Tuesday, July 8, 2014

जहां भगवान शिव ने दिया भष्मासुर को वरदान


जहां भगवान शिव ने दिया भष्मासुर को वरदान




हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र में समुद्रतल से करीब 18,000 फुट की ऊंचाई पर एक एक शिवलिंग स्थित है। इस शिवलिंग को श्रीखंड महादेव के नाम से जाना जाता है। श्रीखंड महादेव की यात्रा इतनी कठिन है कि शारीरिक तौर पर पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति ही बड़ी मुश्किल से यहां तक पहुंच सकता है।

श्रीखंड महादेव के रास्ते में 32 किलोमीटर का सफर इतना कठिन है कि घोड़ा और खच्चर भी नहीं चल सकता। यहां श्रद्घालुओं को अपने हौसलों और भगवान शिव के नाम के सहारे ही सफर तय करना होता है। फिर भी हजारों की संख्या में श्रद्घालु जान जोखिम में डालकर श्रीखंड महादेव के 72 फीट ऊंचे शिवलिंग के दर्शन करने आते हैं।

श्रीखंड महादेव के प्रति इस श्रद्घा का कारण उस कथा से जुड़ा हुआ है जिसमें भगवान शिव के प्राण भगवान विष्णु के मोहिनी रूप ने बचाया था। यहीं भगवान शिव ने भष्मासुर को यह वरदान दिया था कि जिसके सिर पर हाथ रखोगे वह भष्म हो जाएगा। भष्मासुर का अंत होने के बाद यहां श्रीखंड महादेव का वर्तमान शिवलिंग प्रकट हुआ था।



Wednesday, April 16, 2014

वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण

वेद में मूर्ति पूजा के प्रमाण -
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वेदों में ईश्वर उपासना दो रूपों में प्रचलित है साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है तथा केवल निराकारोपासनापरक 'न तस्य प्रतिमा अस्ति ' आदि वचनों को उद्धृत करके ही एकतरफा निर्णय करके संतुष्ट हो जाते हैं पर वे यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।

चूँकि सामान्य बौद्धिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिये अध्यात्म के सूक्ष्म तथ्यों पर ध्यानावस्थित होना कठिन होता है इसलिये मानव मनोविज्ञान के ज्ञाता ऋषियों ने प्रतीक

पूजा की मूर्ति पूजा की प्रथा चलाई ताकि उस मूर्ति को माध्यम बनाकर वह उस अनन्त को साकार रूप में अपने सामने देख सके। निराकार ब्रह्म का मानसचित्र बनाना सबके लिये संभव नहीं। यदि प्रतीकवाद या मूर्ति पूजा का आरंभ न होता। तो आज विश्व की अधिकांश जनसंख्या नास्तिक होती क्यों कि अशिक्षित और पिछड़े स्तर के जनमानस में ईश्वर के निराकार तत्व पर विश्वास ही न होता। केवल उपासना थोड़े से उच्चकोटि के विचारकों तत्ववेत्ताओं और योगियों तक ही सीमित रह जाती ओर मानव जाति का आत्मिक विकास रुक जाता धार्मिक सम्प्रदायों का निर्माण न होता और धर्म के व्यापक विस्तार के बिना समाज में घोर अनास्था और अव्यवस्था फैली होती।

देव प्रतिमा से प्रतीक से साधक को यह विश्वास हो जाता है कि जिन गुणों से सम्पन्न ईश्वर को वह पाना चाहता है, अथवा जिन गुणों को अपने में विकसित करना चाहता है वह मूर्ति उसके समक्ष उपस्थित है। ध्यान धारणा के माध्यम से वह उसे अपनी अन्तःचेतना में बिठाकर एकाकार हो जाता है। ध्यान की परिपक्वता में पहुँचने पर उसे सब ओर उसी की छाया दिखायी देती है वह अणु अणु में समाया हुआ मिलता है उसे अपने इष्ट के अतिरिक्त और कुछ दिखायी नहीं देता। यह वह अवस्था है जब प्रतीक पूजा के माध्यम से साधक का आत्मिक स्तर विकसित होने लगता है और वह सब प्राणियों में अपने प्रभु का ही दर्शन करता है और अपने में सबका उद्देश्य होता है। यहाँ आकर उसकी प्रारंभिक मूर्ति उपासना छूट जाती है और वह समस्त चलती फिरती प्रतिमाओं को अपने ईश्वर का ही रूप मानने लगता हैं। जब उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।

वस्तुतः मूर्ति पूजा ईश्वर उपासना का आरंभिक शिक्षा सत्र है। यह चित्त शुद्धि का मानसिक परिष्कार का सरल साधन है। इसमें अपने इष्टदेव का ध्यान सुविधाजनक होता है निराकार उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने गीता 12 /5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की, श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक पहुँचाती भी है। श्रद्धासिक्त भावना के उन्नयन से आत्मा का सम्बन्ध उस चैतन्य सत्ता से हो जाता है तो अणु-अणु में व्याप्त है।

इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने भी की है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “दि रिलीजंस एटीच्यूड” में मूर्धन्य मनीशी वुडवर्न ने लिखा है, कि मूर्ति का यथार्थ महत्व प्रतीकात्मक होता है और इसका प्रभाव विषेशतः ऐसे व्यक्तियों की चेतना पर पड़ता है जिन्होंने मानसिक प्रतिमाओं का प्रयोग करना नहीं सीखा है। अर्थात् जिसका मानसिक स्तर पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक नाइट ने भी अपनी कृति “सिम्बाँलिकल लैंग्वेज ऑफ एनषियेण्ट आर्ट एण्ड माइथाँलाँजी” में कहा है कि मूर्ति पूजकों का यह विश्वास था कि दैवी-सत्य, प्रतीक में छिपा रहता है, पहेली और कल्पित आख्यायिकाओं में प्रच्छन्न रहता है। यह निर्बल मानवीयता को समयानुकूल रखता है बशर्ते कि यह ज्ञान और मूल दर्शन में प्रदर्शित हो।’ इससे स्पष्ट है कि आधुनिक मनोविज्ञान भी इस मूलभूत सिद्धान्त को स्वीकार करता है कि सामान्य मानसिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिए प्रार्थना व पूजा के लिए कोई दृश्य चित्र या प्रतिमा की आवश्यकता अनिवार्य है। (-अखण्ड ज्योति Dec 1992 )

मनोवेत्ताओं का कहना है कि जड़पूजा तो मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। जल, वायु, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा को वेदों में देवता कहा है, क्योंकि वह निरन्तर अपनी शक्तियों से हमें लाभान्वित करते रहते हैं। उनके बिना हमारा जीवन असंभव है, इसलिए जड़ होते हुए भी हम उनकी पूजा, उपासना करते हैं। इन जड़ पदार्थों में स्वयमेव कोई शक्ति नहीं है। उस आद्यशक्ति के कारण ही इनमें प्राणप्रद गुणों का समावेश हो पाया है। ईश्वर निराकार है। वह स्थूल नेत्रों से दिखाई नहीं देता। उसके अनेकों दिव्य गुण हैं। वह गुणों का समुच्चय है और तदनुरूप ही उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उन शक्तियों के अनुसार आचार्यों ने उसे साकार रूप में ढाल लिया है। मूर्ति पर फूल चढ़ाते हुए यह कोई नहीं सोचता कि वह पत्थर की पूजा कर रहा है, वरन् यह भाव रहता है कि इसमें व्याप्त जो चैतन्य शक्ति है, वह ही हमारी श्रद्धा की पात्र है। प्रतिमा की उपासना करने वाला जानता है कि वह उस सर्वव्यापी ईश्वर की ही उपासना कर रहा है।

श्रद्धाशक्ति इस पवित्र भावना से उसकी आत्मा का संबंध सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता से हो जाता है। मूर्ति साधक के विश्वास को बढ़ाती है कि यही ईश्वर है। विश्वास की पूर्णता ही उसे आदि विद्युत धारा से मिला देती है। इस मिलन से साधक को जो अपार आनन्द की अनुभूति होती है, वही ईश्वर प्राप्ति की ओर बढ़ने का चिन्ह माना जाता है। सूक्ष्म तक स्थूल की सीधी पहुँच नहीं है। स्थूल को स्थूल का ही अवलम्बन लेना पड़ता है। अतः मूर्तिपूजा स्वाभाविक व प्राकृतिक है।

वेद स्वयं स्थूल उपासना का प्रतिपादन करते हैं। अग्नि उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के मन्त्रों में उल्लेख है कि “अग्नि उपासना से कल्याण होता है। अग्नि उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु अग्नि तो जड़ है। उसके माध्यम से चैतन्य की प्रसन्नता प्राप्त करने में साधक कैसे सफल हो सकता है। अग्नि स्थूल पदार्थों को सूक्ष्म बनाकर देवताओं को अर्पण करती है। मूर्तिपूजा भी साधक की पवित्र भावनाओं को उदात्त बनाकर इष्टदेव तक पहुँचाती है। इन दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं हैं। यदि अग्नि उपासना वैदिक है तो मूर्तिपूजा भी वैदिक माननी पड़ेगी। वेद स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-

“संवत्सरस्य प्रतिमा याँ त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”

अर्थात् “ हे रात्रे ! संवत्सर की प्रतिमा ! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।”

अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है- एह्याश्मा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः ० “हे भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”

मा असि प्रमा असि प्रतिमा असि | [तैत्तीरिय प्रपा० अनु ० ५ ] 

हे महावीर तुम इश्वर की प्रतिमा हो |

सह्स्त्रस्य प्रतिमा असि | [यजुर्वेद १५.६५]

हे परमेश्वर , आप सहस्त्रो की प्रतिमा [मूर्ति ] हैं |

अर्चत प्रार्चत प्रिय्मेधासो अर्चत | (अथर्ववेद-20.92.5) 

हे बुद्धिमान मनुष्यों उस प्रतिमा का पूजन करो,भली भांति पूजन करो |

ऋषि नाम प्रस्त्रोअसि नमो अस्तु देव्याय प्रस्तराय| [अथर्व ० १६.२.६ ]

हे प्रतिमा,, तू ऋषियों का पाषण है तुझ दिव्य पाषण के लिए नमस्कार है |

गणपति अथर्व शीर्षम् की फलश्रुती है-

"सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासन्निधौ वा जप्त्वा सिद्धमनत्रो भवति ।।"

- सूर्यग्रहणके समय महानदीमें अथवा ***प्रतिमाके*** निकट इस उपनिषद्का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है ।

इसी प्रकार देवी अथर्वशीर्षम् की फलश्रुती है -

निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनायां प्रतिमायां जप्त्वा देवतासान्निध्यं भवति । प्र्ाणप्रतिष्ठायां जप्त्वा प्राणानां प्रतिष्ठा भवति ।।

प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-

“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥

अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पसीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।

“कपिल तंत्र” में इस भाव की पुष्टि करते हुए कहा गया है-”जिस तरह गाय के सारे शरीर में उत्पन्न होने वाला दुग्ध केवल उसके स्तनों के द्वारा ही बाहर निकलता है, इसी तरह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति का अधिष्ठान मूर्ति में होता है। इस तरह से साधक यह विचार करता है कि वह उस पत्थर निर्मित मूर्ति की उपासना नहीं कर रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य दृष्टि से दिखाई देता है कि वह प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर रहा होता है।

आधुनिक विज्ञान भी इसका समर्थन करता है। साधक के भक्ति, विश्वास और पूजा की शक्ति को यदि विषम-शक्ति मानें और ईश्वर की शक्ति को सम तो निश्चय रूप से साधक की विषमशक्ति परमात्मा की समशक्ति को मूर्ति के माध्यम से आकर्षित कर लेती है। विषय और सम शक्तियों के मिलन से ही विद्युतधारा का प्रवाह दृष्टिगोचर होता है और प्रकाश की उत्पत्ति होती है। इसी तरह से साधक की अन्तःचेतना भी जगमगा उठती है।

मूर्तिपूजा-प्रतीक उपासना के पीछे एक सुदृढ़ मनोविज्ञान काम करता है। आधुनिक मनोविज्ञानी भी मूर्ति की आवश्यकता को अनुभव करते हैं और मानते हैं कि असीम ही सीमित होकर प्रदर्शित होता है। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लाइल के अनुसार वास्तविक प्रतीक में जिसे ऐसा सम्बोधन किया जाता है, सदैव स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से असीम का रहस्योद्घाटन होता है। इसमें निराकार का संयोजन साकार में होता है जिससे वह दृष्टिगत हो सके और प्राप्त हो सके। विद्वान अर्बन ने भी अपनी कृति-”लैग्वेज ऐण्ड रियलिटी” में प्रतिमा उपासना के लाभों का विवेचन करते हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है। (-अखण्ड ज्योति Dec 1992 ) इनसे ऐसे तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है जो अधिक सार्वभौम और आदर्श सम्बन्धों के लिए है, जिनकी अभिव्यक्ति विस्तार अधिक होने से और आदर्शवादिता के कारण सीधे नहीं की जा सकती। अन्यान्य मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है-भारतीय मन्दिरों में शिव, विष्णु, बुद्ध, महावीर आदि की मूर्तियाँ आदर्श को स्थूल रूप देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी है। सूक्ष्म रूप में बिना दृश्य वस्तु के, जो इनका प्रतिरूप है, कल्पना करने पर आदर्श अस्पष्ट रह जाता है। उदाहरण के लिए जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का पूजन मूर्ति रूप में इस कारण प्रचलित नहीं है कि यह मूर्तियाँ ईश्वर के रूप में है, क्योंकि जैनधर्म में ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया है। वस्तुतः वे आदर्श की प्रतीक हैं, जहाँ पहुँचना व्यक्ति का लक्ष्य होता है। स्थूल प्रतीक की यही महत्ता होती है।


आधुनिक मनोवैज्ञानिकों का दृढ़ मत है कि मूर्ति पूजन की प्रथा इसलिए चली कि इनसे प्रेरणा मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास छिपा रहता है। जिस किसी अवतार, देवता या महापुरुष की साधक पूजा करता है, उसके साथ उसके जीवन की महानताएँ या तत्सम्बन्धी कथायें अवश्य जुड़ी रहती हैं। प्रतिमा के सामने आते ही वह सभी दृश्य नेत्रों के सामने तैरने लगते हैं और साधक उस महान विभूति से अपने का संबंधित करके उसकी महानताओं और विशेषताओं से अपने मन मन्दिर को जगमगाता अनुभव करता है। तादात्म्य हो जाने पर अपनी अन्तरात्मा को वह परमात्म चेतना से एकाकार कर देता है। साधक का तद्रूप बनना उसकी भावना पर निर्भर करता है। मूर्तिपूजा से जीवन निर्माण की सूक्ष्म प्रक्रिया आरंभ होती है, जो साधक को उच्च कक्षा में ले जाती है। इस तरह प्रतीक पूजा लाभप्रद ही नहीं, बुद्धि सुलभ भी हैं।

|| जय श्री राम ||

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Tuesday, April 15, 2014

वेद में शूद्रों के वेद पढ़ने का निषेध -

वेद में शूद्रों के वेद पढ़ने का निषेध -
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१ -यथेमां वाचं कल्याणीमावदानी जनेभ्यः | ब्रह्मराजन्याभ्याम शूद्रायचार्याय च स्वाय चारणाय च| यजुर्वेद (२६ -२ )


२- स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ती पावमानी द्विजानाम् | आयुः प्राणं प्रजां पशुं कीर्तिं पृथिव्यां द्रविणं ब्रह्मवर्चसं | मह्यं दत्वा व्रजत ब्रह्मलोकम् |(अथर्व०१९/71/१)

१- यथेमां वाचं कल्याणी० इस मन्त्र को भ्रामक रूप में प्रस्तुत कर आर्य समाजियों ने न जाने कितना उत्पात मचाया | चलो एक क्षण के लिए सनातन धर्म का जातिवादी मत मत मानो ; दयानंद के अनुसार तो जो वेद पढ़ने में असमर्थ हो उसे शूद्र (मूर्खात्वादिगुणविशिष्ट पुरुष ) कहते हैं | फिर भला वेदमन्त्र शूद्र को वेद पढ़ने का अधिकारी कैसे कहेंगे ?? कभी विचार किया ?

