जाता है।"

Monday, February 25, 2013

रामायण की किन चौपाइयों से दूर होती हैं घर या काम की कौन सी परेशानियां?


रामायण की किन चौपाइयों से दूर होती हैं घर या काम की कौन सी परेशानियां?

1. सिरदर्द या दिमाग की कोई भी परेशानी दूर करने के लिए-

हनुमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।

2. नौकरी पाने के लिए -

बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।

धन-दौलत, सम्पत्ति पाने के लिए -

जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।

3. पुत्र पाने के लिए -

प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।

सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।

4. शादी के लिए -

तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि संवारि कै।

मांडवी श्रुतकीरति उर्मिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥

5. खोई वस्तु या व्यक्ति पाने के लिए -

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।

6. पढ़ाई या परीक्षा में कामयाबी के लिए-

जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥

7. जहर उतारने के लिए -

नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

8. नजर उतारने के लिए -

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।

9. हनुमानजी की कृपा के लिए -

सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।

10. यज्ञोपवीत पहनने व उसकी पवित्रता के लिए -

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।

11. सफल व कुशल यात्रा के लिए -

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

12. शत्रुता मिटाने के लिए -

बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥

13. सभी तरह के संकटनाश या भूत बाधा दूर करने के लिए -

प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।

जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥

14. बीमारियां व अशान्ति दूर करने के लिए -

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥

15. अकाल मृत्यु भय व संकट दूर करने के लिए -

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।
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जय सियाराम मित्रों..पढ़ें और जरुर शेयर करें!
रामायण की किन चौपाइयों से दूर होती हैं घर या काम की कौन सी परेशानियां?

1. सिरदर्द या दिमाग की कोई भी परेशानी दूर करने के लिए-

हनुमान अंगद रन गाजे। हाँक सुनत रजनीचर भाजे।।

2. नौकरी पाने के लिए -

बिस्व भरण पोषन कर जोई। ताकर नाम भरत जस होई।।

धन-दौलत, सम्पत्ति पाने के लिए -

जे सकाम नर सुनहि जे गावहि।सुख संपत्ति नाना विधि पावहि।।

3. पुत्र पाने के लिए -

प्रेम मगन कौसल्या निसिदिन जात न जान।

सुत सनेह बस माता बालचरित कर गान।।

4. शादी के लिए -

तब जनक पाइ वशिष्ठ आयसु ब्याह साजि संवारि कै।

मांडवी श्रुतकीरति उर्मिला, कुँअरि लई हँकारि कै॥

5. खोई वस्तु या व्यक्ति पाने के लिए -

गई बहोर गरीब नेवाजू। सरल सबल साहिब रघुराजू।।

6. पढ़ाई या परीक्षा में कामयाबी के लिए-

जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी। कबि उर अजिर नचावहिं बानी॥

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती। जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती॥

7. जहर उतारने के लिए -

नाम प्रभाउ जान सिव नीको। कालकूट फलु दीन्ह अमी को।।

8. नजर उतारने के लिए -

स्याम गौर सुंदर दोउ जोरी। निरखहिं छबि जननीं तृन तोरी।।

9. हनुमानजी की कृपा के लिए -

सुमिरि पवनसुत पावन नामू। अपनें बस करि राखे रामू।।

10. यज्ञोपवीत पहनने व उसकी पवित्रता के लिए -

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग।।

11. सफल व कुशल यात्रा के लिए -

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा। ह्रदयँ राखि कोसलपुर राजा॥

12. शत्रुता मिटाने के लिए -

बयरु न कर काहू सन कोई। राम प्रताप विषमता खोई॥

13. सभी तरह के संकटनाश या भूत बाधा दूर करने के लिए -

प्रनवउँ पवन कुमार,खल बन पावक ग्यान घन।

जासु ह्रदयँ आगार, बसहिं राम सर चाप धर॥

14. बीमारियां व अशान्ति दूर करने के लिए -

दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज काहूहिं नहि ब्यापा॥

15. अकाल मृत्यु भय व संकट दूर करने के लिए -

नाम पाहरु दिवस निसि ध्यान तुम्हार कपाट।

लोचन निज पद जंत्रित जाहिं प्रान केहि बाट।।

Tuesday, February 19, 2013

शिवलिंग के रंग दिन में तीन बार बदलते हैं





उत्तर प्रदेश में शाहजहांपुर के कोतवाली इलाके में स्थित एक मंदिर में स्थित जुड़वा शिवलिंग के रंग दिन में तीन बार बदलते हैं।

सुबह में शिवलिंग का रंग भूरा, दोपहर में हरा और शाम में काला हो जाता है।

करीब चार सौ साल पुराने शिवलिंग की इतनी मान्यता है कि देश के कोने कोने से लोग अपनी मुरादें लिये यहां आते हैं जो पूरी होती है।

शहीदों की नगरी शाहजहांपुर के कोतवाली इलाके के चौक में बाबा चौकसीनाथ का मंदिर है जिसमें यह जुड़वा शिवलिंग लगा है जो चार सौ साल पुराना है।

बादशाह शाहजहां के सिपहसालार सुखलाल चौकसी चार सौ साल पहले यहां आये थे। उस समय गर्रा नदी पर पुल का निर्माण हो रहा था।

उन्होंनें अपने सहयोगियों के साथ यहां रहने की योजना बनायी। उस वक्त इस इलाके में पेड़ और झाड़ियों ही थीं। पेड़ और झाडियों को काट कर जब साफ किया जा रहा था तब एक कुल्हाड़ी शिवलिंग से जा टकरायी। शिवलिंग को जब खोद कर निकाला गया तो उस पर कुल्हाड़ी का निशान बना था।

इसके बाद सुखलाल चौकसी ने बादशाह शाहजहां की नौकरी छोड़ दी और यहीं रह कर पूर्जा अर्चना करने लगे। शिवलिंग को स्थापित कर एक मंदिर का निर्माण कराया गया जिसे चौकसी बाबा मंदिर का नाम दिया गया। अमावस्या और सोमवार के दिन यहां दूर दूर से श्रद्धालु अपनी मनौती लिये यहां आते हैं।

हर साल महाशिवरात्रि को यहां भव्य आयोजन होता है। इस दिन यहां सबसे ज्यादा भीड़ होती है।

यह मंदिर पौराणिक होने के साथ ही आस्था का भी केन्द्र है। बताते हैं कि बाबा चौकसी नाथ के मंदिर से कोई भी श्रद्धालु खाली हाथ नहीं लौटा। लोग यहां झोली फैलाकर आते हैं और भरकर ले जाते हैं। सबसे ज्यादा आश्चर्य की बात इसका जुड़वा होना है। मंदिर में शिवलिंग के निकट ही शाहजहां से लेकर ब्रिटिश काल तक के सिक्के लगे हैं। जोडे में शिवलिंग को शिव पार्वती का स्वरूप माना जाता है।

Friday, February 15, 2013

भारत में धर्मपरिवर्तन धंधा बन चुका है


आज भारत में धर्मपरिवर्तन धंधा बन चुका है जिसके मूल में राजीनीतिक साम्राज्यवाद और बहुराष्ट्रीय कंपनियों का पैसा लगा हुआ है. भारत के संविधान में मौलिक अधिकारों की धारा 25 के तहत भारत के हर नागरिक को यह अधिकार मिला हुआ है कि वह कोई धर्म अपनाने के लिए आजाद है. लेकिन आज भारत में जो धर्मांतरण हो रहा है उसका एक राजनीतिक मकसद है और यह बहुराष्ट्रीय कंपनी के व्यापार में बदल चुका है. यह परावर्तित लोगों को साम्राज्यवादी ताकतों का पिछलग्गू बनाता है.

