Tuesday, August 20, 2013

परमाणु बम का जनक - सनातनी भारत

परमाणु बम का जनक - सनातनी भारत 



आधुनिक परमाणु बम का सफल परीक्षण 16 जुलाई 1945 को New Mexico के एक दूर दराज स्थान में किया गया था| 

इस बम का निर्माण अमेरिका के एक वैज्ञानिक Julius Robert Oppenheimer [ http://en.wikipedia.org/wiki/J._Robert_Oppenheimer ] के नेतृत्व में किया गया था 

Oppenheimer को आधुनिक परमाणु बम के निर्माणकर्ता के रूप में जाना जाता है, आपको ये जानकर आश्चर्य हो सकता है की इस परमाणु परीक्षण का कोड नाम Oppenheimer ने त्रिदेव (Trinity) रखा था,

परमाणु विखण्डन की श्रृंखला अभिक्रिया में २३५ भार वला यूरेनियम परमाणु,बेरियम और क्रिप्टन तत्वों में विघटित होता है। प्रति परमाणु ३ न्यूट्रान मुक्त होकर अन्य तीन परमाणुओं का विखण्डन करते है। कुछ द्रव्यमान ऊर्जा में परिणित हो जाता है। ऊर्जा = द्रव्यमान * (प्रकाश का वेग)२ {E=MC^2} के अनुसार अपरिमित ऊर्जा अर्थात उष्मा व प्रकाश उत्पन्न होते है। यहाँ देखें - [ http://www.facebook.com/photo.php?fbid=374856539304046&set=a.338314332958267.1073741828.100003391094649&type=1&theater ]

Oppenheimer ने महाभारत और गीता का काफी समय तक अध्ययन किया था और हिन्दू धर्मं शास्त्रों से वे बेहद प्रभावित थे १८९३ में जब स्वामी विवेकानन्द अमेरिका में थे, उन्होने वेद और गीता के कतिपय श्लोकों का अंग्रेजी अनुवाद किया।

यद्यपि परमाणु बम विस्फोटट कमेटी के अध्यक्ष ओपेन हाइमर का जन्म स्वामी जी की मृत्यु के बाद हुआ था किन्तु राबर्ट ने श्लोकों का अध्ययन किया था। वे वेद और गीता से बहुत प्रभावित हुए थे। वेदों के बारे में उनका कहना था कि पाश्चात्य संस्कृति में वेदों की पंहुच इस सदी की विशेष कल्याणकारी घटना है।

उन्होने जिन तीन श्लोकों को महत्व दिया वे निम्र प्रकार है।

१. राबर्ट औपेन हाइमर का अनुमान था कि परमाणु बम विस्फोट से अत्यधिक तीव्र प्रकाश और उच्च ऊष्मा होगी, जैसा कि भगवान कृष्ण द्वारा अर्जुन को विराट स्वरुप के दर्शन देते समय उत्पन्न हुआ होगा।

गीता के ग्यारहवें अध्याय के बारहवें श्लोक में लिखा है-

दिविसूर्य सहस्य भवेयुग पदुत्थिता यदि
मा सदृशीसा स्यादा सस्तस्य महात्मन: {११:१२ गीता}

अर्थात - आकाश में हजारों सूर्यों के एक साथ उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न होगा वह भी वह विश्वरुप परमात्मा के प्रकाश के सदृश्य शायद ही हो।

२. औपेन हाइमर के अनुसार इस बम विस्फोट से बहुत अधिक लोगों की मृत्यु होगी, दुनिया में विनाश ही विनाश होगा।

उस समय उन्होंने गीता के गीता के ग्यारहवें अध्याय के ३२ वें श्लोक में वर्णित बातों का सन्दर्भ दिया -

कालोस्स्मि लोकक्षयकृत्प्रवृध्दो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत:।
ऋ तेह्यपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येह्यवस्थिता: प्रत्यनीकेषु योधा:।। {११:३२ गीता}

अर्थात - मैं लोको का नाश करने वाला बढा हुआ महाकाल हूं। इस समय इन लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूं,अत: जो प्रतिपक्षी सेना के योध्दा लोग हैं वे तेरे युध्द न करने पर भी नहीं रहेंगे अर्थात इनका नाश हो जाएगा।

३. औपेन हाइमर के अनुसार बम विस्फोट से जहां कुछ लोग प्रसन्न होंगे तो जिनका विनाश हुआ है वे दु:खी होंगे विलाप करेंगे,जबकि अधिकांश तटस्थ रहेंगे। इस विनाश का जिम्मेदार खुद को मानते हुए वे दुखी हुए, परन्तु उन्होंने गीता में वर्णित कर्म के सिद्धांत का प्रतिपालन किया

उन्होंने गीता के सबसे प्रसिद्ध द्वितीय अध्याय के सैंतालिसवें श्लोक का सन्दर्भ दिया।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संङ्गोह्यस्त्वकर्माणि।। {२:४७ गीता}

अर्थात - तू कर्म कर फल की चिंता मत कर। तू कर्मो के फल हेतु मत हो, तेरी अकर्म में (कर्म न करने में) आसक्ति नहीं होनी चाहिए!

उन्होंने अपनी डायरी में स्वयं की मनोस्तिथि लिखी , और इस परीक्षण का कोड नेम इन्ही ३ श्लोको के आधार तथा भगवान ब्रम्हा विष्णु महेश के नाम पर ट्रिनिटी रखा...

तत्कालीन अमेरिकी सरकार नहीं चाहती थी की कोई और सभ्यता तथा संस्कृति आधुनिक परमाणु बम की अवधारणा का का श्रेय ले जाए.... इसीलिए इस परीक्षण के नामकरण की सच्चाई को उन्होंने Oppenheimer को छुपाने के लिए कहा.... परन्तु जापान में परमाणु बम गिरने के बाद Oppenheimer ने एक इंटरव्यू में ये बात स्वीकार की थी....... विकिपीडिया भी दबी जुबान में ये बात बोलता है... [ http://en.wikipedia.org/wiki/Trinity_(nuclear_test)#Name ]

इसके अतिरिक्त 1933 में उन्होंने अपने एक मित्र Arthur William Ryder, जोकि University of California, Berkeley में संस्कृत के प्रोफेसर थे, के साथ मिल कर भगवद गीता का पूरा अध्यन किया और परमाणु बम बनाया 1945 में | परमाणु बम जैसी किसी चीज़ के होने का पता भी इनको भगवद गीता, रामायण तथा महाभारत से ही मिला, इसमें कोई संदेह नहीं | Oppenheimer ने इस प्रयोग के बाद प्राप्त निष्कर्षों पर अध्यन किया और कहा की विस्फोट के बाद उत्पन विकट परिस्तियाँ तथा दुष्परिणाम जो हमें प्राप्त हुए है ठीक इस प्रकार का वर्णन भगवद गीता तथा महाभारत आदि में मिलता है |

बाद में Oppenheimer के खुलासे के बाद भारी पैमाने पर महाभारत और गीता आदि पर शोध किया गया उन्हें इस बात पर बेहद आश्चर्य हुआ की इन ग्रंथो में "ब्रह्माश्त्र" नामक अस्त्र का वर्णन मिलता है जो इतना संहारक था की उस के प्रयोग से कई हजारो लोग व अन्य वस्तुएं न केवल जल गई अपितु पिघल भी गई| ब्रह्माश्त्र के बारे में हमसे बेहतर कौन जान सकता है इसका वर्णन प्रत्येक पुराण आदि में मिलता है... जगत पिता भगवान ब्रह्मा द्वारा असुरो के नाश हेतु ब्रह्माश्त्र का निर्माण किया गया था...

इस शोध पर लिखी गई कई किताबो में से एक है : [ The Atoms of Kshatriyas http://www.amazon.com/The-Atoms-Kshatriyas-Azsacra-Zarathustra/dp/8182533309 ]

रामायण में भी मेघनाद से युद्ध हेतु श्रीलक्ष्मण ने जब ब्रह्माश्त्र का प्रयोग करना चाहा तब श्रीराम ने उन्हें यह कह कर रोक दिया की अभी इसका प्रयोग उचित नही अन्यथा पूरी लंका साफ़ हो जाएगी |

इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत में परमाण्विक बमों के प्रयोग होने के प्रमाणों की कोई कमी नही है । सिन्धु घाटी सभ्यता (मोहन जोदड़ो, हड़प्पा आदि) में अनुसन्धान से ऐसी कई नगरियाँ प्राप्त हुई है जो लगभग 5000 से 7000 ईसापूर्व तक अस्तित्व में थी| वहां ऐसे कई नर कंकाल इस स्थिति में प्राप्त हुए है मानो वो सभी किसी अकस्मात प्रहार में मारे गये हों... इनमें रेडिएशन का असर भी था | वह कई ऐसे प्रमाण भी है जो यह सिद्ध करते है की किसी समय यहाँ भयंकर ऊष्मा उत्पन्न हुई जो केवल परमाण्विक बम या फिर उसी तरह के अस्त्र से ही उत्पन्न हो सकती है

उत्तर पश्चिम भारत में थार मरुस्थल के एक स्थान में दस मील के घेरे में तीन वर्गमील का एक ऐसा क्षेत्र है जहाँ पर रेडियोएक्टिव्ह राख की मोटी सतह पाई जाती है। वैज्ञानिकों ने उसके पास एक प्राचीन नगर को खोद निकाला है जिसके समस्त भवन और लगभग पाँच लाख निवासी आज से लगभग 8,000 से 12,000 साल पूर्व किसी परमाणु विस्फोट के कारण नष्ट हो गए थे। एक शोधकर्ता के आकलन के अनुसार प्राचीनकाल में उस नगर पर गिराया गया परमाणु बम जापान में सन् 1945 में गिराए गए परमाणु बम की क्षमता से ज्यादा का था।

मुंबई से उत्तर दिशा में लगभग 400 कि.मी. दूरी पर स्थित लगभग 2,154 मीटर की परिधि वाला एक अद्भुत विशाल गड्ढा (crater), जिसकी आयु 50,000 से कम आँकी गई है, भी यही इंगित करती है कि प्राचीन काल में भारत में परमाणु युद्ध हुआ था। शोध से ज्ञात हुआ है कि यह गड्ढा crater) पृथ्वी पर किसी 600.000 वायुमंडल के दबाव वाले किसी विशाल के प्रहार के कारण बना है किन्तु इस गड्ढे (Crater) तथा इसके आसपास के क्षेत्र में उल्कापात से सम्बन्धित कुछ भी सामग्री नहीं पाई जाती। फिर यह विलक्षण गड्ढा आखिर बना कैसे? सम्पूर्ण विश्व में यह अपने प्रकार का एक अकेला गड्ढा (Crater) है।

महाभारत में सौप्तिक पर्व अध्याय १३ से १५ तक ब्रह्मास्त्र के परिणाम दिये गए है|

महाभारत युद्ध का आरंभ 16 नवंबर 5561 ईसा पूर्व हुआ और 18 दिन चलाने के बाद 2 दिसम्बर 5561 ईसा पूर्व को समाप्त हुआ उसी रात दुर्योधन ने अश्वथामा को सेनापति नियुक्त किया । 3 नवंबर 5561 ईसा पूर्व के दिन भीम ने अश्वथामा को पकड़ने का प्रयत्न किया ।

{ तब अश्वथामा ने जो ब्रह्मास्त्र छोड़ा उस अस्त्र के कारण जो अग्नि उत्पन्न हुई वह प्रलंकारी थी । वह अस्त्र प्रज्वलित हुआ तब एक भयानक ज्वाला उत्पन्न हुई जो तेजोमंडल को घिर जाने मे समर्थ थी ।

तदस्त्रं प्रजज्वाल महाज्वालं तेजोमंडल संवृतम ।। ८ ।। }

{ इसके बाद भयंकर वायु चलने लगी । सहस्त्रावधि उल्का आकाश से गिरने लगे ।
आकाश में बड़ा शब्द (ध्वनि ) हुआ । पर्वत, अरण्य, वृक्षो के साथ पृथ्वी हिल गई|

सशब्द्म्भवम व्योम ज्वालामालाकुलं भृशम । चचाल च मही कृत्स्ना सपर्वतवनद्रुमा ।। १० ।। अध्याय १४ }

यहाँ वेदव्यास जी लिखते हैं कि -

“जहां ब्रह्मास्त्र छोड़ा जाता है वहीं १२ वषों तक पर्जन्यवृष्ठी (जीव-जंतु , पेड़-पोधे आदि की उत्पति ) नहीं हो पाती

ये लिंक दे रहा हूँ इसे ओपन करके ध्यान पूर्वक पढ़ें -

http://www.bibliotecapleyades.net/ancientatomicwar/esp_ancient_atomic_07.htm

सनातनी भारत के विलक्षण विज्ञानं को नमन है...

