Sunday, November 12, 2017

सभी देवी देवताओ ने भारत मे हि जन्म क्यो लिया?


आक्षेप - सभी देवी देवताओ ने भारत मे हि जन्म क्यो लिया?

क्यो किसी भी देवी -देवता को भारत के बाहर कोइ नही जानता ?

धज्जियां - वर्तमान् लोक में ही देखा जाता है , यदि कोई सरकारी उच्चाधिकारी (मन्त्री आदि ) किसी नगर में पर्यवीक्षण आदि के लिए आता है तो वहां स्थित अथवा उसके समीपस्थ निर्मित सीधे प्रामाणिक सरकारी आवास पर ठहरता है , वहां से श्रेष्ठ वाहन में बैठकर तब दौरा या अन्य कार्य करता । होता तो पूरे राष्ट्र का मन्त्री है फिर भी पूर्वनियत व्यवस्था का ही अनुपालन करता है । राजा पूरे राज्य का राजा होता है पर मिलने के लिये कोई कामना करे तो , उसे मिलता राजधानी में ही है । यद्यपि बाध्यता नहीं कोई तथापि एकलप्रकार की प्रायिकता है । इसी प्रकार , ईश्वरीय अथवा दैवीय शक्तियां होतीं हैं , वे जब इस वैश्विक धरातल पर अवतरित होती हैं तो सीधे इस विश्व पटल की प्रामाणिक आध्यात्मिक पृष्ठभूमि (भारत ) में आविर्भूत होती हैं तथा यहाँ पदार्पण करने के उपरान्त अपने आध्यात्मिक वर्चस्व से समस्त विश्व को प्रभावित करती हैं | समस्त विश्व में भारत अध्यात्म का सबसे आदर्श धरा भाग है | अफसरीपना पाकर बड़े - बड़े अफसरी भवनों में कौन नहीं आयेगा ? सांसद बनकर भी संसद में कौन नहीं बैठना चाहेगा ? और नहीं बैठेगा संसद में तो फिर कैसा सांसद ? अध्यापक होकर अपनी कक्षा में उपस्थिति न करे तो कैसा अध्यापक ? नरेन्द्र मोदी जब संसद में अपना पहला कदम रखते हैं तो इसकी धूल अपने माथे से लगाकर इसे चूमते हैं , क्योंकि उनको ज्ञात है उसका क्या महत्त्व है ; ऐसे ही भारत भूमि है, ये समस्त विश्व की धर्मसंसद है , देवता इसका महत्त्व जानते हैं , इसके प्रति तो प्रत्येक देवता यही गीत गाता है -

हम देवताओं में भी वे लोग धन्य हैं जो स्वर्ग और मोक्ष के लिए साधनभूत भारतभूमि में उत्पन्न हुए हैं-

'#गायन्ति_देवाः_किल_गीतकानि_धन्यास्तु_ये_भारतभूमिभागे | #स्वर्गापवर्गास्पदहेतुभूते_भवन्ति_भूयः_पुरुषाः_सुरत्वात् ||

देव होकर ही देवताओं की संगति की जाती है #देवो_भूत्वा_यजेत्_देवान् , (यज् देवपूजा-दान-संगतिकरणे ) भारत से बाहर कितने देवत्व धारण करने वाले मनुष्य हैं , ये सुस्पष्ट ही है | संगति का लाभ देवत्व से प्राप्त होता है , जब संगति का ही सम्यक् लाभ नहीं मिला तो उनका विवेक कहाँ से मिलेगा ? ये सब बिना परमात्मा की कृपा कर भला कहाँ सुलभ हो पाता है -

#बिनु_सतसंग_बिबेक_न_होई | #रामकृपा_बिनु_सुलभ_न_सोई

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आक्षेप - जितने भी देवी देवता देवताओ की सवारीयॉ है उनमे सिर्फ वही जानवर क्यो है जो कि भारत मे ही पाये जाते है?

एसे जानवर क्यो नही जो कि सिर्फ कुछ हि देशो मे पाये जाते है, जैसे कि कंगारु, जिराफ आदी !!

धज्जियां - देखो ! इसे ऐसे समझो - जैसे वाहन तो बहुत प्रकार के हैं , जैसे बस, ट्रेन, ट्रैक्टर , साइकिल, बाइक, ऑटो आदि आदि दुनिया भर के ! पर प्रधानमंत्री यदि किसी शहर में आयेगा तो किसी विशेष प्रयोजन मे ऑटो या रेल या फिर ट्रैक्टर में थोड़े न आयेगा ? वो आयेगा तो विशेष योग्यता वाली सरकारी गाड़ी में आयेगा, अर्थात् ऐसे स्मज्हिये कि अमेरिका का राष्ट्रपति जिस कार या वायुयान ( हैलीकॉप्टर आदि) में आ रहा है, उसका धातुज शरीर ( मैटल बॉडी ) आदि अन्य सामान्य कारों की भॉति भले ही दिखे पर वो विशेष है ।

ऐसे ही देवी - देवता हैं, तो -

वे जब आते हैं तो इसीलिये प्रधान देवता भारतीय वाहन में होते हैं , क्योंकि भारत अध्यात्म की सर्वश्रेष्ठ प्रामाणिक धरा है , ये सभी देवी-देवताओं के लिए अध्यात्म का सर्वोत्तम आदर्श है | और दूसरी बात ये है कि देवताओं की संख्या अनगिनत है , यदि कोई देवता कंगारू, जिराफ आदि आकृत्यात्मक वाहनों में हमें न ज्ञात हों तो इसका ये अर्थ नहीं कि वे हैं ही नहीं क्योंकि देवता की इच्छा पर ये निर्भर करता है कि वह किस वाहन स्वरूप (मॉडल ) को चाहता है !

शास्त्र के अनुसार देवताओं के वाहन लौकिक तिर्यक् पशु नहीं होते, वे सब द्युलोकादि के अमर्त्य देवता ही हैं , दिव्य शक्ति का वाहन भी देवता ( दिव्य शक्ति ) है, यही कारण है कि कोई अज वाहन प्रज्ज्वलित अग्नि देवता को धारण किये है , तो कोई मृग वाहन वायु देवता को , लौकिक तिर्यक् पशु में ये सामर्थ्य ही नहीं कि उन अग्नि वायु आदि को धारण कर सके , ये सभी वाहन उस -उस देवता के ही अनुरूप विशेष -विशेष दिव्य शक्तियों से युक्त होते हैं | इसी कारण, शास्त्र का तो यह सिद्धान्त है कि यह देवता ही देव वाहन रूप से समभिव्यक्त है |

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आक्षेप - सभी देवी देवता हमेशा राज घरानो मे हि जन्म क्यो लेते थे ?

क्यो किसी भी देवी देवता ने किसी गरीब या शुद्र के यहा जन्म नही लिया?

धज्जियां - देखो ! लोक में गाँव के विकास का काम करने के लिए ग्राम प्रधान का पद , जिले के लिए डी एम या विधायक का , प्रदेश के लिए मुख्यमंत्री का तथा देश का काम करने के लिए प्रधानमंत्री का पद सबसे प्रामाणिक व्यवस्था है, ऐसे ही यदि विश्व में अध्यात्म का कोई बड़ा काम करना है तो अध्यात्म की सर्वश्रेष्ठ उपाधि (ब्राह्मण ) चाहिए , प्रशासन को लेकर आपको बड़ी भूमिका निभानी है तो राजघराने से सम्बद्ध होना सबसे प्रामाणिक तरीका है | ब्राह्मण और क्षत्रिय ये दोनों शास्त्र और शस्त्र दोनों से लोक में सुव्यवस्था बनाए रखने के सर्वोत्तम साधन हैं , इसीलिये इनका प्रयोग देवी –देवताओं द्वारा होता है |

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आक्षेप - पौराणीक कथाओ मे सभी देवी देवताओ की दिनचर्या का वर्णन है जैसे कि कब पार्वती ने चंदन से स्नान किया, कब गणेश के लिये लड्डु बनाये, गणेश ने कैसे लड्डु खाये.. आदी लेकीन जैसे हि ग्रंथो कि स्क्रीप्ट खत्म हो गयी भगवानो कि दिनचर्या भी खत्म.. तो क्या बाद में सभी देवीदेवताऔ का देहांत हो गया ?? अब वो कहाँ है? उनकी औलादे कहाँ है?