मैं जब धर्मपरिवर्तन को व्यापार कहता हूं तो यह अनायास नहीं है. इसके पीछे ठोस तथ्य हैं. इसके लिए मैं सेविन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च का उदाहरण पेश करना चाहूंगा. एक अकेले सेवेन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च ने साल 2004 में विदेशों से 5850 करोड़ रूपये प्राप्त किये. इस पैसे का उपयोग 10 लाख लोगों का धर्मपरिवर्तन करने के लिए किया गया. कनाडा के धर्म-प्रचारक रॉनवाट्स सेवेन्थ डे एडवेन्टिस्ट चर्च के दक्षिण एशिया के प्रमुख हैं. 1997 में व्यापारिक वीजा लेकर वे भारत में दाखिल हुए थे. जब वे भारत आये थे तो उस समय इस चर्च के सवा दो लाख सदस्य थे. यह इस चर्च के 103 साल के काम का नतीजा था. लेकिन बाद के पांच सालों में सदस्यों की संख्या अचनाक बहुत तेजी से बढ़ी और यह सात लाख हो गयी. ग्लोबल इन्वेगेलिज्म के निदेशक मार्क फिन्ले ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि अकेले 2004 में भारत में 10 लाख 71 हजार 135 लोगों ने ईसाई धर्म ग्रहण किया जो कि पिछले पंद्रह सालों में सर्वाधिक था. यही रिपोर्ट कहती है कि भारत में 15 से 30 वर्ष के 6 लाख नौजवान चर्च के प्रचार, भीड़ को धर्म सभाओं तक लाने व चमत्कारी शो आयोजित करने में लगे हुए हैं.

अब यह ज्यादा स्पष्ट नजर आने लगा है कि धर्म परिवर्तन के काम को साम्राज्यवादी देशों ने अपने हित के कामों में प्रमुख स्थान दिया है. कनाडा की डोरोथी वाट्स एक योजना चला रही हैं जिसका नाम है 10 गांव और 25 घर. यह एक धर्मपरिवर्तन योजना है जो गांवों को अपना निशाना बनाती है. 1998 में 10 गांव कार्यक्रम 17 बार चलाए गये और उससे 9337 लोग ईसा की शरण में पहुंचे. 1999 में यह कार्यक्रम 40 बार आयोजित किया गया और इस साल इससे 40 हजार लोग ईसाई बने. अपने इन शुरूआती नतीजों से उत्साहित होकर डोरोथी वाट्स ने अब 50 गांव योजना शुरू की है. इससे हर महीने 10 हजार लोगों को बैप्टाईज किया जा सकेगा या ईसाई बनाया जा सकेगा.

अमेरिका की मैसिव इवेन्गुलाईजेशन आफ इंडिया नामक संस्था धर्म प्रचार और धर्म परिवर्तन की नयी तकनीकि से लैस होकर इस काम में उतरी है. यूं तो यह योजना 1990 में शुरू की गयी थी लेकिन बुश जूनियर के अमरीकी राष्ट्रपति बनने के बाद इसे गति मिली. इस योजना का असली मकसद है कि भारत को तेजी से ईसाई देश में बदलना है. इस योजना के तहत भारत गरीबों का धर्म परिवर्तन करके उन्हें ज्यादा से ज्यादा चर्च निर्माण के लिए जगह उपलब्ध कराना है. इस संस्था के पास पैसे की कमी नहीं है और वह एक पास्टर (मुख्य ईसाई प्रचारक) को 10 हजार रूपये मासिक तनख्वाह देती है. एक पास्टर के नीचे जो लड़के काम करते हैं उन्हें तीन से पांच हजार रूपये मासिक दिया जाता है. इसके अलावा गांव में जिन्हें रिसोर्स पर्सन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है उन्हें भी पांच सौ रूपये मासिक दिया जाता है.

धर्म परिवर्तन का असर तब दिखाई पड़ता है जब ईसाई अलग राज्य की मांग करने लगते हैं.या फिर अलग देश का ही सपना देखने लगते हैं. उत्तर पूर्व में नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ त्रिपुरा बाकायदा अलग ईसाई राज्य बनाने का आंदोलन चला रहा है. उसकी घोषणा में साफ लिखा है कि उसे त्रिपुरा को खुदा की राजधानी बनाना है. अप्रैल सन 2000 में सीआरपीएफ ने बैप्टिस्ट चर्च आफ त्रिपुरा के सचिव को भारी मात्रा में गोला-बारूद, 50 जिलेटिन की छड़ें, 5 किलो पोटेशियम, 2 किलो सल्फर और बम बनाने के दूसरे सामान के साथ गिरफ्तार किया था. चर्च का दूसरा पदाधिकारी जटन कोलोई ने गिरफ्तार होने पर बयान दिया कि उसने नेशनल लिब्रेशन फ्रण्ट आफ त्रिपुरा के बेस में गोरिल्ला युद्ध का प्रशिक्षण लिया है.

इन्हीं बातों को देखते हुए हम धर्म परिवर्तन को सही नहीं मानते. अगर धर्मपरिवर्तन साम्राज्यवादी हितों की पूर्ती, जातीय उत्पीड़न और सामाजिक गैर बराबरी को बढ़ाता है तो हम इसका विरोध करते हैं. अगर वह चर्चों, मिशन, अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में उच्च जाति के ईसाईयों का कब्जा बरकार रखता है और गरीबों और दलित ईसाईयों को वहां प्रवेश की भी मनाही होती है तो ऐसे धर्म परिवर्तन का मकसद समझ में आता है. —

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वन्देमातरम !!
 

इसलिए खराब नहीं होता गंगाजल

इसलिए खराब नहीं होता गंगाजल

गंगा जल आखिर खराब क्यों नहीं होता ? पतित पावनी गंगा नदी का नाम आते ही ये सवाल अक्सर दिमाग को खटखटा देता है। लेकिन इसका भी... जवाब मिल गया है।


दरअसल, हिमालय की कोख गंगोत्री से निकली गंगा का जल इसलिए कभी खराब नहीं होता, क्योंकि इसमें गंधक, सल्फर, खनिज की सर्वाधिक मात्रा पाई जाती है। राष्ट्रीय जल विज्ञान संस्थान रूड़की के निदेशक डाॅ. आरडी सिंह ने बताया कि हरिद्वार में गोमुख गंगोत्री से आ रही गंगा के जल की गुणवत्ता पर इसलिए कोई दुष्प्रभाव नहीं पड़ता, क्योंकि यह हिमालय पर्वत पर उगी हुई अनेकों जीवन दायनि उपयोगी जड़ी बुटियों के ऊपर से स्पर्श करता हुआ आता है।

अन्य कारण भी

वरिष्ठ वैज्ञानिक डाॅ. मुकेश कुमार शर्मा ने बताया कि गंगा जल खराब नहीं होने के कई वैज्ञानिक कारण भी हैं। एक यह कि गंगा जल में बैट्रिया फोस नामक एक बैक्टीरिया पाया गया है, जो पानी के अंदर रासायनिक क्रियाओं से उत्पन्न होने वाले अवांछनीय पदार्थों को खाता रहता है। इससे जल की शुद्धता बनी रहती है। दूसरा गंगा के पानी में गंधक की प्रचुर मात्रा मौजूद रहती है, इसलिए भी यह खराब नहीं होता।

गंगा को मैला हमने बनाया

डाॅ. सिंह ने बताया कि गंगा हरिद्वार से आगे अन्य शहरों की ओर बढ़ती जाती है वैसे ही शहरों, नगर निगमों और खेतीबाड़ी का कूड़ा करकट तथा औद्योगिक रसायनों का मिश्रण गंगा में डाल दिया जाता है। यही वजह है कि कानपुर, वाराणसी और इलाहाबाद का गंगा जल आज पीने योग्य नहीं रह गया है।