Saturday, July 13, 2013

काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग

काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग

हाल ही में एक सेमिनार में प्रख्यात लेखिका कुसुमलता केडिया ने विभिन्न पश्चिमी पुस्तकों और शोधों के हवाले से यह तर्कसिद्ध किया कि विश्व की प्राचीनतम सभ्यताओं में बहुत गहरे अन्तर्सम्बन्ध रहे हैं। पुस्तक “फ़िंगरप्रिंट्स ऑफ़ द गॉड – लेखक ग्राहम हैन्नोक” तथा एक अन्य पुस्तक “1434″ (लेखक – गेविन मेनजीस) का “रेफ़रेंस” देते हुए उन्होंने बताया कि पश्चिम के शोधकर्ताओं को “सभ्यताओं” सम्बन्धी खोज करते समय अंटार्कटिका क्षेत्र के नक्शे भी प्राप्त हुए हैं, जो कि बेहद कुशलता से तैयार किये गये थे, इसी प्रकार कई बेहद प्राचीन नक्शों में कहीं-कहीं चीन को “वृहत्तर भारत” का हिस्सा भी चित्रित किया गया है। अब इस सम्बन्ध में पश्चिमी लेखकों और शोधकर्ताओं में आम सहमति बनती जा रही है कि पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व 12,000 वर्ष से भी पुराना है, और उस समय की कई सभ्यताएं पूर्ण विकसित थीं।

हालांकि “काबा एक शिव मन्दिर है”, इस लेखमाला का ऊपर उल्लेखित तथ्यों से कोई सम्बन्ध नहीं है, लेकिन जैसा कि केडिया जी ने कहा है कि विश्व का इतिहास जो हमें पढ़ाया जाता है या बताया जाता है अथवा दर्शाया जाता है, वह असल में ईसा पूर्व 4000 वर्ष का ही कालखण्ड है और Pre-Christianity काल को ही विश्व का इतिहास मानता है। लेकिन जब आर्कियोलॉजिस्ट और प्रागैतिहासिक काल के शोधकर्ता इस 4000 वर्ष से और पीछे जाकर खोजबीन करते हैं तब उन्हें कई आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं।

यह प्रश्न कई बार और कई जगहों पर पूछा गया है कि क्या मुस्लिमों का तीर्थ स्थल “काबा” एक हिन्दू मन्दिर है या था? इस बारे में काफ़ी लोगों को शक है कि आखिर काबा के बाहर चांदी की गोलाईदार फ़्रेम में जड़ा हुआ काला पत्थर क्या है? काबा में काले परदे से ढँकी हुई उस विशाल संरचना के भीतर क्या है? क्यों काबा के कुछ इलाके गैर-मुस्लिमों के लिये प्रतिबन्धित हैं? आखिर मुस्लिम काबा में परिक्रमा क्यों करते हैं? इन सवालों के जवाब में सबसे प्रामाणिक और ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों के साथ भारतीय इतिहासकार पीएन ओक तथा हिन्दू धर्म के प्रखर विद्वान अमेरिकी इतिहासकार स्टीफ़न नैप की साईटों पर कुछ सामग्री मिलती है। इतिहासकारों में पीएन ओक के निष्कर्षों को लेकर गहरे मतभेद हैं, लेकिन जैसे-जैसे नये-नये तथ्य, नक्शे और प्राचीन ग्रन्थों के सन्दर्भ सामने आते जा रहे हैं, हिन्दू वैदिक संस्कृति का प्रभाव समूचे पश्चिम एशिया और अरब देशों में था यह सिद्ध होता जायेगा। कम्बोडिया और इंडोनेशिया में पहले से मौजूद मंदिर तथा बामियान में ध्वस्त की गई बुद्ध की मूर्ति इस बात की ओर स्पष्ट संकेत तो करती ही है। हिन्दू संस्कृति के धुर-विरोधी इतिहासकार भी इस बात को तो मानते ही हैं कि इस्लाम के प्रादुर्भाव के पश्चात कई-कई मंदिरों और मूर्तियों को तोड़ा गया, लेकिन फ़िर भी संस्कृति की एक अन्तर्धारा सतत मौजूद रही जो कि विभिन्न परम्पराओं में दिखाई भी देती है।

पीएन ओक ने अपने एक विस्तृत लेख में इस बात पर बिन्दुवार चर्चा की है। पीएन ओक पहले सेना में कार्यरत थे और सेना की नौकरी छोड़कर उन्होंने प्राचीन भारत के इतिहास पर शोध किया और विभिन्न देशों में घूम-घूम कर कई प्रकार के लेख, शिलालेखों के नमूने, ताड़पत्र आदि का अध्ययन किया। पीएन ओक की मृत्यु से कुछ ही समय पहले की बात है, कुवैत में एक गहरी खुदाई के दौरान कांसे की स्वर्णजड़ित गणेश की मूर्ति प्राप्त हुई थी। कुवैत के उस मुस्लिम रहवासी ने उस मूर्ति को लेकर कौतूहल जताया था तथा इतिहासकारों से हिन्दू सभ्यता और अरब सभ्यता के बीच क्या अन्तर्सम्बन्ध हैं यह स्पष्ट करने का आग्रह किया था।

जब पीएन ओक ने इस सम्बन्ध में गहराई से छानबीन करने का निश्चय किया तो उन्हें कई चौंकाने वाली जानकारियाँ मिली। तुर्की के इस्ताम्बुल शहर की प्रसिद्ध लायब्रेरी मकतब-ए-सुल्तानिया में एक ऐतिहासिक ग्रन्थ है “सायर-उल-ओकुल”, उसके पेज 315 पर राजा विक्रमादित्य से सम्बन्धित एक शिलालेख का उल्लेख है, जिसमें कहा गया है कि “…वे लोग भाग्यशाली हैं जो उस समय जन्मे और राजा विक्रम के राज्य में जीवन व्यतीत किया, वह बहुत ही दयालु, उदार और कर्तव्यनिष्ठ शासक था जो हरे व्यक्ति के कल्याण के बारे में सोचता था। लेकिन हम अरब लोग भगवान से बेखबर अपने कामुक और इन्द्रिय आनन्द में खोये हुए थे, बड़े पैमाने पर अत्याचार करते थे, अज्ञानता का अंधकार हमारे चारों तरफ़ छाया हुआ था। जिस तरह एक भेड़ अपने जीवन के लिये भेड़िये से संघर्ष करती है, उसी प्रकार हम अरब लोग अज्ञानता से संघर्षरत थे, चारों ओर गहन अंधकार था। लेकिन विदेशी होने के बावजूद, शिक्षा की उजाले भरी सुबह के जो दर्शन हमें राजा विक्रमादित्य ने करवाये वे क्षण अविस्मरणीय थे। उसने अपने पवित्र धर्म को हमारे बीच फ़ैलाया, अपने देश के सूर्य से भी तेज विद्वानों को इस देश में भेजा ताकि शिक्षा का उजाला फ़ैल सके। इन विद्वानों और ज्ञाताओं ने हमें भगवान की उपस्थिति और सत्य के सही मार्ग के बारे में बताकर एक परोपकार किया है। ये तमाम विद्वान, राजा विक्रमादित्य के निर्देश पर अपने धर्म की शिक्षा देने यहाँ आये…”।

उस शिलालेख के अरेबिक शब्दों का रोमन लिपि में उल्लेख यहाँ किया जाना आवश्यक है…उस स्र्किप्ट के अनुसार, “…इट्राशाफ़ई सन्तु इबिक्रामतुल फ़ाहालामीन करीमुन यात्राफ़ीहा वायोसास्सारु बिहिल्लाहाया समाइनि एला मोताकाब्बेरेन सिहिल्लाहा युही किद मिन होवा यापाखारा फाज्जल असारी नाहोने ओसिरोम बायिआय्हालम। युन्दान ब्लाबिन कज़ान ब्लानाया सादुन्या कानातेफ़ नेतेफ़ि बेजेहालिन्। अतादारि बिलामासा-रतीन फ़ाकेफ़तासाबुहु कौन्निएज़ा माज़ेकाराल्हादा वालादोर। अश्मिमान बुरुकन्कद तोलुहो वातासारु हिहिला याकाजिबाय्माना बालाय कुल्क अमारेना फानेया जौनाबिलामारि बिक्रामातुम…” (पेज 315 साया-उल-ओकुल, जिसका मतलब होता है “यादगार शब्द”)। एक अरब लायब्रेरी में इस शिलालेख के उल्लेख से स्पष्ट है कि विक्रमादित्य का शासन या पहुँच अरब प्रायद्वीप तक निश्चित ही थी।

उपरिलिखित शिलालेख का गहन अध्ययन करने पर कुछ बातें स्वतः ही स्पष्ट होती हैं जैसे कि प्राचीन काल में विक्रमादित्य का साम्राज्य अरब देशों तक फ़ैला हुआ था और विक्रमादित्य ही वह पहला राजा था जिसने अरब में अपना परचम फ़हराया, क्योंकि उल्लिखित शिलालेख कहता है कि “राजा विक्रमादित्य ने हमें अज्ञान के अंधेरे से बाहर निकाला…” अर्थात उस समय जो भी उनका धर्म या विश्वास था, उसकी बजाय विक्रमादित्य के भेजे हुए विद्वानों ने वैदिक जीवन पद्धति का प्रचार तत्कालीन अरब देशों में किया। अरबों के लिये भारतीय कला और विज्ञान की सीख भारतीय संस्कृति द्वारा स्थापित स्कूलों, अकादमियों और विभिन्न सांस्कृतिक केन्द्रों के द्वारा मिली।

इस निष्कर्ष का सहायक निष्कर्ष इस प्रकार हैं कि दिल्ली स्थित कुतुब मीनार विक्रमादित्य के अरब देशों की विजय के जश्न को मनाने हेतु बनाया एक स्मारक भी हो सकता है। इसके पीछे दो मजबूत कारण हैं, पहला यह कि तथाकथित कुतुब-मीनार के पास स्थित लोहे के खम्भे पर शिलालेख दर्शाता है कि विजेता राजा विक्रमादित्य की शादी राजकुमारी बाल्हिका से हुई। यह “बाल्हिका” कोई और नहीं पश्चिम एशिया के बाल्ख क्षेत्र की राजकुमारी हो सकती है। ऐसा हो सकता है कि विक्रमादित्य द्वारा बाल्ख राजाओं पर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने उनकी पुत्री का विवाह विक्रमादित्य से करवा दिया हो।

अथवा, दूसरा तथ्य यह कि कुतुब-मीनार के पास स्थित नगर “महरौली”, इस महरौली का नाम विक्रमादित्य के दरबार में प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी मिहिरा के नाम पर रखा गया है। “महरौली” शब्द संस्कृत के शब्द “मिहिरा-अवली” से निकला हुआ है, जिसका अर्थ है “मिहिरा” एवं उसके सहायकों के लिये बनाये गये मकानों की श्रृंखला। इस प्रसिद्ध गणित ज्योतिषी को तारों और ग्रहों के अध्ययन के लिये इस टावर का निर्माण करवाया गया हो सकता है, जिसे कुतुब मीनार कहा जाता है।