धज्जियां - न जाने कहान से आप दिनचर्या पढे हो , तथापि दुर्जन तोष न्याय से समाधान करते हैं ! स्क्रिप्ट ख़त्म तो दिनचर्या ख़त्म - ये तो कोई पागल ही बोल सकता है |यदि मैं किसी को तुम्हारे बारे में बताऊँ कि ///कल तुमने मुझसे एक अमुक प्रश्न पूछा था उसका मैंने ये उत्तर दिया /// तो तुम्हारी ये जानकारी किसी को बताने से तुम मर जाओगे क्या ? चलचित्र (फिल्म) के अंत में हीरो और हीरोइन का मिलन हो जाता है और तीन घंटे की फिल्म समाप्त हो जाती है तो क्या हीरो हीरोइन मर जाते हैं ? वे तो यथास्थान ही होते हैं | कितनी घोर मूर्खता है ! चलचित्र ( फिल्म ) के उस द इंड से तो स्क्रिप्टराइटर की ये शिक्षा होती है कि इस प्रकार उक्त नायक -नायिका के सुखमय जीवन की शुरुआत हुई | एक बच्चा भी आसानी से इतनी सी सामान्य बात समझता है |

................देखो ! लोक में विद्वान क्या करता है , विद्वान जब किसी को बताता है तो सारभूत बोलता है , सटीक बोलता है , और उतना ही बोलता है जितना अगले व्यक्ति को समझाने के लिए यथायोग्य एवं पर्याप्त हो ! इसे सारं सुष्ठु मितं भाष्यम् (वाग्व्यवहार ) कहते हैं | सार का अभिप्राय है सारभूत , सुष्ठु का अभिप्राय है सर्वथोचित सुन्दर, मितम् का अभिप्राय है यथावश्यक |

....................पौराणिक कथाएँ आपको ईश्वर के चरित्र अथवा लीलाओं की सूचना इसी सारं सुष्ठु मितं से प्रदान करती है , ताकि आप उसे ग्रहण कर उसका बांकी तात्पर्य स्वतः समझ सकें | आपको उतना ही बताते हैं जितने से आपकी प्रज्ञा को समुचित मार्गदर्शन हो जाए , आप स्थालीपुलाकन्याय से उस सम्बन्ध में अन्य गुण –कर्म - स्वभाव भी समझ जाएँ कि इनका गुण कर्म स्वभाव लीला विनोद इस तरह से अभिहित है | आपकी अभिधारणा को ईश्वरीय चेतना के आलोक में सुनियोजित कर उसका उत्तम निर्माण करना मात्र पौराणिक कथाओं का प्रयोजन है | गणेश जी ने लड्डू खाया या कुंकुम-चंदनादि किसी ईश्वरीय शक्ति द्वारा स्वीकृत होने आदि की बातें अगर पुराण कहता है तो इसका अभिप्राय है कि ईश्वर का गणेश रूप अपने प्रेमी भक्तों के द्वारा भाव से प्रदत्त मोदक को ही भक्षण कर रहे हैं , जब आप उपासना करें तो उसमें उनकी प्रसन्नता की कामना लेते हुए मोदक (लड्डू ) के भोग की प्रधानता रखें |

.......................मोदक प्रतीक है मुदिता , प्रसन्नता का अथवा आनन्द का | श्री गणेश जी को मोदक देने का अर्थ है इस प्रतीक के रूप में ईश्वर के प्रति अपने अध्यात्मिक प्रेमानंद की अभिव्यक्ति करना | जब भक्त मुदित होता है तो उसका उपास्य ईश्वर भी मुदित होता है , ये उपास्य -उपासक का परस्पर आतंरिक प्रेम है | जब आप एक मोदक बनाकर ईश्वर के गणेश रूप को श्रद्धा और प्रेम से अर्पित करते हैं तो ईश्वर के प्रति इस प्रेमपूर्ण आध्यात्मिक व्यवहार से आपकी चेतना में क्रमशः सात्त्विकता आती है और आपका आध्यात्मिक विकास होता है | आपको साधना के उद्देश्य से ये श्री गणेश जी के मोदक आदि भक्षण की चर्चा पुराणादि का उद्देश्य है |

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आक्षेप - ग्रंथो के अनुसार पुराने समय मे सभी देवी देवताओ का पृथ्वी पर आना-जाना लगा रहता था। जैसे कि किसी को वरदान देने या किसी पापी का सर्वनाश करने.. लेकीन अब एसा क्या हुआ जो देवी देवताओ ने पृथ्वी पर आना बंद हि कर दिया??

धज्जियां - पुराने समय में देवी -देवता पृथ्वी पर आते थे तो तब भी उनके देवी या देवता होने का रहस्य केवल उनके अधिकारी भक्त ही जान पाते थे , सब नहीं , जैसे भगवान् कृष्ण द्वापरयुग में अवतरित हुए तो केवल उनके अधिकारी भक्तों जैसे - असित , देवल , व्यास, कुंती, विदुर आदि गिने -चुने लोग ही उनकी भगवत्ता को पहचान पाते थे अथवा केवल स्वयं श्री कृष्ण ही अपनी भगवत्ता के ज्ञाता थे , सभी नहीं |

#आहुस्त्वामृषयः_सर्वे_देवर्षिर्नारदस्तथा |

#असितो_देवलो_व्यासः_स्वयं_चैव_ब्रवीषि_मे || (-श्रीमद्भगवद्गीता १०/१३)

सौ कौरव, कर्ण , जरासंध , अश्वत्थामा , शिशुपाल आदि सहित सारा संसार उनको एक साधारण ग्वाला ही समझता था | इसीलिये तो दुर्योधन भरी राजसभा में उनको बन्दी बनाने का आदेश देता है , शिशुपाल सौ गालियाँ देता है, अश्वत्थामा उनकी आज्ञा न मानकर पांडवों के सर्वनाश का कुकृत्य करता है , आदि | ऐसे ही राम के विषय में था ऐसे ही अन्य अवतारों के विषय में है | हनुमान जी को उस समय का अज्ञानी समाज एक साधारण बन्दर समझता था, इतने देवी देवता वानर रीछ आदि रूपों में अवतरित हुए किसने पहचाना ? केवल महातपा ऋषि मुनियों आदि ने ही क्योंकि महान् आध्यात्मिक शक्तियों को जानने के लिए ज्ञाता को स्वयं भी अध्यात्म के सर्वोच्च शिखर पर होना आवश्यक है | तपः पूत , क्रान्तदर्शी ऋषिगण समाधि की अवस्था में समस्त अवतारों के मूल स्वरूप का साक्षात्कार कर फिर उनका उपदेश करते हैं | इतनी हजारों गोपियाँ पूर्वजन्म में महान् ऋषि थीं, अनेक तो देवलोक की अप्सराएं थीं , अनेक वेदमंत्रों की ऋचाएं अवतरित हुईं थी , किसने पहचाना ?

.................. यहाँ तक कि श्री भगवान् तो यहाँ तक स्पष्ट करते हैं कि लोक में जो-जो भी विभूति युक्त अर्थात् ऐश्वर्य युक्त, कान्ति युक्त और शक्ति युक्त वस्तु है, उस- उसको तू (हे अर्जुन !) मेरे तेज़ के अंश की ही अभिव्यक्ति जान -

#यद्यद्विभूतिमत्सत्वं_श्रीमदूर्जितमेव_वा ।

#तत्तदेवावगच्छ_त्वं_मम_तेजोंऽशसंभवम् || (- श्रीमद्भगवद्गीता १० /४१)

इसी प्रकार आज भी अनेक देवी -देवताओं की स्वांश आध्यात्मिक विभूतियाँ आदि प्रायः विविध प्रकार से अवतरित होकर सनातन धर्म की रक्षा , लोकालीला का सम्पादन करते हैं , पर केवल अधिकारी भक्त ही उनका गूढ़ रहस्य समझ पाते हैं , उनकी विभूतियों का दर्शन कर पाते हैं , मूढ़ नहीं | या फिर वही व्यक्ति उनका संज्ञान प्राप्त कर सकता है , जो इन ऋषियों , हम जैसे धर्मज्ञ ब्राह्मणों से ज्ञान का श्रवण करे | अज्ञानी मूढों के लिए तो श्री भगवान् स्वयं कहते हैं -

मूर्ख लोग मेरे सम्पूर्ण प्राणियों के महान् ईश्वररूप श्रेष्ठभाव को न जानते हुए मुझे मनुष्य-शरीर के आश्रित मानकर अर्थात् साधारण मनुष्य मानकर मेरी अवज्ञा करते हैं -

#अवजानन्ति_मां_मूढा_मानुषीं_तनुमाश्रितम् |

#परं_भावमजानन्तो_मम_भूतमहेश्वरम् || (-श्रीमद्भगवद्गीता ९/११)

तुम्हारी भाषा में कहा जाए तो - #शौके_दीदार_गर_है_तो_नजर_पैदा_कर !