जन्मना जायते शूद्रः - ये कहाँ का श्लोकांश है जानते हो ?? ...मनु स्मृति ?? नही ! पुराण का है और पुराण स्पष्ट शूद्र के लिए वेद पढने का निषेध करते हैं |

२- स्तुता मया वरदा वेदमाता० इस मन्त्र में स्पष्ट द्विजों के लिए वेदवाणी की प्रवृत्ति स्पष्ट हुई है क्योंकि जो द्विज होगा वही वेद का अधिकारी होगा |

दोनों मन्त्रों में ''वाचं'' और ''वेद '' दो शब्द स्पष्ट हैं | वाचं के अंतर्गत समस्त वैदिक वाङ्मय ग्रहण किया जा सकता है | इतिहास तथा पुराण भी वाङ्मय के अंतर्गत हैं ; जिसे शूद्र भी श्रवण कर सकते हैं तो इस प्रकार वैदिक वाङ्मय के अंतर्गत शूद्र का समावेश हो जाता है किन्तु वेद शब्द के अंतर्गत ये बात नही इसलिए स्तुता मया वरदा वेदमाता० यह वेदमन्त्र केवल द्विजों के लिए वेद की प्रवृत्ति दर्शा रहा है |

अतः शूद्र को वेद पढने का अधिकार नही |

||जय श्री राम ||



प्रश्न- केवल शूद्र के लिए ही वेद का निषेध क्यों किया गया ?

उत्तर- वैदिक विज्ञान के अनुसार किसी भी जीव को उसके पूर्वजन्म के कर्मों (प्रारब्ध) के

प्रभाव से शूद्रवंश या ब्राह्मण वंश आदि में पैदा होने का भाग्य मिलता है | हम जैसा कर्म

करते हैं उसी के अनुरूप भगवान द्वारा हमारा आगामी जन्म निश्चित होता है | यही

प्रकृति का नियम है |

शूद्र्वंश का शरीर रजः प्रधान तमो गुण का विक्षेप होता है , जिसमे तमः संस्पर्श होने

से परम पवित्र अपौरुषेय तथा अलौकिक वेदध्वनि का प्रतिस्थापन नही किया जा

सकता| इसीलिये शास्त्रों में बार-बार उनके लिए वेद का निषेध हुआ है |

अतः उनके लिए हमारे परम करुणामय महान ऋषि -मुनियों ने इतिहास (रामायण/

महाभारत ) तथा पुराणों के श्रवणादि की संस्तुति की ताकि उन शूद्र शरीर वाले जीवों

का भी आत्मोद्धार हो सके |

||जय श्री राम ||

Saturday, April 5, 2014

कलियुग के लक्षण सुनिए

हे गरड जी, कलियुग के लक्षण सुनिए:
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि।।99(ख)।।
अर्थात् शूद्र ब्राह्मणों से विवाद करते हैं और कहते हैं कि हम क्या तुमसे कुछ कम हैं? 'जो ब्रह्म को
जानता है वही श्रेष्ठ ब्राह्मण है' ऐसा कहकर शूद्र ब्राह्मणों को डाँटकर आँखें दिखाते हैं.
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा। स्वपच किरात कोल कलवारा।।
नारि मुई गृह संपति नासी। मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी।।
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं। उभय लोक निज हाथ नसावहिं।।
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी। निराचार सठ बृषली स्वामी।।
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना। बैठि बरासन कहहिं पुराना।
सब नर कल्पित करहिं अचारा। जाइ न बरनि अनीति अपारा।।
अर्थात् तेली, कुम्हार, चाण्डाल, भील, कोल और कलवार आदि जो वर्णों में नीच हैं, स्त्री के मरने
पर अथवा घर की संपत्ति नष्ट हो जाने पर सिर मुँड़ाकर संन्यासी हो जाते हैं. वे अपने को
ब्राह्मणों से पुजवाते हैं और अपने ही हाथों दोनों लोक नष्ट करते हैं. ब्राह्मण अनपढ़, लोभी, कामी,
आचारहीन, मूर्ख और नीची जाति की व्यभिचारिणी स्त्रियों के स्वामी होते हैं. शूद्र नाना प्रकार के
जप, तप और व्रत करते हैं तथा ऊँचे आसन पर बैठकर पुराण कहतेहैं. सब मनुष्य मनमाना
आचरण करते हैं. इस अपार अनीति का वर्णन नहीं किया जा सकता.
-श्रीरामचरित मानस |
[उत्तर कांड]
धन्य है गोस्वामी जी , क्या वर्णन किया , एकदम सटीक _/\_
श्री राम जय राम जय जय राम |

Wednesday, March 26, 2014

एकमात्र असली धर्म



हमारा सनातन हिन्दू धर्म सबसे महान है | यही वो एकमात्र असली धर्म है , जो हमेशा 

से था , हमेशा से है और हमेशा ही रहेगा ! जिसे आज तक दुनिया की कोई ताकत नहीं 

मिटा सकी , न आज ही मिटा पा रही है और न आगे ही मिटा पायेगी !!! ..........



मुझे गर्व है कि मैं ऐसे दिव्य सनातन हिन्दू धर्म का अनुयायी हूँ! 

जय हिंदुत्व !!

||जय श्री राम ||

Tuesday, March 25, 2014

वेद पुस्तक नहीं

वेद को पुस्तक का दर्जा देकर दयानंद प्रभृत कतिपय सनातन धर्म विरोधी आक्षेपकारों ने वेदों की मर्यादा एवं इनके महत्त्व को भुलाकर इनके अपार गौरव को आहत करने की कुचेष्टा की है | जिनके नव्यमतावलम्बी कतिपय छद्म उदारवादि अनुयायियों ने वैदिक संस्कृति की मर्यादाओं को तार- तार करते हुए अपनी ईर्ष्या को लोकप्रियता में परिवर्तित करने के लिए स्त्री , शूद्र , द्विजेबंधुओं के साथ -साथ वर्णसंकरों , कुलगोत्रादिपारम्पर्यत्वविहीन म्लेच्छों तक को वेद का अधिकारी घोषित करने का जो कुकृत्य किया है , उस कुकृत्य ने हमारे सनातन (हिन्दू ) धर्म की नयी पीढी के अंतःकरण में " रूढ़िवादी नियमों की जंजीरों में बंधा तथाकथित सनातन (हिन्दू ) धर्म वर्गविशेष की साजिशों का परिणाम है" ; इस आधारहीन मानसिकता को जन्म दिया है जिससे वर्णाश्रम लक्षण वाले हमारे वैदिक धर्म को अपार क्षति हुई | स्थिति ये है कि आज हमारा हिन्दू समाज वेदों के मौलिक स्वरूप एवं इसकी मर्यादाओं से काफी दूर आ चुका है और आये दिन एक नया ज्ञानलवदुर्विदग्ध हमारी प्राचीन संस्कृति की अजस्र परम्पराओं को कटघरे में खडा कर स्वय को प्रखर प्रज्ञा संपन्न , धर्मवेत्ता और पंडित मानता हुआ सनातन (हिन्दू) धर्म को धूमिल करने में ही अपने को स्वनामधन्य समझता है | ऐसी विकृत मानसिकता के विरुद्ध हम सभी विशुद्ध हिन्दुत्ववादी ऋषि-संतानों को एकजुट होकर प्रखर विरोध का शंखनाद करते हुए इनको हमारी सांस्कृतिक अस्मिता और हमारे स्वाभिमान का स्वरूप दर्शन कराते हुए इनका दिमाग ठिकाने पर लाना होगा || |

| जय श्री राम ||

शिवलिंग -रहस्य

'शिवलिंग -रहस्य ''
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प्रश्न- क्या शिवपुराण वर्णित शिवलिंग अश्लीलता है ?

उत्तर- 'सर्गश्च प्रति सर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च । वंशानुचरितं चैव पुराणं पञ्च लक्षणम् ।।

यह पुराण का लक्षण कहा गया है | अतः अपने लक्षण के अनुकूल सर्ग (सृष्टिविद्या ) के प्रसंग का

, उनके परस्पर व्यवहारों , आपसी संबंधों का वर्णन करना उचित ही है | शिव पुराण में वर्णित

भगवान शिव सृष्टि की उत्पादिका शक्ति हैं , न की कोई मनुष्य | उनके सच्चिदानन्दमय

श्रीविग्रह को मानव शरीर के अनुरूप अनुमान करना सर्वथा गलत है | अतः उनके अलौकिक

चिन्मय लिंगादि प्रभृत दिव्य अंगो की सृष्टि निर्माण में भूमिका, अचिन्त्य प्रभाव, अप्रतिम

लीला-विलासों का वर्णन अत्यंत गूढ़ सृष्टि विद्या है | जलचर, थलचर , नभचर यहां तक कि

स्थावर वृक्षादि प्रभृत भी सृष्टि का कोई भी प्राणी हो , वह लौकिक माता-पिता की भूमिका में

कामजन्य सम्भोग के माध्यम से संतानोत्पत्ति जैसे बिना तत्तद्विशिष्ट लिंग-योनि के (भले

बाहरी रूप भिन्न हो ) संभव नही , यानी जनक और संवाहक की भूमिका सर्वत्र है वैसे ही

सृष्ट्योत्पादन करते हुए प्रजा का विस्तार भी बिना दिव्य लिंग- योनि के सर्वथा असंभव है |

इसीलिये ब्रह्म संहिता कहती है-

लिंगयोन्यात्मिकाजाता इमा माहेश्वरी प्रजा |

ख़ास बात ये है कि मानव शरीर के मांस -चरम से निर्मित लिंग -योनि रूप अंगों का अन्य

शरीरांगों से स्वगतभेद होता है किन्तु सजातीय, विजातीय और स्वगत - त्रिविधभेदशून्य होने के

कारण सच्चिदानन्दमय अलौकिक लिंग साक्षात विशुद्ध परमात्मतत्व है |

<पारमार्थिकतया शिवलिंग और शिव में अंगांगिभावसम्बन्ध नहीं अपितु पूर्णतः
अद्वैत स्थिति है >

इसलिए श्री लिंगभगवान को ब्रह्ममुरारिसुरार्चित माना गया है अर्थात् ब्रह्मा

, विष्णु से लेकर सारे देवता लिंग भगवान का ध्यान करते हैं| महामूर्ख लोग शिव लिंग की तुलना

मांस-चर्म के मानवीय लिंगों की भांति करके अलौकिक परमात्मा का अपराध कर बैठते हैं |

अब थोड़ा खडी बोली में कहें तो-

भगवान का शरीर भी भगवान ही है , हाथ भी उतना ही पूर्ण भगवान ही है , नाक , कान,गला, बाल

, लिंग , गुदा , पीठ, पेट सब पूर्ण भगवान ही है, जब ऐसा आश्चर्यमय भगवत्तत्व है तभी तो

वो ""भगवान"" हैं , जिनका पार बड़े-बड़े ऋषि -मुनि, देवता यहाँ तक कि स्वयं वेद भी नहीं पा पाते

हैं | इसलिए वेद बारबार कहते हैं कि हे मनुष्यों भगवान को जानने की जिज्ञासा करो ! उनकी कृपा

पाने के लिए उनका भजन करो !तब तुम उनको किंचित समझ पाओगे !


............. शिव पुराण के सृष्टि विद्या प्रकरणों में अश्लीलता देखने वाले किसी मूर्ख आर्य

समाजी को कदाचित् सौभाग्य से कुछ पढ़ने -लिखने का मौक़ा मिल जाए तो वो बायोलॉजी

(जीव-विज्ञान ) की किताब के साथ न जाने क्या न्याय कर बठेगा ? 

धर्म की जय हो !

अधर्म का नाश हो !

जय शिव शंकर |

Thursday, February 6, 2014

वृन्दावन की प्राचीनता

वृन्दावन की प्राचीनता :- 
श्रीमद् भागवत में वृन्दावन का उल्लेख नन्दादिगोपों द्वारा श्रीकृष्ण सहित गोकुल को छोड़कर वृन्दावन गमन करने के समय आता है जहाँ कि श्रीकृष्ण द्वारा अनेकानेक अद्भुत लीलाएँ की गई थीं। श्रीकृष्ण जी के प्रपौत्र ने समस्त लीला स्थलियों को प्रतिष्ठापित किया तथा अनेक मन्दिर, कुण्ड एवं सरोवरों आदि की स्थापना की थी। सन् १५१५ ई. में श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन पधारे। इसके अतिरिक्त स्वामी हरिदासजी, श्री हित हरिवंश, श्री निम्बार्काचार्य, श्रीलोकनाथ, श्री अद्वेताचार्यपाद, श्रीमान्नित्यानन्दपाद आदि अनन्य अनेकों संत-महात्माओं ने वृन्दावन में निवास किया था। गुप्तकालीन महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंश में कुबेर के चौत्ररथ नामक उद्यान से वृन्दावन की तुलना की हैं। 

१४वीं शताब्दी में वृन्दावन की विद्यमानता का उल्लेख अनेक जैन-ग्रन्थों में भी मिलता है। इस पावन स्थली का वृन्दावन नामकरण कैसे हुआ? इस संबंध में अनेक मत हैं। 'वृन्दा' तुलसी को कहते हैं। यहाँ तुलसी के पौधे अधिक थे। इसलिए इसे वृन्दावन कहा गया। वन्दावन की अधिष्ठात्री देवी वृन्दा हैं। कहते हैं कि वृन्दा देवी का मन्दिर सेवा कुंज वाले स्थान पर था। यहाँ आज भी छोटे-छोटे सघन कुंज हैं। ब्रह्म वैवर्त पुराण के अनुसार वृन्दा राजा केदार की पुत्री थी। उसने इन वन स्थली में घोर तप किया था। अत: इस वन का नाम वृन्दावन हुआ। कालान्तर में यह वन धीरे-धीरे बस्ती के रुप में विकसित होकर आबाद हुआ। इसी पुराण में कहा गया है कि श्रीराधा के सोलह नामों में से एक नाम वृन्दा भी है। वृन्दा अर्थात् राधा अपने प्रिय श्रीकृष्ण से मिलने की आकांक्षा लिए इस वन में निवास करती है और इस स्थान के कण-कण को पावन तथा रसमय करती हैं। आदि वृन्दावन इतिहास के पृष्ठों में कुछ विद्वानों के अनुसार यह वह वृन्दावन नहीं है, जहाँ भगवान श्री कृष्ण ने अपनी दिव्य लीलाओं के द्वारा प्रेम एवं भक्ति का साम्राज्य स्थापित किया था।

 ये लोग पौराणिक वर्णन के आधार लेकर कहते हैं कि वृन्दावन के समीप गोवर्धन पर्वत की विद्यमानता बताई है जबकि वह यहाँ से पर्याप्त दूरी पर है। कुछ लोग राधाकुण्ड को तो कुछ लोग कामा को वृन्दावन सिद्ध करते हैं। उस काल में यमुना वहीं होकर बहती थी। धीरे-धीरे यमुना का प्रवाह बदलता रहा। प्राचीन वृन्दावन के लुप्त प्राय: हो जाने से नवीन स्थल पर वृन्दावन बसाया गया। वृन्दावन कहीं भी रहा हो यह बात खोजी तथा तार्किकों के लिए छोड़ देना चाहिए। इन बातों से वृन्दावन की महिमा में कोई कमी नहीं आती। पंद्रहवीं-सोलहवी शताब्दी में मदन-मोहनजी, गोविन्द देवजी, गोपीनाथजी, राधाबल्लभजी आदि मन्दिरों का निर्माण हो चुका था। औरंगजेब के शासन के समय जब वृन्दावन ही नहीं, ब्रज मण्डल के अनेक मन्दिरों को नष्ट किया जा रहा था तब वृन्दावन के अनेक श्रीविग्रहों के जयपुर आदि अन्यान्य स्थानों को भेज दिया गया था। वृन्दावन का नाम मोमिनाबाद रखने का प्रयत्न किया जो प्रचलित नहीं हो सका और सरकारी कागजातों तक ही सीमित रहा। सन् १७१८ ई. से सन् १८०३ ई. तक तो ब्रजमण्डल में जाट राजाओं का आधिपत्य रहा, लेकिन सन् १७५७ ई. में अहमदशाह ने ब्रज मण्डल के मथुरा, महावन आदि तीर्थ स्थलों के साथ वृन्दावन में भी लूटपाट की थीं। सन् १८०१ ई. के अन्तिम काल में ब्रज मण्डल के अनेक क्षेत्रों पर पुन: जाट राजाओं का फिर से हुकूमत हो गई। उसके बाद ही वृन्दावन को पुन: प्रतिष्ठित होने का अवसर मिला। 

यह स्थान देश कि राजधानी दिल्ली से लगभग १५० कि.मी. कि दूरी पर स्थित है और सभी मुख्य जगहों से रेल गाड़ियाँ मथुरा आती है जहाँ से वृन्दावन लगभग १४ कि.मी है. यमुना नदी इस पवन स्थान को अपने कृष्ण वर्ण के जल से और अधिक पवन और मनोहर बना देती है.जैसी शांति इस पावन धाम में आकर प्राप्त होती है वैसी कदाचित ही और कहीं प्राप्त होती हो. यहाँ अनेको मंदिर और घाट हैं जो आज भी श्री राधा-कृष्ण की दिव्य लीलाओं का स्मरण करा रहें हैं.यहाँ का मुख्य दर्शनीय मंदिर है श्री बांके बिहारी मंदिर,जो यहाँ की संकरी तथा मन को आनंद प्रदान करने वाली छोटी छोटी गलियों में स्तिथ है.यहाँ एक अद्भुत रीत है की ,श्री विग्रह के दर्शन नित्य नहीं होते, समय समय पर भगवन के आगे पर्दा होता रहता है ,यहाँ भक्तो मैं जाती पाती का कोई भी बंधन नहीं है,हो भी कैसे यह भूमि तो बस भगवन के प्रेमियों के लिए ही है फिर चाहे वे कोई भी क्यूँ न हो? यहाँ अनेको मनोहर मंदिर हैं जिनमे श्री राधा-वल्लभ मंदिर, श्री युगल-किशोर मंदिर, श्री रंग जी मंदिर जो कि दक्षिणी भारत कि कला का एक अनोखा नमूना है तथा इस्क्कोन मंदिर जहाँ अनेको विदेशी भी कृष्ण कीर्तन में झूमते हैं विशेष दर्शनीय हैं. 