अपनी खोज को दूर तक पहुँचाने के लिये अरब में मिले विक्रमादित्य के उल्लेख वाले शिलालेख के निहितार्थ को मिलाया जाये तो उस कहानी के बिखरे टुकड़े जोड़ने में मदद मिलती है कि आखिर यह शिलालेख मक्का के काबा में कैसे आया और टिका रहा? ऐसे कौन से अन्य सबूत हैं जिनसे यह पता चल सके कि एक कालखण्ड में अरब देश, भारतीय वैदिक संस्कृति के अनुयायी थे? और वह शान्ति और शिक्षा अरब में विक्रमादित्य के विद्बानों के साथ ही आई, जिसका उल्लेख शिलालेख में “अज्ञानता और उथलपुथल” के रूप में वर्णित है? इस्ताम्बुल स्थित प्रसिद्ध लायब्रेरी मखतब-ए-सुल्तानिया, जिसकी ख्याति पश्चिम एशिया के सबसे बड़े प्राचीन इतिहास और साहित्य का संग्रहालय के रूप में है। लायब्रेरी के अरेबिक खण्ड में प्राचीन अरबी कविताओं का भी विशाल संग्रह है। यह संकलन तुर्की के शासक सुल्तान सलीम के आदेशों के तहत शुरु किया गया था। उस ग्रन्थ के भाग “हरीर” पर लिखे हुए हैं जो कि एक प्रकार का रेशमी कपड़ा है। प्रत्येक पृष्ठ को एक सजावटी बॉर्डर से सजाया गया है। यही संकलन “साया-उल-ओकुल” के नाम से जाना जाता है जो कि तीन खण्डों में विभाजित किया गया है। इस संकलन के पहले भाग में पूर्व-इस्लामिक अरब काल के कवियों का जीवन वर्णन और उनकी काव्य रचनाओं को संकलित किया गया है। दूसरे भाग में उन कवियों के बारे में वर्णन है जो पैगम्बर मुहम्मद के काल में रहे और कवियों की यह श्रृंखला बनी-उम-मय्या राजवंश तक चलती है। तीसरे भाग में इसके बाद खलीफ़ा हारुन-अल-रशीद के काल तक के कवियों को संकलित किया गया है। इस संग्रह का सम्पादन और संकलन तैयार किया है अबू आमिर असामाई ने जो कि हारुन-अल-रशीद के दरबार में एक भाट था। “साया-उल-ओकुल” का सबसे पहला आधुनिक संस्करण बर्लिन में 1864 में प्रकाशित हुआ, इसके बाद एक और संस्करण 1932 में बेरूत से प्रकाशित किया गया।

यह संग्रह प्राचीन अरबी कविताओं का सबसे आधिकारिक, सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण संकलन माना जाता है। यह प्राचीन अरब जीवन के सामाजिक पहलू, प्रथाओं, परम्पराओं, तरीकों, मनोरंजन के तरीकों आदि पर पर्याप्त प्रकाश डालता है। इस प्राचीन पुस्तक में प्रतिवर्ष मक्का में आयोजित होने वाले समागम जिसे “ओकाज़” के नाम से जाना जाता है, और जो कि काबा के चारों ओर आयोजित किया जाता है, के बारे में विस्तार से जानकारियाँ दी गई हैं। काबा में वार्षिक “मेले” (जिसे आज हज कहा जाता है) की प्रक्रिया इस्लामिक काल से पहले ही मौजूद थी, यह बात इस पुस्तक को सूक्ष्मता से देखने पर साफ़ पता चल जाती है।

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है -
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है -

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

Thursday, July 11, 2013

क्यों मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

अनोखी है पर सच्ची है......

क्यों मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है भगवान जगन्नाथ का रथ?

मुसलिम भक्त को मंदिर में आने नहीं दिया गया तो भगवान खुद पहुंच गये भक्त के घर।
अगर आपको हैरानी हो रही है तो आप इस घटना की सच्चाई को खुद अपनी आंखों को देख सकते हैं।

10 जुलाई को इस साल भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकलेगी।

रास्ते में जगन्नाथ जी भक्त से मिलने के लिए रूकेंगे और फिर उनका रथ आगे बढ़ेगा।

यह सिलसिला बीते कई वर्षों से चला आ रहा है।
हर साल भगवान जगन्नाथ अपने भक्त की मजार पर रूकते हैं और बताते हैं कि जो भी सच्चे मन से उनकी भक्ति करेगा वह उनका अपना होगा।

भगवान जगन्नाथ का रथ जिस मुसलमान भक्त की मजार पर रूकता है उनका नाम सालबेग था।

सालबेग की माता हिंदू थी और पिता मुसलमान।

सालबेग बड़ा होकर मुगल सेना में शामिल हो गया।
एक बार जंग में इसे माथे पर ऐसा घाव हुआ जो किसी भी वैद्य से ठीक नहीं हुआ।

सेना से भी सालबेग को निकाल दिया गया।

इसके बाद सालबेग की मां ने भगवान जगन्नाथ की भक्ति करने की सलाह दी।

मां की बात मानकर सालबेग भगवान जगन्नाथ की भक्ति में डूब गया।

कुछ दिन बाद सपने में भगवान जगन्नाथ ने सालबेग को विभूति दिया।

सालबेग ने सपने में ही उस विभूति को सिर पर लगाया और जैसे ही नींद खुली उसने देख वह पूरी तरह स्वस्थ हो चुका है।
इसके बाद सालबेग भगवान जगन्नाथ का भक्त बन गया।

मगर मुसलमान होने के कारण सालबेग को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला।

भक्त सालबेग मंदिर के बाहर बैठकर जगन्नाथ की भक्ति करते और भक्ति पूर्ण गीत लिखते।

उड़िया भाषा में लिखे इनके भक्ति गीत धीरे- धीरे लोकप्रिय होने लगे और लोगों के जुबान पर चढ़ गये।
बावजूद इसके सालबेग को जब तक जीवित रहे मंदिर में प्रवेश नहीं मिला।

मृत्यु के बाद इन्हें जगन्नाथ मंदिर और गुंडिचामंदिर के बीच में दफना दिया गया।

सालबेग ने एक बार कहा था कि अगर मेरी भक्ति सच्ची है तो मेरे मरने के बाद भगवान जगन्नाथ मेरी मजार पर आकर मुझसे मिलेंगे।

सालबेग के मृत्यु के बाद जब रथ यात्रा निकली तो रथ इनके मजार के सामने आकर रूक गया।

लोगों ने लाख कोशिशें की लेकिन रथ अपने स्थान से हिला तक नहीं।

जब सभी लोग परेशान हो गये तब किसी व्यक्तिने उड़ीसा के राजा को भक्त सालबेग का जयकारा लगाने के लिए कहा।

सालबेग के नाम का जयघोष होते ही रथ अपने आप चल पड़ा।

इस घटना के बाद से ही यह परंपरा चली आ रही हैकि भक्त सालबेग की मजार पर जगन्नाथ जी का रथ कुछ समय के लिए रूकता है फिर आगे की ओर बढ़ता है

‪#‎Hindurashtra‬

Tuesday, July 9, 2013

कैलाश पर्वत .......दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डारक

कैलाश पर्वत .......दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी पर्वत, अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डारक

Axis Mundi (एक्सिस मुंडी ) .............प्रश्न पहेली रहस्य ...
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एक्सिस मुंडी को ब्रह्मांड का केंद्र, दुनिया की नाभि या आकाशीय ध्रुव और भौगोलिक ध्रुव के रूप में, यह आकाश और पृथ्वी के बीच संबंध का एक बिंदु है जहाँ चारों दिशाएं मिल जाती हैं। और यह नाम, असली और महान, दुनिया के सबसे पवित्र और सबसे रहस्यमय पहाड़ों में से एक कैलाश पर्वत से सम्बंधित हैं। एक्सिस मुंडी वह स्थान है अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है और आप उन शक्तियों के साथ संपर्क कर सकते हैं रूसिया के वैज्ञानिक ने वह स्थान कैलाश पर्वत बताया है।

भूगोल और पौराणिक रूप से कैलाश पर्वत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता हैं। इस पवित्र पर्वत की ऊंचाई 6714 मीटर है। और यह पास की हिमालय सीमा की चोटियों जैसे माउन्ट एवरेस्ट के साथ प्रतिस्पर्धा नहीं कर सकता पर इसकी भव्यता ऊंचाई में नहीं, लेकिन अपनी विशिष्ट आकार में निहित है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के चार दिक् बिन्दुओं के सामान है और एकान्त स्थान पर स्थित है जहाँ कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत पर चड़ना निषिद्ध है पर 11 सदी में एक तिब्बती बौद्ध योगी मिलारेपा ने इस पर चड़ाई की थी।

कैलाश पर्वत चार महान नदियों के स्त्रोतों से घिरा है सिंध, ब्रह्मपुत्र, सतलज और कर्णाली या घाघरा तथा दो सरोवर इसके आधार हैं पहला मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकर सूर्य के सामान है तथा राक्षस झील जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के सामान है। ये दोनों झीलें सौर और चंद्र बल को प्रदर्शित करते हैं जिसका सम्बन्ध सकारात्मक और नकारात्मक उर्जा से है। जब दक्षिण चेहरे से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिन्ह वास्तव में देखा जा सकता है.

कैलाश पर्वत और उसके आस पास के बातावरण पर अध्यन कर रहे रसिया के वैज्ञानिक Tsar Nikolai Romanov और उनकी टीम ने तिब्बत के मंदिरों में धर्मं गुरुओं से मुलाकात की उन्होंने बताया कैलाश पर्वत के चारों ओर एक अलौकिक शक्ति का प्रवाह होता है जिसमे तपस्वी आज भी आध्यात्मिक गुरुओं के साथ telepathic संपर्क करते है।

" In shape it (Mount Kailas) resembles a vast cathedral… the sides of the mountain are perpendicular and fall sheer for hundreds of feet, the strata horizontal, the layers of stone varying slightly in colour, and the dividing lines showing up clear and distinct...... which give to the entire mountain the appearance of having been built by giant hands, of huge blocks of reddish stone. "

(G.C. Rawling, The Great Plateau, London, 1905).