हमारी भाषा में - यथा दृष्टिः तथा सृष्टिः #दृष्टिसृष्टिवाद

...............श्रीभगवान् स्वयं कहते हैं - (हे अर्जुन !) अपनी योगमायासे छिपा हुआ मैं सबके प्रत्यक्ष नहीं होता, इसलिए यह अज्ञानी जनसमुदाय मुझ जन्मरहित अविनाशी परमेश्वरको नहीं जानता -

#नाहं_प्रकाशः_सर्वस्य_योगमायासमावृतः |

#मूढोऽयं_नाभिजानाति_लोको_मामजमव्ययम् || (-श्रीमद्भगवद्गीता ७/ २५ )

तो कौन जानता है ? तो कहा - जो उनके भक्त हैं, वे अपनी पराभक्ति के द्वारा परमात्मा को वो जो हैं , जैसे हैं ठीक वैसा तत्व से जानते हैं -

#भक्त्या_मामभिजानाति_यावान्यश्चास्मि_तत्त्वतः | (-श्रीमद्भगवद्गीता १८/५५ )

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आक्षेप - अगर हिन्दू धर्म के अनुसार एक जीवित पत्नी के रहते, दूसरा विवाह अनुचित है, तो फिर राम के पिता दशरथ ने चार विवाह किस नीति अनुसार किये थे?

धज्जियां - किसने कहा अनुचित है ? श्री याज्ञवल्क्य जी जैसे विशुद्ध ब्राह्मण की भी दो पत्नियां (मैत्रेयी और कात्यायनी ) थीं, महायोगीश्वर भगवान् श्री कृष्ण तो सोलह हजार एक सौ आठ पत्नियां थीं | एक उत्तम कृषक के पास जितनी भूमि होगी, वह उससे उतनी फसल उगाएगा , ये तो बहुत अच्छी बात है | अधिकाधिक पुत्र-पौत्रों से सुसम्पन्न होना , खूब दीर्घायु होना ये तो हमारी परम्परा में आशीर्वाद का फल है, कृषक और उसकी भूमि का जो पवित्र सम्बन्ध होता है , वही वैदिक धर्म में पति और पत्नी का होता है |

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आक्षेप - अगर शिव के पुत्र गनेश की गर्दन शिव ने काट दी, तो फिर यह कैसा भगवान है?? जो उस कटी गर्दन को उसी जगह पर क्यों नहीं जोड़ सका?? क्यों एक निरपराध जानवर (हाथी) की हत्या करके उसकी गर्दन गणेश की धढ पर लगाई? एक इंसान के बच्चे के धढ़ पर हाथी की गर्दन कैसे फिट आ गयी?

उत्तर :- आपकी यह सारी कल्पना ईश्वर को मनुष्य देह के समान तुलना करने से उपजी है | पहले आप ईश्वरीय देह की दिव्यता समझिये -

श्री ब्रह्मा जी ने ब्रह्म-संहिता में भगवान के स्वरुप की चर्चा करते हुए कहा है कि श्रीभगवान का श्री विग्रह - आनन्दमय, चिन्मय और सत्-मय होने के कारण परम उज्जवल है; जिस श्रीविग्रह के सारे अंग (अर्थात प्रत्येक इन्द्रिय) समस्त इन्द्रियों की सारी वृत्तियों से संपन्न हैं और जो चिद्-अचिद् अनन्त जगत्समूह का नित्य दर्शन, पालन और नियमन करते हैं-

#अङ्गानि_यस्य_सकलेन्द्रियवृत्तिमन्ति_पश्यन्ति_पान्ति_कलयन्ति_चिरं_जगन्ति |

#आनन्दचिन्मयसदुज्ज्वलविग्रहस्य_गोविन्दमादिपुरुषं_तमहं_भजामि ||(- श्री ब्रह्मसंहिता ५/३२)

#सत्त्वादयो_न_सन्तीशे_यत्र_वै_प्राकृता_गुणाः ( श्रीविष्णुपुराणम्१/९/४४ )

अर्थात् स्पष्ट है कि उसकी तुलना मानवीय देह से कदापि नहीं हो सकती |

श्रीरामचरितमानस स्पष्ट कहती है कि ईश्वर की देह चिदानन्दमय है (यह प्रकृतिजन्य पंच महाभूतों की बनी हुई कर्म बंधनयुक्त, त्रिदेह विशिष्ट मायिक नहीं है) और (उत्पत्ति-नाश, वृद्धि-क्षय आदि) सब विकारों से रहित है, इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं।

ईश्वर ने देवता और संतों के कार्य के लिए (दिव्य) नर शरीर धारण किया है और प्राकृत (प्रकृति के तत्वों से निर्मित देह वाले, साधारण) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं-

#चिदानन्दमय_देह_तुम्हारी। #बिगत_बिकार_जान_अधिकारी॥

#नर_तनु_धरेहु_संत_सुर_काजा। #कहहु_करहु_जस_प्राकृत_राजा॥ (- श्रीरामच०मा०, अयोध्याकाण्ड १२६/३)

ये तो मूर्खलोग ही होते हैं जो सगुन साकार ईश्वर को सामान्य मनुष्य शरीर की भांति मानकर उनकी अवज्ञा करते हैं (-श्रीमद्भगवद्गीता ९/११)

ब्राह्मण , गौ , देवताओं और सन्तों के हित के लिए मनुज अवतार लेने वाला उनका श्री विग्रह उनकी ही दिव्य इच्छा शक्ति से निर्मित होता है और माया के सत्त्वादि गुणों तथा भौतिक इन्द्रियों से परे होता है -

#बिप्र_धेनु_सुर_संत_हित_लीन्ह_मनुज_अवतार।

#निज_इच्छा_निर्मित_तनु_माया_गुन_गो_पार।। (- श्रीरामच०मा०, बालकाण्ड १९२)

शास्त्रीय दृष्टि से ईश्वरीय देह के एक एक रोम में ब्रह्माण्ड को समाने की क्षमता है , कहाँ तो आप किसी हाथी के सिर की बात कर रहे हैं //#ब्रह्माण्ड_निकाया_निर्मित_माया_रोम_रोम_प्रति_बेद_कहै (- श्रीरामच०मा०, बालकाण्ड १९२ /// #माया_गुन_ग्यानातीत_अमाना_बेद_पुरान_भनंता (-तत्रैव )//// कार्य सदैव अपने कारण में समाहित हो जाता है , ईश्वर की देह मायाशक्ति की महिमा होने से कारण समस्त कार्यात्मक प्राकृतिक तत्त्वों (तदन्तर्गत पञ्च महाभूत एवं उनसे सृष्ट समस्त पदार्थों ) की कारण स्वरूपा है |

...................अतः ईश्वर के देह को मानवीय देह की भांति समझना कूपमंडूकता है | ईश्वर की योग शक्ति से प्रकट उनके दिव्य देह में कटना , जुड़ना आदि सब घटनाएं ईश्वर की ही माया शक्ति के कारण ही परिलक्षित होते हैं | जैसे जादूगर स्वयं के ही शरीर काट कर पुनः जोड़ लेता है , ऐसे ही ईश्वर की लीला है माया उसका जादू है और वह उससे युक्त मायावी , जैसा कि वेद कहता है -

#माया_तु_प्रकृतिं_विद्धि_मायिनं_तु_महेश्वरम् (- श्वेता० उ०४/१०)

परमेश्वर एक होकर भी अपनी अलौकिक मायाशक्ति से अनेकरूपों में परिलक्षित होता है -

#इन्द्रो_मायाभिः_पुरुरूप_ईयते ” ( ऋग्वेद ६ / ४७ /१८ )