और भी अनेको मंदिर श्री वृन्दावन धाम में स्थित हैं. यहाँ १२ मुख्य वन हैं जिनमे निधिवन और सेवाकुंज अति मनोहर हैं और शांतिप्रदायक हैं.इन वनों में मनो आज भी श्री कृष्ण अपनी मनोहर वंशी बजाकर सबको आकर्षित कर रहें हैं. घाटों में तो यहाँ एक अद्भुत और आश्चर्यजनक सौंदर्य है जिसे बखान पाना शायद संभव ही नहीं है.सूर्य देव जब संध्या में अस्ताचल को प्रस्थान कर रहे होते है तब उनकी किरणों के स्पर्श से यमुना का जल पिघला सोना लगता है.केशिघट और कालियाघट श्री कृष्ण की उन लीलाओं का स्मरण कराती है जब उन्होंने केशी दैत्य और कालिया नाग का दमन करके संसार को सुखी किया. 

यहाँ गोपियों की सची भक्ति और विशुद्ध प्रेम दर्शाता है राधावन जहाँ श्री राधा आदि गोपियाँ श्री कृष्ण का श्रृंगार आदि करा करती थी. अनेको संतों ने यहाँ दर्शन किये तथा यहाँ का वातावरण पूर्ण कृष्णमय ही बना दिया.श्री चैतन्य महाप्रभु ,मीराबाई,वल्लभाचार्य,स्वामी हरिदास,सूरदास,तुलसीदास आदि अनेको महा संतों ने यहाँ श्री कृष्ण के साक्षात् दर्शन पाए. || हरे कृष्ण ||

Monday, February 3, 2014

भारत की गीर गाय





भारत की गीर गाय के नाम 65 लिटर दूध देने का रिकार्ड है.

भारत में 18 करोड़ गाय है जिनमे 13 करोड़ गाये बच्चा देने लायक है और इनमे से करीब 70 % देशी नस्ल की गाये कम दुध् देने वाली नस्ल है. जिनको उन्नत नस्ल बनाने के लिए दूध की खान "गीर" गायो के सांडों से "क्रास" कराना चाहिए और लोग कर भी रहे हैं परन्तु गीर नस्ल के सांडों की बेहद कमी हो गयी है जिसके लिए हमारी मुर्खता जिम्मेदार है. हम गायो की फिकर करते हैं लेकिन सांडों के बारे में सोचते ही नहीं....एडवांस हो चुके हैं..नंदी की कदर क्या जाने..

उधर सिर्फ 5000 के करीब गीर गाय पुरे भारत में बची है जो शुद्ध है परन्तु इनके सांडो की संख्या 300 से भी कम है क्योकि हम एडवांस हो चुके हैं, हमें सिर्फ गाय का थन ही दिखता है.

अब आप सोचिये.....13 करोड़ गायो को यदि हम गीर नस्ल से ज्यादा दूध देने वाली और बीमार न होने वाली दुमरेजी गाय बनाना भी चाहे तो 13 करोड़ गाय और 300 सांड यानी एक सांड के पीछे (13,00,00,000/300 = 4,33,333 गाये ) 4 लाख से ज्यादा गाये आयेंगे जो असंभव है. यह आंकडा थोड़ा सा कम ज्यादा हो सकता है लेकिन गलत नहीं है. सांडो की इतनी कमी के पीछे बहुत सारी साजिस भी है.

थोड़ा सा पैसा कमाने के चक्कर में खुद कुछ हिन्दू भी छुट्टा सांडो को चोरी चोरी क़त्ल खानों को बेच रहे हैं. यदि हर १० गाव में एक गीर छुट्टा सांड पाल दिया जाये तो भारत में दूध की नदी फिर से बहेगी.

Saturday, January 4, 2014

33 करोड नहीँ 33 कोटि देवी देवता हैँ

33 करोड नहीँ 33 कोटि देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ। कोटि = प्रकार। देवभाषा संस्कृत में कोटि के दो अर्थ होते है, कोटि का मतलब प्रकार होता है और एक अर्थ करोड़ भी होता। हिन्दू धर्म का दुष्प्रचार करने के लिए ये बात उडाई गयी की हिन्दुओ के 33 करोड़ देवी देवता हैं और अब तो भेड़चाली मुर्ख हिन्दू खुद ही गाते फिरते हैं की हमारे 33 करोड़ देवी देवता हैं........

कुल 33 प्रकार के देवी देवता हैँ हिँदू धर्म मेँ:

12 प्रकार हैँ आदित्य: , धाता, मित, आर्यमा, शक्रा, वरुण, अँश, भाग, विवास्वान, पूष, सविता, तवास्था, और विष्णु...!

8 प्रकार हैँ - वासु:, धर, ध्रुव, सोम, अह, अनिल, अनल, प्रत्युष और प्रभाष।

11 प्रकार हैँ- रुद्र: ,हर, बहुरुप,त्रयँबक, अपराजिता, बृषाकापि, शँभू, कपार्दी, रेवात, मृगव्याध, शर्वा, और कपाली।

एवँ

दो प्रकार हैँ अश्विनी और कुमार।

कुल: 12+8+11+2=33

Tuesday, December 24, 2013

हनुमान जी ने धरा पंचमुखी रूप

जब हनुमान जी ने धरा पंचमुखी रूप और बचाया श्रीराम-लक्ष्मण को.....

श्रीराम-रावण युद्ध के मध्य एक समय ऐसा आया जब रावण को अपनी सहायता के लिए अपने भाई अहिरावण का स्मरण करना पड़ा। वह तंत्र-मंत्र का प्रकांड पंडित एवं मां भवानी का अनन्य भक्त था। अपने भाई रावण के संकट को दूर करने का उसने एक सहज उपाय निकाल लिया। यदि श्रीराम एवं लक्ष्मण का ही अपहरण कर लिया जाए तो युद्ध तो स्वत: ही समाप्त हो जाएगा। उसने ऐसी माया रची कि सारी सेना प्रगाढ़ निद्रा में निमग्न हो गयी और वह श्री राम और लक्ष्मण का अपहरण करके उन्हें निद्रावस्था में ही पाताल-लोक ले गया।

जागने पर जब इस संकट का भान हुआ और विभीषण ने यह रहस्य खोला कि ऐसा दु:साहस केवल अहिरावण ही कर सकता है तो सदा की भांति सबकी आंखें संकट मोचन हनुमानजी पर ही जा टिकीं। हनुमान जी तत्काल पाताल लोक पहुंचे। द्वार पर रक्षक के रूप में मकरध्वज से युद्ध कर और उसे हराकर जब वह पातालपुरी के महल में पहुंचे तो श्रीराम एवं लक्ष्मण जी को बंधक-अवस्था में पाया।

वहां भिन्न-भिन्न दिशाओं में पांच दीपक जल रहे थे और मां भवानी के सम्मुख श्रीराम एवं लक्ष्मण की बलि देने की पूरी तैयारी थी। अहिरावण का अंत करना है तो इन पांच दीपकों को एक साथ एक ही समय में बुझाना होगा। यह रहस्य ज्ञात होते ही हनुमान जी ने पंचमुखी हनुमान का रूप धारण किया। उत्तर दिशा में वराह मुख, दक्षिण दिशा में नरसिम्ह मुख, पश्चिम में गरुड़ मुख, आकाश की ओर हयग्रीव मुख एवं पूर्व दिशा में हनुमान मुख। इन पांच मुखों को धारण कर उन्होंने एक साथ सारे दीपकों को बुझाकर अहिरावण का अंत किया और श्रीराम-लक्ष्मण को मुक्त किया।

सागर पार करते समय एक मछली ने उनके स्वेद की एक बूंद ग्रहण कर लेने से गर्भ धारण कर मकरध्वज को जन्म दिया था अत: मकरध्वज हनुमान जी का पुत्र है, ऐसा जानकर श्रीराम ने मकरध्वज को पातालपुरी का राज्य सौंपने का हनुमान जी को आदेश दिया। हनुमान जी ने उनकी आज्ञा का पालन किया और वापस उन दोनों को लेकर सागर तट पर युद्धस्थल पर लौट आये

श्रीमद भागवत पुराण में सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity)

श्रीमद भागवत पुराण में सापेक्षता का सिद्धांत (Theory of Relativity) आइंस्टीन से हजारों वर्ष पूर्व ही लिख दिया गया था

आइंस्टीन के सापेक्षता के सिद्धांत को तो हम सभी जानते है । आइंस्टीन ने अपने सिद्धांत में दिक् व काल की सापेक्षता प्रतिपादित की। उसने कहा, विभिन्न ग्रहों पर समय की अवधारणा भिन्न-भिन्न होती है। काल का सम्बन्ध ग्रहों की गति से रहता है। इस प्रकार अलग-अलग ग्रहों पर समय का माप भिन्न रहता है। समय छोटा-बड़ा रहता है।

उदाहरण के लिए यदि दो जुडुवां भाइयों मे से एक को पृथ्वी पर ही रखा जाये तथा दुसरे को किसी अन्य गृह पर भेज दिया जाये और कुछ वर्षों पश्चात लाया जाये तो दोनों भाइयों की आयु में अंतर होगा।

आयु का अंतर इस बात पर निर्भर करेगा कि बालक को जिस गृह पर भेजा गया उस गृह की सूर्य से दुरी तथा गति , पृथ्वी की सूर्य से दुरी तथा गति से कितनी अधिक अथवा कम है ।

एक और उदाहरण के अनुसार चलती रेलगाड़ी में रखी घडी उसी रेल में बैठे व्यक्ति के लिए सामान रूप से चलती है क्योकि दोनों रेल के साथ एक ही गति से गतिमान है परन्तु वही घडी रेल से बाहर खड़े व्यक्ति के लिए धीमे चल रही होगी । कुछ सेकंडों को अंतर होगा । यदि रेल की गति और बढाई जाये तो समय का अंतर बढेगा और यदि रेल को प्रकाश की गति (299792.458 किमी प्रति सेकंड) से दोड़ाया जाये (जोकि संभव नही) तो रेल से बाहर खड़े व्यक्ति के लिए घडी पूर्णतया रुक जाएगी ।

इसकी जानकारी के संकेत हमारे ग्रंथों में मिलते हैं।

श्रीमद भागवत पुराण में कथा आती है कि रैवतक राजा की पुत्री रेवती बहुत लम्बी थी, अत: उसके अनुकूल वर नहीं मिलता था। इसके समाधान हेतु राजा योग बल से अपनी पुत्री को लेकर ब्राहृलोक गये। वे जब वहां पहुंचे तब वहां गंधर्वगान चल रहा था। अत: वे कुछ क्षण रुके।

जब गान पूरा हुआ तो ब्रह्मा ने राजा को देखा और पूछा कैसे आना हुआ? राजा ने कहा मेरी पुत्री के लिए किसी वर को आपने पैदा किया है या नहीं?

ब्रह्मा जोर से हंसे और कहा,- जितनी देर तुमने यहां गान सुना, उतने समय में पृथ्वी पर 27 चर्तुयुगी {1 चर्तुयुगी = 4 युग (सत्य,द्वापर,त्रेता,कलि ) = 1 महायुग } बीत चुकी हैं और 28 वां द्वापर समाप्त होने वाला है। तुम वहां जाओ और कृष्ण के भाई बलराम से इसका विवाह कर देना।
अब पृथ्वी लोक पर तुम्हे तुम्हारे सगे सम्बन्धी, तुम्हारा राजपाट तथा वैसी भोगोलिक स्थतियां भी नही मिलेंगी जो तुम छोड़ कर आये हो |

साथ ही उन्होंने कहा कि यह अच्छा हुआ कि रेवती को तुम अपने साथ लेकर आये। इस कारण इसकी आयु नहीं बढ़ी। अन्यथा लौटने के पश्चात तुम इसे भी जीवित नही पाते |

अब यदि एक घड़ी भी देर कि तो सीधे कलयुग (द्वापर के पश्चात कलयुग ) में जा गिरोगे |

इससे यह भी स्पष्ट है की निश्चय ही ब्रह्मलोक कदाचित हमारी आकाशगंगा से भी कहीं अधिक दूर है

यह कथा पृथ्वी से ब्राहृलोक तक विशिष्ट गति से जाने पर समय के अंतर को बताती है। आधुनिक वैज्ञानिकों ने भी कहा कि यदि एक व्यक्ति प्रकाश की गति से कुछ कम गति से चलने वाले यान में बैठकर जाए तो उसके शरीर के अंदर परिवर्तन की प्रक्रिया प्राय: स्तब्ध हो जायेगी।

यदि एक दस वर्ष का व्यक्ति ऐसे यान में बैठकर देवयानी आकाशगंगा (Andromeida Galaz) की ओर जाकर वापस आये तो उसकी उमर में केवल 56 वर्ष बढ़ेंगे किन्तु उस अवधि में पृथ्वी पर 40 लाख वर्ष बीत गये होंगे।

काल के मापन की सूक्ष्मतम और महत्तम इकाई के वर्णन को पढ़कर दुनिया का प्रसिद्ध ब्राह्माण्ड विज्ञानी Carl Sagan अपनी पुस्तक Cosmos में लिखता है, -

"विश्व में एक मात्र हिन्दू धर्म ही ऐसा धर्म है, जो इस विश्वास को समर्पित है कि ब्राह्माण्ड सृजन और विनाश का चक्र सतत चल रहा है। तथा यही एक धर्म है जिसमें काल के सूक्ष्मतम नाप परमाणु से लेकर दीर्घतम माप ब्राह्म दिन और रात की गणना की गई, जो 8 अरब 64 करोड़ वर्ष तक बैठती है तथा जो आश्चर्यजनक रूप से हमारी आधुनिक गणनाओं से मेल खाती है।"


सांप-सीढ़ी का खेल भरत में 'मोक्ष पातं'




सांप-सीढ़ी का खेल भरत में 'मोक्ष पातं' के नाम से बच्चों को धर्म सिखाने के लिए खेलाया जाता था।
जहां सीढ़ी मोक्ष का रास्ता है और सांप पाप का रास्ता है।

इस खेल की अवधारणा 13वीं सदी में कवि संत 'ज्ञानदेव' ने दी थी।

मौलिक खेल में जिन खानों में सीढ़ी मिलती थी वो थे- 12वां खाना आस्था का था, 51वां खाना विश्वास का, 57वां खाना उदारता का, 76वां ज्ञान का और 78वां खाना वैराग्य का था। और जीन खानों में सांप मिलते थे वो इस प्रकार थे- 41 वां खाना अवमानना का, 44 वां खाना अहंकार का, 49 वां खाना अश्लीलता का, 52 वां खाना चोरी का, 58 वां खाना झूठ का, 62 वां खाना शराब पीने का, 69 वां खाना उधर लेने का, 73 वां खाना हत्या का , 84 वां खाना क्रोध का, 92 वां खाना लालच का, 95 वां खाना घमंड का ,99 वां खाना वासना का हुआ करता था। 100वें खाने में पहुचने पे मोक्ष मिल जाता था।

1892 में ये खेल अंग्रेज इंग्लैंड ले गए और सांप-सीढ़ी नाम से प्रचलित किया।

वैदिक वाङ्मय

तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत।।
यजुर्वेद 31.7

परमात्मा ने सृष्टि की रचना की। उसके संविधान के लिए चार वेदों का प्रकाश किया। अग्नि ऋषि के हृदय में ऋग्वेद, वायु ऋषि के हृदय में यजुर्वेद, आदित्य ऋषि के हृदय में सामवेद और अङि्गरा ऋषि के हृदय में अथर्ववेद ज्ञान दिया। इन चारों ऋषियों से ब्रह्मा ने वेदों का ज्ञान प्राप्त किया। ब्रह्मा से इन्द्र ने और इन्द्र से भरद्वाज ने वेद विद्या ग्रहण की। भरद्वाज से वेद विद्या तपोमूर्ति ब्राह्मणों को मिली। ब्राह्मणों ने जग के कल्याण के लिए सामान्य लोगों में वेद विद्या का प्रचार किया।