रूसिया के वैज्ञानिकों का दावा है की कैलाश पर्वत प्रकृति द्वारा निर्मित सबसे उच्चतम पिरामिड है। जिसको तीन साल पहले चाइना के वैज्ञानिकों द्वारा सरकारी चाइनीज़ प्रेस में नकार दिया था। आगे कहते हैं " कैलाश पर्वत दुनिया का सबसे बड़ा रहस्यमयी, पवित्र स्थान है जिसके आस पास अप्राकृतिक शक्तियों का भण्डार है। इस पवित्र पर्वत सभी धर्मों ने अलग अलग नाम दिए हैं। "

रूसिया वैज्ञानिकों की यह रिपोर्ट UNSpecial! Magzine में January-August 2004 को प्रकाशित की गयी थी।

With deep thanks to Mr. Wolf Scott, former Deputy Director of UNRISD,

Saturday, June 1, 2013

गीता की साँख्यिकी

गीता की साँख्यिकी - a statistics - 700 श्लोकों की गीता में धृतराष्ट्र ने केवल 1 श्लोक बोला, सँजय ने 41 बार बोला, अर्जुन 84 बार बोलता है, पूछता है, जो शायद 84 लाख योनियों को सँतुष्ट करने के लिये काफी है, अर्जुन की शब्दावली ही केवल अलग है, उसको कृष्ण से कहलवाना तो एक ही बात है कि "युद्ध न करना ही अच्छा है", तथा कृष्ण 574 बार बोलते हैं जवाब देते हैं जो उनकी धैर्यता की पराकाष्ठा का प्रतीक है, इस तरह से यह 700 श्लोकों की गीता समाप्त हो जाती है केवल पुस्तक में।

हम सभी के वास्तविक जीवन में और जन्म-जन्मान्तर यह गीता सँदेश गूँजता ही रहता है, क्यों कि इसका सँबंध कर्मों और कर्म फल के ग्यान से है जो कभी समाप्त नहीं हो सकता। आप पायेंगे कि धीरे धीरे अर्जुन प्रश्न पूछने के मामले में शिथिल होता जाता है अँत में पूर्ण रूपेण सँतुष्ट दिखाई देता है; जैसे पहले अध्याय में उसके 21 प्रश्न थे जो अंतिम अध्याय में प्रश्न ना होकर उत्तर हो जाते हैं - कि "मुझे स्मृति आ गयी है, मेरा "मोह" नष्ट हो गया है (18-73) अब मैं वही करुंगा जो तुम मुझे आदेश दोगे"।

यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि गीता में "क्षत्रीय" शब्द किसी शरीर आधारित धर्म या जाति के लिये प्रयोग नहीं हुआ है बल्कि देश की रक्षा करने वाले वीर के लिये ही प्रयोग हुआ है, जैसे ब्राम्हण् का कार्य है ग्यान देन, उसी तरह से क्षत्रीय का कार्य है अँतरिक एवम बाहरी शत्रुओं से देश की रक्षा करना। सारे वर्ण इसी आधार पर बने हुए हैं। जो ग्यान दे वह ब्राम्हण, जो रक्षा कर सके वह क्षत्रीय, जो व्यापार करे वह वैश्य और जो सेवा करे वह शूद्र, तो इस अर्थ में तो एक क्षत्रीय भी शूद्र ही होता है क्यों कि वह देश की सेवा करता है, और इस अर्थ में तो गीता के अनुसार सभी शूद्र हो जाते हैं क्यों कि सभी किसी ना किसी सेवा कार्य में व्यस्त रहते हैं।

जीवन भी एक यात्रा ही है, कई मुसाफिर मिलते हैं और बिछड जाते हैं, कई स्टेशन आते हैं और पीछे छूट जाते हैं, सभी अपने अपने गन्तव्य की ओर प्रस्थान कर रहे होते हैं, मुख्य मुद्दा है आत्मारूपी ड्राइवर का सदैव प्रसन्नचित्त रहना फिर यात्रा कितनी ही लंबी क्यों ना हो अखरती नहीं, खास करके यदि कोई अच्छा साथी भी मिल जाये इस यात्रा में तो सोने पे सुहागा।

गीता के सभी उपदेश इसी जीवन रूपी यात्रा को सुखद, और मंगलमय बनाने के लिये ही हैं, दुखों से छुडाने के लिये ही हैं।

अध्याय 1 से 5 तक जीवन की योजना क्या हो कैसी हो इस बारे में सुंदर मार्ग दर्शन मिलता है जीवन के महासिद्धांत और उनका पालन कैसे करें इसकी रूप रेखा की सुंदर चर्चा ग्यान योग, कर्म योग के द्वारा।

अध्याय 6 से 11 तक भक्ति की चर्चा है अलग अलग ढंग से और "गीता" के अनुसार भक्ति अर्थात "प्रेम" या कहें हम जो भी कार्य करते हैं उसे यदि पूरी तरह से इन्वौल्व होकर के करें उसमें पूरी आत्मा उंडेलें अपनी, तो उसे ही भक्ति योग कहा है,

तथा अध्याय् 11 में साक्षात भक्ति के दर्शन विश्वरूप दर्शन योग के माध्यम से हो जाते हैं।

12 वें अध्याय में साकार निराकार भक्तों के 39 लक्षण और तुलनात्मक अध्ययन्। भगवान की भक्ति करने वालों के लिये एक दर्पण या आईना है यह अध्याय, जो हमारी आँखें भी खोल सकता है और हम शर्म से पानी पानी भी हो सकते हैं यदि हम देखें कि दिये हुए लक्षणों या गुणों में से हम में अधिकतर गुण नदारद हैं या कहें एकभी लक्षण नहीं है तो।

13वें अध्याय में ग्यान का महत्वपूर्ण विभाग - आत्मा को शरीर से प्रथक करने के बारे में ही है तथा कर्म फल में अनासक्ति का सुंदर वर्णन।

14 वां अध्याय सतो रजो तमो गुणों से अतीत बनने का नुस्खा बताता है।

15वां अध्याय तो भगवान के अनुसार एक शास्त्र ही है जिसमें जीवन की पूर्णता समाई हुई है- देखें अंतिम श्लोक 20वां - इतिगुह्यतमम शास्त्रं...।

16वां अध्याय - भलाई बुराई के बारे में, अर्थात जीवन में क्या छोडना और क्या पकडना चाहिये इसकी सुंदर व्याख्या करता है। 26 दैवी गुण धारण करने के लिये प्रेरणा, और यदि एक भी अच्छे से धारण कर लिया तो भी बेडा पार समझें क्यों कि बाकी उसके पीछे पीछे चले आयेंगे और जीवन सरल हो जायेगा।

17वां अध्याय जीवन का कार्यक्रम सुचारू रूप से चलाने के बारे में है और यह कि हम ऋण मुक्त कैसे हों।

18वां अध्याय पटाक्षेप और सभी पिछले 17 अध्यायों का सार है, और इसी अध्याय में भगवान ने कहा है कि - "मरने के बाद तो सभी मुझे प्यारे हो ही जाते हैं जैसा कि आप लोग भी कहते ही हो ना (मरने के बाद कहते हैं ना कि भगवान को प्यारा हो गया), किंतु मुझे इस पृथ्वी पर उससे अधिक प्यारा और कोई नहीं हो सकता जो "जीते जी" इस गीता ग्यान का प्रचार प्रसार मानव कल्याण के लिये करेगा (न च तस्मान्मनुश्येशू....18/69)।

इसीलिये मैंने जीते जी भगवान का प्यारा होने की ठानी है, मरने के बाद की कौन जाने ? मरने के बाद आजतक कोई भी बताने नहीं आया —

ब्रह्माण्ड की कुल आयु

28 वे महायुग के तीन युग (सत्युग, त्रेता, दवापर) बीत चुके है!
1 महायुग = 4,320,000
कलि महायुग का 10 % होता है =4,320,000*(10 /100 ) =4,32,000
कलि अभी चल रहा है इसलिए इसे महायुग मेसे घटा देते है =

4,320,000-4,32,000= 3888000 वर्ष, 28 वे महायुग के बीत चुके है ।

बिता हुआ समय = 27 महायुग + 3888000 वर्ष

उपरोक्त समय 7 वे मन्वन्तर का है । इससे पहले 6 मन्वन्तर पुरे बीत चुके है ।
6 मन्वन्तर = 426 महायुग {चूँकि 1 मन्वन्तर = 71 महायुग }

बिता हुआ समय = 426 महायुग +27 महायुग + 3888000 वर्ष।

ध्यान रहे हमें नियतांक और शामिल करना होगा । वेदों के अनुसार ब्रह्मा के प्रत्येक मन्वन्तर के मध्य 4 युगों का समय अंतराल होता है ।
6 मन्वन्तरों में कुल अन्तराल = 6 * 4 = 24 युग
=2.4 महायुग {चूँकि कलि युग महायुग का 10 % भाग होता है}

बिता हुआ समय = 2.4 महायुग+426 महायुग +27 महायुग + 3888000 वर्ष।

अब हम ब्रह्मा के 51 वे वर्ष के 1 दिन तक की गणना कर चुके है । इससे पीछे नही जाना क्यू की इससे पीछे
ब्रह्मा के 50 वे वर्ष का 360 वां दिन की रात्रि आ जायेगी , रात्रि मतलब विनाश । और उसे भी पूर्व जायेंगे तो
ब्रह्मा के 50 वे वर्ष का 360 वां दिन आ जायेगा, वो दिन इस दिन से भिन्न है अर्थात ब्रह्मा का वो स्वप्न इस स्वप्न से भिन्न है अर्थात वो ब्रह्माण्ड इस ब्रह्माण्ड का भूतपूर्व है ।

इस ब्रह्माण्ड की कुल आयु = 2.4 महायुग+426 महायुग +27 महायुग + 3888000 वर्ष।
= 455.4 महायुग+ 3888000 वर्ष।
= 455.4 * 4,320,000 + 3888000 वर्ष {चूँकि 1 महायुग =4,320,000 }
=1972944000 वर्ष

इस कलि के 5000 वर्ष बित चुके है यदि उन्हें भी जोड़े तो ब्रह्माण्ड की कुल आयु =
1972944000 वर्ष + 5000
=1972949000 वर्ष !

मनुष्यको दुःख देनेवाला खुदका संकल्प है

मनुष्यको दुःख देनेवाला खुदका संकल्प है । ऐसा होना चाहिये और ऐसा नहीं होना चाहिये‒यह जो मनकी धारणा है, इसीसे दुःख होता है । अगर वह संकल्प छोड़ दे तो एकदम योग (समता) की प्राप्ति हो जायगी‒‘सर्वसंकल्पसन्न्यासी योगारूढस्तदोच्यते’ (गीता ६/४) । अपना ही संकल्प करके आप दुःख पा रहा है मुफ्तमें ! संकल्पोंका कायदा यह है कि जो संकल्प पूरे होनेवाले हैं, वे तो पूरे होंगे ही और जो नहीं पूरे होनेवाले हैं, वे पूरे नहीं होंगे, चाहे आप संकल्प करें अथवा न करें । सब संकल्प किसीके भी पूरे नहीं हुए, और ऐसा कोई आदमी नहीं है, जिसका कोई संकल्प पूरा नहीं हुआ । तात्पर्य है कि कुछ संकल्प पूरे होते हैं और कुछ संकल्प पूरे नहीं होते‒यह सबके लिये एक सामान्य विधान है । जैसा हम चाहें, वैसा ही होगा‒यह बात है नहीं । जो होना है, वही होगा ।
होइहि सोइ जो राम रचि राखा ।
को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥
(मानस १/५२/४)


इसलिये अपना संकल्प रखना दुःखको, पराधीनताको निमन्त्रण देना है । अपना कुछ भी संकल्प न रखें तो होनेवाला संकल्प पूरा हो जायगा । जैसा तुम चाहो वैसा ही हो जाय‒यह हाथकी बात नहीं है । अतः संकल्प करके क्यों अपनी इज्जत खोते हो ? कुछ आना-जाना नहीं है ! अगर मनुष्य संकल्पोंका त्याग कर दे तो योगारूढ़ हो जाय, तत्त्वकी प्राप्ति हो जाय; जो कुछ बड़ा-से-बड़ा काम है, वह हो जाय; यह मनुष्य जन्म सफल हो जाय, कुछ भी करना, जानना और पाना बाकी नहीं रहे ! अतः अपना संकल्प कुछ नहीं रखो । वह संकल्प चाहे भगवान्‌के संकल्पपर छोड़ दो, चाहे संसारके संकल्पपर छोड़ दो, चाहे प्रारब्ध (होनहार) पर छोड़ दो और चाहे प्रकृतिपर छोड़ दो* । जो अच्छा लगे, उसीपर छोड़ दो तो दुःख मिट जायगा । भगवान्‌पर छोड़ दो तो जैसा भगवान्‌ करेंगे, वैसा हो जायगा । संसारपर छोड़ दो तो संसार (माता-पिता, भाई-बन्धु, कुटुम्ब-परिवार आदि) की जैसी मर्जी होगी, वैसे हो जायगा । अपने प्रारब्धपर छोड़ दो तो प्रारब्धके अनुसार जैसा होना है, वैसा हो जायगा । अपना कोई संकल्प नहीं करना है । अपना संकल्प रखकर बन्धनके सिवाय और कुछ कर नहीं सकते । होगा वही जो भगवान्‌ करेंगे, जो प्रारब्धमें है अथवा जो संसारमें होनेवाला है ।