Thursday, February 14, 2013

कामसूत्र, ऋषि वात्स्यायन और विदेशी इस्लामिक दुष्प्रचार

कामसूत्र, ऋषि वात्स्यायन और विदेशी इस्लामिक दुष्प्रचार







अक्सर मैंने कुछ लोगो विशेषत: मुसलमानों को ये कहते सुना है की सनातन धर्म में कामसूत्र एक कलंक है और वे बार बार कुछ पाखंडियो बाबाओ के साथ साथ कामसूत्र को लेकर सनातन धर्म पर तरह तरह के अनर्लग आरोप व् आक्षेप लगाते रहते है| चूँकि जब मैंने ऋषि वात्सयायन द्वारा रचित कामसूत्र का अध्ययन किया तो ज्ञात हुआ की कामसूत्र को लेकर जितना दुष्प्रचार हिन्दुओ ने किया है उतना तो मुसलमानों और अंग्रेजो ने भी नहीं किया | मुसलमान विद्वान व् अंग्रेज इस बात पर शोर मचाते रहते है की भारतीय संस्कृति में कामसूत्र के साथ साथ अश्लीलता भरी हुई है और ऐसे में वे खजुराहो और अलोरा अजन्ता की गुफाओं की मूर्तियों, चित्रकारियो का हवाला दे कर भारत संस्कृति के खिलाफ जमकर दुष्प्रचार करते है|

आज मैं आप सभी के समक्ष उन सभी तथ्यों को उजागर करूँगा जिसके अनुसार कामसूत्र अश्लील न होकर एक जीवन पद्दति पर आधारित है, ये भारतीय संस्कृति की उस महानता को दर्शाता है जिसने पति पत्नी को कई जन्मो तक एक ही बंधन में बाँधा जाता है और नारी को उसके अधिकार के साथ धर्म-पत्नी का दर्जा मिलता है, भारतीय संस्कृति में काम को हेय की दृष्टि से न देख कर जीवन के अभिन्न अंग के रूप में देखा गया है, इसका अर्थ ये नहीं की हमारी संस्कृति अश्लील है, कामसूत्र में काम को इन्द्रियों द्वारा नियंत्रित करके भोगने का साधन दर्शाया गया है, वास्तव में ये केवल एक दुष्प्रचार है की कामसूत्र में अश्लीलता है और ये विचारधारा तब और अधिक फैली जब कामसूत्र फिल्म आई थी, जिसमे काम को एक वासना के रूप में दिखा कर न केवल ऋषि वात्सयायन का अपमान किया गया था अपितु ऋषि वात्स्यायन द्वारा रचित कामसूत्र के असली मापदंडो के भी प्रतिकूल है, अब आगे लेख में आप पढेंगे की ऐसा क्या है कामसूत्र में??

सौजन्य से – Saffron Hindurashtra

कौन थे महर्षि वात्‍स्‍यायन


महर्षि वात्स्यायन भारत के प्राचीनकालीन महान दार्शनिक थे. इनके काल के विषय में इतिहासकार एकमत नहीं हैं. अधिकृत प्रमाण के अभाव में महर्षि का काल निर्धारण नहीं हो पाया है. कुछ स्‍थानों पर इनका जीवनकाल ईसा की पहली शताब्‍दी से पांचवीं शताब्‍दी के बीच उल्लिखित है. वे ‘कामसूत्र’ और ‘न्यायसूत्रभाष्य’ नामक कालजयी ग्रथों के रचयिता थे. महर्षि वात्स्यायन का जन्म बिहार राज्य में हुआ था. उन्‍होंने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है, बल्कि कला, शिल्पकला और साहित्य को भी श्रेष्‍ठता प्रदान की है. कामसूत्र’ का अधिकांश भाग मनोविज्ञान से संबंधित है. यह जानकर अत्‍यंत आश्‍चर्य होता है कि आज से दो हजार वर्ष से भी पहले विचारकों को स्‍त्री और पुरुषों के मनोविज्ञान का इतना सूक्ष्‍म ज्ञान था. इस जटिल विषय पर वात्‍स्‍यायन रचित ‘कामसूत्र’ बहुत ज्‍यादा प्रसिद्ध हुआ.
भारतीय संस्‍कृति में कभी भी ‘काम’ को हेय नहीं समझा गया. काम को ‘दुर्गुण’ या ‘दुर्भाव’ न मानकर इन्‍हें चतुर्वर्ग अर्थ, काम, मोक्ष, धर्म में स्‍थान दिया गया है. हमारे शास्‍त्रकारों ने जीवन के चार पुरुषार्थ बताए हैं- ‘धर्म’, ‘अर्थ’, ‘काम’ और ‘मोक्ष’. सरल शब्‍दों में कहें, तो धर्मानुकूल आचरण करना, जीवन-यापन के लिए उचित तरीके से धन कमाना, मर्यादित रीति से काम का आनंद उठाना और अंतत: जीवन के अनसुलझे गूढ़ प्रश्‍नों के हल की तलाश करना. वासना से बचते हुए आनंददायक तरीके से काम का आनंद उठाने के लिए कामसूत्र के उचित ज्ञान की आवश्‍यकता होती है. वात्‍स्‍यायन का कामसूत्र इस उद्देश्‍य की पूर्ति में एकदम साबित होता है. ‘काम सुख’ से लोग वंचित न रह जाएं और समाज में इसका ज्ञान ठीक तरीके से फैल सके, इस उद्देश्‍य से प्राचीन काल में कई ग्रंथ लिखे गए.

जीवन के इन चारों पुरुषार्थों के बीच संतुलन बहुत ही आवश्‍यक है. ऋषि-मुनियों ने इसकी व्‍यवस्‍था बहुत ही सोच-विचारकर दी है. यानी ऐसा न हो कि कोई केवल धन कमाने के पीछे ही पड़ा रहे और नीति-शास्‍त्रों को बिलकुल ही भूल जाए. या काम-क्रीड़ा में इतना ज्‍यादा डूब जाए कि उसे संसार को रचने वाले की सुध ही न रह जाए.

जीवन के इन चारों पुरुषार्थों के बीच संतुलन बहुत ही आवश्‍यक है. ऋषि-मुनियों ने इसकी व्‍यवस्‍था बहुत ही सोच-विचारकर दी है. यानी ऐसा न हो कि कोई केवल धन कमाने के पीछे ही पड़ा रहे और नीति-शास्‍त्रों को बिलकुल ही भूल जाए. या काम-क्रीड़ा में इतना ज्‍यादा डूब जाए कि उसे संसार को रचने वाले की सुध ही न रह जाए.

मनुष्‍य को बचपन और यौवनावस्‍था में विद्या ग्रहण करनी चाहिए. उसे यौवन में ही सांसारिक सुख और वृद्वावस्‍था में धर्म व मोक्ष प्राप्ति का प्रयत्‍न करना चाहिए. अवस्‍था को पूरी तरह से निर्धारित करना कठिन है, इसलिए मनुष्‍य ‘त्रिवर्ग’ का सेवन इच्‍छानुसार भी कर सकता है. पर जब तक वह विद्याध्‍ययन करे, तब तक उसे ब्रह्मचर्य रखना चाहिए यानी ‘काम’ से बचना चाहिए.

कान द्वारा अनुकूल शब्‍द, त्‍वचा द्वारा अनूकूल स्‍पर्श, आंख द्वारा अनुकूल रूप, नाक द्वारा अनुकूल गंध और जीभ द्वारा अनुकूल रस का ग्रहण किया जाना ‘काम’ है. कान आदि पांचों ज्ञानेन्द्रियों के साथ मन और आत्‍मा का भी संयोग आवश्‍यक है.