वैदिक वाङ्मय को चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है- संहिता, ब्राहमण, आरण्यक और उपनिषद्। तद्यथा- मन्त्रब्राह्मणयोर्वेदनामधेयम्। यहाँ पर ब्राह्मण से ब्राहमण सहित आरण्यक और उपनिषद् भी गृहित है।

आचार्य सायण ने वेद से अभिप्राय निकाला है-इष्टप्राप्त्यनिष्टपरिहारयोरलौकिकमुपायं यो ग्रन्थो वेदयति स वेदः।
अर्थात् इष्ट की प्राप्ति और अनिष्ट के परिहार का अलौकिक उपाय बताने वाला ग्रन्थ वेद है।

ऋषि दयानन्द के अनुसार-विदन्ति जानन्ति,विद्यन्ते भवन्ति, विन्दन्ति विन्दन्ते लभन्ते, विन्दते विचारयन्ति सर्वे मनुष्याः सर्वाः सत्यविद्या यैर्येषु वा तथा विद्वांसश्च भवन्ति ते वेदाः। तथ आदिसृष्टिमारभ्याद्यापर्यन्तं ब्रह्मादिभिः सर्वाः सत्यविद्याः श्रूयन्ते अनया सा श्रुतिः।
अर्थात् जिनके पढने से यथार्थ विद्या का विज्ञान होता है, जिनको पढ के विद्वान् होते है, जिनसे सब सुखों का लाभ होता है और जिनसे ठीक-2 सत्य-असत्य का विचार मनुष्यों को होता है, इससे ऋक् संहितादि का नाम वेद है।
वैसे ही सृष्टि के आरम्भ से आज पर्यन्त और ब्रह्मादि से लेकर हम लोग पर्यन्त जिससे सब सत्यविद्याओं को सुनते आते हैं इससे वेदों का श्रुति नाम पडा है।

ऐसा माना जाता है कि वेदों में सभी प्रकार का ज्ञान-विज्ञान है-सर्वज्ञानमयो हि सः- मनु।

जो वेद की निन्दा करता है उसे नास्तिक कहा जाता है- नास्तिको वेदनिन्दकः- मनुः।

वेदों का रचनाकालः--
मैक्समूलर ने ईसा से 800-600 वर्ष पूर्व माना है।
ऋषि दयानन्द ने वेदों की उत्पत्ति सृष्टि के आदि में माना है। तदनुसार 1,97,29,49,113 वर्ष हुए हैं।

ह्विटनी और केगी के अनुसार वेदों का समय 2000-1500 ई.पू. है।

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के अनुसार 4000-2500 ई.पू. है।

प्रो. जैकोबी के अनुसार 4500-2500 ई.पू. है।

दीनानाथ शास्त्री के अनुसार आज से लगभग तीन लाख वर्ष पूर्व है।


<<<<<<<<<<<<<<<<<वैदिक-वाङ्मय>>>>>>>>>>>>>>>>>>


*******वेद******
ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद।

*****उपवेद******
आयुर्वेद, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद और अर्थवेद।

******शाखाः*****

1. ऋग्वेदः---
ऋग्वेद की इक्कीस शाखाएँ हैं- एकविंशतिधा बाह्वृच्यम्। इनमें से उपलब्ध पाँच शाखाएँ---शाकल, बाष्कल, आश्वलायन, शांखायन और माण्डूकायन।

2. यजुर्वेदः---
यजुर्वेद की एक सौ एक शाखाएँ हैं-एकशतमध्वर्युशाखाः। इनमें छः शाखाएँ उपलब्ध हैं।
शुक्ल-.यजुर्वेदः---वाजसनेयी या माध्यन्दिनि और काण्व।
कृष्ण-यजुर्वेदः----तैत्तिरीय,मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठल।

3. सामवेदः----
सामवेद की एक हजार शाखाएँ हैं-सहस्रवर्त्मा सामवेदः। कुछ प्रमुख शाखाएँ--- असुरायणीय, वासुरायणीय, वार्तान्तरेय, प्राञ्जल, राणायनीय, शाट्यायनीय, सात्यमुद्गल, खल्वल, महाखल्वल, लाङ्गल, कौथुम, गौतम और जैमिनीय। उपलब्ध शाखाएँ-- कौथुमीय, राणायनीय और जैमिनीय।

4. अथर्ववेदः---
अथर्ववेद की नौ शाखाएँ हैं-नवधाथर्वणो वेदः--- पैप्लाद, शौनक, मौद, स्तौद, जाजल, जलद, ब्रह्मवेद, देवदर्श और चारणवैद्य। उपलब्ध शाखाएँ-- पैप्लाद और शौनक।

********ब्राह्मण*********

1.ऋग्वेदः----
ऐतरेय और शाङ्खायन।

2.यजुर्वेदः-----
शुक्ल-यजुर्वेदः--शतपथ।
कृष्ण-यजुर्वेदः--तैत्तिरीय, मैत्रायणी, कठ और कपिष्ठल।

3.सामवेदः---
प्रौढ, षड्विंश, सामविधान, आर्षेय, देवताध्याय, उपनिष्द, संहितोपनिषद्, वंश और जैमिनीय।

4.अथर्ववेदः---
गोपथ।


*********आरण्यक********

1.ऋग्वेदः---
ऐतरेय और शाङ्खायन।

2.यजुर्वेदः----
शुक्ल-यजुर्वेदः--बृहदारण्यक।
कृष्ण-यजुर्वेदः--तैत्तिरीय और मैत्रायणी।

3.सामवेदः---
छान्दोग्य।

***********उपनिषद्**********

प्रमुख उपनिषद् ग्यारह हैं---ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, ऐतरेय, तैत्तिरीय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर।

1.ऋग्वेदः----
ऐतरेय।

2.यजुर्वेदः----
शुक्ल-यजुर्वेदः--ईश और बृहदारण्यक।
कृष्ण-यजुर्वेदः--कठ, तैत्तिरीय और श्वेताश्वतर।

3.सामवेदः----
केन और छान्दोग्य।

4.अथर्ववेदः-----
प्रश्न, मुण्डक और माण्डूक्य।


**************वेदाङ्ग************

कुल वेदाङ्ग छः हैं--- शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष्।

1.शिक्षा----
पाणिनीया
ऋक्लक्षण
याज्ञवल्क्य
वाशिष्ठी
माण्डव्य
भरद्वाज
अवसान निर्णय
नारदीय
माण्डूकी
शौनकीया प्रातिशाख्या
अथर्ववेद प्रा.
पुष्यसूत्र प्रा.
वाजसनेयी प्रा.
तैत्तिरीय प्रा.
माध्यन्दिनि शिक्षा।


2.कल्पः----

कल्प चार हैं--- श्रौत-सूत्र, गृह्य-सूत्र, धर्म-सूत्र और शुल्ब-सूत्र।

(क)श्रौत-सूत्रः----
आशवलायन
कौषीतकि
कात्यायन
बोधायन
आपस्तम्ब
भारद्वाज
कठ
जैमिनीय
खादिर
द्राह्यायण
लाट्यायन
वाधूल
वैतान।

(ख)गृह्य-सूत्रः---
आश्वलायन
शाङ्खायन
शाम्बव्य
कात्यायन
कठ
आपस्तम्ब
बोधायन
वैखानस
भारद्वाज
वाधूल
जैमिनीय
गोभिल
गौतम
कौशिक।

(ग)धर्म-सूत्रः----
वशिष्ठ
हारीत
शङ्ख
विष्णु
आपस्तम्ब
बोधायन
हिरण्यकेशी
वैखानस
गौतम।

(घ)शुल्ब-सूत्रः-----
कात्यायन
मानव
बोधायन
आपस्तम्ब
मैत्रायणी
वाराह
वाधूल।


3.व्याकरणम्----

इन्द्र
चन्द्र
काशकृत्स्न
आपिशलि
पाणिनि
अमर
जैनेन्द्र।

4.निरुक्तम्----

आचार्य यास्क


5.छन्दः------

छन्दःसूत्रः--आचार्य पिङ्गल


6.ज्योतिष्------

आर्च ज्योतिष्
याजुष् ज्योतिष्।


******************उपाङ्ग********************

इन्हें शास्त्र और दर्शन भी कहा जाता है। ये कुल छः हैं---
1.न्याय--गोतम

2.वैशेषिक--कणाद

3.साङ्ख्य--कपिल

4.योग--पतञ्जलि

5.पूर्व-मीमांसा--जैमिनि

6.उत्तर-मीमांसा(ब्रह्मसूत्र)--व्यास।

Saturday, December 21, 2013

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?
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गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं। इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है। गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है। गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है। गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला, उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है। चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है। गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है। यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है। अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के कारण पंचगव्य चिकित्सा में उपयोगी साबित हो रहा है।

Friday, December 13, 2013

गौ- घृत से अद्भुत लाभ

गौ- घृत से अद्भुत लाभ-

हम अगर गोरस का बखान करते करते मर जाए तो भी कुछ अंग्रेजी सभ्यता वाले हमारी बात नहीं मानेगे क्योकि वे लोग तो हम लोगो को पिछड़ा, साम्प्रदायिक और गँवार जो समझते है|

उनके लिए तो वही सही है जो पश्चिम कहे तो हम उन्ही के वैज्ञानिक शिरोविच की गोरस पर खोज लाये हैं जो रुसी वैज्ञानिक है|

गाय का घी और चावल की आहुती डालने से महत्वपूर्ण गैसे जैसे – एथिलीन ऑक्साइड,प्रोपिलीन ऑक्साइड,फॉर्मल्डीहाइड आदि उत्पन्न होती हैं । इथिलीन ऑक्साइड गैस आजकल सबसे अधिक प्रयुक्त होनेवाली जीवाणुरोधक गैस है,जो शल्य-चिकित्सा (ऑपरेशन थियेटर) से लेकर जीवनरक्षक औषधियाँ बनाने तक में उपयोगी हैं । वैज्ञानिक प्रोपिलीन ऑक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षो का आधार मानते है ।

आयुर्वेद विशेषज्ञो के अनुसार अनिद्रा का रोगी शाम को दोनों नथुनो में गाय के घी की दो – दो बूंद डाले और रात को नाभि और पैर के तलुओ में गौघृत लगाकर लेट जाय तो उसे प्रगाढ़ निद्रा आ जायेगी ।

गौघृत में मानव शरीर में पहुंचे रेडियोधर्मी विकिरणों का दुष्प्रभाव नष्ट करने की असीम क्षमता हैं । अग्नि में गाय का घी कि आहुति देने से उसका धुआँ जहाँ तक फैलता है,वहाँ तक का सारा वातावरण प्रदूषण और आण्विक विकरणों से मुक्त हो जाता हैं ।

सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह है कि एक चम्मच गौघृत को अग्नि में डालने से एक टन प्राणवायु (ऑक्सीजन) बनती हैं जो अन्य किसी भी उपाय से संभव नहीं हैं |

देसी गाय के घी को रसायन कहा गया है। जो जवानी को कायम रखते हुए, बुढ़ापे को दूर रखता है। काली गाय का घी खाने से बूढ़ा व्यक्ति भी जवान जैसा हो जाता है।गाय के घी में स्वर्ण छार पाए जाते हैं जिसमे अदभुत औषधीय गुण होते है, जो की गाय के घी के इलावा अन्य घी में नहीं मिलते । गाय के घी से बेहतर कोई दूसरी चीज नहीं है।

गाय के घी में वैक्सीन एसिड, ब्यूट्रिक एसिड, बीटा-कैरोटीन जैसे माइक्रोन्यूट्रींस मौजूद होते हैं। जिस के सेवन करने से कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से बचा जा सकता है। गाय के घी से उत्पन्न शरीर के माइक्रोन्यूट्रींस में कैंसर युक्त तत्वों से लड़ने की क्षमता होती है।

यदि आप गाय के 10 ग्राम घी से हवन अनुष्ठान (यज्ञ,) करते हैं तो इसके परिणाम स्वरूप वातावरण में लगभग 1 टन ताजा ऑक्सीजन का उत्पादन कर सकते हैं। यही कारण है कि मंदिरों में गाय के घी का दीपक जलाने कि तथा , धार्मिक समारोह में यज्ञ करने कि प्रथा प्रचलित है। इससे वातावरण में फैले परमाणु विकिरणों को हटाने की अदभुत क्षमता होती है।

गोघृत के अन्य महत्वपूर्ण उपयोग :–

1.गाय का घी नाक में डालने से पागलपन दूर होता है।
2.गाय का घी नाक में डालने से एलर्जी खत्म हो जाती है।
3.गाय का घी नाक में डालने से लकवा का रोग में भी उपचार होता है।
4--20-25 ग्राम घी व मिश्री खिलाने से शराब, भांग व गांझे का नशा कम हो जाता है।
5.गाय का घी नाक में डालने से कान का पर्दा बिना ओपरेशन के ही ठीक हो जाता है।
6.नाक में घी डालने से नाक की खुश्की दूर होती है और दिमाग तारो ताजा हो जाता है।
7.गाय का घी नाक में डालने से कोमा से बहार निकल कर चेतना वापस लोट आती है।
8.गाय का घी नाक में डालने से बाल झडना समाप्त होकर नए बाल भी आने लगते है।
9.गाय के घी को नाक में डालने से मानसिक शांति मिलती है, याददाश्त तेज होती है।
10.हाथ पाव मे जलन होने पर गाय के घी को तलवो में मालिश करें जलन ढीक होता है।
11.हिचकी के न रुकने पर खाली गाय का आधा चम्मच घी खाए, हिचकी स्वयं रुक जाएगी।
12.गाय के घी का नियमित सेवन करने से एसिडिटी व कब्ज की शिकायत कम हो जाती है।
13.गाय के घी से बल और वीर्य बढ़ता है और शारीरिक व मानसिक ताकत में भी इजाफा होता है
14.गाय के पुराने घी से बच्चों को छाती और पीठ पर मालिश करने से कफ की शिकायत दूर हो जाती है।
15.अगर अधिक कमजोरी लगे, तो एक गिलास दूध में एक चम्मच गाय का घी और मिश्री डालकर पी लें।
16.हथेली और पांव के तलवो में जलन होने पर गाय के घी की मालिश करने से जलन में आराम आयेगा।
17.गाय का घी न सिर्फ कैंसर को पैदा होने से रोकता है और इस बीमारी के फैलने को भी आश्चर्यजनक ढंग से रोकता है।
18.जिस व्यक्ति को हार्ट अटैक की तकलीफ है और चिकनाइ खाने की मनाही है तो गाय का घी खाएं, हर्दय मज़बूत होता है।
19.देसी गाय के घी में कैंसर से लड़ने की अचूक क्षमता होती है। इसके सेवन से स्तन तथा आंत के खतरनाक कैंसर से बचा जा सकता है।
20.संभोग के बाद कमजोरी आने पर एक गिलास गर्म दूध में एक चम्मच देसी गाय का घी मिलाकर पी लें। इससे थकान बिल्कुल कम हो जाएगी।
21.फफोलो पर गाय का देसी घी लगाने से आराम मिलता है।गाय के घी की झाती पर मालिस करने से बच्चो के बलगम को बहार निकालने मे सहायक होता है।
22.सांप के काटने पर 100 -150 ग्राम घी पिलायें उपर से जितना गुनगुना पानी पिला सके पिलायें जिससे उलटी और दस्त तो लगेंगे ही लेकिन सांप का विष कम हो जायेगा।
23.दो बूंद देसी गाय का घी नाक में सुबह शाम डालने से माइग्रेन दर्द ढीक होता है। सिर दर्द होने पर शरीर में गर्मी लगती हो, तो गाय के घी की पैरों के तलवे पर मालिश करे, सर दर्द ठीक हो जायेगा।
24.यह स्मरण रहे कि गाय के घी के सेवन से कॉलेस्ट्रॉल नहीं बढ़ता है। वजन भी नही बढ़ता, बल्कि वजन को संतुलित करता है । यानी के कमजोर व्यक्ति का वजन बढ़ता है, मोटे व्यक्ति का मोटापा (वजन) कम होता है।
25.एक चम्मच गाय का शुद्ध घी में एक चम्मच बूरा और 1/4 चम्मच पिसी काली मिर्च इन तीनों को मिलाकर सुबह खाली पेट और रात को सोते समय चाट कर ऊपर से गर्म मीठा दूध पीने से आँखों की ज्योति बढ़ती है।
26.गाय के घी को ठन्डे जल में फेंट ले और फिर घी को पानी से अलग कर ले यह प्रक्रिया लगभग सौ बार करे और इसमें थोड़ा सा कपूर डालकर मिला दें। इस विधि द्वारा प्राप्त घी एक असर कारक औषधि में परिवर्तित हो जाता है जिसे जिसे त्वचा सम्बन्धी हर चर्म रोगों में चमत्कारिक मलहम कि तरह से इस्तेमाल कर सकते है। यह सौराइशिस के लिए भी कारगर है।