भगवान्‌ने कहा है‒‘कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन’ (गीता २/४७)‘कर्तव्य-कर्म करनेमें ही तेरा अधिकार है, फलोंमें कभी नहीं ।’ ऐसा करेंगे और ऐसा नहीं करेंगे, शास्त्रसे विरुद्ध काम नहीं करेंगे‒इसमें तो स्वतन्त्रता है, पर दुःखदायी और सुखदायी परिस्थिति तो आयेगी ही; आप चाहो तो आयेगी, न चाहो तो आयेगी । करनेमें सावधान रहना है । शास्त्रकी, सन्त-महात्माओंकी आज्ञाके अनुसार काम करना है । इसमें कोई भूल होगी तो वह मिट जायगी । कभी भूलसे कोई विपरीत कार्य हो भी जायगा तो वह ठहरेगा नहीं, टिकेगा नहीं, मिट जायगा । खास बात इतनी करनी है कि अपना संकल्प नहीं रखना है । अपना कोई संकल्प न रहे तो आदमी सुखी हो जाय । ‘यूँ भी वाह-वा है और वूँ भी वाह-वा है’ ऐसा हो जाय तो भी ठीक, वैसा हो जाय तो भी ठीक !
रज्जब रोष न कीजिये, कोई कहे क्यों ही ।
हँसकर उत्तर दीजिये, हाँ बाबाजी यों ही

Tuesday, May 28, 2013

भक्ति का तत्त्व

भक्ति का तत्त्व

[ १ ] भगवान शरणागत भक्त से कभी अलग नहीं हो सकते | भगवान का सर्वस्व उसका हो जाता है | वह परम पवित्र हो जाता है , उसके दर्शन , भाषण और चिंतन से भी लोग पवित्र हो जाते हैं | वह तीर्थों के लिए तीर्थरूप बन जाता है | उसके संम्पूर्ण अवगुण , पाप , और दुखों का अत्यंत नाश हो जाता है और उसके आनंद और शान्ति का पार नहीं रहता |

[ २ ] नवधा - भक्ति का तत्त्व रहस्य महापुरुषों से समझकर श्रद्धा और प्रेमपूर्वक तत्परता के साथ भक्ति का साधन करना चाहिए | बिना अभ्यास किये साधक प्रेमलक्षणा भक्ति का सच्चा पात्र नहीं बन सकता | ईश्वर की स्मृति निरंतर रहनी चाहिए | भगवान के स्मरण के अभ्यास से पापी का भी एक क्षण में उद्धार हो सकता है | 


[ ३ ] भगवान में चित्त लगाकर भगवान के लिए ही कर्म करनेवाले को भगवान की कृपा से भगवान शीघ्र मिल जाते हैं , यह बात जगह - जगह गीता में भगवान ने कही है [ ८ / ७ ; ११ / ५५ ; १२ / ६ , ७ , ८ ; १८ / ५६ , ५७ ,५८; १८ / ६२ ] | सब काम करते हुए निरंतर भगवतस्मरण करने की चेष्टा करनी चाहिए | स्मरण तेलधारावत लगातार होना चाहिए |


[ ४ ] भगवान के किये हुए प्रत्येक विधान में निरंतर उनका स्मरण करता हुआ परम संतोष मानकर हर समय प्रसन्न रहे | अपने मस्तक पर प्रभु का हाथ समझकर आनन्दित होता रहे | सबसे मुख्य बात है अनन्य मनसे युक्त होकर भगवान को निरंतर भजना | अनन्य भजन का स्वरूप भगवान ने गीता [ ९ / १४ ] में बतलाया है | नित्य - निरंतर चिंतन ही मुख्य है |


[ ५ ] भगवान का साक्षात दर्शन तो अनन्य भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी उपाय से नहीं हो सकता [ गीता ११ / ५४ ] | अनन्य भक्त को भक्ति का तत्त्व परमेश्वर स्वयं समझा देते हैं | 

[ ६ ] यदि घर में एक भी पुरुष को अनन्य भक्ति से परमात्मा का साक्षात्कार हो जाय तो उसका समस्त कुल पवित्र समझा जाता है | भक्ति के द्वारा सब कुछ हो सकता है | साकार भगवान नेत्रों से देखे जाते हैं , सगुण - निराकार बुद्धि द्वारा समझे जाते हैं और निर्गुण - निराकार अनुभव से प्राप्त किये जाते हैं | ज्ञानरूप नेत्रोंवाले ज्ञानीजन ही भगवान को तत्त्व से जान सकते हैं | 

[ ७ ] केवल भगवान के नाम का जप , उनके स्वरूप का पूजन और ध्यान करने से भी अति उत्तम गति की प्राप्ति हो सकती है | 

[ ८ ] अनन्य - भक्त को भगवान स्वयं ज्ञान प्रदान कर उसके अज्ञानरुपी अंधकार का नाश कर देते हैं | भक्त जिस रूप में उन्हें देखना चाहता है , वे उसी रूप में प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन देते हैं | 

[ ९ ] श्री नरसी मेहता की तरह लज्जा , मान , बडाई और भय को छोड़कर भगवान के गुण - गान में मग्न होकर विचरने से भगवान प्रत्यक्ष मिल सकते हैं | कहते हैं कि मेहताजी के जीवन में कुल ५४ बार भगवान सशरीर प्रकट हुए और उनका कार्य सिद्ध किया | 

[ १० ] दयामय भगवान केवल भाव के भूखे हैं | भावरहित के लिए उनका द्वार सदा बंद है | 

[ ११ ] उपासना या भक्तिमार्ग बड़ा ही सुगम और महत्त्वपूर्ण है | इसमें ईश्वर का सहारा रहता है और उनका बल प्राप्त होता रहता है | 

[ १२ ] सात्विक आचरण और भगवान की विशुद्ध भक्ति से अंत:करण की शुद्धि होने पर , जिस समय भ्रम मिट जाता है उस समय साधक कृत - कृत्य हो जाता है , यही परमात्मा की प्राप्ति है | 

[ १३ ] भक्ति के लिए भगवान ने पहली शर्त यह बतलाई है की भक्ति के साधन करनेवालों को दैवी - संपत्ति का आश्रय लेना चाहिए | 

[ १४ ] भक्ति दिखाने की चीज नहीं है , वह तो हृदय का परम गुप्त धन है | भक्ति का स्वरूप जितना गुप्त रहता है , उतना ही वह अधिक मूल्यवान समझा जाता है | 

[ १५ ] गीता का प्रारंभ [ २/ ७ ] और पर्यावसान [ १८ / ६६ ] भक्ति में ही है | इसलिए वास्तव में भगवान में अनन्य प्रेम का होना ही भक्ति है | 

[ १६ ] अतिशय समता , शान्ति , दया , प्रेम , क्षमा , माधुर्य , वात्सल्य , गम्भीरता , उदारता , सुहृदता आदि भगवान के गुण हैं | 

[ १७ ] सम्पूर्ण विभूति , बल , ऐश्वर्य , तेज , शक्ति , सामर्थ्य और असम्भव को भी सम्भव कर देना आदि भगवान का प्रभाव है | 

[ १८ ] जैसे परमाणु , भाप , बादल , बूँदें , और बर्फ आदि सब जल ही हैं , वैसे ही सगुण , निर्गुण , साकार , निराकार , व्यक्त , अव्यक्त , जड , चेतन , स्थावर , जंगम , सत , असत , आदि जो कुछ भी है तथा जो इससे भी परे है , वह सब भगवान ही है | यह भगवान का तत्त्व है |

[ १९ ] भगवान के दर्शन , भाषण , स्पर्श , चिंतन , कीर्तन , अर्चन , वन्दन , स्तवन आदि से पापी भी परम पवित्र हो जाता है , यह विश्वास करना तथा सर्वज्ञ , सर्वशक्तिमान , सर्वत्र समभाव से स्थित मनुष्य आदि शरीरों में प्रकट होनेवाले और अवतार लेनेवाले परमात्मा को पहचानना , यह रहस्य है | 

[ २० ] भक्ति से ज्ञान - वैराग्य आप ही हो सकते हैं क्योंकि भक्ति माता है और ज्ञान - वैराग्य दोनों उसके पुत्र हैं | अत: भक्ति में ही सुख है | 

Saturday, May 18, 2013

भगवान पर विश्वास रखे

भगवद्भक्ति के पथपर चलने वाले पुरुषों को अपने मन में खूब उत्साह रखना चाहिये | इस बात का सदा स्मरण रखना चाहिये की समस्त विघ्नों के नाश करने वाले और साधन में सतत सहायता पहुँचानेवाले भगवान हमारे पीछे स्तिथ रहकर सदा हमारी रक्षा करते है | रणांगनमें रण-प्रवृत योद्धाके मन में इस स्मृति से महान उत्साह बना रहता है की मेरे पीछे विशाल सैन्यको साथ लिये सेनापति स्थित है | भक्तों को तो इससे भी अनन्तगुण अधिक उत्साह होना चाहिये | क्योंकि उसके पीछे अनन्त शक्ति-संपन्न भगवान का बल है | शक्तिशाली सैन्य का सहारा पाकर जब निर्बल भी बलवान बन जाता है, जब कायर भी शूरवीर-सा काम कर दिखाता है | निर्बल, निरुत्साही मनुष्य इस बात को भली-भाँती समझता हुआ ही मुझमे बड़ीभारी शत्रु-सेना का सामना करने की शक्ति नहीं है, किन्तु शत्रु-सेना की अपेक्षा अपनी सेना को अधिक बलवती देखकर उसके भरोसे लड़ने को तैयार हो जाता है | फिर, जिसके भगवान सहायक हो उसको तो भीषण विषय-सैन्य को तुच्छ समझकर उसके नाश के लिए बद्ध-परिकर ही हो जाना चाहिये | परमात्मा श्रीकृष्ण अपने प्रेमी भक्तों को आश्वासन देते हुए घोषणा करते है ‘जो अनन्यभाव से मुझमे स्थित हुए भक्तजन मुझ परमेश्वर को निरन्तर चिन्तन करते हुए निष्काम भाव से भजते है, उन नित्य एकीभाव में मुझमे स्थिति वाले पुरुषों को योगक्षेम मैं स्वयं प्राप्त करा देता हूँ | 

भगवान की इस घोषणा पर विश्वासकर कठिन-से-कठिन मार्गपर अग्रसर होने में संकोच नहीं करना चाहिये | शंख, चक्र, गदा आदि धारण करनेवाले भगवान जब हमारे प्राप्त साधन की रक्षा और अप्राप्त की प्राप्ति करने का स्वयं जिम्मा ले रहे हैं, जब पद-पद पर हमे बचाने के लिए तैयार है, तब इस घोर अंधकारमय संसार-अरण्य से भर निकलने के लिए हमने जिस साधनमय पथ का अवलंबन किया है, उसमे विघ्न करने वाले काम-क्रोध-रूप सिंह-व्याघ्रादी से भय करने की क्या आवश्यकता है ? जब भगवान सदा-सर्वदा हमारे है तब भय किस बात का ? जैसे छोटा बालक माता की गोद में आते ही अपने को निर्भय और निश्चिन्त मानता है, इसी प्रकार हमे भी अपने को परमपिता परमात्मा की गोद में स्थित समझकर निर्भय और निश्चिन्त रहना चाहिये | भगवान तो बल, प्रेम, सुहृदयता आदि में सभी प्रकार सबसे अधिक है | कारण, ये सारे सद्गुण उन्हीं गुणसागरके तो गुण-कण है अतएव सब तरह से शोक, भय आदि को त्याग कर, बड़े उत्साह और उमंग के साथ एक वीर की भाँती अपने अभीष्ट मार्ग पर द्रुतगति से अग्रसर होना चाहिये |