ईश्वर की लीला में सहभागी होने वाला कोई भी जीव उसके पूर्व कर्मों , संस्कारों का वैशिष्ट्य लिए होता है , तभी वह उस लीला का अंग बनताहै , कौन निरपराध है , कौन अपराधी , कौन ग्राह्य है कौन अग्राह्य , इन सब का ध्यान ईश्वर स्वयं रखता है , और तदनुसार ही अपनी लीला का सम्पादन करता है | उसकी लीला में सहभागी होने वाले प्राणी के अनन्त कर्मों का ज्ञाता , उसके भूत , भविष्य एवं वर्त्तमान की सब जिम्मेदारी स्वयं ईश्वर के ही हाथ में है | इतने अनन्त ब्रह्माण्डों में अनन्त जड़ चेतन प्राणियों का प्रतिक्षण संहार , पालन और उद्भव करने की अकेले ही जिम्मेदारी निभाने वाले परम महिमामय श्री भगवान् के लिए एक लोक विशेष के एक हाथी की जिम्मेदारी भी स्वयं की ही है, आपको उसकी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं | (Y

आक्षेप - जब भी कोइ पापी पाप फैलाता था तो उसका नाश करने के लिये खुद भागवान किसी राजा के यहा जन्म लेते थे फिर 30-35 की उम्र तक जवान होने के बाद वो पापी का नाश करते थे, ऐसा क्यों? पापी का नाश जब भगवान खुद हि कर रहे है तो 30-35 साल का इतना ज्यादा वक्त क्यो??? भगवान सिधे कुछ क्यो नही करते?? जीस प्रकार उन्होने अपने खुद के ही भक्तो का उत्तराखण्ड मे नाश किया ?

धज्जियां :- आपने शास्त्रीय अभिधारणा ठीक से प्राप्त नहीं की है , लगता है कभी विशुद्ध ब्राह्मणों के चरण रज को शिरोधार्य नहीं किया , देखिये अब समझिये इसे गहराई से -

अवतारवाद पर श्रीमद्भगवद्गीता ४/७-८ में दो प्रमुख श्लोक हैं , -

हे भारत ! जब-जब धर्मकी हानि और अधर्मकी वृद्धि होती है, तब-तब मैं अपने आत्मा को सृजता हूँ -

#यदा_यदा_हि_धर्मस्य_ग्लानिर्भवति_भारत |

#अभ्युत्थानमधर्मस्य_तदात्मानं_सृजाम्यहम् ||

फिर इसके आगे कहा कि -

साधु पुरुषोंके की सब ओर से रक्षा के लिए , दुष्कृतियों के विनाशार्थ और धर्म की सम्यक् स्थापना करनेके लिए मैं युग-युगमें प्रकट हुआ करता हूँ -

#परित्राणाय_साधूनां_विनाशाय_च_दुष्कृताम् |

#धर्मसंस्थापनार्थाय_सम्भवामि_युगे_युगे ||

अब यहाँ दो बातें श्रीभगवान् ने अपने अवतार पर स्पष्ट की हैं -

१- यदा यदा (जब-जब ) २- युगे युगे (युग-युग में )

प्रथम श्लोक में श्री भगवान ने स्पष्ट किया कि जब भी धर्म की ग्लानि होगी तो मैं अपने आत्मा का सृजन करूंगा , किन्तु हम देखते हैं कि धर्म की हानि तो अभी भी हो रही है , जैसे आप ही कर रहे हैं ये आक्षेप खड़े करके तो भगवानका अवतार कहाँ हुआ?

तो इसका समाधान स्वयं भगवान दे रहे हैं कि - /// तदात्मानं सृजामि // तब मैं अपनी आत्मा का सृजन करता हूँ ! अब देखो -

भगवान् तो सबके आत्मा हैं , भगवान का आत्मा कौन है भला जिसको सृजित करेंगे ? ...तो इसका उत्तर है कि - #ज्ञानित्वात्मैव_मे_मतम् (श्रीमद्भगवद्गीता ७/१८) अर्थात् ज्ञानी ही श्री भगवान् का आत्मा है , इसी अपने आत्मा को सृष्ट कर देते हैं , जैसे तुम जैसे धर्ममूढों के लिए मैं सृष्ट हूँ | वह ईश्वर का आत्मा स्वयं आकर धर्म का उत्थान कर देगा !

..............आप इतिहास उठाकर देखिये , लोक में जब जब भी धर्म के मूलभूत सिद्धान्तों की हानि हुई और अधर्म वृद्धि को प्राप्त हुआ , तो उस -उस देश , काल या परिस्थिति में तदनुरूप ही कोई न कोई ज्ञानी , कोई न कोई विभूति उन्हीं के मध्य में आयी और उसने उसका शमन कर दिया |

इसीलिए तो श्री भगवान् कहते हैं कि -

भावार्थ : जो-जो भी विभूतियुक्त अर्थात्‌ ऐश्वर्ययुक्त, कान्तियुक्त और शक्तियुक्त वस्तु है, उस-उस को तू मेरे तेज के अंश की ही अभिव्यक्ति जान-

#यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं_श्रीमदूर्जितमेव_वा |

#तत्तदेवावगच्छ_त्वं_मम_तेजोंऽशसम्भवम्‌ || (श्रीमद्भगवद्गीता १०/४१ )

दूसरा युगे युगे है , कि जब अन्धेरा इतना फ़ैल जाएगा कि दीपक से दूर न हो सकेगा तो सूर्य स्वयं प्रकट होगा | इसका स्पष्टीकरण शास्त्रों में प्रसिद्ध ही है कि किस युग में कौन कौन से अवतार होंगे |

................ईश्वर हर पापी को समय देते हैं कि वे सुधारे और अपने पाप का घड़ा भरने से स्वयं को रोके, संभलने का पूर्ण अवसर परमात्मा पापे को पहले ही दे देते हैं , पर पापी जब ईश्वर की प्रेरणा की अवहेलना करता है तो फिर उसका संहार ही आवश्यक होता है | हर असुर का संहार भी स्वयं नहीं करते, जो विशेष (ईश्वर के अनुग्रह के पात्र ) होते हैं वही स्वयं श्री हरि के हाथों द्वारा पराभूत होते हैं |

चींटी को मारने के लिए महाविध्वंसकारी आग्नेयास्त्र का प्रयोग थोड़े न किया जाता है भला ? इसी प्रकार किसी पापी के संहार हेतु ईश्वर का स्वयं का कोई निश्चित आयुकाल नहीं कि इसी में उसका संहार करने में सक्षम हो पायेंगे , वे तो दूधमुंहे बाल्यकाल में भी पूतना , शकटासुर जैसे असुरों को ठिकाने लगाने में परम सिद्धहस्त हैं | ये सब सामने वाले जीव के कर्मों पर निर्भर करता है कि उसका घडा कब भर रहा है |

.............उत्तराखण्ड में जो प्रलय हुआ उसमें भक्तों का नाश नहीं किया , भक्तों को तो बचा लिया उस प्रलय से भगवान ने | शिव भक्त तो उसी उत्तराखण्ड में अब भी सुरक्षित हैं , यदि भक्तों का नाश करना ही प्रलय का उद्देश्य होता तो फिर कोई भक्त कहाँ बचते ? जिनका नाश हुआ , वे सभी ईश्वर की दृष्टि में उस दण्ड के योग्य थे क्योंकि ईश्वर तो अनादिकाल से ही सब प्राणियों के अन्तः करण विराजमान हुआ उनेक जन्म जन्मान्तर के अनन्त कर्मों को जानने वाला साक्षी चैतन्य है |

#कर्माध्यक्षः_सर्वभूताधिवासः_साक्षी_चेता_केवलो_निर्गुणश्च' - (श्वे० उप० ६/११)

(#तान्यहं_वेद_सर्वाणि_न_त्वं_वेत्थ_परन्तप (श्रीमद्भगवद्गीता ४/५ )

।। जयश्री राम ।।

जाती व्यवस्था

सनातन धर्म की जाती व्यवस्था प्रारंभ से ही सबको खटकती थी इसी को अंत करने के उद्देश्य से विभिन्न मत पन्थ बने। उनके संग क्या हुआ आइये जानते हैं क्रमबद्ध तरीके से आये मत।