27.गाय का घी एक अच्छा(LDL)कोलेस्ट्रॉल है। उच्च कोलेस्ट्रॉल के रोगियों को गाय का घी ही खाना चाहिए। यह एक बहुत अच्छा टॉनिक भी है। अगर आप गाय के घी की कुछ बूँदें दिन में तीन बार,नाक में प्रयोग करेंगे तो यह त्रिदोष (वात पित्त और कफ) को संतुलित करता है।

28.घी, छिलका सहित पिसा हुआ काला चना और पिसी शक्कर (बूरा) तीनों को समान मात्रा में मिलाकर लड्डू बाँध लें। प्रातः खाली पेट एक लड्डू खूब चबा-चबाकर खाते हुए एक गिलास मीठा कुनकुना दूध घूँट-घूँट करके पीने से स्त्रियों के प्रदर रोग में आराम होता है, पुरुषों का शरीर मोटा ताजा यानी सुडौल और बलवान बनता है ।

इन्ही विशेषताओं का अनुभव करके हमारे ऋषियों ने समवेत स्वर में उद्घोष किया --" गावो विश्वस्य मातरः "-गायें सबकी मातायें हैं । 

Thursday, December 12, 2013

यज्ञोपवीत कितना वैज्ञानिक

यज्ञोपवीत कितना वैज्ञानिक
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हिंदू धर्म के सोलह संस्कारों में से एक है यज्ञोपवीत। यज्ञ और उपवीत शब्दों से मिलकर बना है-यज्ञोपवीत। यज्धातु से यज्ञ बना है। शास्त्रों में जहां यज्धातु को देवताओं की पूजा, दान आदि से संबंधित बताया गया है, वहीं उपवीत का अर्थ समीप या नजदीक होना होता है। इस प्रकार यज्ञोपवीत का अर्थ हुआ-यज्ञ के समीप यानी ऐसी वस्तु, जिसे धारण करने पर हम देवताओं के समीप हो जाते हैं।कर्तव्य के आधार पर चुनाव :शास्त्रों के अनुसार, छह प्रकार के यज्ञोपवीत ऐसे हैं, जिन्हें धारण किया जा सकता है-कपास से तैयार. रेशम-धागा . सन से बना हुआ . स्वर्ण के धागों से मढा हुआ . चांदी के तार से पिरोया गया . कुश और घास से तैयार यज्ञोपवीत।कर्तव्य के आधार पर माता-पिता इनका चुनाव करते हैं। जो माता-पिता अपनी संतान को पठन-पाठन [ब्राह्मण] से जोडना चाहते हैं, उनके लिए शास्त्रों में सूत और रेशम का यज्ञोपवीत धारण करने का विधान है। यदि व्यक्ति देश-समाज के रक्षा कार्यो [क्षत्रिय] से जुडा हो, तो उसे सोने से तैयार जनेऊ धारण करना चाहिए।व्यापार [वैश्य] करने वालों के लिए चांदी या सूत से तैयार उपनयनका विधान है। रंगों का महत्व :अब प्रश्न उठता है कि हम किस रंग का जनेऊ धारण करें? पढने-पढाने वालों को सफेद रंग का, रक्षा संबंधी कार्यो से जुडे व्यक्ति को लाल रंग का और व्यापार से जुडे लोगों के लिए चांदी की जनेऊ धारण करने का प्रावधान है।वैज्ञानिक आधार :यज्ञोपवीत धारण करने के वैज्ञानिक आधार भी हैं। आयुर्वेद के अनुसार, यज्ञोपवीत धारण करने से इंसान की उम्र लंबी, बुद्धि तेज, और मन स्थिर होता है। जनेऊ धारण करने से व्यक्ति बलवान, यशस्वी, वीर और पराक्रमी होता है। आयुर्वेद में यह भी कहा गया है कि यज्ञोपवीत धारण करने से न तो हृदयरोग होता है और न ही गले और मुख का रोग सताता है। मान्यता है कि सन से तैयार यज्ञोपवीत पित्त रोगों से बचाव करने में सक्षम है। जो व्यक्ति स्वर्ण के तारों से तैयार यज्ञोपवीत धारण करते हैं, उन्हें आंखों की बीमारियों से छुटकारा मिल जाता है। इससे बुद्धि और स्मरण शक्ति बढ जाती है और बुढापा भी देर से आता है। रेशम का जनेऊ पहनने से वाणी पर नियंत्रण रहता है। मान्यता है कि चांदी के तार से तैयार यज्ञोपवीत धारण करने से शरीर पुष्ट होता है। आयु में भी वृद्धि होती है। ध्यान रखें कि जनेऊ शरीर पर बायें कंधे से हृदय को छूता हुआ कमर तक होना चाहिए ।.यज्ञोपवीत धारण करने से आयु वृद्धि, उत्तम विचार और धर्म मार्ग पर चलने वाली श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है। यही नहीं यज्ञोपवीत बल और तेज दोनों ही प्रदान करती है।इंसान का जन्म तो अपनी माता की कोख से होता है, लेकिन उसके प्राकृत जीवन को अधिक शुद्ध, संवेदनशील और विश्व कल्याण में लगाने के लिएजिस संस्कार की सबसे ज्यादा जरूरत है, वह है यज्ञोपवीत संस्कार। वेदों में यज्ञोपवीत शब्द "यज्ञ" और "उपवीत" इन दो पदों से मिलकर बना है। इसका अर्थ है "यज्ञ द्वारा पवित्र किया गया सूत्र"। यज्ञोपवीत संस्कार को व्रतबंध, उपनयन और लोकभाषा में "जनेऊ" भी कहा जाता है। शास्त्रों में यज्ञोपवीत संस्कार को द्विज मात्र का पुनर्जन्म ही माना गया है, जिसके कारण वह "द्विज" कहलाता है। इसी कारण ब्रह्मपुराण में कहा गया है कि जन्म से व्यक्ति की ब्राह्मण आदि कई जातियां होती हंै लेकिन यज्ञोपवीत संस्कार के बाद ही वह द्विज कहलाने लगता है।यज्ञोपवीत है जरूरीब्रह्मोपनिषद् में यज्ञोपवीत को श्रेष्ठ औरपरम पवित्र कहा गया है। यह सृष्टि के आरंभ में भगवान प्रजापति के साथ उत्पन्न हुई थी। यज्ञोपवीत धारण करने से आयु वृद्धि, उत्तम विचार और धर्म मार्ग पर चलने वाली श्रेष्ठ संतान प्राप्त होती है। यज्ञोपवीत बल और तेजदोनों ही प्रदान करती है। शंखस्मृति में यज्ञोपवीत पहनने की आयु का निर्घारण भी कियागया है, "गर्भाष्टमेùब्द­े कर्तव्यं ब्राह्मणस्योपना­यपम्" यानी आठवें वर्ष में ब्राह्मण, क्षत्रिय का दसवें और वैश्य का बारहवें वर्ष में उपनयन संस्कार कर ही देना चाहिए। कहीं-कहीं शास्त्रों में ब्राह्मण के लिए सोलह, क्षत्रिय के लिए बीस और वैश्य केलिए चौबीस वर्ष की आयु तक भी यज्ञोपवीत करने का विधान प्राप्त होता है। इस आयु तक यज्ञोपवीत संस्कार न करने पर वह व्यक्ति व्रात्य दोष के कारण सब धर्म-कर्म से रहित औरयहां तक पतित हो जाता है कि उसके द्वारा कियागया धार्मिक कृत्य सफल हो ही नहीं पाता।संपूर्ण फल के लिए यज्ञोपवीतयज्ञोपवीत सारे वैदिक और पौराणिक कृत्यों में अत्यंत आवश्यक है। कई लोग कहते हैं कि उन्हें पूजा-अनुष्ठान का पूरा फल प्राप्त नहीं हो रहा है, इसका प्रमुख कारण यही है कि वे लोग बिना यज्ञोपवीत धारण किए ही सारे जप-अनुष्ठान संपन्न कर लेते हैं। यज्ञोपवीत स्वयं की शोभा के लिए या खंूटी पर टांग देने के लिए नहीं होती, बल्कि यह तो शास्त्रों का परमादेश है। एक बार यज्ञोपवीत संस्कार हो जाने के बाद जो व्यक्ति अज्ञानतावश यज्ञोपवीत नहीं पहनता, वह महापाप का भागी होता है। सूर्योपासना और माता गायत्री की उपासना में तो यज्ञोपवीत जरूरी ही है। पितृ-तर्पण और श्राद्ध, तीर्थ पूजन आदि में यज्ञोपवीत न हो तो सारा कर्म ही निष्फल हो जाता है।धर्म की निशानी है यज्ञोपवीतवाल्मीकि रामायण में स्पष्ट उल्लेख है कि मर्यादा पुरूषोतम भगवान श्रीराम स्वयं धर्मके प्रतीक के रूप में यज्ञोपवीत धारण करते हैं। श्रीराम को माता-पिता और गुरू वशिष्ठ यज्ञोपवीत धारण करवाते हैं। श्रीकृष्ण का यज्ञोपवीत संस्कार महर्षि संदीपनी के आश्रममें संपन्न होता है। इसी कारण हम जब भी किसी शुभ कार्य में देवपूजन करते हैं, तो देवताओं को यज्ञोपवीत अनिवार्य रूप से चढ़ाते ही हैं। अब हम देवताओं को तो जनेऊ चढ़ाएं और स्वयं पहने ही नहीं तो भला कैसे हमें पूजन कासंपूर्ण फल प्राप्त हो सकता है? लिहाजा यह जरूरी है कि जोव्यक्ति किसी भी तरह का धर्म-अनुष्ठान करना चाहता है, उसे सबसे पहले धर्म के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए यज्ञोपवीत जरूर ही धारण करनी चाहिए।

Friday, November 22, 2013

श्राद्ध -तर्पण विषयक शंका -समाधान

श्राद्ध -तर्पण विषयक शंका -समाधान ------------>

प्रश्न – मेरे मन में सदा ये संशय रहता है की मनुष्यों द्वारा पितरों का जो तर्पण किया जाता है, उसमें जल तो जल में ही चला जाता है; फिर हमारे पूर्वज उस से तृप्त कैसे होते हैं ? इसी प्रकार पिंड आदि का सब दान भी यहीं देखा जाता है | अतः हम यह कैसे कह सकते हैं की यह पितर आदि के उपभोग में आता है ? 
”उत्तर- पितरों और देवताओं की योनि ही ऐसी होती है की वे दूर की कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा भी ग्रहण कर लेते हैं और दूर की स्तुति से भी संतुष्ट होते हैं | इसके सिवा ये भूत, भविष्य और वर्तमान सब कुछ जानते और सर्वत्र पहुचते हैं | पांच तन्मात्राएँ, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति – इन नौ तत्वों का बना हुआ उनका शरीर होता है | इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान् पुरुषोत्तम निवास करते हैं | इसलिए देवता और पितर गंध तथा रस तत्व से तृप्त होते हैं | शब्द तत्व से रहते हैं तथा स्पर्श तत्व को ग्रहण करते हैं और किसी को पवित्र देख कर उनके मन में बड़ा संतोष होता है | जैसे पशुओं का भोजन तृण और मनुष्यों का भोजन अन्न कहलाता है, वैसे ही देवयोनियों का भोजन अन्न का सार तत्व है | सम्पूर्ण देवताओं की शक्तियां अचिन्त्य एवं ज्ञानगम्य हैं | अतः वे अन्न और जल का सार तत्व ही ग्रहण करते हैं, शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं स्थित देखी जाती है |

प्रश्न – श्राद्ध का अन्न तो पितरों को दिया जाता है, परन्तु वे अपने कर्म के अधीन होते हैं | यदि वे स्वर्ग अथवा नर्क में हों, तो श्राद्ध का उपभोग कैसे कर सकते हैं ? और वैसी दशा में वरदान देने में भी कैसे समर्थ हो सकते हैं ? 
उत्तर- यह सत्य है की पितर अपने अपने कर्मों के अधीन होते हैं, परन्तु देवता, असुर और यक्ष आदि के तीन अमूर्त तथा चार वर्णों के चार मूर्त – ये सात प्रकार के पितर माने गए हैं | ये नित्य पितर हैं, ये कर्मों के अधीन नहीं, ये सबको सब कुछ देने में समर्थ हैं | वे सातों पितर भी सब वरदान आदि देते हैं | उनके अधीन अत्यंत प्रबल इकतीस गण होते हैं | इस लोक में किया हुआ श्राद्ध उन्ही मानव पितरों को तृप्त करता है | वे तृप्त होकर श्राद्धकर्ता के पूर्वजों को जहाँ कहीं भी उनकी स्थिति हो, जाकर तृप्त करते हैं | इस प्रकार अपने पितरों के पास श्राद्ध में दी हुई वस्तु पहुचती है और वे श्राद्ध ग्रहण करने वाले नित्य पितर ही श्राद्ध कर्ताओं को श्रेष्ठ वरदान देते हैं |

प्रश्न – जैसे भूत आदि को उन्हीं के नाम से ‘इदं भूतादिभ्यः” कह कर कोई वस्तु दी जाती है, उसी प्रकार देवता आदि को संक्षेप में क्यों नहीं दिया जाता है ? मंत्र आदि के प्रयोग द्वारा विस्तार क्यों किया जाता है ?

उत्तर- सदा सबके लिए उचित प्रतिष्ठा करनी चाहिए | उचित प्रतिष्ठा के बिना दी हुई कोई वास्तु देवता आदि ग्रहण नहीं करते | घर के दरवाजे पर बैठा हुआ कुत्ता, जिस प्रकार ग्रास (फेंका हुआ टुकड़ा) ग्रहण करता है, क्या कोई श्रेष्ठ पुरुष भी उसी प्रकार ग्रहण करता है ? इसी प्रकार भूत आदि की भाँती देवता कभी अपना भाग ग्रहण नहीं करते | वे पवित्र भोगों का सेवन करने वाले तथा निर्मल हैं | अतः अश्रद्धालु पुरुष के द्वारा बिना मन्त्र के दिया हुआ जो कोई भी हव्य भाग होता है, उसे वे स्वीकार नहीं करते | यहाँ मन्त्रों के विषय में श्रुति भी इस प्रकार कहती है -” सब मन्त्र ही देवता हैं, विद्वान पुरुष जो जो कार्य मन्त्र के साथ करता है, उसे वह देवताओं के द्वारा ही संपन्न करता है | मंत्रोच्चारणपूर्वक जो कुछ देता है, वह देवताओं द्वारा ही देता है | मन्त्रपूर्वक जो कुछ ग्रहण करता है, वह देवताओं द्वारा ही ग्रहण करता है | इसलिए मंत्रोच्चारण किये बिना मिला हुआ प्रतिग्रह न स्वीकार करे | बिना मन्त्र के जो कुछ किया जाता है , वह प्रतिष्ठित नहीं होता | “इस कारण पौराणिक और वैदिक मन्त्रों द्वारा ही सदा दान करना चाहिए |

प्रश्न – कुश, तिल, अक्षत और जल – इन सब को हाथ में लेकर क्यों दान दिया जाता है? मैं इस कारण को जानना चाहता हूँ |

उत्तर- प्राचीन काल में मनुष्यों ने बहुत से दान किये, और उन सबको असुरों ने बलपूर्वक भीतर प्रवेश करके ग्रहण कर लिया | तब देवताओं और पितरों ने ब्रह्मा जी से कहा – स्वामिन ! हमारे देखते देखते दैत्यलोग सब दान ग्रहण कर लेते हैं | अतः आप उनसे हमारी रक्षा करें, नहीं तो हम नष्ट हो जायेंगे | ” तब ब्रह्मा जी ने सोच विचार कर दान की रक्षा के लिए एक उपाय निकल | पितरों को तिल के रूप में दान दिया जाए, देवताओं को अक्षत के साथ दिया जाए तथा जल और कुश का सम्बन्ध सर्वत्र रहे | ऐसा करने पर दैत्य उस दान को ग्रहण नहीं कर सकते | इन सबके बिना जो दान किया जाता है, उस पर दैत्य लोग बलपूर्वक अधिकार कर लेते हैं और देवता तथा पितर दुखपूर्वक उच्ह्वास लेते हुए लौट जाते हैं | वैसे दान से दाता को कोई फल नहीं मिलता | इसलिए सभी युगों में इसी प्रकार (तिल, अक्षत, कुश और जल के साथ) दान दिया जाता है |

Monday, November 18, 2013

अर्जुन का घमंड

अर्जुन का घमंड

एक दिन श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने साथ घुमाने ले गए। रास्ते में उनकी भेंट एक निर्धन ब्राह्मण से हुई। उसका व्यवहार थोड़ा विचित्र था। वह सूखी घास खा रहा था और उसकी कमर से तलवार लटक रही थी।

अर्जुन ने उससे पूछा - आप तो अहिंसा के पुजारी हैं। जीव हिंसा के भय से सूखी घास खाकर अपना गुजारा करते हैं। लेकिन फिर हिंसा का यह उपकरण तलवार क्यों आपके साथ है?