यह सदा स्मरण रखना चाहिये की जिस प्रकार भक्तप्रवर अर्जुन ने भगवान को सहायता से भीष्म, द्रोण, कर्ण आदि द्वारा सुरक्षित ग्यारह अक्षोहिणी कौरव-सेना को विध्वंशकर विजय प्राप्त की थी, उसी प्रकार उनकी सहायता से हम भी काम-क्रोधादिरूप कौरव-सेना का सहज ही में विनाशकर परमात्मा की प्राप्तिरूप सच्चे स्वराज्य को प्राप्त कर सकते है | बस, भगवान को अपना सच्चा अवलम्बन बनाकर भीमार्जुन की भाँती प्राणविसर्जन तक का प्रणकर भगवदाज्ञानुसार कार्यक्षेत्र में अवतीर्ण होने भर की देर है | 

Wednesday, May 15, 2013

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है | भूत और भविष्य गौओं के ही हाथ में है | वे ही सदा रहने वाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मी की जड हैं | गौओं की सेवा में जो कुछ दिया जाता है, उसका फल अक्षय होता है | अन्न गौओं से उत्पन्न होता है, देवताओं को उत्तम हविष्य (घृत) गौएँ देती है तथा स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषटकार (इन्द्रयाग) भी सदा गौओं पर ही अवलंबित है | गौएँ ही यज्ञ का फल देने वाली है | उन्हीं में यज्ञौ की प्रतिष्ठा है | ऋषियों को प्रात:काल और सांयकाल में होम के समय गौएँ ही हवंन के योग्य घृत आदि पदार्थ देती है | जो लोग दूध देने वाली गौ का दान करते है, वे अपने समस्त संकटों और पाप से पार हो जाते है | जिनके पास दस गायें हो वह एक गौ का दान करे,जो सौ गाये रखता हो, वह दस गौ का दान करे और जिसके पास हज़ार गौएँ मौजूद हो, वह सौ गाये दान करे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है |

जो सौ गौओं का स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हज़ार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कंजूसी नहीं छोड़ता-ये तीनो मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पाने के अधिकारी नही है |
प्रात:काल और सांयकाल में प्रतिदिन गौओं को प्रणाम करना चाहिये | इससे मनुष्य के शरीर और बल की पुष्टि होती है | गोमूत्र और गोबर देखर कभी घ्रणा न करे | गौओं के गुणों का कीर्तन करे | कभी उसका अपमान न करे | यदि बुरे स्वप्न दीखायी दे तो गोमाता का नाम ले | प्रतिदिन शरीर में गोबर लगा के स्नान करे | सूखे हुए गोबर पर बैठे | उस पर थूक न फेकें | मल-मूत्र न त्यागे | गौओं के तिरस्कार से बचता रहे | अग्नि में गाय के घृत का हवन करे, उसीसे स्वस्तिवाचन करावे | गो-घृत का दान और स्वयं भी उसका भक्षण करे तो गौओं की वृद्धि होती हैं | (महा० अनु० ७८ |५-२१)

गौओं को यज्ञ का अंग और साक्षात् यज्ञस्वरूप बतलाया गया है | इनके बिना यज्ञ किसी तरह नहीं हो सकता | ये अपने दूध और घी से प्रजा का पालन-पोषण करती है तथा इनके पुत्र (बैल) खेती के काम आते है और तरह तरह के अन्न एवं बीज पैदा करते है, जिनसे यज्ञ संपन्न होते है और हव्य-कव्य का भी काम चलता है | इन्हीं से दूध, दही और घी प्राप्त होते है | ये गौए बड़ी पवित्र होती है और बैल भूक प्यास कष्ट सह कर अनेको प्रकार के बोझ ढोते रहते है | इस प्रकार गौ-जाति अपने काम से ऋषियों तथा प्रजाओं का पालन करती रहती है | उसके व्यवहार में शठता या माया नहीं होती | वह सदा पवित्र कर्म में लगी रहती है | इसी से ये गौएँ हम सब लोगों के उपर स्थान में निवास करती है | इसके सिवा गौएँ वरदान भी प्राप्त कर चुकी है तथा प्रसन्न होने पर वे दूसरों को वरदान भी देती है | (महा० अनु० ८३ |१७-२१)

गौएँ सम्पूर्ण तपस्विओं से भी बढकर है | इसलिए भगवान शंकर ने गौओं के साथ रहकर तप किया था | जिस ब्रह्मलोक में सिद्ध ब्रह्मर्षि भी जाने की इच्छा करते हैं, वहीँ ये गौएँ चन्द्रमा के साथ निवास करती है | ये अपने दूध, दही, घी, गोबर, चमड़ा, हड्डी, सींग और बालों से भी जगत का उपकार करती है | इन्हें सर्दी, गर्मी और वर्षा का कष्ट विचलित नहीं करता | ये गौएँ सदा ही अपना काम किया करती है | इसलिए ये ब्राह्मणों के साथ ब्रह्मलोक में जाकर निवास करती है | इसे से गौ और ब्राह्मण को विद्वान पुरुष एक बताते है | (महा० अनु० ६६ |३७-४२)

Tuesday, May 14, 2013

प्रभु पर विश्वास कैसे हो ?

प्रश्न यह है कि प्रभु पर विश्वास कैसे हो ? बच्चे को कैसे विश्वास हो जाता है कि अमुक मेरी माँ है ! बच्चा जब क्रन्दन करता है तब सभी को उससे सहानूभूति होती है पर जो भागती हुयी आती है, वह ही उसकी माँ है; ठीक इसी प्रकार जब माँ पुकारे तो सैकड़ों बच्चों की भीड़ में से भी जॊ भागकर जाये और माँ के आँचल में छुप जाये, वही उस माँ का बालक है। जब इस नश्वर जगत में हम स्वीकार कर लेते हैं कि अमुक मेरी माँ है और अमुक पिता। हमारा मन उसी समय यह भी बिना किसी के बताये, यह स्वीकार कर लेता है कि वे जो भी सॊचेंगे, हमारे भले की ही सोचेंगे। तब भला, जब सारे संत कह रहे हैं कि प्रभु, हमारे पिता, माता, बंधु, सखा, प्रियतम, लाला इत्यादि हैं तो भी हम विश्वास नहीं कर पा रहे, इसका कारण इस दास की अल्पबुद्धि से परे है क्यॊंकि कभी भी दास के साथ ऐसी स्थिति आयी ही नहीं। अब दुविधा यह है कि जाके पैर न फ़टी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। दास का मानना है कि यदि तनिक भी संदेह है तो विश्वास है ही नहीं। विश्वास के साथ संदेह का होना ऐसा ही है जिस प्रकार सूर्य और अंधकार का एक साथ होना, जो संभव ही नहीं है। प्रेम और विश्वास जब भी होंगे, १००% ही होंगे, कम हो ही नहीं सकते। यह पूर्ण ब्रह्म का ही एक रूप है, या तो पूर्ण होगा या नहीं। जब तक संदेह है तभी तक की ही देरी है। मैं देह नहीं हूँ, देह से अधिक महत्वपूर्ण उसी चेतन का अंश हूँ। मैं बूँद हूँ, वह सागर है, प्रभु ने कृपा करके हमें अपनी लीला में सम्मिलित किया है; वह निर्देशक हैं, मैं एक पात्र। मेरा प्रयास यही हो कि मैं निर्देशक पर पूर्ण विश्वास रखते हुए अपने पात्र के अनूकूल अभिनय करूँ और उस अभिनय को इतनी सम्पूर्णता, लगन से करूँ कि जब स्टॆज से ग्रीनरूम में जाऊँ तो निर्देशक प्रसन्न होकर मेरी पीठ पर हाथ फ़ेरे और आगे भी अपने साथ ही रखे। यदि मैने निर्देशक पर विश्वास न करते हुए अपने संवाद या वेशभूषा बदल दी जो पात्र के अनूकूल न हो तो क्या हश्र होगा। पात्र की तो सुताई जनता करेगी ही, निर्देशक भी उसके नाम से हाथ जोड़ देगा।
जैसे किसी नाटक में अलग-अलग स्वाँग धरकर लोग आते हैं और अपनी-अपनी भूमिका निभाकर चले जाते हैं, वैसे ही इस संसाररुपी नाटक में हम लोग आते हैं, सम्बन्ध जोड़ते हैं और अपनी भूमिका पूरी होते ही चले जाते हैं। रंगमंच पर पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका, भाई-बहन, नौकर-मालिक की भूमिका करने वाले, नाटक समाप्त होने के बाद अपने पूर्व रुप में आ जाते हैं और अपने द्वारा अभिनीत पात्रों के अनुसार ही आपस में आचरण नहीं करते। यहाँ वास्तव में कोई किसी का पिता या पुत्र नहीं है। एकमात्र परमात्मा ही सबके परम पिता हैं। प्रभु के लीलामय रंगमंच के पात्र बने हम कभी कोई चेहरा लगाकर कोई पात्र निभा रहे हैं और कभी कोई। इस आनंदमयी लीला में पात्र भी निर्देशक का सानिध्य पाकर अभिभूत हैं और दर्शक भी। सत्य तो यह है कि प्रभु, विश्वास तो करने से ही होता है।
सड़कों पर मदारी, एक छोटे बच्चे के साथ कुछ विस्मयकारी खेल दिखाते हैं जिसमें मदारी, जमूरा बने लड़के को कपड़े से ढककर काट कर दिखाता है। एक बार भारत सेवाश्रम संघ, हरिद्वार के पूज्यवर श्री सत्यमित्रानंदजी ने रूककर जमूरे को बुलाकर पूछा कि क्या तुम्हें इतने खतरनाक खेल दिखाते हुए डर नहीं लगता तो जमूरे बने लड़के का उत्तर था कि नहीं ! मैं अपने उस्ताद की सारी ट्रिक जानता हूँ। यह ऐसी सारगर्भित बात है जो बताती है कि विश्वास क्या है, कैसा हो।
सतों के लिये यह जगत इतना सहज कैसे हो जाता है वह इसलिये कि वह भी अपने उस्ताद की सारी ट्रिक समझते हुए खुद को खेल में शामिल करते हुए भी, खेल की ही भावना से उस्ताद की बाजीगरी के द्वारा, इस जगत को प्रभु के लीलामय रंगमंच पर आमन्त्रित करते रहते है कि आओ, मेरे उस्ताद पर विश्वास करो और जमूरा बनकर आनंद लो, तुम्हारा बाल भी बांका न होगा।
जय जय श्री राधे !