स्‍पर्श विशेष के विषय में यह निश्चित है कि स्‍पर्श के द्वारा प्राप्‍त होने वाला विशेष आनंद ‘काम’ है. यही काम का प्रधान रूप है. कुछ आचार्यों का मत है कि कामभावना पशु-पक्षियों में भी स्‍वयं प्रवृत्त होती है और नित्‍य है, इसलिए काम की शिक्षा के लिए ग्रंथ की रचना व्‍यर्थ है. दूसरी ओर वात्‍स्‍यायन का मानना है कि चूंकि स्‍त्री-पुरुषों का जीवन पशु-पक्षियों से भिन्‍न है. इनके समागम में भी भिन्‍नता है, इसलिए मनुष्‍यों को शिक्षा के उपाय की आवश्‍यकता है. इसका ज्ञान कामसूत्र से ही संभव है. पशु-पक्षियों की मादाएं खुली और स्‍वतंत्र रहती हैं और वे ऋतुकाल में केवल स्‍वाभाविक प्रवृत्ति से समागम करती हैं. इनकी क्रियाएं बिना सोचे-विचारे होती हैं, इसलिए इन्‍हें किसी शिक्षा की आवश्‍यकता नहीं होती.
वात्‍स्‍यायन का मत है कि मनुष्‍य को काम का सेवन करना चाहिए, क्‍योंकि कामसुख मानव शरीर की रक्षा के लिए आहार के समान है. काम ही धर्म और अर्थ से उत्‍पन्‍न होने वाला फल है. हां, इतना अवश्‍य है कि काम के दोषों को जानकर उनसे अलग रहना चाहिए| कुछ आचार्यों का मत है कि स्त्रियों को कामसूत्र की शिक्षा देना व्‍यर्थ है, क्‍योंकि उन्‍हें शास्‍त्र पढ़ने का अधिकार नहीं है. इसके विपरीत वात्‍स्‍यायन का मत है कि स्त्रियों को इसकी शिक्षा दी जानी चाहिए, क्‍योंकि इस ज्ञान का प्रयोग स्त्रियों के बिना संभव नहीं है.
आचार्य घोटकमुख का मत है कि पुरुष को ऐसी युवती से विवाह करना चाहिए, जिसे पाकर वह स्‍वयं को धन्‍य मान सके तथा जिससे विवाह करने पर मित्रगण उसकी निंदा न कर सकें. वात्‍स्‍यायन लिखते हैं कि मनुष्‍य की आयु सौ वर्ष की है. उसे जीवन के विभिन्‍न भागों में धर्म, अर्थ और काम का सेवन करना चाहिए. ये ‘त्रिवर्ग’ परस्‍पर सं‍बंधित होना चाहिए और इनमें विरोध नहीं होना चाहिए.
कामशास्‍त्र पर वात्‍स्‍यायन के ‘कामसूत्र’ के अतिरिक्‍त ‘नागर सर्वस्‍व’, ‘पंचसायक’, ‘रतिकेलि कुतूहल’, ‘रतिमंजरी’, ‘रतिरहस्‍य’ आदि ग्रंथ भी अपने उद्देश्‍य में काफी सफल रहे.
वात्‍स्‍यायन रचित ‘कामसूत्र’ में अच्‍छे लक्षण वाले स्‍त्री-पुरुष, सोलह श्रृंगार, सौंदर्य बढ़ाने के उपाय, कामशक्ति में वृद्धि से संबंधित उपायों पर विस्‍तार से चर्चा की गई है.
इस ग्रंथ में स्‍त्री-पुरुष के ‘मिलन’ की शास्‍त्रोक्‍त रीतियां बताई गई हैं. किन-किन अवसरों पर संबंध बनाना अनुकूल रहता है और किन-किन मौकों पर निषिद्ध, इन बातों को पुस्‍तक में विस्‍तार से बताया गया है.
भारतीय विचारकों ने ‘काम’ को धार्मिक मान्‍यता प्रदान करते हुए विवाह को ‘धार्मिक संस्‍कार’ और पत्‍नी को ‘धर्मपत्‍नी’ स्‍वीकार किया है. प्राचीन साहित्‍य में कामशास्‍त्र पर बहुत-सी पुस्‍तकें उपलब्‍ध हैं. इनमें अनंगरंग, कंदर्प, चूड़ामणि, कुट्टिनीमत, नागर सर्वस्‍व, पंचसायक, रतिकेलि कुतूहल, रतिमंजरी, रहिरहस्‍य, रतिरत्‍न प्रदीपिका, स्‍मरदीपिका, श्रृंगारमंजरी आदि प्रमुख हैं.
पूर्ववर्ती आचार्यों के रूप में नंदी, औद्दालकि, श्‍वेतकेतु, बाभ्रव्‍य, दत्तक, चारायण, सुवर्णनाभ, घोटकमुख, गोनर्दीय, गोणिकापुत्र और कुचुमार का उल्‍लेख मिलता है. इस बात के पर्याप्‍त प्रमाण हैं कि कामशास्‍त्र पर विद्वानों, विचारकों और ऋषियों का ध्‍यान बहुत पहले से ही जा चुका था.

वात्‍स्‍यायन ने ब्रह्मचर्य और परम समाधि का सहारा लेकर कामसूत्र की रचना गृहस्‍थ जीवन के निर्वाह के लिए की की. इसकी रचना वासना को उत्तेजित करने के लिए नहीं की गई है. संसार की लगभग हर भाषा में इस ग्रन्थ का अनुवाद हो चुका है. इसके अनेक भाष्य और संस्करण भी प्रकाशित हो चुके हैं. वैसे इस ग्रन्थ के जयमंगला भाष्य को ही प्रमाणिक माना गया है. कामशास्‍त्र का तत्व जानने वाला व्‍यक्ति धर्म, अर्थ और काम की रक्षा करता हुआ अपनी लौकिक स्थिति सुदृढ़ करता है. साथ ही ऐसा मनुष्‍य जितेंद्रिय भी बनता है.कामशास्‍त्र का कुशल ज्ञाता धर्म और अर्थ का अवलोकन करता हुआ इस शास्‍त्र का प्रयोग करता है. ऐसे लोग अधिक वासना धारण करने वाले कामी पुरुष के रूप में नहीं जाने जाते.
वात्‍स्‍यायन ने कामसूत्र में न केवल दाम्पत्य जीवन का श्रृंगार किया है, बल्कि कला, शिल्पकला और साहित्य को भी श्रेष्‍ठता प्रदान की है. राजनीति के क्षेत्र में जो स्थान कौटिल्य का है, काम के क्षेत्र में वही स्थान महर्षि वात्स्यायन का है. करीब दो सौ वर्ष पूर्व प्रसिद्ध भाषाविद् सर रिचर्ड एफ़ बर्टन ब्रिटेन में इसका अंग्रेज़ी अनुवाद करवाया. अरब के विख्यात कामशास्त्र ‘सुगन्धित बाग’ पर भी इस ग्रन्थ की छाप है. राजस्थान की दुर्लभ यौन चित्रकारी के अतिरिक्‍त खजुराहो, कोणार्क आदि की शिल्पकला भी कामसूत्र से ही प्रेरित है.
एक ओर रीतिकालीन कवियों ने कामसूत्र की मनोहारी झांकियां प्रस्तुत की हैं. दूसरी ओर गीत-गोविन्द के रचयिता जयदेव ने अपनी रचना ‘रतिमंजरी’ में कामसूत्र का सार-संक्षेप प्रस्तुत किया है.