1. बौद्ध मत: वेदवर्णित जाती व्यवस्था के विरुद्ध आया मत जिसने पुरजोर जातिवाद का विरोध किया किन्तु अंततः स्वयं विभिन्न जातियों ओर मतों में बंट गया जैसे हीनयान बौद्ध, महायान बौद्ध , वज्रयान बौद्ध, थेरवाद बौद्ध इत्यादि।

2. जैन धर्म: जातिव्यवस्था का विरोध किन्तु अंततः और वर्तमान में दिगम्बर, श्वेताम्बर, सौंगढ़िया जैन इत्यादि। उसमें भी दिगम्बर में सिंघई, सवा सिंघई, साढ़े सिंघई जैसी जातियां बनी।

3: ईसाइयत: एक इसु मसीह द्वारा बनाया मत जोकि एक ईश्वर की संतान सबको बताता था किंतु वर्तमान में सबसे ज़्यादा बंटा कैथोलिक, प्रोटोस्टेंट, एवेंजलिस्ट, मॉरमॉन, बैप्टिस्ट, इत्यादि अनेक प्रकार की जाती मतों में।

4. मुहम्मद का इस्लाम: मुहम्मद द्वारा इस्लाम लाया गया जिसमें एक अल्लाह एक रसूल सब एक अल्लाह के बनाए आदम के पुत्र कोई जातिवाद नही किन्तु अंततः मुहम्मद के मरते ही और वर्तमान में सुन्नी, शिया, वहाबी, सल्फी, बोहरा, हनफ़ी, कादियानी, अल्वी इत्यादि और सब एक दूसरे के खून के प्यासे। कम से कम हिन्दू सभी जाति के मरने मिटने एक दूसरे को सोचते तक नहीं। 

उसमे भी सुन्नियों में पठान, सैय्यद, रंगरेज़ से लेकर विभिन्न ऊंच नीच जाती जिसमे जमकर भेदभाव होता है। 

5: सिख: गुरुनानक जी के विचारों से बना एक पन्थ जो एक सच्चे निराकार वाहेगुरु की उपासना करता और जिनके ग्रन्थ में सभी एक ईश्वर के पुत्र बिना भेद भाव जाट पात के बताए गए किन्तु वर्तमान में यह भी पापे(लाले), जट्ट, ट्रखांण(रमगरिया) और चमार में बंटा है और पंजाब साइड जाओगे तो पापे बनाम जट्ट तो खूब चलता है। इनमे भी जट्ट पापे लोग चमार और रमगरियों के यहां न विवाह करते न पानी तक पीते।

सार क्या निकला?

तुम्हारे मतों में तो जातिवाद नही था तो भी इतनी जातियों में बंट गया इससे समझ जाओ जातिवाद ईश्वर की ही एक देन उपहार है जोकि हमारे शास्त्रों में वर्णित है और हम मानते हैं और तुम्हारे शास्त्रों में वर्णित न होकर भी तुम मान ही रहे हो भले किसी अन्य तरीके से। 
सभी विचार अवश्य कीजियेगा।

जय श्रीराम

Friday, December 12, 2014

प्रश्न - राष्ट्रीय ग्रन्थ क्या होना चाहिए ? वेद या गीता ??

प्रश्न - राष्ट्रीय ग्रन्थ क्या होना चाहिए ? वेद या गीता ??

उत्तर - गीता ही राष्ट्रीय ग्रन्थ होना चाहिए , जो धूर्त आर्य समाजी लोग हिन्दू धर्म के विषय में इतने अज्ञानी हैं कि स्वयं "हिंदुत्व " इस शब्द पर ही लोगों को निराधार तथ्यों से अक्सर भ्रमित करते रहते हैं | इस प्रकार के लोग जो वेद को राष्ट्रीय ग्रन्थ घोषित करने की मांग कर रहे हैं , इसके पीछे इनकी अपनी सनातन धर्म विरोधी मानसिकता लादने की बहुत गहरी साजिश काम कर रही है | उन असुरों को ये तक नहीं मालूम कि वेद कहते किसे हैं | 

अनंता वै वेदाः - इस शतपथ वचन के अनुसार वेद अनन्त हैं | इन मूर्ख समाजियों का चार संहिताओं मात्र को वेद कहना अर्धकुक्कुटी न्याय जैसा है , क्योंकि संहिता , ब्राह्मण , आरण्यक और उपनिषदों से लेकर समस्त उपवेद भी वेद नाम से गृहीत होते हैं | 


वेदों को संकुचितता का जामा पहनाकर देकर अपना म्लेच्छ सिद्धान्त हिन्दू समाज पर हावी करने की साजिश रचाने वाले समाजी असुरों से सावधान रहें !!!!
हिन्दू कभी किसी फर्जी महर्षि दयानंद की नहीं अपितु वास्तविक महर्षि वेदव्यास की सुनकर चलते हैं -


एकं शास्त्रं देवकीपुत्रगीतमेको देवो देवकीपुत्र एव |

एको मन्त्रस्तस्य नामानि यानि कर्माप्येकं तस्य देवस्य सेवा || 

इन साजिशकर्ता असुरों के विरुद्ध हर सनातनी को अपनी-अपनी भूमिका से शंखनाद करना चाहिए |

जय श्री कृष्ण !!!
|| जय श्री राम ||

 

Sunday, August 3, 2014

महान संत रविदास जी और मीरा बाई जी , सिकन्दर लोदी का एक उतम प्रसंग

महान संत रविदास जी और मीरा बाई जी , सिकन्दर लोदी का एक उतम प्रसंग..

महाराणा परिवार की महारानी मीरा को कौन नहीं जानता --? वे चित्तौड़ से चलकर काशी आयीं और रामानंद स्वामी से निवेदन किया कि वे उन्हें अपना शिष्य बना ले स्वामी जी ने वहीँ बैठे संत रविदास की ओर इशारा करते हुए कहा तुम्हारे योग्य गुरु तो संत रविदास ही है महारानी मीरा ने तुरंत ही संत रविदास की शिष्या बन गयी और वे महारानी मीरा से कृष्णा भक्त मीराबायी हो गयी इससे बड़ा समरसता का उदहारण कहाँ मिलेगा, उन्हें भगवान कृष्ण का साक्षात्कार हुआ ये संत रविदास की ही कृपा है संत रविदास चित्तौड़ किले में कई महीने रहे उसी का परिणाम है आज भी पश्चिम भारत में बड़ी संख्या में रविदासी हैं.

संत रविदास का चमत्कार बढ़ने लगा इस्लामिक शासन घबड़ा गया सिकंदरसाह लोदी ने सदन कसाई को संत रविदास को मुसलमान बनाने के लिए भेजा वह जनता था की यदि रविदास इस्लाम स्वीकार लेते हैं तो भारत में बहुत बड़ी संख्या में इस्लाम मतावलंबी हो जायेगे लेकिन उसकी सोच धरी की धरी रह गयी स्वयं सदन कसाई शास्त्रार्थ में पराजित हो कोई उत्तर न दे सके और उनकी भक्ति से प्रभावित होकर उनका भक्त यानी वैष्णव (हिन्दू) हो गया उसका नाम सदन कसाई से रामदास हो गया, दोनों संत मिलकर हिन्दू धर्म के प्रचार में लग गए जिसके फलस्वरूप सिकंदर लोदी क्रोधित होकर इनके अनुयायियों को चमार यानी चंडाल घोषित कर दिया ( तब से इस समाज के लोग अपने को चमार कहने लगे) उनसे कारावास में खाल खिचवाने, खाल-चमड़ा पीटने, जुती बनाने इत्यादि काम जबरदस्ती कराया गया उन्हें मुसलमान बनाने के लिए बहुत शारीरिक कष्ट दिए गए लेकिन उन्होंने कहा -----

''वेद धर्म सबसे बड़ा, अनुपम सच्चा ज्ञान,

फिर मै क्यों छोडू इसे, पढ़ लू झूठ कुरान.