जो उलझा रहा है, वह धर्म नहीं हो सकता

जो उलझा रहा है, वह धर्म नहीं हो सकता या हम धर्म की परिभाषा नहीं जानते । धर्म सुलझाता है, तब, जब हम सुलझना चाहते हैं । यह प्रश्न तो हमारा स्वयं से होना चाहिये कि क्या हम वास्तव में धर्म को जानना चाहते हैं या आत्म-प्रशंसा के लिये धर्म-धर्म का नाटक कर रहे हैं । वस्तुस्थिति तो यह है कि धर्म हमसे दूर नहीं हो रहा, हम धर्म से दूर हो रहे हैं क्योंकि धर्म के साथ चलते हुए हमें अपनी कुत्सित भावनाओं और स्वार्थ की पूर्ति संभव नहीं दिखती अत: "सब यही कर रहे हैं, केवल हमने ही तो धर्म का ठेका नहीं ले रखा है" यह सोचकर हम स्वयं अपने धर्म का परित्याग करते हैं । दास का अनुभव है कि आज जितने सत्संग-कथा-प्रवचन स्थान-स्थान पर हो रहे हैं, उतने कभी भी नहीं हुए। आखिर क्या कारण है कि भगवद-कृपा से इतने कथा-सत्संग-प्रवचनों की उपलब्धता के बाद भी दिन-ब-दिन पाप बढ़ता ही जा रहा है। हर स्थान पर कथा-प्रवचनों में भारी भीड़ के बाद भी मनुष्य-मात्र के आचरण में कोई विशेष बदलाव नहीं दिखायी दे रहा है; बहुत बड़ी संख्या में लोग ठाकुरजी की मंगला आरति के दर्शन करते हैं; बहुत से श्रीहरि के दर्शन के बिना खाते-पीते नहीं। बहुतों ने दर्शन का नियम ले रखा है, बहुतों ने साप्ताहिक दर्शन एवं परिक्रमा का; बहुत से लोग मिलकर कथा का आयोजन करवाते हैं अन्य भंडारों का आयोजन करते हुए स्वयं को गौरवशाली अनुभव करते हैं। श्रीमदभागवत प्रवक्ता बार-बार कहते हैं कि यह कथा मोक्षदायिनी है हमने कथाओं, सत्संग-प्रवचनों में जो भी सुना, उस समय तन्मय होकर सुना, बड़ा आनन्द आया। ह्रदय बार-बार कहता है कि सब सत्य ही तो कहा जा रहा है, प्रभु के प्रति सुप्त प्रेम अनायास छलकने लगता है। मन-मयूर आहलादित होकर नृत्य करने लगता है, अश्रुपात होने लगता है, पाँव स्वयं ही थिरकने लगते हैं परन्तु कथा -प्रवचन से लौटते हुए यह मस्ती शनै: शनै: उतरने लगती है। कुछ देर बाद ही संसार हमारे ऊपर हावी होने लगता है और कुछ ही देर में हमें पूर्णरुप से अपनी गिरफ़्त में ले लेता है। हम मानो एक बड़े ही मीठे स्वपन से मुक्त होकर "जाग्रत अवस्था" में आ जाते हैं। कटु सत्य तो यह है कि हम धार्मिक हैं ही नहीं। कथा-प्रवचनों को हम एक आनन्द के साधन के रुप में ले रहे हैं जिस प्रकार हम सिनेमा देखते है और अच्छे अभिनय, और पटकथा की प्रशंसा करते हैं, फ़िल्म के कई "डायलाँग्स" को हम रट लेते हैं, और अपनी प्रसन्नता के लिये, दूसरों पर शेखी बघारने के लिये, दोहराते हैं; लेकिन उस कथा की किसी भी अच्छी बात या डायलाँग को किसी भी रुप में अपनाते नहीं; ठीक यही हम कर रहे हैं। कथा तारेगी कब ? जब प्रथम तो वह वक्ता के आचरण में उतरेगी। यदि वक्ता पर भगवद-कृपा है और वह प्रभु-कृपा से प्रभु की लीलाओं के मर्म को समझ गया है तो नि:सन्देह ऐसे वक्ता की कथा का प्रभाव जन-मानस पर पड़ेगा ही। खेद की बात है कि कुछ वक्ताओं ने इसे भी एक "ऐन्टरटेन्मेंन्ट पैकेज" बना दिया है जिसमें कथा का सार कम और सभी रसों का थोड़ा-थोड़ा समावेश करके एक "हिट फ़ार्मूला" बना दिया है जिससे किसका "कल्याण" हो रहा है, वह ही जानें। उससे भी अधिक दोषी हम हैं। हम भी तो कहाँ किसी भी अच्छी बात को अपने आचरण में उतार रहे हैं। परिजनों में हम शेखी बघारते हैं कि - " अरे ! तुम कथा में नहीं गये ? बड़ी अच्छी कथा हो रही है, महाराजश्री ऐसा वर्णन करते हैं कि आत्मा प्रसन्न हो जाती है। अरे भाई ! कभी तो मिला करो। नहीं-नहीं, कल नहीं मिल पाऊँगा, उस समय तो मैं कथा सुनने जाता हूँ।" हम उन्हें जताना चाहते हैं कि हममें और तुममें क्या अन्तर है ? हम कहाँ और तुम कहाँ ? अब हम धार्मिक होने के कारण मन्दिर नहीं जाते, दान नहीं करते, सहायता नहीं करते वरन अधिकाशत: हम यह सब "डर" के कारण करते हैं। शहरों में तो अधिकांशत: ऐसे आयोजन वैभव का प्रदर्शन बन गये हैं; लाखों रुपयों का खर्च, "स्टेट्स सिम्बल" बन गया है। पहिले जिस प्रकार विवाह समारोहों में वैभव का प्रदर्शन होता है अब उससे कहीं अधिक ऐसे आयोजनों में दिखायी देता है और धर्म की मूल भावना ही जब गौड़ हो जाये तो हमारा कल्याण कैसे संभव है ? भागते-दौड़ते हम सोमवार को कहीं हाजिरी लगाते हैं, मंगल को कहीं और, बृहस्पतिवार को कहीं, और शनिवार को कहीं। हमें डर है कि हमारे द्वारा जाने या अनजाने में नित्य ही अपराधों की मात्रा बढ़ती जा रही है, यह ऐसा युग है कि दौड़ में यदि आपने किसी को धक्का नहीं दिया तो वह आपको दे देगा, क्या सही, क्या गलत, क्या नैतिक, क्या अनैतिक; बस, किसी प्रकार आगे निकलना है। लक्ष्य पर पहुँचकर सोचेंगे, अभी तो सब जायज है और यह सब करते हुए जब हमारी आत्मा, हमें कचोटती है तो हम स्वयं ही स्वयं को कुतर्कों की "ऐनस्थिसिया" देकर सुला देते हैं। पर आत्मा कुछ समय बाद पुन: जाग्रत होकर प्रश्न करती है और हमारे पास उत्तर नहीं होता। अपने अन्तर में झाँकने से जब हम घबराने लगते है तब हम भागते हैं किसी संत के पास, मन्दिर में दर्शन करने, कुछ दान-पुण्य करने। हमारा अपराध-बोध हमें दौड़ाता है। विडंबना यह भी है कि ऐसा करने के बाद जब हम वापस अपनी दुनिया में आते हैं तब स्वय़ं पर गर्व अनुभव करते हैं कि हम कितने धार्मिक हैं, हमारे विचार कितने पवित्र हैं: हमारे जैसा तो हमारे आस-पास कोई दिखायी भी नहीं देता ? हम अपनी आत्मा से कहते हैं कि लो कर ली तेरे मन की, अब प्रसन्न ! यदि "अनजाने में" हमसे कुछ गलत भी हो गया हो, किसी का ह्रदय दु:खा हो तो अब तो दान-पुण्य के द्वारा हमने अपना "प्रायश्चित" कर लिया। स्वयं ही स्वयं को दिलासा देकर हम पुन: उन्हीं कर्मों में प्रवृत्त हो जाते हैं क्योंकि अब तो हम पवित्र हो ही चुके हैं।
पुनश्च, इसे आत्म-प्रलाप ही समझें। यदि मुझ पतित के इन कठोर शब्दों से किसी भी भक्त ह्रदय को वेदना पहुँचे तो अपना ही नादान, दुष्ट, नालायक बालक समझकर क्षमा करने की कृपा कीजियेगा। जो विक्षिप्त के प्रकार का व्यवहार करता हो और जिसे अपना कल्याण ही समझ न आ रहा हो, उसकी बातों को ह्रदय से मत लगाइयेगा।
हे प्रभु ! हे नाथ ! हे करुणा सागर ! हे जीवनधन ! हे प्रियतम ! हे प्राणनाथ ! मुझ अधम शिरोमणि की एकमात्र आशा ! तुम्हीं अपने कर-कमलों से मुझ पतित को इस पंक से उबारो तो ही उबर सकता हूँ। जिस प्रकार शूकर को पंक में, वैकुण्ठ से भी बढ़कर सुख प्रतीत होता है, हे मोहन ! मुझे भी सांसारिक भोगों ने ऐसे ही मोह लिया है। संतजनों के वचन क्षणिक आनन्द के पश्चात एक कर्ण में प्रवेश कर दूसरे से निकल जाते हैं, भीतर कुछ भी नहीं जा रहा और ढ़ोंग मैं ऐसा करता हूँ मानो कितना विनयी, सरल और पवित्र आचरण वाला तुम्हारा प्रिय भक्त हूँ। हे दीनबंधु ! हे अशरणशरण ! संतों के सम्मुख जब मैं, भक्त होने का नाटक करता हूँ और उस समय जो दो-चार बार तुम्हारा नाम लेता हूँ, चूँकि मुझ पतित से तुम्हें अधिक आशा भी नहीं है अत: तुम इतने से ही मुझ अधम पर प्रसन्न होकर मुसकराते हुए मेरी ओर इंगित कर किसी अपने प्रिय संत को/ भक्त को मेरे कल्याण का भार सौंप देते हो। तुम्हारी कृपा से इतना तो विश्वास हो ही गया है कि तुम मुझे छोड़ोगे नहीं परन्तु नाथ ! यदि ऐसा हो जाये कि मैं आपको नहीं छोडू तो अत्युत्तम होगा। यह होगा भी तभी जब आप करवाओगे। मेरी क्षमता भी नहीं, बुद्धि भी नहीं, अपने कल्याण का मार्ग भी तो नहीं जानता और आप जना भी दो तो भोगों में प्रबल आसक्ति के कारण मैं चलने वाला भी तो नहीं। आज चेतना कुछ जाग्रत सी प्रतीत होती है अत: आपसे आज ही यह प्रार्थना है कि प्रभु ! इतनी दया बनाये रखना कि यह दुष्ट, आपकी चरण-धूलि से पवित्र हो जाये और इसका एकमात्र अवलम्बन आपके चरण-कमल बने रहे, उनसे विलग न होने पावे। सब आप पर ही छोड़ता हूँ, मेरे बस में तो वैसे भी कुछ है ही नहीं। हे पतितपावन ! मुझ पतित को आप निश्चय ही अपने नाम की लाज रखते हुए स्वीकारेंगे क्योंकि राम से बड़ा राम का नाम.......। दीनबंधु ! दीन तुम्हें छोड़कर किसके पास जाये ? हे अशरणशरण ! तुम्हीं शरण न दोगे तो कौन देगा ? 
जय जय श्री राधे !

Thursday, May 9, 2013

भगवान की दया

भगवान की दया

दयामय परमात्मा की सब जीवों पर इतनी दया है की सम्पूर्णरूप से तो उस दयाको मनुष्य समझ ही नहीं सकता | वह अपनी समझके अनुसार अपने ऊपर जितनी अधिक-से-अधिक दया समझता हैं, वह भी नितान्त अल्प ही होती हैं | मनुष्य ईश्वरदया का यथार्थ कल्पना ही नहीं कर सकता | भगवान की वह अनन्त दया सबके ऊपर समभाव से गंगाके प्रवाहकी भाँती नित्य-निरन्तर चारों और से बह रही है | इस दया से जो मनुष्य जितना लाभ उठाना चाहता है, उतना ही उठा सकता है | खेद की बात है की लोग इस रहस्य को न जानने के कारण ही दुखी हो रहे है | यह उनकी मूर्खता है | इन लोगो किन वही दशा समझनी चाहिये, जैसी उस मूर्ख प्यासे मनुष्य की है जो नित्य-निरन्तर शीतल सुमधुर जल को प्रवाहित करने वाली भगवती गंगा के किनारे पड़ा हो, परन्तु ज्ञान न होने के कारण जल न ग्रहण कर प्यास के मारे तड़प रहा हों |

ईश्वर की दया अपार है परन्तु जो जितनी मानता है उतनी ही दया उसको फलती है, इसलिए उस ईश्वर की जितनी अधिक-से-अधिक दया तुम अपने ऊपर समझ सको उन्ती समझनी चाहिये | तुम्हारी कल्पना जितनी अधिक होगी, तुम्हे उतना ही अधिक लाभ होगा | यद्यपि भगवान की दया का थाह उसी प्रकार किसीको नहीं मिलता, जैसे विमान पर बैठ कर आकाशमें उड़ने वाले मनुष्य को आकाश का थाह नहीं मिलता, परन्तु इस दया का थोडा-सा रहस्य जानने पर भी मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है | जैसे अथाह गंगा के प्रवाहमें से मनुष्य की प्यास बुझानेके लिए एक लोटा गंगाजल ही पर्याप्त है वैसे ही अपार, अपरिमित दयासागरकी दया के एक कारण से ही मनुष्य की अनन्त-जन्मों की शोकाअग्नि सदा के लिए शान्त हो जाती है | यह तुलना भी पर्याप्त नहीं है, क्योकि साधारण जलबुद्धि से पीये हुए गंगाजल के एक लोटे जल से तो मनुष्य की प्यास थोड़ी देर के लिए शान्त होती है, परन्तु ईश्वर की दया के कण से तो भय, शोक और दुखों की निवृति एवं शान्ति और परमानन्द की प्राप्ति सदा के लिए हो जाती है | अतएव सबको चाहिये की उस परमेश्वर के शरण होकर उसकी दया की खोज करे |

Saturday, April 27, 2013

दान

प्रश्न‒दान देनेमें, सेवा करनेमें पात्र-अपात्रका विचार करना चाहिये कि नहीं ?