कामसूत्र के अनुसार -
स्‍त्री को कठोर शब्‍दों का उच्‍चारण, टेढ़ी नजर से देखना, दूसरी ओर मुंह करके बात करना, घर के दरवाजे पर खड़े रहना, द्वार पर खड़े होकर इधर-उधर देखना, घर के बगीचे में जाकर किसी के साथ बात करना और एकांत में अधिक देर तक ठहरना त्‍याग देना चाहिए.
स्‍त्री को चाहिए कि वह पति को आकर्षित करने के लिए बहुत से भूषणों वाला, तरह-तरह के फूलों और सुगंधित पदार्थों से युक्‍त, चंदन आदि के विभिन्‍न अनूलेपनों वाला और उज्‍ज्‍वल वस्‍त्र धारण करे.
स्‍त्री को अपने धन और पति की गुप्‍त मंत्रणा के बारे में दूसरों को नहीं बताना चाहिए.
पत्‍नी को वर्षभर की आय की गणना करके उसी के अनुसार व्‍यय करना चाहिए.
स्‍त्री को चाहिए कि वह सास-ससुर की सेवा करे और उनके वश में रहे. उनकी बातों का उत्तर न दे. उनके सामने बोलना ही पड़े, तो थोड़ा और मधुर बोले और उनके पास जोर से न हंसे. स्‍त्री को पति और परिवार के सेवकों के प्रति उदारता और कोमलता का व्‍यवहार करना चाहिए.
स्‍त्री और पुरुष में ये गुण होने चाहिए- प्रतिभा, चरित्र, उत्तम व्‍यवहार, सरलता, कृतज्ञता, दीर्घदृष्टि, दूरदर्शी. प्रतिज्ञा पालन, देश और काल का ज्ञान, नागरिकता, अदैन्‍य न मांगना, अधिक न हंसना, चुगली न करना, निंदा न करना, क्रोध न करना, अलोभ, आदरणीयों का आदर करना, चंचलता का अभाव, पहले न बोलना, कामशास्‍त्र में कौशल, कामशास्‍त्र से संब‍ंधित क्रियाओं, नृत्‍य-गीत आदि में कुशलता. इन गुणों के विपरीत दशा का होना दोष है.
ऐसे पुरुष यदि ज्ञानी भी हों, तो भी समागम के योग्‍य नहीं हैं- क्षय रोग से ग्रस्‍त, अपनी पत्‍नी से अधिक प्रेम करने वाला, कठोर शब्‍द बोलने वाला, कंजूस, निर्दय, गुरुजनों से परित्‍यक्‍त, चोर, दंभी, धन के लोभ से शत्रुओं तक से मिल जाने वाला, अधिक लज्‍जाशील.

वात्‍स्‍यायन ने पुरुषों के रूप को भी निखारने के उपाय बताए हैं. उनका मानना है कि रूप, गुण, युवावस्‍था, और दान आदि में धन का त्‍याग पुरुष को सुंदर बना देता है. तगर, कूठ और तालीस पत्र को पीसकर बनाया हुआ उबटन लगाना पुरुष को सुंदर बना देता है. पुनर्नवा, सहदेवी, सारिवा, कुरंटक और कमल के पत्तों से बनाया हुआ तेल आंख में लगाने से पुरुष रूपवान बन जाता है.

आधुनिक जीवनशैली और बढ़ती यौन-स्‍वच्‍छंदता ने समाज को कुछ भयंकर बीमारियों की सौगात दी है. एड्स भी ऐसी ही बीमारियों में से एक है. अगर लोगों को कामशास्‍त्र का उचित ज्ञान हो, तो इस तरह की बीमारियों से बचना एकदम मुमकिन है.

Saturday, February 9, 2013

हमारे हिन्दू धर्म तथा ब्रह्माण्ड में 108 अंक का क्या महत्व है....?


हमारे हिन्दू धर्म के किसी भी शुभ कार्य, पूजा , अथवा अध्यात्मिक व्यक्ति के नाम के पूर्व ""श्री श्री 108 "" लगाया जाता है...!

लेकिन क्या सच में आप जानते हैं कि.... हमारे हिन्दू धर्म तथा ब्रह्माण्ड में 108 अंक का क्या महत्व है....?????

दरअसल.... वेदान्त में एक""मात्रक विहीन सार्वभौमिक ध्रुवांक 108 "" का उल्लेख मिलता है.... जिसका अविष्कार हजारों वर्षों पूर्व हमारे
... ऋषि-मुनियों (वैज्ञानिकों) ने किया थाl

आपको समझाने में सुविधा के लिए मैं मान लेता हूँ कि............ 108 = ॐ (जो पूर्णता का द्योतक है).
अब आप देखें .........प्रकृती ­ में 108 की विविध अभिव्यंजना किस प्रकार की है।

1. सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी/सूर्य का व्यास = 108 = 1 ॐ
150,000,000 km/1,391,000 km = 108 (पृथ्वी और सूर्य के बीच 108 सूर्य सजाये जा सकते हैं)

2. सूर्य का व्यास/ पृथ्वी का व्यास = 108 = 1 ॐ
1,391,000 km/12,742 km = 108 = 1 ॐ
सूर्य के व्यास पर 108 पृथ्वियां सजाई सा सकती हैं .

3. पृथ्वी और चन्द्र के बीच की दूरी/चन्द्र का व्यास = 108 = 1 ॐ
384403 km/3474.20 km = 108 = 1 ॐ
पृथ्वी और चन्द्र के बीच 108 चन्द्रमा आ सकते हैं .

4. मनुष्य की उम्र 108 वर्षों (1ॐ वर्ष) में पूर्णता प्राप्त करती है .
क्योंकि... वैदिक ज्योतिष के अनुसार.... मनुष्य को अपने जीवन काल में
विभिन्न ग्रहों की 108 वर्षों की अष्टोत्तरी महादशा से गुजरना पड़ता है .

5. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति 200 ॐ श्वास लेकर एक दिन पूरा करता है .
1 मिनट में 15 श्वास >> 12 घंटों में 10800 श्वास >> दिनभर में 100 ॐ श्वास, वैसे ही रातभरमें 100 ॐ श्वास

6. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति एक मुहुर्त में 4 ॐ ह्रदय की धड़कन पूरी करता है .
1 मिनट में 72 धड़कन >> 6 मिनटमें 432 धडकनें >> 1 मुहूर्त में 4 ॐ धडकनें ( 6 मिनट = 1 मुहूर्त)

7. सभी 9 ग्रह (वैदिक ज्योतिष में परिभाषित) भचक्र एक चक्र पूरा करते समय 12 राशियों से होकर गुजरते हैं और 12 x 9 = 108 = 1 ॐ

8. सभी 9 ग्रह भचक्र का एक चक्कर पूरा करते समय 27 नक्षत्रों को पार करते
हैं... और, प्रत्येक नक्षत्र के चार चरणहोते हैं और 27 x 4 = 108 = 1 ॐ

9. एक सौर दिन 200 ॐ विपल समय में पूरा होता है. (1 विपल = 2.5 सेकेण्ड)
1 सौर दिन (24 घंटे) = 1 अहोरात्र = 60 घटी = 3600 पल = 21600 विपल = 200 x 108 = 200 ॐ विपल
@@@@ उसी तरह ..... 108 का आध्यात्मिक अर्थ भी काफी गूढ़ है..... और,

1 ..... सूचित करता है ब्रह्म की अद्वितीयता/ ­एकत्व/पूर्णता को

0 ......... सूचित करता है वह शून्य की अवस्था को जो विश्व की अनुपस्थिति मेंउत्पन्न हुई होती

8 ......... सूचित करता है उस विश्व की अनंतता को जिसका अविर्भाव उस शून्य में ब्रह्म की अनंत अभिव्यक्तियों से हुआ है .
अतः ब्रह्म, शून्यता और अनंत विश्व के संयोग को ही 108 द्वारा सूचित किया गया है .