वेद धर्म छोडू नहीं, कोसिस करो हज़ार,

तिल-तिल काटो चाहि, गोदो अंग कटार'' (रैदास रामायण)

यातनाये सहने के पश्चात् भी वे अपने वैदिक धर्म पर अडिग रहे, और अपने अनुयायियों को बिधर्मी होने से बचा लिया, ऐसे थे हमारे महान संत रविदास जिन्होंने धर्म, देश रक्षार्थ सारा जीवन लगा दिया इनकी मृत्यु चैत्र शुक्ल चतुर्दसी विक्रम सम्बत 1584 रविवार के दिन चित्तौड़ में हुआ, वे आज हमारे बीच नहीं है उनकी स्मृति आज भी हमें उनके आदर्शो पर चलने हेतु प्रेरित करती है आज भी उनका जीवन हमारे समाज के लिए प्रासंगिक है, हमें यह ध्यान रखना होगा की आज के छह सौ वर्ष पहले चमार जाती थी ही नहीं, इस समाज ने पद्दलित होना स्वीकार किया, धर्म बचाने हेतु सुवर पलना स्वीकार किया, लेकिन बिधर्मी होना स्वीकार नहीं किया आज भी यह समाज हिन्दू धर्म का आधार बनकर खड़ा है, हिन्दू समाज में छुवा-छूत, भेद-भाव, उंच-नीच का भाव था ही नहीं ये सब कुरीतियाँ इस्लामिक काल की देन है, हमें इस चुनौती को स्वीकार कर इसे समूल नष्ट करना होगा यही संत रविदास के प्रति सच्ची भक्ति होगी.

Sunday, July 20, 2014

वेद व्यास जी वर्णसंकर नहीं


वेद व्यास जी पर वर्णसंकर आक्षेप का जबाब (वेद व्यास जी वर्णसंकर नहीं)
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अक्सर मैं देखता आया हूँ हमारे परम पूज्य वेद व्यास जी पर आक्षेप किया जाता है कि वो वर्णसंकर थे? लेकिन वास्तविकता कितनी अलग है देखिये?

वर्णव्यवस्था के अनुसार ब्राह्मण दम्पति की संतान ब्राह्मण कहलाती है, क्षत्रिय दम्पति की संतान क्षत्रिय कहलाती है इसी प्रकार वैश्य और शुद्र दम्पति की संतान क्रमशः वैश्य और शुद्र कहलाती है इसके अलावा एक वर्ण के व्यक्ति द्वारा अन्य किसी भी वर्ण (अपने वर्ण से भिन्न) या जाती की स्त्री से जन्मी संतान वर्णसंकर कहलाती है जैसा कि आक्षेप महर्षि वेदव्यास जी पर लगाया गया है!! देखें-

सवर्णेभ्यः सवर्णासु जायन्ते हि सजातयः। (-याज्ञवल्क्य स्मृति आचाराध्याय 4/90)

अर्थ- सवर्ण(पुरुषोँ) द्वारा प्रशस्त (ब्राह्म आदि) विवाहोँ से ग्रहण की गयी सवर्णा (समान वर्ण) की स्त्रियोँ मेँ उत्पन्न पुत्र सजाति (उसी वर्ण के ) होते हैँ |

वेद व्यास जी पर शंका
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ये सर्वविदित है कि वेदव्यास की के पिता मुनि पराशर एक विशुद्ध ब्राह्मण थे! अतः अब अज्ञानी शंका उठाते हैं उनकी माता सत्यवती जिन्हें मत्स्यगंधा भी कहते हैं उन पर तो उनकी शंका के निवारण हेतु पहले सत्यवती जी कौन थी यह जानना आवश्यक है! 

सत्यवती महाभारत की एक महत्वपूर्ण पात्र है। उसका विवाह हस्तिनापुरनरेश शान्तनु से हुआ। उसका मूल नाम 'मत्स्यगंधा' था। वह ब्रह्मा के शाप से मत्स्यभाव को प्राप्त हुई "अद्रिका" नाम की अप्सरा के गर्भ से उपरिचर वसु द्वारा उत्पन्न एक कन्या थी। इसका ही नाम बाद में सत्यवती हुआ। (महाभारत आदिपर्व)
अब विचारणीय तथ्य है कि -
मत्स्यगंधा (सत्यवती) अप्सरा की पुत्री थीं चूँकि अप्सरा देवकन्या होती है और देवों में कोई भी वर्ण व्यवस्था नहीं होती अतः देखिये इस विषय में आद्य जगद्गुरु श्री शंकराचार्य जी अपने गीता भाष्य (अध्याय ४.१३) में कहते हैं -

मानुष एव लोके वर्णाश्रमादिकर्माधिकारः । नान्येषु लोकेष्विति नियमः किं निमित्तः ? इति । 

अथवा वर्णाश्रमादिप्रविभागोपेता मनुष्या मम वर्त्मानुवर्तन्ते सर्वश [गीता ४.११] इत्युक्तं कस्मात्पुनः कारणान्नियमेन तवैव वर्त्मानुवर्तन्ते, नान्यस्य किम् ? उच्यते!!

यानी इससे सिद्ध होता है कि देवताओं में कोई वर्ण व्यवस्था नहीं होती |
अब मनुस्मृति की आज्ञा देखिये-
पुमानपुंसोऽधिके शुक्रे स्त्रीभवत्यधिके स्त्रियाः ।
समेऽपुमान्पुंस्त्रियौ वा क्षीणेऽल्पे च विपर्ययः।। (३.४९)

अर्थात्- पुरुष के वीर्य अधिक हो तो पुत्र और स्त्री (माता) का रज अधिक हो तो कन्या होती है और दोनोँ का बराबर हो तो नपुंसक या पुत्र पुत्री दोनोँ पैदा होँ व दोनोँ का न्यून होवै तो गर्भ नहीँ रहता !

अतः कन्या मेँ मातृप्रधानता होती है और पुत्र मेँ पितृप्रधानता अर्थात् कन्या मातृअंश का प्रबल उत्कर्ष रहता है किँतु पुत्र मेँ पितृ अंश का !

इसके अनुसार मत्स्यगंधा अपनी मातृ अंशको ग्रहण करेंगी इस प्रकार वो भी देव कन्या ही हुयीं!!

अब बात आती है वेदव्यास जी की चूँकि उनकी माता देवकन्या हुयीं और उनके पिता विशुद्ध ब्राह्मण और माता देवकन्या होने के कारण वर्ण से मुक्त होंगी फिर मनुस्मृति के उसी श्लोक के अनुसार वेद व्यास जी में पितृ अंश प्रबल होगा अतः वे विशुद्ध ब्राह्मण ही होंगे!!!!

इस प्रकार महर्षि वेदव्यास विशुद्ध ब्राह्मण स्पष्ट हैं ||

||जय श्री राम ||

Tuesday, July 8, 2014

जहां भगवान शिव ने दिया भष्मासुर को वरदान


जहां भगवान शिव ने दिया भष्मासुर को वरदान




हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में समुद्रतल से करीब 18,000 फुट की ऊंचाई पर एक एक शिवलिंग स्थित है। इस शिवलिंग को श्रीखंड महादेव के नाम से जाना जाता है। श्रीखंड महादेव की यात्रा इतनी कठिन है कि शारीरिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति ही बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंच सकता है।

श्रीखंड महादेव के रास्ते में 32 किलोमीटर का सफर इतना कठिन है कि घोड़ा और खच्चर भी नहीं चल सकता। यहां श्रद्घालुओं को अपने हौसलों और भगवान शिव के नाम के सहारे ही सफर तय करना होता है। फिर भी हजारों की संख्या में श्रद्घालु जान जोखिम में डालकर श्रीखंड महादेव के 72 फीट ऊंचे शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं।

श्रीखंड महादेव के प्रति इस श्रद्घा का कारण उस कथा से जुड़ा हुआ है जिसमें भगवान शिव के प्राण भगवान विष्णु के मोहिनी रूप ने बचाया था। यहीं भगवान शिव ने भष्मासुर को यह वरदान दिया था कि जिसके सिर पर हाथ रखोगे वह भष्म हो जाएगा। भष्मासुर का अंत होने के बाद यहां श्रीखंड महादेव का वर्तमान शिवलिंग प्रकट हुआ था।



Wednesday, April 16, 2014

वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण

वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण -
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वेदों में ईश्वर उपासना दो रूपों में प्रचलित है साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है तथा केवल निराकारोपासनापरक 'न तस्य प्रतिमा अस्ति ' आदि वचनों को उद्धृत करके ही एकतरफा निर्णय करके संतुष्ट हो जाते हैं पर वे यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।

चूँकि सामान्य बौद्धिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिये अध्यात्म के सूक्ष्म तथ्यों पर ध्यानावस्थित होना कठिन होता है इसलिये मानव मनोविज्ञान के ज्ञाता ऋषियों ने प्रतीक