ब्राह्मण ने जवाब दिया - मैं कुछ लोगों को दंडित करना चाहता हूं। आपके शत्रु कौन हैं? अर्जुन ने जिज्ञासा जाहिर की।

ब्राह्मण ने कहा - मैं चार लोगों को खोज रहा हूं, ताकि उनसे अपना हिसाब चुकता कर सकूं। सबसे पहले तो मुझे नारद की तलाश है। नारद मेरे प्रभु को आराम नहीं करने देते, सदा भजन-कीर्तन कर उन्हें जागृत रखते हैं। फिर मैं द्रौपदी पर भी बहुत क्रोधित हूं। उसने मेरे प्रभु को ठीक उसी समय पुकारा, जब वह भोजन करने बैठे थे। उन्हें तत्काल खाना छोड़ पांडवों को दुर्वासा ऋषि के शाप से बचाने जाना पड़ा। उसकी धृष्टता तो देखिए। उसने मेरे भगवान को जूठा खाना खिलाया।

आपका तीसरा शत्रु कौन है? - अर्जुन ने पूछा। वह है हृदयहीन प्रह्लाद। उस निर्दयी ने मेरे प्रभु को गरम तेल के कड़ाह में प्रविष्ट कराया, हाथी के पैरों तले कुचलवाया और अंत में खंभे से प्रकट होने के लिए विवश किया। और चौथा शत्रु है अर्जुन। उसकी दुष्टता देखिए। उसने मेरे भगवान को अपना सारथी बना डाला। उसे भगवान की असुविधा का तनिक भी ध्यान नहीं रहा। कितना कष्ट हुआ होगा मेरे प्रभु को। - यह कहते ही ब्राह्मण की आंखों में आंसू आ गए।

यह देख अर्जुन का घमंड चूर-चूर हो गया। उसने श्रीकृष्ण से क्षमा मांगते हुए कहा - मान गया प्रभु, इस संसार में न जाने आपके कितने तरह के भक्त हैं। मैं तो कुछ भी नहीं हूं।

Friday, November 8, 2013

भारतीय गाय इस धरती पर सभी गायो मे सर्वश्रेष्ठ क्यूँ है ?

भारतीय गाय इस धरती पर सभी गायो मे सर्वश्रेष्ठ क्यूँ है ?

यह जानकार आपको शायद झटका लगेगा की हमने अपनी देशी गायों को गली-गली आवारा घूमने के लिए छोड़ दिया है । क्यूंकी वे दूध कम देती हैं । इसलिए उनका आर्थिक मोल कम है , लेकिन ब्राज़ील हमारी इन देशी गायो की नस्ल का सबसे बड़ा निर्यातक बन गया है । जबकि भारत अमेरिका और यूरोप से घरेलू दुग्ध उत्पादन बढ़ाने के लिए विदेशी प्रजाती की गायों का आयात करता है । वास्तव मे 3 महत्वपूर्ण भारतीय प्रजाती गिर, कंकरेज , व ओंगल की गाय जर्सी गाय से भी अधिक दूध देती हैं ।

यंहा तक की भारतीय प्रजाती की गाये होलेस्टेन फ्राइजीयन जैसी विदेशी प्रजाती की गाय से
भी ज्यादा दूध देती है । और भारत विदेशी प्रजाती की गाय का आयात करता है जिनकी रोगो से लड़ने की क्षमता ( वर्ण संकर जाती के कारण ) भी बहुत कम होती है ।
हाल ही मे ब्राज़ील मे दुग्ध उत्पादन की प्रतियोगिता हुई थी जिसमे भारतीय प्रजाती की गिर ने गाय एक दिन मे 48 लीटर दूध दिया । तीन दिन तक चली इस प्रतियोगिता मे
दूसरा स्थान भी भारतीय प्राजाती की गाय गिर को ही प्राप्त हुआ । इस गाय ने एक दिन मे 45 लीटर दूध दिया । तीसरा स्थान भी आंध्रप्रदेश के ओंगल नस्ल की गाय ( जिसे ब्राज़ील मे नेरोल कहा जाता है ) को मिला उसने भी एक दिन मे 45 लीटर दूध दिया ।
केवल ज्यादा दुग्ध उत्पादन की ही बात क्यूँ करे ? भारतीय नस्ल की गाय स्थानीय महोल मे अच्छी तरह ढली हुई हैं वे भीषण गर्मी भी सह सकती हैं । उन्हे कम पानी चाहिए , वे दूर तक चल सकती हैं । वे अनेक संक्रामक रोगो का मुक़ाबला कर सकती हैं । अगर उन्हे
सही खुराक और सही परिवेश मिले तो वे उच्च उत्पादक भी बन सकती हैं । हमारी देशी गयो मे ओमेगा -6 फेटी एसीड्स होता है जो केंसर नियंत्रण मे सहायक होता है ।

विडम्बना देखिए ओमेगा -6 के लिए एक बड़ा उद्योग विकसित हो गया है जो इसे केपसूल की शक्ल मे बेच रहा है । , जबकि यह तत्व हमारी गायो के दूध मे स्वाभाविक ( हमारे पूर्वज ऋषियों द्वारा विकसित कहना ज्यादा सही होगा ) रूप से विद्यमान है । आयातित गायो मे इस तत्व का नामोनिशान भी नही होता ।

न्यूजीलेंड के वेज्ञानिकों ने पाया है की पश्चिमी नस्ल की गायो के दूध मे ' बेटा केसो मार्फीन ' नामक मिश्रण होता है । जिसकी वजह से अल्जाइमर ( स्मृती लोप ) और पार्किसन जैसे रोग होते हैं ।

इतना ही नही भारतीय नस्ल की गायो का गोबर भी आयातित गयो की तुलना मे श्रेष्ठ है । जो एसा पंचागभ्य तैयार करने के अनुकूल है जो रासायनिक खादों से भी बेहतर विकल्प है ।
पिछली सदी के अंत मे ब्राज़ील ने भारतीय पशुधन का आयात किया था । ब्राज़ील गई गायो मे गुजरात की गिर और कंकरेज नस्ल तथा आन्ध्रप्रदेश की ओंगल नस्ल की गाय शामिल थी । इन गायों को मांस के लिए ब्राज़ील ले जाया गया था । लेकिन जब वे ब्राज़ील पहुची तो वंहा के लोगो को एहसास हुआ की इन गायों मे कुछ खास है ।

अगर भारत मे विदेशी जहरीली वर्ण संकर नस्ल की गायों के बजाय भारतीय नस्ल की गायो पर ध्यान दिया होता तो हमारी गायें न केवल आर्थिक रूप से व्यावहारिक होती बल्कि हमारे यंहा की खेती और फसल की दशा भी व्यावहारिक व लाभदायक होती । मरुभूमि के अत्यंत कठिन माहोल मे रहने वाली थारपारकर जैसी नस्ल की गाये उपेक्षित न होती । आज दुग्ध उत्पादन ही नही प्रत्येक क्षेत्र मे आत्म निर्भरता प्राप्त करने के लिए विदेशी नस्ल ( मलेच्च्यो- मुसालेबीमान व किसाई ) और उनके सहायक चापलूस हन्दुओ से ज्यादा विनाशकारी और कुछ नही हो सकता ।

इससे यह स्पष्ट हो जाता है की भारतीय सारकर हर क्षेत्र मे पूर्व निर्धारित षड्यंत्र के तहत
गलत नीती अपनाकर चल रही है ।

गोवर्धन पूजा

गोवर्धन पूजा के पावन अवसर पर समस्त देशवासियों को हार्दिक शुभकामनायें....


आज कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा के दिन पर्वतराज गोवर्धन की पूजा की जाती है। इसे अन्नकूट के नाम से भी जानते हैं।

इस त्यौहार का भारतीय लोकजीवनमें काफी महत्व है।इस पर्व में प्रकृति के साथ मानव का सीधा सम्बन्ध दिखाई देता है।इस पर्व की अपनी मान्यता और लोककथा है।

गोवर्धन पूजा में गोधन यानी गायों की पूजा की जाती है ।शास्त्रों में बताया गया है कि गाय उसी प्रकार पवित्र होती जैसे
नदियों में गंगा।

गाय को देवी लक्ष्मी का स्वरूप भी कहा गया है ।देवीलक्ष्मी जिस प्रकार सुख समृद्धि प्रदान करती हैं उसी प्रकार गौ माता भी अपने दूध से स्वास्थ्य रूपी धन प्रदान करती हैं।

इनका बछड़ा खेतों में अनाज उगाता है। इस तरह गौ सम्पूर्ण मानव जाती के लिए पूजनीय और आदरणीय है।

गौ के प्रति श्रद्धा प्रकट करने के लिए ही कार्तिक शुक्ल पक्ष प्रतिपदा के दिन गोर्वधन की पूजा की जाती है और इसके प्रतीक के रूप में गाय की ।

गोवर्धन पूजा के सम्बन्ध में एक लोक गाथा प्रचलित है।

कथा यह है कि देवराज इन्द्र को अभिमान हो गया था।इन्द्र का अभिमान चूर करने हेतु भगवान श्री कृष्ण जो स्वयं लीलाधारी श्री हरि विष्णु के अवतार है उन्होंने एक लीला रची।

प्रभु की इस लीला में यूं हुआ कि एक दिन उन्होंने देखा के सभी बृजवासी उत्तम पकवान बना रहे हैं और किसी पूजा की तैयारी में जुटे।

श्री कृष्ण ने बड़े भोलेपन से मईया यशोदा से प्रश्न किया "मईया ये आप लोग
किनकी पूजा की तैयारी कर रहे हैं" ।

"भगवान् श्रीकृष्ण" की बातें सुनकर मैया बोली लल्ला हम देवराज इन्द्र की पूजा के लिए अन्नकूट की तैयारी कर रहे हैं ।

मैया के ऐसा कहने पर श्रीकृष्ण बोले मैया हम इन्द्र की पूजा क्यों करते हैं ?

मैईया ने कहा वह वर्षा करते हैं जिससे अन्न की पैदावार होती है उनसे हमारी गायों को चारा मिलता है।

भगवानश्री कृष्ण बोले हमें तो गोर्वधन पर्वत की पूजा करनी चाहिए क्योंकि हमारी गाये वहीं चरती हैं, इस दृष्टि से गोर्वधन पर्वत ही पूजनीय है और इन्द्र तो कभी दर्शन भी नहीं देते व पूजा न करने पर क्रोधित भी होते हैं अत: ऐसे अहंकारी की पूजा नहीं करनी चाहिए।

लीलाधारी की लीला और माया से सभी ने इन्द्र के बदले गोवर्घन पर्वत की पूजा की।

देवराजइन्द्र ने इसे अपना अपमान समझा और मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। प्रलय के समान वर्षा देखकर सभी बृजवासी भगवान कृष्ण को कोसने लगे कि, सब इनका कहा मानने से हुआ है।

तब मुरलीधर ने मुरली कमर में डाली और अपनी कनिष्ठा उंगली पर पूरा गोवर्घन पर्वत उठा लिया और सभी बृजवासियों को उसमें अपने गाय और बछडे समेत शरण लेने के लिए बुलाया।

इन्द्र कृष्ण की यह लीला देखकर और क्रोधित हुए फलत: वर्षा और तेज हो गयी।

इन्द्र का मान मर्दन के लिए तब श्री कृष्ण ने सुदर्शन चक्र से कहा कि आप पर्वत के ऊपर रहकर वर्षा की गति को नियत्रित करें और शेषनाग से कहा आप मेड़ बनाकर पानी को पर्वत की ओर आने से रोकें।

इन्द्र लगातार सात दिन तक मूसलाधार वर्षा करते रहे तब उन्हे एहसास हुआ कि उनका मुकाबला करने वाला कोई आम मनुष्य नहीं हो सकता अत: वे ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और सब वृतान्त कह सुनाया।

ब्रह्मा जी ने इन्द्र से कहा कि आप जिस कृष्ण की बात कर रहे हैं वह भगवान विष्णु के साक्षात अंश हैं और पूर्ण पुरूषोत्तम नारायण हैं ।

ब्रह्मा जी के मुंख से यह सुनकर इन्द्र अत्यंत लज्जित हुए और श्री कृष्ण से कहा कि प्रभु मैं आपको पहचान न सका इसलिए अहंकारवश भूल कर बैठा।
आप दयालु हैं और कृपालु भी इसलिए मेरी भूल क्षमा करें।

इसके पश्चात देवराजइन्द्र ने मुरलीधर की पूजा कर उन्हें भोग लगाया ।इस पौराणिक घटना के बाद से ही गोवर्घन पूजा की जाने लगी।
बृजवासी इस दिन गोवर्घन पर्वत की पूजा करते हैं।

गाय बैल को इस दिन स्नान कराकर उन्हें रंग लगाया जाता है व उनके गले में नई रस्सी डाली जाती है।गाय और बैलों को गुड़ और चावल मिलाकर खिलाया जाता है।