इस तरह हम कह सकते हैं कि.....जिस प्रकार ब्रह्म की शाब्दिक अभिव्यंजना
प्रणव ( अ + उ + म् ) है...... और, नादीय अभिव्यंजना ॐ की ध्वनि है.....
ठीक उसी उसी प्रकार ब्रह्म की""गाणितिक अभिव्यंजना 108 "" है।

जय क्षात्र सनातन धर्म की।
हमारे हिन्दू धर्म के किसी भी शुभ कार्य, पूजा , अथवा अध्यात्मिक व्यक्ति के नाम के पूर्व ""श्री श्री 108 "" लगाया जाता है...!

लेकिन क्या सच में आप जानते हैं कि.... हमारे हिन्दू धर्म तथा ब्रह्माण्ड में 108 अंक का क्या महत्व है....?????

दरअसल.... वेदान्त में एक""मात्रक विहीन सार्वभौमिक ध्रुवांक 108 "" का उल्लेख मिलता है.... जिसका अविष्कार हजारों वर्षों पूर्व हमारे
... ऋषि-मुनियों (वैज्ञानिकों) ने किया थाl

आपको समझाने में सुविधा के लिए मैं मान लेता हूँ कि............ 108 = ॐ (जो पूर्णता का द्योतक है).
अब आप देखें .........प्रकृती ­ में 108 की विविध अभिव्यंजना किस प्रकार की है।

1. सूर्य और पृथ्वी के बीच की दूरी/सूर्य का व्यास = 108 = 1 ॐ
150,000,000 km/1,391,000 km = 108 (पृथ्वी और सूर्य के बीच 108 सूर्य सजाये जा सकते हैं)

2. सूर्य का व्यास/ पृथ्वी का व्यास = 108 = 1 ॐ
1,391,000 km/12,742 km = 108 = 1 ॐ
सूर्य के व्यास पर 108 पृथ्वियां सजाई सा सकती हैं .

3. पृथ्वी और चन्द्र के बीच की दूरी/चन्द्र का व्यास = 108 = 1 ॐ
384403 km/3474.20 km = 108 = 1 ॐ
पृथ्वी और चन्द्र के बीच 108 चन्द्रमा आ सकते हैं .

4. मनुष्य की उम्र 108 वर्षों (1ॐ वर्ष) में पूर्णता प्राप्त करती है .
क्योंकि... वैदिक ज्योतिष के अनुसार.... मनुष्य को अपने जीवन काल में
विभिन्न ग्रहों की 108 वर्षों की अष्टोत्तरी महादशा से गुजरना पड़ता है .

5. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति 200 ॐ श्वास लेकर एक दिन पूरा करता है .
1 मिनट में 15 श्वास >> 12 घंटों में 10800 श्वास >> दिनभर में 100 ॐ श्वास, वैसे ही रातभरमें 100 ॐ श्वास

6. एक शांत, स्वस्थ और प्रसन्न वयस्क व्यक्ति एक मुहुर्त में 4 ॐ ह्रदय की धड़कन पूरी करता है .
1 मिनट में 72 धड़कन >> 6 मिनटमें 432 धडकनें >> 1 मुहूर्त में 4 ॐ धडकनें ( 6 मिनट = 1 मुहूर्त)

7. सभी 9 ग्रह (वैदिक ज्योतिष में परिभाषित) भचक्र एक चक्र पूरा करते समय 12 राशियों से होकर गुजरते हैं और 12 x 9 = 108 = 1 ॐ

8. सभी 9 ग्रह भचक्र का एक चक्कर पूरा करते समय 27 नक्षत्रों को पार करते
हैं... और, प्रत्येक नक्षत्र के चार चरणहोते हैं और 27 x 4 = 108 = 1 ॐ

9. एक सौर दिन 200 ॐ विपल समय में पूरा होता है. (1 विपल = 2.5 सेकेण्ड)
1 सौर दिन (24 घंटे) = 1 अहोरात्र = 60 घटी = 3600 पल = 21600 विपल = 200 x 108 = 200 ॐ विपल
@@@@ उसी तरह ..... 108 का आध्यात्मिक अर्थ भी काफी गूढ़ है..... और,

1 ..... सूचित करता है ब्रह्म की अद्वितीयता/ ­एकत्व/पूर्णता को

0 ......... सूचित करता है वह शून्य की अवस्था को जो विश्व की अनुपस्थिति मेंउत्पन्न हुई होती

8 ......... सूचित करता है उस विश्व की अनंतता को जिसका अविर्भाव उस शून्य में ब्रह्म की अनंत अभिव्यक्तियों से हुआ है .
अतः ब्रह्म, शून्यता और अनंत विश्व के संयोग को ही 108 द्वारा सूचित किया गया है .

इस तरह हम कह सकते हैं कि.....जिस प्रकार ब्रह्म की शाब्दिक अभिव्यंजना
प्रणव ( अ + उ + म् ) है...... और, नादीय अभिव्यंजना ॐ की ध्वनि है.....
ठीक उसी उसी प्रकार ब्रह्म की""गाणितिक अभिव्यंजना 108 "" है।