पूजा की मूर्ति पूजा की प्रथा चलाई ताकि उस मूर्ति को माध्यम बनाकर वह उस अनन्त को साकार रूप में अपने सामने देख सके। निराकार ब्रह्म का मानसचित्र बनाना सबके लिये संभव नहीं। यदि प्रतीकवाद या मूर्ति पूजा का आरंभ न होता। तो आज विश्व की अधिकांश जनसंख्या नास्तिक होती क्यों कि अशिक्षित और पिछड़े स्तर के जनमानस में ईश्वर के निराकार तत्व पर विश्वास ही न होता। केवल उपासना थोड़े से उच्चकोटि के विचारकों तत्ववेत्ताओं और योगियों तक ही सीमित रह जाती ओर मानव जाति का आत्मिक विकास रुक जाता धार्मिक सम्प्रदायों का निर्माण न होता और धर्म के व्यापक विस्तार के बिना समाज में घोर अनास्था और अव्यवस्था फैली होती।

देव प्रतिमा से प्रतीक से साधक को यह विश्वास हो जाता है कि जिन गुणों से सम्पन्न ईश्वर को वह पाना चाहता है, अथवा जिन गुणों को अपने में विकसित करना चाहता है वह मूर्ति उसके समक्ष उपस्थित है। ध्यान धारणा के माध्यम से वह उसे अपनी अन्तःचेतना में बिठाकर एकाकार हो जाता है। ध्यान की परिपक्वता में पहुँचने पर उसे सब ओर उसी की छाया दिखायी देती है वह अणु अणु में समाया हुआ मिलता है उसे अपने इष्ट के अतिरिक्त और कुछ दिखायी नहीं देता। यह वह अवस्था है जब प्रतीक पूजा के माध्यम से साधक का आत्मिक स्तर विकसित होने लगता है और वह सब प्राणियों में अपने प्रभु का ही दर्शन करता है और अपने में सबका उद्देश्य होता है। यहाँ आकर उसकी प्रारंभिक मूर्ति उपासना छूट जाती है और वह समस्त चलती फिरती प्रतिमाओं को अपने ईश्वर का ही रूप मानने लगता हैं। जब उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।

वस्तुतः मूर्ति पूजा ईश्वर उपासना का आरंभिक शिक्षा सत्र है। यह चित्त शुद्धि का मानसिक परिष्कार का सरल साधन है। इसमें अपने इष्टदेव का ध्यान सुविधाजनक होता है निराकार उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने गीता 12 /5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की, श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक पहुँचाती भी है। श्रद्धासिक्त भावना के उन्नयन से आत्मा का सम्बन्ध उस चैतन्य सत्ता से हो जाता है तो अणु-अणु में व्याप्त है।

इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने भी की है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “दि रिलीजंस एटीच्यूड” में मूर्धन्य मनीशी वुडवर्न ने लिखा है, कि मूर्ति का यथार्थ महत्व प्रतीकात्मक होता है और इसका प्रभाव विषेशतः ऐसे व्यक्तियों की चेतना पर पड़ता है जिन्होंने मानसिक प्रतिमाओं का प्रयोग करना नहीं सीखा है। अर्थात् जिसका मानसिक स्तर पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक नाइट ने भी अपनी कृति “सिम्बाँलिकल लैंग्वेज ऑफ एनषियेण्ट आर्ट एण्ड माइथाँलाँजी” में कहा है कि मूर्ति पूजकों का यह विश्वास था कि दैवी-सत्य, प्रतीक में छिपा रहता है, पहेली और कल्पित आख्यायिकाओं में प्रच्छन्न रहता है। यह निर्बल मानवीयता को समयानुकूल रखता है बशर्ते कि यह ज्ञान और मूल दर्शन में प्रदर्शित हो।’ इससे स्पष्ट है कि आधुनिक मनोविज्ञान भी इस मूलभूत सिद्धान्त को स्वीकार करता है कि सामान्य मानसिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिए प्रार्थना व पूजा के लिए कोई दृश्य चित्र या प्रतिमा की आवश्यकता अनिवार्य है। (-अखण्ड ज्योति Dec 1992 )

मनोवेत्ताओं का कहना है कि जड़पूजा तो मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। जल, वायु, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा को वेदों में देवता कहा है, क्योंकि वह निरन्तर अपनी शक्तियों से हमें लाभान्वित करते रहते हैं। उनके बिना हमारा जीवन असंभव है, इसलिए जड़ होते हुए भी हम उनकी पूजा, उपासना करते हैं। इन जड़ पदार्थों में स्वयमेव कोई शक्ति नहीं है। उस आद्यशक्ति के कारण ही इनमें प्राणप्रद गुणों का समावेश हो पाया है। ईश्वर निराकार है। वह स्थूल नेत्रों से दिखाई नहीं देता। उसके अनेकों दिव्य गुण हैं। वह गुणों का समुच्चय है और तदनुरूप ही उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उन शक्तियों के अनुसार आचार्यों ने उसे साकार रूप में ढाल लिया है। मूर्ति पर फूल चढ़ाते हुए यह कोई नहीं सोचता कि वह पत्थर की पूजा कर रहा है, वरन् यह भाव रहता है कि इसमें व्याप्त जो चैतन्य शक्ति है, वह ही हमारी श्रद्धा की पात्र है। प्रतिमा की उपासना करने वाला जानता है कि वह उस सर्वव्यापी ईश्वर की ही उपासना कर रहा है।

श्रद्धाशक्ति इस पवित्र भावना से उसकी आत्मा का संबंध सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता से हो जाता है। मूर्ति साधक के विश्वास को बढ़ाती है कि यही ईश्वर है। विश्वास की पूर्णता ही उसे आदि विद्युत धारा से मिला देती है। इस मिलन से साधक को जो अपार आनन्द की अनुभूति होती है, वही ईश्वर प्राप्ति की ओर बढ़ने का चिन्ह माना जाता है। सूक्ष्म तक स्थूल की सीधी पहुँच नहीं है। स्थूल को स्थूल का ही अवलम्बन लेना पड़ता है। अतः मूर्तिपूजा स्वाभाविक व प्राकृतिक है।

वेद स्वयं स्थूल उपासना का प्रतिपादन करते हैं। अग्नि उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के मन्त्रों में उल्लेख है कि “अग्नि उपासना से कल्याण होता है। अग्नि उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु अग्नि तो जड़ है। उसके माध्यम से चैतन्य की प्रसन्नता प्राप्त करने में साधक कैसे सफल हो सकता है। अग्नि स्थूल पदार्थों को सूक्ष्म बनाकर देवताओं को अर्पण करती है। मूर्तिपूजा भी साधक की पवित्र भावनाओं को उदात्त बनाकर इष्टदेव तक पहुँचाती है। इन दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं हैं। यदि अग्नि उपासना वैदिक है तो मूर्तिपूजा भी वैदिक माननी पड़ेगी। वेद स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-

“संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”

अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।”

अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है- एह्याश्मा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः ० “हे भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”

मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि | [तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ] 

हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो |

सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि | [यजुर्वेद १५.६५]

हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं |

अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत | (अथर्ववेद-20.92.5) 

हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो |

ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय| [अथर्व ० १६.२.६ ]

हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य पाषण के लिए नमस्कार है |

गणपति अथर्व शीर्षम् की फलश्रुती है-

"सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमनत्रो भवति ।।"

- सूर्यग्रहणके समय महानदीमें अथवा ***प्रतिमाके*** निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है ।

इसी प्रकार देवी अथर्वशीर्षम् की फलश्रुती है -

निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं भवति । प्र्ाणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।।

प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-

“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥

अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पसीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।

“कपिल तंत्र” में इस भाव की पुष्टि करते हुए कहा गया है-”जिस तरह गाय के सारे शरीर में उत्पन्न होने वाला दुग्ध केवल उसके स्तनों के द्वारा ही बाहर निकलता है, इसी तरह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति का अधिष्ठान मूर्ति में होता है। इस तरह से साधक यह विचार करता है कि वह उस पत्थर निर्मित मूर्ति की उपासना नहीं कर रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य दृष्टि से दिखाई देता है कि वह प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर रहा होता है।