जय जय गोवर्धन गिरधारी।
श्रीकृष्ण गोविँद हरे मुरारी।।

देसी गाय के दूध का महत्व

देसी गाय के दूध का महत्व

 आधुनिक विज्ञानका यह मानना है कि सृष्टिके आदि कालमें, भूमध्य रेखा के दोनो ओर प्रथम एक गर्म भूखंड उत्पन्न हुआ था इसे भारतीय परम्परामे जम्बुद्वीपका नाम दिया जाता है |  सभी स्तनधारी भूमि पर पैरों से चलनेवाले प्राणी दोपाए, चौपाए जिन्हें वैज्ञानिक भाषामें अनग्युलेट मेमलके (ungulate mammal) नामसे जाना जाता है, वे इसी जम्बू द्वीपपर उत्पन्न हुये थे | इस प्रकार सृष्टिमें सबसे प्रथम मनुष्य और गौका इसी जम्बुद्वीप भूखंडपर उत्पन्न होना माना जाता है |  इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है कि भारतीय गाय ही विश्वकी मूल गाय है इसी मूल भारतीय गायका लगभग ८००० वर्ष पूर्व, भारत जैसे गर्म क्षेत्रोंसे यूरोपके ठंडे क्षेत्रोंके लिए पलायन हुआ, ऐसा माना जाता है |  जीव विज्ञानके अनुसार भारतीय गायोंके २०९ तत्व के डीएनए में ६७ पद पर स्थित एमिनो एसिड प्रोलीन (Proline) पाया जाता है इन गौओंके ठंडे यूरोपीय देशोंको पलायनमें भारतीय गायके डीएनएमें प्रोलीन Proline एमीनोएसिड हिस्टीडीनके (Histidine) साथ उत्परिवर्तित हो गया | इस प्रक्रियाको वैज्ञानिक भाषामें म्युटेशन ( Mutation ) कहते हैं |  1. मूल गायके दूधमें पोरलीन(Proline) अपने स्थान ६७ पर अत्यधिक दृढतासे आग्रहपूर्वक अपने पडोसी स्थान ६६ पर स्थित अमीनोएसिड आइसोल्यूसीनसे (Isoleucine) जुडा रहता है; परन्तु जब प्रोलीनके स्थानपर हिस्टिडीन आ जाता है तब इस हिस्टिडीनमें अपने पडोसी स्थान 66 पर स्थित आइसोल्युसीनसे जुडे रहनेकी प्रबल इच्छा नही पाई जाती |  इस स्थितिमें यह एमिनो एसिड Histidine, मानव शरीरकी पाचन क्रियामें सरलतासे टूट कर पसर जाता है |  इस प्रक्रियासे एक 7 एमीनोएसिडका छोटा प्रोटीन स्वच्छ्न्द रूपसे मानव शरीरमें अपना भिन्न अस्तित्व बना लेता है | इस 7 एमीनोएसिडके प्रोटीनको बीसीएम 7 BCM7 (बीटा Caso Morphine7) नाम दिया जाता है |  2. BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम परिवारका मादक तत्व है जो अत्यधिक शक्तिशाली Oxidant ऑक्सीकरण तत्त्वके रूपमें मानव स्वास्थ्यपर अपनी श्रेणीके दूसरे अफीम जैसे ही मादक तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव छोडता है |   जिस दूधमें यह विषैला मादक तत्व बीसीएम 7 पाया जाता है, उस दूधको वैज्ञानिकोंने ए1 दूधका नाम दिया है |   यह दूध उन विदेशी गौओंमें पाया गया है जिनके डीएनएमें ६७ स्थानपर प्रोलीन न हो कर हिस्टिडीन होता है |  आरम्भमें जब दूधको बीसीएम7 के कारण बडे स्तरपर जानलेवा रोगोंका कारण पाया गया तब न्यूज़ीलेंडके सारे डेरी उद्योगके दूधका परीक्षण आरम्भ हुआ |  सारे डेरी दूधपर किए जानेवाले प्रथम अनुसंधानमे जो दूध मिला वह बीसीएम7 से दूषित पाया गया | इसलिए यह सारा दूध ए1 कहलाया |  तदोपरांत ऐसे दूधकी आविष्कार आरम्भ हुई जिसमें यह बीसीएम7 विषैला तत्व न हो |  इस दूसरे अनुसंधान अभियानमें जो बीसीएम7 रहित दूध पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया |  सुखद बात यह है कि विश्वकी मूल गायकी प्रजातिके दूधमें, यह विष तत्व बीसीएम7 नहीं मिला, इसलिए देसी गायका दूध ए2 प्रकारका दूध संबोधित किया जाता है | देसी गायके दूधमें यह स्वास्थ्य नाशक मादक विष तत्व बीसीएम7 नही होता |   आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानसे अमेरिकामें यह भी पाया गया कि ठीकसे पोषित देसी गायके दूध और दूधके बने पदार्थ मानव शरीरमें कोई भी रोग उत्पन्न नहीं होने देते |  भारतीय परम्परामें इसलिए देसी गायके दूधको अमृत कहा जाता है |   आज यदि भारतवर्षका डेरी उद्योग हमारी देसी गायके ए2 दूधकी उत्पादकताका महत्व समझ लें तो भारत सारे विश्व डेरी दूध व्यापारमें सबसे बडा दूध निर्यातक देश बन सकता है |  देसी गायकी पहचान आज के वैज्ञानिक युग में, यह भी महत्त्वका विषय है कि देसी गायकी पहचान प्रामाणिक रूपसे हो सके |   साधारण बोल चालमे जिन गौओं में कुकुभ, गल कम्बल छोटा होता है उन्हे य देसी नहीं माना जाता और सबको जर्सी कह दिया जाता है |  प्रामाणिक रूपसे यह जाननेके लिए कि कौन सी गाय मूल देसी गायकी प्रजातिकी हैं, गौका डीएनए जांचा जाता है | इस परीक्षणके लिए गायकी पूंछके बालके एक टुकडेसे ही यह सुनिश्चित हो जाता है कि वह गाय देसी गाय मानी जा सकती है या नहीं |   यह अत्याधुनिक विज्ञानके अनुसन्धान का विषय है | पाठकोंकी जानकारीके लिए भारत सरकारसे इस अनुसंधानके लिए आर्थिक सहयोगके प्रोत्साहनसे भारतवर्षके वैज्ञानिक इस विषयपर अनुसंधान कर रहे हैं और निकट भविष्यमें वैज्ञानिक रूपसे देसी गायकी पहचान सम्भव हो सकेगी |   इस महत्वपूर्ण अनुसंधानका कार्य दिल्ली स्थित महाऋषि दयानंद गोसम्वर्द्धन केंद्रकी पहल और भागीदारीपर और कुछ भारतीय वैज्ञानिकोंके निजी उत्साहसे आरम्भ हो सका है |  ए1 दूधका मानव स्वास्थ्यपर दुष्प्रभाव जन्मके समय बालकके शरीरमें blood brain barrier नही होता | माताके स्तन पान करानेके बाद तीन चार वर्षकी आयु तक शरीरमें यह ब्लडब्रेन बैरियर स्थापित हो जाता है |  इसलिए जन्मोपरांत माताके पोषन और स्तनपान द्वारा शिषुको मिलनेवाले पोषणका, बचपनमें ही नही, बडे हो जानेपर भविष्यमें भी मस्तिष्कके रोग और शरीरकी रोग निरोधक क्षमता ,स्वास्थ्य, और व्यक्तित्वके निर्माणमें अत्यधिक महत्व बताया जाता है |  बाल्य कालके रोग (Pediatric disease) आजकल भारत वर्षमें ही नहीं सारे विश्वमें, जन्मोपरान्त बच्चोंमें जो Autism (बोध अक्षमता ) और Diabetes type1 (मधुमेह) जैसे रोग बढ रहे हैं उनका स्पष्ट कारण ए1 दूध का बीसीएम7 पाया गया है |  वयस्क समाजके रोग (Adult disease) मानव शरीरके सभी metabolic degenerative disease शरीरके स्वजन्य रोग जैसे उच्च रक्त चाप (high blood pressure) हृदय रोग (Ischemic Heart Disease) तथा मधुमेहका (Diabetes) प्रत्यक्ष सम्बंध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध से स्थापित हो चुका है |  यही नहीं बुढापेके मानसिक रोग भी बचपनमें ए1 दूधका प्रभावके रूपमें भी देखे जा रहे हैं |  सम्पूर्ण विश्वमें डेयरी उद्योग आज चुपचाप अपने पशुओंकी प्रजनन नीतियोंमें ” अच्छा दूध अर्थात् BCM7 मुक्त ए2 दूध “ के उत्पादनके आधारपर परिवर्तन ला रहा हैं |   वैज्ञानिक शोध इस विषयपर भी किया जा रहा है कि किस प्रकार अधिक ए2 दूध देनेवाली गौओंकी प्रजातियां विकसित की जा सकें |  डेरी उद्योगकी भूमिका मुख्य रूपसे यह हानिकारक ए1 दूध होल्स्टिन फ्रीज़ियन प्रजातिकी गायमें ही मिलता है, यह भैंस जैसी दीखनेवाली, अधिक दूध देनेके य कारण सारे डेरी उद्योगकी पसन्दीदा गाय है |  होल्स्टीन, फ्रीज़ियन दूधके ही कारण लगभग सारे विश्वमें डेरीका दूध ए1 पाया गया | विश्वके सारे डेरी उद्योग और राजनेताओंकी आज यही कठिनाई है कि अपने सारे ए1 दूध को एक दम कैसे अच्छे ए2 दूधमें कैसे परिवर्तित करें |  आज विश्वका सारा डेरी उद्योग भविष्यमें केवल ए2 दूधके उत्पादनके लिए अपनी गौओंकी प्रजातिमे नस्ल सुधारके नये कार्यक्रम चला रहा है |  विश्व बाज़ारमे भारतीय नस्लके गीर वृषभोंकी इसलिए अत्यधिक मांग भी हो गयी है | साहीवाल नस्लके अच्छे वृषभकी भी बहुत मांग बढ गयी है |  सबसे पहले यह अनुसंधान न्यूज़ीलेंडके वैज्ञानिकोंने किया था; परन्तु वहांके डेरी उद्योग और सरकारी तंत्रकी मिलीभगतसे यह वैज्ञानिक अनुसंधान छुपानेके प्रयत्नोंसे उद्विग्न होनेपर, वर्ष २००७ में Devil in the Milk-illness, health and politics A1 and A2 Milk” नामकी पुस्तक कीथ वुड्फोर्ड द्वारा न्यूज़ीलेंडमें प्रकाशित हुई |   ऊपर उल्लेखित पुस्तकमें विस्तारसे लगभग तीस वर्षोंके विश्व भरके आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और रोगोंके अनुसंधानके आंकडोंके आधारपर यह सिद्ध किया जा सका है कि बीसीएम7 युक्त ए1 दूध मानव समाजके लिए विषतुल्य है |  इन पंक्तियोंके लेखकने भारतवर्षमें २००७ में ही इस पुस्तकको न्युज़ीलेंडसे मंगा कर भारत सरकार और डेरी उद्योगके शीर्षस्थ अधिकारियोंका इस विषयपर ध्यान आकर्षित कर, देसी गायके महत्वकी ओर वैज्ञानिक आधारपर प्रचार और ध्यानाकर्षणका एक अभियान चला रखा है; परन्तु अभी भारत सरकारने इस विषयको गम्भीरतासे नही लिया है |  डेरी उद्योग और भारत सरकारके गोपशु पालन विभागके अधिकारी व्यक्तिगत स्तरपर तो इस विषयको समझने लगे हैं; परंतु भारतवर्षकी और डेरी उद्योगकी नीतियोंमें परिवर्तित करनेके लिए जिस नेतृत्वकी आवश्यकता होती है उसके लिए तथ्योंके अतिरिक्त सशक्त जनजागरण भी आवश्यक होता है इसके लिए जन साधारणको इन तथ्योंके बारेमे अवगत कराना भारत वर्षके हर देश प्रेमी गोभक्तका दायित्व बन जाता है |  विश्व मंगल गो ग्रामयात्रा इसी जन चेतना जागृतिका शुभारम्भ है | देसी गायसे विश्वोद्धार भारत वर्षमें यह विषय डेरी उद्योगके गले सरलतासे नही उतर रहा,हमारा सम्पूर्ण डेरी उद्योग तो प्रत्येक प्रकारके दूधको एक जैसा ही समझता आया है |  उनके लिए देसी गायके ए2 दूध और विदेशी ए1 दूध देनेवाली गायके दूधमें कोई अंतर नही होता था |  गाय और भैंसके दूधमें भी कोई अंतर नहीं माना जात,सारा ध्यान अधिक मात्रामें दूध और वसा देनेवाले पशुपर ही होता है | किस दूधमें क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस विषयपर डेरी उद्योग कभी सचेत नहीं रहा है | सरकारकी स्वास्थ्य संबन्धित नीतियां भी इस विषयपर केंद्रित नहीं हैं |  भारतमें किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक प्रारंभिक अध्ययनके अनुसार यह अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने वाली गौओंकी संख्या पंद्रह प्रतिशतसे अधिक नहीं है |   भरत्वर्षमें देसी गायोंके संसर्गकी संकर नस्ल ज्यादातर डेयरी क्षेत्रके साथ ही हैं |  आज सम्पूर्ण विश्वमें यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्थामें बच्चोंको केवल ए2 दूध ही देना चाहिये | विश्व बाज़ारमें न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ,जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूधके मूल्य साधारण ए1 डेरी दूधके यदामसे कही अधिक हैं |   ए2 से देने वाली गाय विश्वमें सबसे अधिक भारतवर्षमें पाई जाती हैं |  यदि हमारी देसी गोपालनकी नीतियोंको समाज और शासनका प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहारका निर्यात भारतवर्षसे किया जा सकता है | यह एक बडे आर्थिक महत्वका विषय है 

Saturday, November 2, 2013

कुलदेवी कृपा प्राप्ति साधना


कुलदेवी कृपा प्राप्ति साधना

कुलदेवी सदैव हमारी कुल कि रक्षा करती है,हम पर चाहे किसी भी प्रकार कि कोई भी बाधाये आने वाली हो तो सर्वप्रथम हमारी सबसे ज्यादा चिंता उन्हेही ही होती है.कुलदेवी कि कृपा से कई जीवन के येसे कार्य है जिनमे पूर्ण सफलता मिलती है.
कई लोग येसे है जिन्हें अपनी कुलदेवी पता ही नहीं और कुछ येसे भी है जिन्हें कुलदेवी पता है परन्तु उनकी पूजा या फिर साधना पता नहीं है.तो येसे समय यह साधना बड़ी ही उपयुक्त है.यह साधना पूर्णतः फलदायी है और गोपनीय है.यह दुर्लभ विधान मेरी प्यारी गुरुभाई/बहन कि लिए आज सदगुरुजी कि कृपा से हम सभी के लिये.
इस साधना के माध्यम से घर मे क्लेश चल रही हो,कोई चिंता हो,या बीमारी हो,धन कि कमी,धन का सही तरह से इस्तेमाल न हो,या देवी/देवतओं कि कोई नाराजी हो तो इन सभी समस्या ओ के लिये कुलदेवी साधना सर्वश्रेष्ट साधना है.
सामग्री :-
३ पानी वाले नारियल,लाल वस्त्र ,९ सुपारिया ,८ या १६ शृंगार कि वस्तुये ,खाने कि ९ पत्ते ,३ घी कि दीपक,कुंकुम ,हल्दी ,सिंदूर ,मौली ,तिन प्रकार कि मिठाई .
साधना विधि :-
सर्वप्रथम नारियल कि कुछ जटाये निकाले और कुछ बाकि रखे फिर एक नारियल को पूर्ण सिंदूर से रंग दे दूसरे को हल्दी और तीसरे नारियल को कुंकुम से,फिर ३ नारियल को मौली बांधे .
किसी बाजोट पर लाल वस्त्र बिछाये ,उस पर ३ नारियल को स्थापित कीजिये,हर नारियल के सामने ३ पत्ते रखे,पत्तों पर १-१ coin रखे और coin कि ऊपर सुपारिया स्थापित कीजिये.फिर गुरुपूजन और गणपति पूजन संपन्न कीजिये.
अब ज्यो पूजा स्थापित कि है उन सबकी चावल,कुंकुम,हल्दी,सिंदूर,जल ,पुष्प,धुप और दीप से पूजा कीजिये.जहा सिन्दूर वाला नारियल है वह सिर्फ सिंदूर ही चढ़े बाकि हल्दी कुंकुम नहीं इस प्रकार से पूजा करनी है,और चावल भी ३ रंगों मे ही रंगाने है,अब ३ दीपक स्थापित कर दीजिये.और कोई भी मिठाई किसी भी नारियल के पास चढादे .साधना समाप्ति के बाद प्रसाद परिवार मे ही बाटना है.शृंगार पूजा मे कुलदेवी कि उपस्थिति कि भावना करते हुये चढादे और माँ को स्वीकार करनेकी विनती कीजिये.


और लाल मूंगे कि माला से ३ दिन तक ११ मालाये मंत्र जाप रोज करनी है.यह साधना शुक्ल पक्ष कि १२,१३,१४ तिथि को करनी है.३ दिन बाद सारी सामग्री जल मे परिवार के कल्याण कि प्रार्थना करते हुये प्रवाहित कर दे.


मंत्र :-
|| ओम ह्रीं श्रीं कुलेश्वरी प्रसीद - प्रसीद ऐम् नम : ||


साधना समाप्ति के बाद सहपरिवार आरती करे तो कुलेश्वरी कि कृपा और बढती है.