जय क्षात्र सनातन धर्म की।

Wednesday, February 6, 2013

हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा


हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा

हिंदुत्व कभी कट्टरपंथी और क्रूर नहीं रहा है और इसका साक्षी हजारों साल पुराना इतिहास
है और वर्तमान समय भी।
यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तोपनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।
हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?
स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठआँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ? नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।
महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।
आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देतेहैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।
हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकिसत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।
एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।
राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैंमगर मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करनेयोग्य महान गुण
हो।
हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"
हिंदुत्व कभी क्रूर नहीं रहा
हिंदुत्व कभी कट्टरपंथी और क्रूर नहीं रहा है और इसका साक्षी हजारों साल पुराना इतिहास
है और वर्तमान समय भी।
यदि हिंदुत्व क्रूर या कट्टर होता तो विभिन्नं संस्कृतियाँ यहाँ ना तोपनप सकती थी और
ना पोषित हो सकती थी।हमारे वेद, जो प्राचीन ग्रन्थ हैं उनसे विश्व बंधुत्व का सन्देश निकला।
यह वेदों की सोच है जो यह मानती है कि सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।
हिंदुत्व ने आज तक किसी देश को क्षति नहीं पहुंचाई ,विश्व के किसी भी देश को ना लूटा
और ना ही आक्रमण किया।रामायण काल में श्री राम ने लोक व्यवस्था को मजबूती दी,
आततायी चाहे भारत का रहा हो या भारत के बाहर का उसे खत्म किया।श्री राम ने बाली के
अधार्मिक शासन को खत्म किया और सुशासन की स्थापना के लिए उन्ही लोगो को शासन
की बागडोर सौंप दी जो उसके उत्तराधिकारी थे,उन्होंने उस शासन को अपने अधीन नहीं किया।
रावण के आतंक को खत्म किया ,वहां सुशासन की स्थापना की मगर उस देश को स्वतंत्र
रखा। क्या श्री राम जीते हुए देश पर अपना शासन नहीं रख सकते थे ? हिंदुत्व की सोच क्रूरता
की नहीं थी ,राम ने उस समय ना तो लंका को लूटा ना ही अपना प्रभुत्व जमाया।क्या इसे
इतिहास विश्व बंधुत्व के सन्देश से परे देखता है ?
स्वामी विवेकानंद ने कहा था -"गर्व से कहो हम हिन्दू हैं" क्यों कहा होगा उस वेद वेदान्त के
मर्मज्ञ ने ऐसा ?क्यों शिकागो सम्मलेन में हिन्दू धर्म को श्रेष्ठआँका गया ?क्या कट्टरवाद के
कारण ? नहीं ,हिंदुत्व के मानव धर्म के कारण ऐसा संभव हुआ था।
महात्मा गांधी ने कहा -मुझे अपने हिन्दू होने पर गर्व है। क्या गांधी को फासिस्ट मान लिया
जाए ,शायद नहीं ,क्योंकि गांधी के हिंदुत्व में भाईचारा झलकता था।
आरएसएस या विहिप जब यह उदघोष करती है कि हमें हिन्दुत्व पर गर्व है तो आज उन्हें
तथाकथित सभ्य लोग कट्टरपंथी कह देतेहैं,क्यों ?क्या अपने धर्म पर गर्व करना कट्टरपंथ
या अन्य धर्मों पर क्रूरता करना है?यह हिंदुत्व ही है जो इतना विशाल ह्रदय लेकर चलता है,
जिस तरह विभिन्न दिशाओं से बहने वाली नदियाँ समुद्र में आकर समा जाती है और एक रस
हो जाती है उसी तरह हिंदुत्व के कारण भारत में सभी धर्म पोषित हो रहे हैं।
हिंदुत्व को देश की स्वतंत्रता के बाद सबसे ज्यादा कट्टरपंथी मान्यता वाला शब्द माना गया
तो उसके पीछे दुसरे धर्मों के लोगों से ज्यादा हम खुद जिम्मेदार हैं,क्योंकि हमारे में निम्न कोटि
की सोच के लोग पनप गए हैं जो अपना घर जला कर खुद तमाशा दिखा रहे हैं।सत्ता का नशा
भी निम्न कोटि की सोच के लोगों को लग गया है ,दूसरों के सामने खुद को गाली और खुद को
तमाचा मार के भी लोग सत्ता पाना चाहते हैं ,और इसी दिवालियापन के कारण विश्व भ्रम में
पड़ गया है। आज एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को सार्वजनिक रूप से साम्प्रदायिक कह देता है और
उसका समर्थन भी सत्ता लोभी दूसरा हिन्दू कर देता है।आज सत्ता को टिकाये रखने के लिए या
फिर से सत्ता पाने के लिए एक हिन्दू दुसरे हिन्दू को ही आतंकी बता देता है,तथाकथित सभ्य
हिन्दू भगवा में आतंक देखने की बात फैलाते हैं जब की वो जानते हैं कि वो सच नहीं झूठ कह
रहे हैं,फिर भी इसलिए कह रहे हैं ताकिसत्ता का सुख भोग सकें।सिर्फ सत्ता पाने के लिए हिंदुत्व
को संकीर्ण बताने वाले लोग ना तो खुद का भला कर पायेंगे और ना ही सभी धर्मों का।
एक हिन्दू खुद को सभी धर्मों को समान भाव से देखने वाला मानता है और दुसरे हिन्दू
को देख कर यह कहता है कि यह फासिस्ट है तो दुनियाँ किसे सही और किसे गलत मानेगी ?
क्या दुसरे मजहब के लोग फिर ये धारणा नहीं बना लेंगे कि हिंदुत्व कट्टरवाद का पोषक है।
राजनीती के कुछ सिद्धांत होते हैंमगर मजहबों में वैमनस्य फैलाना और सत्ता की
रोटी सेकना अधम नीति है।सभी धर्मों के लोगों को अपने धर्म पर गर्व होना चाहिए।किसी
धर्मावलम्बी को अपने धर्म पर गर्व तभी होता है जब उस धर्म में गर्व करनेयोग्य महान गुण
हो।
हमें अपने "हिंदुत्व पर गर्व है क्योंकि हमारा हिंदुत्व विश्व बंधुत्व की प्रेरणा देता है।"

Monday, February 4, 2013

हम नमस्ते क्यों करते है ? हम बड़ों के पैर क्यों छूते है ?

हम नमस्ते क्यों करते है ? 

शास्त्रों में पाँच प्रकार के अभिवादन बतलाये गए है जिन में से एक है "नमस्कारम"।
नमस्कार को कई प्रकार से देखा और समझा जा सकता है। संस्कृत में इसे विच्छेद करे तो हम पाएंगे की नमस्ते दो शब्दों से बना है नमः + ते।
नमः का मतलब होता है मैं (मेरा अंहकार) झुक गया। नम का एक और अर्थ हो सकता है जो है न + में यानी की मेरा नही। आध्यात्म की दृष्टी से इसमें मनुष्य दुसरे मनुष्य के सामने अपने अंहकार को कम कर रहा है। नमस्ते करते समय में दोनों हाथो को जोड़ कर एक कर दिया जाता है जिसका अर्थ है की इस अभिवादन के बाद दोनों व्यक्ति के दिमाग मिल गए या एक दिशा में हो गये।

हम बड़ों के पैर क्यों छूते है ?

भारत में बड़े बुजुर्गो के पाँव छूकर आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है। ये दरअसल बुजुर्ग, सम्मानित व्यक्ति के द्वारा किए हुए उपकार के प्रतिस्वरुप अपने समर्पण की अभिव्यक्ति होती है। अच्छे भावः से किया हुआ सम्मान के बदले बड़े लोग आशीर्वाद देते है जो एक सकारात्मक ऊर्जा होती है।

आदर के निम्न प्रकार है :
* प्रत्युथान : किसी के स्वागत में उठ कर खड़े होना
* नमस्कार : हाथ जोड़ कर सत्कार करना
* उपसंग्रहण : बड़े, बुजुर्ग, शिक्षक के पाँव छूना
* साष्टांग : पाँव, घुटने, पेट, सर और हाथ के बल जमीन पर पुरे लेट कर सम्मान करना
* प्रत्याभिवादन : अभिनन्दन का अभिनन्दन से जवाब देना

किसे किसके सामने किस विधि से सत्कार करना है ये शास्त्रों में विदित है। उदाहरण के तौर पर राजा केवल ऋषि मुनि या गुरु के सामने नतमस्तक होते थे।

Friday, February 1, 2013

ऐसे बनते हैं नागा साधु

ऐसे बनते हैं नागा  साधु
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दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले-महाकुंभ के कई अलग-अलग रंगों में एक रंग हैं- नागा साधु जो हमेशा की तरह श्रद्धालुओं के कौतूहल का केंद्रबने हुए हैं।