आधुनिक विज्ञान भी इसका समर्थन करता है। साधक के भक्ति, विश्वास और पूजा की शक्ति को यदि विषम-शक्ति मानें और ईश्वर की शक्ति को सम तो निश्चय रूप से साधक की विषमशक्ति परमात्मा की समशक्ति को मूर्ति के माध्यम से आकर्षित कर लेती है। विषय और सम शक्तियों के मिलन से ही विद्युतधारा का प्रवाह दृष्टिगोचर होता है और प्रकाश की उत्पत्ति होती है। इसी तरह से साधक की अन्तःचेतना भी जगमगा उठती है।

मूर्तिपूजा-प्रतीक उपासना के पीछे एक सुदृढ़ मनोविज्ञान काम करता है। आधुनिक मनोविज्ञानी भी मूर्ति की आवश्यकता को अनुभव करते हैं और मानते हैं कि असीम ही सीमित होकर प्रदर्शित होता है। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लाइल के अनुसार वास्तविक प्रतीक में जिसे ऐसा सम्बोधन किया जाता है, सदैव स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से असीम का रहस्योद्घाटन होता है। इसमें निराकार का संयोजन साकार में होता है जिससे वह दृष्टिगत हो सके और प्राप्त हो सके। विद्वान अर्बन ने भी अपनी कृति-”लैग्वेज ऐण्ड रियलिटी” में प्रतिमा उपासना के लाभों का विवेचन करते हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है। (-अखण्ड ज्योति Dec 1992 ) इनसे ऐसे तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है जो अधिक सार्वभौम और आदर्श सम्बन्धों के लिए है, जिनकी अभिव्यक्ति विस्तार अधिक होने से और आदर्शवादिता के कारण सीधे नहीं की जा सकती। अन्यान्य मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है-भारतीय मन्दिरों में शिव, विष्णु, बुद्ध, महावीर आदि की मूर्तियाँ आदर्श को स्थूल रूप देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी है। सूक्ष्म रूप में बिना दृश्य वस्तु के, जो इनका प्रतिरूप है, कल्पना करने पर आदर्श अस्पष्ट रह जाता है। उदाहरण के लिए जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का पूजन मूर्ति रूप में इस कारण प्रचलित नहीं है कि यह मूर्तियाँ ईश्वर के रूप में है, क्योंकि जैनधर्म में ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया है। वस्तुतः वे आदर्श की प्रतीक हैं, जहाँ पहुँचना व्यक्ति का लक्ष्य होता है। स्थूल प्रतीक की यही महत्ता होती है।


आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का दृढ़ मत है कि मूर्ति पूजन की प्रथा इसलिए चली कि इनसे प्रेरणा मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास छिपा रहता है। जिस किसी अवतार, देवता या महापुरुष की साधक पूजा करता है, उसके साथ उसके जीवन की महानताएँ या तत्सम्बन्धी कथायें अवश्य जुड़ी रहती हैं। प्रतिमा के सामने आते ही वह सभी दृश्य नेत्रों के सामने तैरने लगते हैं और साधक उस महान विभूति से अपने का संबंधित करके उसकी महानताओं और विशेषताओं से अपने मन मन्दिर को जगमगाता अनुभव करता है। तादात्म्य हो जाने पर अपनी अन्तरात्मा को वह परमात्म चेतना से एकाकार कर देता है। साधक का तद्रूप बनना उसकी भावना पर निर्भर करता है। मूर्तिपूजा से जीवन निर्माण की सूक्ष्म प्रक्रिया आरंभ होती है, जो साधक को उच्च कक्षा में ले जाती है। इस तरह प्रतीक पूजा लाभप्रद ही नहीं, बुद्धि सुलभ भी हैं।

|| जय श्री राम ||

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Tuesday, April 15, 2014

वेद में शूद्रों के वेद पढ़ने का निषेध -

वेद में शूद्रों के वेद पढ़ने का निषेध -
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१ -यथेमां वाचं कल्याणीमावदानी जनेभ्यः | ब्रह्मराजन्याभ्याम शूद्रायचार्याय च स्वाय चारणाय च| यजुर्वेद (२६ -२ )


२- स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ती पावमानी द्विजानाम् | आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं पृथिव्यां द्रविणं ब्रह्मवर्चसं | मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् |(अथर्व०१९/71/१)

१- यथेमां वाचं कल्याणी० इस मन्त्र को भ्रामक रूप में प्रस्तुत कर आर्य समाजियों ने न जाने कितना उत्पात मचाया | चलो एक क्षण के लिए सनातन धर्म का जातिवादी मत मत मानो ; दयानंद के अनुसार तो जो वेद पढ़ने में असमर्थ हो उसे शूद्र (मूर्खात्वादिगुणविशिष्ट पुरुष ) कहते हैं | फिर भला वेदमन्त्र शूद्र को वेद पढ़ने का अधिकारी कैसे कहेंगे ?? कभी विचार किया ?

जन्मना जायते शूद्रः - ये कहाँ का श्लोकांश है जानते हो ?? ...मनु स्मृति ?? नही ! पुराण का है और पुराण स्पष्ट शूद्र के लिए वेद पढने का निषेध करते हैं |

२- स्तुता मया वरदा वेदमाता० इस मन्त्र में स्पष्ट द्विजों के लिए वेदवाणी की प्रवृत्ति स्पष्ट हुई है क्योंकि जो द्विज होगा वही वेद का अधिकारी होगा |

दोनों मन्त्रों में ''वाचं'' और ''वेद '' दो शब्द स्पष्ट हैं | वाचं के अंतर्गत समस्त वैदिक वाङ्मय ग्रहण किया जा सकता है | इतिहास तथा पुराण भी वाङ्मय के अंतर्गत हैं ; जिसे शूद्र भी श्रवण कर सकते हैं तो इस प्रकार वैदिक वाङ्मय के अंतर्गत शूद्र का समावेश हो जाता है किन्तु वेद शब्द के अंतर्गत ये बात नही इसलिए स्तुता मया वरदा वेदमाता० यह वेदमन्त्र केवल द्विजों के लिए वेद की प्रवृत्ति दर्शा रहा है |

अतः शूद्र को वेद पढने का अधिकार नही |

||जय श्री राम ||



प्रश्न- केवल शूद्र के लिए ही वेद का निषेध क्यों किया गया ?

उत्तर- वैदिक विज्ञान के अनुसार किसी भी जीव को उसके पूर्वजन्म के कर्मों (प्रारब्ध) के

प्रभाव से शूद्रवंश या ब्राह्मण वंश आदि में पैदा होने का भाग्य मिलता है | हम जैसा कर्म

करते हैं उसी के अनुरूप भगवान द्वारा हमारा आगामी जन्म निश्चित होता है | यही

प्रकृति का नियम है |

शूद्र्वंश का शरीर रजः प्रधान तमो गुण का विक्षेप होता है , जिसमे तमः संस्पर्श होने

से परम पवित्र अपौरुषेय तथा अलौकिक वेदध्वनि का प्रतिस्थापन नही किया जा

सकता| इसीलिये शास्त्रों में बार-बार उनके लिए वेद का निषेध हुआ है |

अतः उनके लिए हमारे परम करुणामय महान ऋषि -मुनियों ने इतिहास (रामायण/

महाभारत ) तथा पुराणों के श्रवणादि की संस्तुति की ताकि उन शूद्र शरीर वाले जीवों

का भी आत्मोद्धार हो सके |

||जय श्री राम ||

Saturday, April 5, 2014

कलियुग के लक्षण सुनिए

हे गरड जी, कलियुग के लक्षण सुनिए:
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99(ख)।।
अर्थात् शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं और कहते हैं कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? 'जो ब्रह्म को
जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है' ऐसा कहकर शूद्र ब्राह्मणों को डाँटकर आँखें दिखाते हैं.
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
अर्थात् तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्णों में नीच हैं, स्त्री के मरने
पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं. वे अपने को
ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं. ब्राह्मण अनपढ़, लोभी, कामी,
आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं. शूद्र नाना प्रकार के
जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण कहतेहैं. सब मनुष्य मनमाना
आचरण करते हैं. इस अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता.
-श्रीरामचरित मानस |
[उत्तर कांड]
धन्य है गोस्वामी जी , क्या वर्णन किया , एकदम सटीक _/\_
श्री राम जय राम जय जय राम |