रावण के जन्म की कथा

रावण के जन्म की कथा


ब्रह्मा जी के पुलस्त्य नामक पुत्र हुये थे जो उन्हीं के समान तेजस्वी और गुणवान थे। एक बार वे महगिरि पर तपस्या करने गये। वह स्थान अत्यन्त रमणीक था। इसलिये ऋषियों, नागों, राजर्षियों आदि की कन्याएँ वहाँ क्रीड़ा करने आ जाती थी। इससे उनकी तपस्या में विघ्न पड़ता था। उन्होंने उन्हें वहाँ आने से मना किया। जब वे नहीं मानीं तो उन्होंने शाप दे दिया कि कल से जो लड़की यहाँ मुझे दिखाई देगी, वह गर्भवती हो जायेगी। शैष सब कन्याओं ने तो वहाँ आना बन्द कर दिया, परन्तु राजर्षि तृणबिन्दु की कन्या शाप की बात से अनजान होने के कारण उस आश्रम में आ गई और महर्षि के द‍ृष्टि पड़ते ही गर्भवती हो गई। जब तृणबिन्दु को यह बात मालूम हुई तो उन्होंने अपने कन्या को पत्‍नी के रूप में महर्षि को अर्पित कर दिया। इस प्रकार विश्रवा का जन्म हुआ जो अपने पिता के समान वेद्‍‍विद और धर्मात्मा हुआ। महामुनि भरद्वाज ने अपनी कन्या का विवाह विश्रवा से कर दिया। उनके वैश्रवण नामक पुत्र हुआ। वह भी धर्मात्मा और विद्वान था। उसने भारी तपस्या करके ब्रह्मा जी को प्रसन्न किया और यम्, इन्द्र तथा वरुण के सद‍ृश लोकपाल का पद पाया। फिर उसने त्रिकूट पर्वत पर बसी लंका को अपना निवास स्थान बनाया और राक्षसों पर राज्य करने लगा।"

श्रीराम ने आश्‍चर्य से पूछा, "तो क्या कुबेर और रावण से भी पहले लंका में माँसभक्षी राक्षस रहते थे? फिर उनका पूर्वज कौन था? यह सुनने के लिये मुझे कौतूहल हो रहा है?" तब अगस्त्य जी बोले, "पूर्वकाल में ब्रह्मा जी ने अनेक जल जन्तु बनाये और उनसे समुद्र के जल की रक्षा करने के लिये कहा। तब उन जन्तुओं में से कुछ बोले कि हम इसका रक्षण (रक्षा) करेंगे और कुछ ने कहा कि हम इसका यक्षण (पूजा) करेंगे। इस पर ब्रह्माजी ने कहा कि जो रक्षण करेगा वह राक्षस कहलायेगा और जो यक्षण करेगा वह यक्ष कहलायेगा। इस प्रकार वे दो जातियों में बँट गये। राक्षसों में हेति और प्रहेति दो भाई थे। प्रहेति तपस्या करने चला गया, परन्तु हेति ने भया से विवाह किया जिससे उसके विद्युत्केश नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। विद्युत्केश के सुकेश नामक पराक्रमी पुत्र हुआ। सुकेश के माल्यवान, सुमाली और माली नामक तीन पुत्र हुये। तीनों ने ब्रह्मा जी की तपस्या करके यह वरदान प्राप्त कर लिये कि हम लोगों का प्रेम अटूट हो और हमें कोई पराजित न कर सके। वर पाकर वे निर्भय हो गये और सुरों, असुरों को सताने लगे। उन्होंने विश्‍वकर्मा से एक अत्यन्त सुन्दर नगर बनाने के लिये कहा। इस पर विश्‍वकर्मा ने उन्हें लंकापुरी का पता बताकर भेज दिया। वहाँ वे बड़े आनन्द के साथ रहने लगे। माल्यवान के वज्रमुष्टि, विरूपाक्ष, दुर्मुख, सुप्तघ्न, यज्ञकोप, मत्त और उन्मत्त नामक सात पुत्र हुये। सुमाली के प्रहस्त्र, अकम्पन्न, विकट, कालिकामुख, धूम्राक्ष, दण्ड, सुपार्श्‍व, संह्नादि, प्रधस एवं भारकर्ण नाम के दस पुत्र हुये। माली के अनल, अनिल, हर और सम्पाती नामक चार पुत्र हुये। ये सब बलवान और दुष्ट प्रकृति होने के कारण ऋषि-मुनियों को कष्ट दिया करते थे। उनके कष्टों से दुःखी होकर ऋषि-मुनिगण जब भगवान विष्णु की शरण में गये तो उन्होंने आश्‍वासन दिया कि हे ऋषियों! मैं इन दुष्टों का अवश्य ही नाश करूँगा।

"जब राक्षसों को विष्णु के इस आश्‍वासन की सूचना मिली तो वे सब मन्त्रणा करके संगठित हो माली के सेनापतित्व में इन्द्रलोक पर आक्रमण करने के लिये चल पड़े। समाचार पाकर भगवान विष्णु ने अपने अस्त्र-शस्त्र संभाले और राक्षसों का संहार करने लगे। सेनापति माली सहित बहुत से राक्षस मारे गये और शेष लंका की ओर भाग गये। जब भागते हुये राक्षसों का भी नारायण संहार करने लगे तो माल्यवान क्रुद्ध होकर युद्धभूमि में लौट पड़ा। भगवान विष्णु के हाथों अन्त में वह भी काल का ग्रास बना। शेष बचे हुये राक्षस सुमाली के नेतृत्व में लंका को त्यागकर पाताल में जा बसे और लंका पर कुबेर का राज्य स्थापित हुआ। अब मैं तुम्हें रावण के जन्म की कथा सुनाता हूँ। राक्षसों के विनाश से दुःखी होकर सुमाली ने अपनी पुत्री कैकसी से कहा कि पुत्री! राक्षस वंश के कल्याण के लिये मैं चाहता हूँ कि तुम परम पराक्रमी महर्षि विश्रवा के पास जाकर उनसे पुत्र प्राप्त करो। वही पुत्र हम राक्षसों की देवताओं से रक्षा कर सकता है।" अगस्त्य मुनि ने कहना जारी रखा, "पिता की आज्ञा पाकर कैकसी विश्रवा के पास गई। उस समय भयंकर आँधी चल रही थी। आकाश में मेघ गरज रहे थे। कैकसी का अभिप्राय जानकर विश्रवा ने कहा कि भद्रे! तुम इस कुबेला में आई हो। मैं तुम्हारी इच्छा तो पूरी कर दूँगा परन्तु इससे तुम्हारी सन्तान दुष्ट स्वभाव वाली और क्रूरकर्मा होगी। मुनि की बात सुनकर कैकसी उनके चरणों में गिर पड़ी और बोली कि भगवन्! आप ब्रह्मवादी महात्मा हैं। आपसे मैं ऐसी दुराचारी सन्तान पाने की आशा नहीं करती। अतः आप मुझ पर कृपा करें। कैकसी के वचन सुनकर मुनि विश्रवा ने कहा कि अच्छा तो तुम्हारा सबसे छोटा पुत्र सदाचारी और धर्मात्मा होगा।

"इस प्रकार कैकसी के दस मुख वाले पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम दशग्रीव रखा गया। उसके पश्‍चात् कुम्भकर्ण, शूर्पणखा और विभीषण के जन्म हुये। दशग्रीव और कुम्भकर्ण अत्यन्त दुष्ट थे, किन्तु विभीषण धर्मात्मा प्रकृति का था। अपने भाई वैश्रवण से भी अधिक पराक्रमी और शक्‍तिशाली बनने के लिये दशग्रीव ने अपने भाइयों सहित ब्रह्माजी की तपस्या की। ब्रह्मा के प्रसन्न होने पर दशग्रीव ने माँगा कि मैं गरुड़, नाग, यक्ष, दैत्य, दानव, राक्षस तथा देवताओं के लिये अवध्य हो जाऊँ। ब्रह्मा जी ने 'तथास्तु' कहकर उसकी इच्छा पूरी कर दी। विभीषण ने धर्म में अविचल मति का और कुम्भकर्ण ने वर्षों तक सोते रहने का वरदान पाया। "फिर दशग्रीव ने लंका के राजा कुबेर को विवश किया कि वह लंका छोड़कर अपना राज्य उसे सौंप दे। अपने पिता विश्रवा के समझाने पर कुबेर ने लंका का परित्याग कर दिया और रावण अपनी सेना, भाइयों तथा सेवकों के साथ लंका में रहने लगा। लंका में जम जाने के बाद अपने बहन शूर्पणखा का विवाह कालका के पुत्र दानवराज विद्युविह्वा के साथ कर दिया। उसने स्वयं दिति के पुत्र मय की कन्या मन्दोदरी से विवाह किया जो हेमा नामक अप्सरा के गर्भ से उत्पन्न हुई थी। विरोचनकुमार बलि की पुत्री वज्रज्वला से कुम्भकर्ण का और गन्धर्वराज महात्मा शैलूष की कन्या सरमा से विभीषण का विवाह हुआ। कुछ समय पश्‍चात् मन्दोदरी ने मेघनाद को जन्म दिया जो इन्द्र को परास्त कर संसार में इन्द्रजित के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

"सत्ता के मद में रावण उच्छृंखल हो देवताओं, ऋषियों, यक्षों और गन्धर्वों को नाना प्रकार से कष्ट देने लगा। एक बार उसने कुबेर पर चढ़ाई करके उसे युद्ध में पराजित कर दिया और अपनी विजय की स्मृति के रूप में कुबेर के पुष्पक विमान पर अधिकार कर लिया। उस विमान का वेग मन के समान तीव्र था। वह अपने ऊपर बैठे हुये लोगों की इच्छानुसार छोटा या बड़ा रूप धारण कर सकता था। विमान में मणि और सोने की सीढ़ियाँ बनी हुई थीं और तपाये हुये सोने के आसन बने हुये थे। उस विमान पर बैठकर जब वह 'शरवण' नाम से प्रसिद्ध सरकण्डों के विशाल वन से होकर जा रहा था तो भगवान शंकर के पार्षद नन्दीश्‍वर ने उसे रोकते हुये कहा कि दशग्रीव! इस वन में स्थित पर्वत पर भगवान शंकर क्रीड़ा करते हैं, इसलिये यहाँ सभी सुर, असुर, यक्ष आदि का आना निषिद्ध कर दिया गया है। नन्दीश्‍वर के वचनों से क्रुद्ध होकर रावण विमान से उतरकर भगवान शंकर की ओर चला। उसे रोकने के लिये उससे थोड़ी दूर पर हाथ में शूल लिये नन्दी दूसरे शिव की भाँति खड़े हो गये। उनका मुख वानर जैसा था। उसे देखकर रावण ठहाका मारकर हँस पड़ा। इससे कुपित हो नन्दी बोले कि दशानन! तुमने मेरे वानर रूप की अवहेलना की है, इसलिये तुम्हारे कुल का नाश करने के लिये मेरे ही समान पराक्रमी रूप और तेज से सम्पन्न वानर उत्पन्न होंगे। रावण ने इस ओर तनिक भी ध्यान नहीं दिया और बोला कि जिस पर्वत ने मेरे विमान की यात्रा में बाधा डाली है, आज मैं उसी को उखाड़ फेंकूँगा। यह कहकर उसने पर्वत के निचले भाग में हाथ डालकर उसे उठाने का प्रयत्न किया। जब पर्वत हिलने लगा तो भगवान शंकर ने उस पर्वत को अपने पैर के अँगूठे से दबा दिया। इससे रावण का हाथ बुरी तरह से दब गया और वह पीड़ा से चिल्लाने लगा। जब वह किसी प्रकार से हाथ न निकाल सका तो रोत-रोते भगवान शंकर की स्तुति और क्षमा प्रार्थना करने लगा। इस पर भगवान शंकर ने उसे क्षमा कर दिया और उसके प्रार्थान करने पर उसे एक चन्द्रहास नामक खड्ग भी दिया।"

अगस्त्य मुनि ने आगे कहा, "एक दिन हिमालय प्रदेश में भ्रमण करते हुये रावण ने अमित तेजस्वी ब्रह्मर्षि कुशध्वज की कन्या वेदवती को तपस्या करते देखा। उस देखकर वह मुग्ध हो गया और उसके पास आकर उसका परिचय तथा अविवाहित रहने का कारण पूछा। वेदवती ने अपने परिचय देने के पश्चात् बताया कि मेरे पिता विष्णु से मेरे विवाह करना चाहते थे। इससे क्रुद्ध होकर मेरी कामना करने वाले दैत्यराज शम्भु ने सोते में उनका वध कर दिया। उनके मरने पर मेरी माता भी दुःखी होकर चिता में प्रविष्ट हो गई। तब से मैं अपने पिता के इच्छा पूरी करने के लिये भगवान विष्णु की तपस्या कर रही हूँ। उन्हीं को मैंने अपना पति मान लिया है। "पहले रावण ने वेदवती को बातों में फुसलाना चाहा, फिर उसने जबरदस्ती करने के लिये उसके केश पकड़ लिये। वेदवती ने एक ही झटके में पकड़े हुये केश काट डाले। फिर यह कहती हुई अग्नि में प्रविष्ट हो गई कि दुष्ट! तूने मेरा अपमान किया है। इस समय तो मैं यह शरीर त्याग रही हूँ, परन्तु मेरा विनाश करने के लिये फिर जन्म लूँगी। अगले जन्म में मैं अयोनिजा कन्या के रूप में जन्म लेकर किसी धर्मात्मा की पुत्री बनूँगी। अगले जन्म में वह कन्या कमल के रूप में उत्पन्न हुई। उस सुन्दर कान्ति वाली कमल कन्या को एक दिन रावण अपने महलों में ले गया। उसे देखकर ज्योतिषियों ने कहा कि राजन्! यदि यह कमल कन्या आपके घर में रही तो आपके और आपके कुल के विनाश का कारण बनेगी। यह सुनकर रावण ने उसे समुद्र में फेंक दिया। वहाँ से वह भूमि को प्राप्त होकर राजा जनक के यज्ञमण्डप के मध्यवर्ती भूभाग में जा पहुँची। वहाँ राजा द्वारा हल से जोती जाने वाली भूमि से वह कन्या फिर प्राप्त हुई। वही वेदवती सीता के रूप में आपकी पत्‍नी बनी और आप स्वयं सनातन विष्णु हैं। इस प्रकार आपके महान शत्रु रावण को वेदवती ने पहले ही अपने शाप से मार डाला था. आप तो उसे मारने में केवल निमित्तमात्र थे।

"अनेक राजा महाराजाओं को पराजित करता हुआ दशग्रीव इक्ष्वाकु वंश के राजा अनरण्य के पास पहुँचा जो अयोध्या पर राज्य करते थे। उसने उन्हें भी द्वन्द युद्ध करने अथवा पराजय स्वीकार करने के लिये ललकारा। दोनों में भीषण युद्ध हुआ किन्तु ब्रह्माजी के वरदान के कारण रावण उनसे पराजित न हो सका। जब अनरण्य का शरीर बुरी तरह से क्षत-विक्षत हो गया तो रावण इक्ष्वाकु वंश का अपमान और उपहास करने लगा। इससे कुपित होकर अनरण्य ने उसे शाप दिया कि तूने अपने व्यंगपूर्ण शब्दों से इक्ष्वाकु वंश का अपमान किया है, इसलिये मैं तुझे शाप देता हूँ कि महात्मा इक्ष्वाकु के इसी वंश में दशरथनन्दन राम का जन्म होगा जो तेरा वध करेंगे। यह कहकर राजा स्वर्ग सिधार गये। "रावण की उद्दण्डता में कमी नहीं आई। राक्षस या मनुष्य जिसको भी वह शक्‍तिशाली पाता, उसी के साथ जाकर युद्ध करने करने लगता। एक बार उसने सुना कि किष्किन्धापुरी का राजा बालि बड़ा बलवान और पराक्रमी है तो वह उसके पास युद्ध करने के लिये जा पहुँचा। बालि की पत्‍नी तारा, तारा के पिता सुषेण, युवराज अंगद और उसके भाई सुग्रीव ने उसे समझाया कि इस समय बालि नगर से बाहर सन्ध्योपासना के लिये गये हुये हैं। वे ही आपसे युद्ध कर सकते हैं। और कोई वानर इतना पराक्रमी नहीं है जो आपके साथ युद्ध कर सके। इसलिये आप थोड़ी देर उनकी प्रतीक्षा करें। फिर सुग्रीव ने कहा कि राक्षसराज! सामने जो शंख जैसे हड्डियों के ढेर लगे हैं वे बालि के साथ युद्ध की इच्छा से आये आप जैसे वीरों के ही हैं। बालि ने इन सबका अन्त किया है। यदि आप अमृत पीकर आये होंगे तो भी जिस क्षण बालि से टक्कर लेंगे, वह क्षण आपके जीवन का अन्तिम क्षण होगा। यदि आपको मरने की बहुत जल्दी हो तो आप दक्षिण सागर के तट पर चले जाइये। वहीं आपको बालि के दर्शन हो जायेंगे।

"सुग्रीव के वचन सुनकर रावण विमान पर सवार हो तत्काल दक्षिण सागर में उस स्थान पर जा पहुँचा जहां बालि सन्ध्या कर रहा था। उसने सोचा कि मैं चुपचाप बालि पर आक्रमण कर दूँगा। बालि ने रावण को आते देख लिया परन्तु वह तनिक भी विचलित नहीं हुआ और वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करता रहा। ज्योंही उसे पकड़ने के लिये रावण ने पीछे से हाथ बढ़ाया, सतर्क बालि ने उसे पकड़कर अपनी काँख में दबा लिया और आकाश में उड़ चला। रावण बार-बार बालि को अपने नखों से कचोटता रहा किन्तु बालि ने उसकी कोई चिन्ता नहीं की। तब उसे छुड़ाने के लिये रावण के मंत्री और अनुचर उसके पीछे शोर मचाते हुये दौड़े परन्तु वे बालि के पास तक न पहुँच सके। इस प्रकार बालि रावण को लेकर पश्‍चिमी सागर के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने सन्ध्योपासना पूरी की। फिर वह दशानन को लिये हुये किष्किन्धापुरी लौटा। अपने उपवन में एक आसन पर बैठकर उसने रावण को अपनी काँख से निकालकर पूछा कि अब कहिये आप कौन हैं और किसलिये आये हैं? "रावण ने उत्तर दिया कि मैं लंका का राजा रावण हूँ। आपके साथ युद्ध करने के लिये आया था। वह युद्ध मुझे मिल गया। मैंने आपका अद्‍भुत बल देख लिया। अब मैं अग्नि की साक्षी देकर आपसे मित्रता करना चाहता हूँ। फिर दोनों ने अग्नि की साक्षी देकर एक दूसरे से मित्रता स्थापित की।"