इनका जीवन आम लोगों के लिए एक रहस्य की तरह होताहै। नागा साधु बनाने की प्रक्रिया महाकुंभ के दौरान ही होती है। नागा साधु बनने के लिए इतनी परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है कि शायद बिनासंन्यास और दृढ़ निश्चय के कोई व्यक्ति इस पर पार ही नहीं पा सकता। सनातन परंपरा की रक्षा और उसे आगे बढ़ाने के उद्देश्य से विभिन्न संन्यासी अखाड़ों में हर महाकुंभ के दौरान नागा साधु बनाए जाते हैं। माया मोह त्यागकर वैराग्य धारण की इच्छा लिए विभिन्न अखाड़ों कीशरण में आने वाले व्यक्तियों को परम्परानुसार आजकल प्रयाग महाकुंभमें नागा साधु बनाया जा रहा है। अखाड़ों के मुताबिक इस बार प्रयागमहाकुंभ में पांच हजार से ज्यादा नागा साधु बनाए जाएंगे। आमतौर पर नागा साधु सभी संन्यासी अखाड़ों में बनाए जाते हैं लेकिन जूना अखाड़ा सबसे ज्यादा नागा साधु बनाता है। सभी तेरह अखाड़ों में जूना अखाड़ासबसे बड़ा अखाड़ा भी माना जाता है। जूना अखाड़े के महंत नारायणगिरि महाराज के मुताबिक नागाओं को सेना की तरह तैयार किया जाता है। नागा को आम दुनिया से अलग और विशेष बनना होता है। इस प्रक्रिया में काफी समय लगता है। जब भी कोई व्यक्ति साधु बनने के लिए किसी अखाड़े में जाता है तो उसे कभी सीधे-सीधे अखाड़े में शामिल नहीं किया जाता। अखाड़ा अपने स्तर पर ये तहकीकात करता है कि वह साधु क्यों बनना चाहता है। नागा बनने आए व्यक्ति की पूरी पृष्ठभूमि देखी जाती है। अगर अखाड़े को ये लगता है कि वह साधु बनने के लिए सही व्यक्ति है तो उसे अखाड़े में प्रवेश की अनुमति मिलती है। प्रवेश की अनुमति के बाद पहले तीन साल गुरुओं की सेवा करने के साथ धर्म कर्म और अखाड़ों के नियमों को समझना होता है। इसी अवधि में ब्रह्मचर्यकी परीक्षा ली जाती है। अगर अखाड़ा और उस व्यक्ति का गुरु यह निश्चित कर ले कि वह दीक्षा देने लायक हो चुका है तो फिर उसे अगली प्रक्रिया में ले जाया जाता है। उन्होंने कहा कि अगली प्रक्रिया कुंभ मेले के दौरान शुरू होती है। जब ब्रह्मचारी से उसे महापुरुष बनाया जाता है। इस दौरान उनका मुंडन कराने के साथ उसे 108 बार गंगा में डुबकी लगवाई जाती है। उसके पांच गुरु बनाए जाते हैं। भस्म, भगवा, रूद्राक्ष आदि चीजें दी जाती हैं। महापुरुष के बाद उसे अवधूत बनाया जाता है। अखाड़ों के आचार्य द्वारा अवधूत का जनेऊ संस्कार कराने के साथ संन्यासी जीवन की शपथ दिलाई जाती हैं। इस दौरान उसके परिवार के साथ उसका भी पिंडदान कराया जाता है। इसके पश्चात दंडी संस्कार कराया जाता है और रातभर उसे ओम नम: शिवाय का जाप करना होता है। जूना अखाड़े के एक और महंत नरेंद्र महाराज कहते हैं कि जाप के बाद भोर में अखाड़े के महामंडलेश्वर उससे विजया हवन कराते हैं। उसके पश्चात सभी को फिर से गंगा में 108 डुबकियां लगवाई जाती हैं। स्नानके बाद अखाड़े के ध्वज के नीचे उससे दंडी त्याग कराया जाता है। इस प्रक्रिया के बाद वह नागा साधु बन जाता है। 

चूंकि नागा साधु की प्रक्रिया प्रयाग (इलाहाबाद), हरिद्वार, नासिक और उज्जैन में कुम्भ के दौरान हीहोती है। प्रयाग के महाकुंभ में दीक्षा लेने वालों को नागा, उज्जैन मेंदीक्षा लेने वालों को खूनी नागा कहा जाता है। हरिद्वार में दीक्षा लेनेवालों को बर्फानी व नासिक वालों को खिचड़िया नागा के नाम से जाना जाता है। इन्हें अलग-अलग नाम से केवल इसलिए जाना जाता है,जिससे उनकी यह पहचान हो सके कि किसने कहां दीक्षा ली है।

संगम तट पर महिला नागा साधुओं की अलग ही है दुनिया
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इलाहाबाद। अब तक आपने नागा साधुओं के बारे में ही सुना होगा याफिर उन्हें कुंभ में देखा होगा लेकिन उत्तर प्रदेश में प्रयागनगरीइलाहाबाद में संगम तट पर लगे दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक मेले मेंपहली बार महिला नागा साधुओं की उपस्थिति लोगों के कौतूहल काविषय बनी हुई है। ये महिला साधु पुरुष नागाओं की तरह नग्न रहने केबजाए अपने तन पर एक गेरूआ वस्त्र लपेटे रहती हैं।नागा साधुओं के अखाड़ों में महिला संन्यासियों को एक अलग पहचानऔर खास महत्व दिया गया है, जिससे इस बात का अहसास होता है किपुरुषों की बहुलता वाले इस धार्मिक आयोजन में अब महिलाओं को भीखासा महत्व दिए जाने की नई परंपरा शुरू हो रही है। इन महिलासंन्यासियों की अलग दुनिया है और उनकी अपनी नेता भी और साथ हीअपने संसाधन भी। उनके शिविर में शौचालयों की पर्याप्त व्यवस्था कीगयी है और शिविर के बाहर चौबिसों घंटे पुलिसकर्मियों की तैनाती रहतीहै।महिलाओं के अखाड़े की नेता दिब्या गिरी हैं और वह बड़ी ही साफगोई सेकहती हैं कि यह महिलाओं की एक अलग पहचान है। गिरी साल 2004 में विधिवत तौर पर साधु बनी थीं। उन्होंने नई दिल्ली के एक प्रतिष्ठितसंस्थान से मेडिकल टेक्निशियन की पढ़ाई पूरी की है। गिरी कहती हैं किउनका ईष्टदेव भगवान दत्तात्रेय की मां अनूसुइया हैं और उन्हीं को ईष्टमानकर आराधना की जाती हैं।ऐसा नहीं है कि महाकुंभ की इस नगरी में बसे महिलाओं के अखाड़े मेंसिर्फ देशी महिलाएं ही हैं। इसमें कुछ विदेशी महिलाएं भी महिला नागासाधुओं की संगति में शामिल हुई हैं। अखाड़े से जुड़ी एक महिलासंन्यासी बताती हैं कि नागा महिला संन्यासियों का अलग शिविर तोबनाया गया है लेकिन अभी भी काफी कुछ नियंत्रण पुरुषों के हाथ में हीहोता है। शिविर के छोटे से बड़े फैसले वहीं लेते हैं। इसको बदलने कीजरूरत है।जूना के संन्यासिन अखाड़े में अधिकांश महिला साधु नेपाल से आयी हैं।इसकी खास वजह के बारे में यह महिला साधु बताती हैं कि नेपाल मेंउंची जाति की महिलाओं को दोबारा शादी समाज स्वीकार नहीं करता हैऔर ऐसे में यह महिलाएं घर लौटने की बजाए साधु बन जाती हैं।यह महिला साधु शिविर के बारे में बताती हैं कि महिलाओं के नग्न रहनेपर सख्त मनाही है और खासतौर से शाही स्नान के दिन तो बिल्कुलनहीं और इसी के चलते ज्यादातर महिलाएं केवल एक गेरुआ कपड़ा हीलपेटे रहती हैं। वह कहती हैं कि महिला नागा साधुओं को नग्न रहने कीइजाजत कैसे दी जा सकती है। महिलाओं का नग्न रहना भारतीयसंस्कृति का खुला उल्लंघन होगा।


कल्पवास
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कल्पवास पौष पूर्णिमा से शुरू होकर माघ पूर्णिमा तक चलता है। यानी 25 फरवरी तक कल्पवासी संगम किनारे ही रहेंगे। कल्पवास के दौरान यहां एक महीना बिताने वाले भक्त दिन में तीन बार स्नान करते हैं, और एक ही बार भोजन करते हैं। कल्पवास में उन्हे काम, क्रोध, मोह, माया से दूर रहने का संकल्प लेना होता है। माना जाता है कि कल्पवास करने वाले शख्स को ब्रह्मा की तपस्या करने के बराबर फल मिलता है। श्रद्धालुओं में गंगा स्नान को लेकर खासा उत्साह रहता है। ज्यादातर श्रद्धालु एक महीने तक यहां कल्पवास नहीं कर सकते। ऐसे में अगले तीन दिन वो संगम किनारे रहकर पुण्य हासिल लेने की कोशिश करते हैं।