उत्तर‒अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें पात्र-अपात्र आदिका विचार नहीं करना चाहिये । जिसको अन्न, जल आदिकी आवश्यकता है, वही पात्र है । परन्तु कन्यादान, भूमिदान, गोदान आदि विशेष दान करना हो तो उसमें देश, काल, पात्र आदिका विशेष विचार करना चाहिये ।

अन्न, जल, वस्त्र और औषध‒इनको देनेमें यदि हम पात्र-कुपात्रका अधिक विचार करेंगे तो खुद कुपात्र बन जायँगे और दान करना कठिन हो जायगा ! अतः हमारी दृष्टिमें अगर कोई भूखा, प्यासा आदि दीखता हो तो उसको अन्न, जल आदि दे देना चाहिये । यदि वह अपात्र भी हुआ तो हमें पाप नहीं लगेगा ।

प्रश्न‒दूसरोंको देनेसे लेनेवालेकी आदत बिगड़ जायगी, लेनेका लोभ पैदा हो जायगा; अतः देनेसे क्या लाभ ?

उत्तर‒दूसरेको निर्वाहके लिये दें, संचयके लिये नहीं अर्थात्‌ उतना ही दें, जिससे उसका निर्वाह हो जाय । यदि लेनेवालेकी आदत बिगड़ती है तो यह दोष वास्तवमें देनेवालेका है अर्थात्‌ देनेवाला कामना, ममता, स्वार्थ आदिको लेकर देता है । यदि देनेवाला निःस्वार्थ-भावसे, बदलेकी आशा न रखकर दे तो जिसको देगा, उसका स्वभाव भी देनेका बन जायगा, वह भी सेवक बन जायगा ! 

रामायणमें आया है‒
सर्बस दान दीन्ह सब काहू ।
जेहिं पावा राखा नहिं ताहू ॥
(मानस, बाल॰ १९४/४)

शीघ्र कल्याण चाहने वाले मनुष्य को


शीघ्र कल्याण चाहने वाले मनुष्य को परमात्माकी प्राप्ति के सिवा और किसी भी बात की इच्छा नहीं रखनी चाहिये; क्योंकि इसके सिवा सब इच्छाएँ जन्म-मृत्यु रूप संसार-सागर में भरमाने वाली हैं ।

परमात्मा की प्राप्ति के लिये मनुष्य को अर्थ और भाव के सहित शास्त्रों का अनुशीलन और एकान्त में बैठकर जप-ध्यान तथा आध्यात्मिकविषय का विचार नियमपूर्वक  नित्य करना चाहिये ।

अनिच्छा या परेच्छा से होने वाली घटना को भगवान् का भेजा हुआ पुरस्कार मान लेने पर काम- क्रोध आदि शत्रु पास नहीं आ सकते, जैसे सूर्य के सम्मुख अन्धकार नहीं आ सकता ।

जीव, ब्रह्म और माया के तत्त्व को समझनेके लिये एकान्त में बैठकर विवेक और वैराग्ययुक्त चित्तसे नित्यप्रति परमात्मा का चिंतन करते हुए अध्यात्म-विषय का विचार करना चाहिये ।

जिसने ईश्वर की दया और प्रेम के तत्त्व-रहस्य को जान लिया है, उसके शान्ति और आनन्द की सीमा नहीं रहती ।

जो अपने-आप को ईश्वरके अर्पण कर चुका है और ईश्वरपर ही निर्भर है, उसकी सदा-सर्वदा सब प्रकार से ईश्वर रक्षा करता है, इससे वह सदा के लिये निर्भय-पदको प्राप्त हो जाता है ।

प्रेमपूर्वक जप सहित भगवान् के ध्यान का अभ्यास, श्रद्धापूर्वक सत्पुरुषोंका संग, विवेकपूर्वक भावसहित सत- शास्त्रों का स्वाध्याय, दु:खी, अनाथ, पूज्यजन तथा वृद्धों की नि:स्वार्थभावसे सेवा — इनको यदि कर्तव्यबुद्धिसे किया जाय तो ये एक-एक साधन शीघ्र कल्याण करने वाले हैं ।

भगवान् बहुत बड़े दयालु और प्रेमी हैं । जो साधक उनका तत्त्व समझ जायगा, वह भगवान् की शरण होकर शीघ्र ही परम शान्ति को प्राप्त हो जायगा ।

सर्वत्र भगवद्भावके सामान कोई भाव नहीं है और सर्वत्र भगवद्भाव होने से दुर्गुण और दुरुचारों का अत्यंत अभाव होकर सद्गुण और सदाचार अपने –आप ही आ जाते हैं ।

वस्तुमात्र को भगवान् का स्वरुप और चेष्टामात्र को भगवान् की लीला समझने समझने से भगवान् का तत्त्व समझ में आ जाता है ।

Monday, April 15, 2013

हनुमान जी की उपासना


हनुमान जी की उपासना केवल भारत भूमि में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य भाग जैसे जावा-सुमित्रा’ लंका, थाई, मारीशस, बर्मा अफगानिस्तान, जापान आदि से लेकर यूरोप व समस्त विश्व में होती है। श्री हनुमान उन सप्तऋषि में से एक है जिन्हें वरदान प्राप्त है कि चिरंजीवी रहेंगे- (अश्ववत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, शक, कृपाचार्य परशुराम)

हनुमान वेग में वायु देवता तथा गति में गरुड़ देवता के सक्षम हैं। भगवान के उत्तर दिशा के पार्षद कुबेर की गदा इन पर रहती है जिसमें अधर्म करने को दण्ड देने के अधिकारी हैं। इनकी गदा संग्राम में विजय दिलाने वाली हैं अतः साधकों को धर्मच्युत व्यवहार के लिए मारुति की गदा का भी ध्यान व पूजन अभीष्ट है।

यदि साधक मृत्युतुल्य कष्ट से ग्रस्त हो, तो मंगलमूर्ति का ध्यान हाथ में संजीवनी का पहाड़ लिये, साथ में सुषेण वैद्य का भी ध्यान करना चाहिये।

दुर्गम काज जगत के जेते।
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।

यह हमेशा याद रखें कि हनुमत सिद्ध के लिये राम उपासना की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि भगवान राम के अयोध्या से साकेत को प्रस्थान करते समय हनुमान को आदेश दिया था कि तुम मेरी कथा का प्रचार-प्रसार करते हुये मेरे भक्तों के समीप रहो, कल्पपर्यन्त पृथ्वी पर निवास करते रहो। अतः जहाँ भी रामकथा होती है हनुमान अपने लूक्ष्म शरीर से उपस्थित रहते हैं। तुलसी बाबा ने इनके सान्निध्य से ही रामकथा मानस पूरी की।

==== जय श्री राम ====
हनुमान जी की उपासना केवल भारत भूमि में ही नहीं अपितु विश्व के अन्य भाग जैसे जावा-सुमित्रा’ लंका, थाई, मारीशस, बर्मा अफगानिस्तान, जापान आदि से लेकर यूरोप व समस्त विश्व में होती है। श्री हनुमान उन सप्तऋषि में से एक है जिन्हें वरदान प्राप्त है कि चिरंजीवी रहेंगे- (अश्ववत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, शक, कृपाचार्य परशुराम)

हनुमान वेग में वायु देवता तथा गति में गरुड़ देवता के सक्षम हैं। भगवान के उत्तर दिशा के पार्षद कुबेर की गदा इन पर रहती है जिसमें अधर्म करने को दण्ड देने के अधिकारी हैं। इनकी गदा संग्राम में विजय दिलाने वाली हैं अतः साधकों को धर्मच्युत व्यवहार के लिए मारुति की गदा का भी ध्यान व पूजन अभीष्ट है।

यदि साधक मृत्युतुल्य कष्ट से ग्रस्त हो, तो मंगलमूर्ति का ध्यान हाथ में संजीवनी का पहाड़ लिये, साथ में सुषेण वैद्य का भी ध्यान करना चाहिये।

दुर्गम काज जगत के जेते। 
सुगम अनुग्रह तुम्हरे तेते।

यह हमेशा याद रखें कि हनुमत सिद्ध के लिये राम उपासना की बहुत आवश्यकता है। क्योंकि भगवान राम के अयोध्या से साकेत को प्रस्थान करते समय हनुमान को आदेश दिया था कि तुम मेरी कथा का प्रचार-प्रसार करते हुये मेरे भक्तों के समीप रहो, कल्पपर्यन्त पृथ्वी पर निवास करते रहो। अतः जहाँ भी रामकथा होती है हनुमान अपने लूक्ष्म शरीर से उपस्थित रहते हैं। तुलसी बाबा ने इनके सान्निध्य से ही रामकथा मानस पूरी की। 

==== जय श्री राम ====

Thursday, April 11, 2013

राम राज्याभिषेक.

नव संवत्सर के दिन भगवान श्री राम ने सिंहासनारूढ़ होकर राम-राज्य की स्थापना की थी। 

....राम राज्याभिषेक....



अवधपुरी बहुत ही सुंदर सजाई गई।
देवताओं ने पुष्पों की वर्षा की झड़ी लगा दी।
श्री रामचंद्रजी ने सेवकों को बुलाकर कहा कि तुम लोग जाकर पहले मेरे सखाओं को स्नान कराओ ॥

भगवान् के वचनसुनते ही सेवक जहाँ -तहाँ दौड़े और तुरंत ही उन्होंने सुग्रीवादि को स्नान कराया।
फिर करुणानिधान श्री रामजी ने भरतजी को बुलाया और उनकी जटाओं को अपने हाथों से सुलझाया ॥

तदनन्तर भक्त वत्सल कृपालु प्रभु श्री रघुनाथजी ने तीनों भाइयों को स्नान कराया।
भरतजी का भाग्य और प्रभु की कोमलता का वर्णन अरबों शेषजी भी नहीं कर सकते ॥

फिर श्री रामजी ने अपनी जटाएँ खोलीं और गुरुजी की आज्ञा माँगकर स्नान किया।
स्नान करके प्रभु ने आभूषण धारण किए।
उनके (सुशोभित) अंगों को देखकर सैकड़ों (असंख्य) कामदेव लजा गए ॥

(इधर) सासुओं ने जानकीजी को आदर के साथ तुरंत ही स्नान कराके उनके अंग-अंग में दिव्य वस्त्र और श्रेष्ठ आभूषण भली- भाँतिसजा दिए (पहना दिए) ॥

श्री राम के बायीं ओर रूप और गुणों की खान रमा (श्री जानकीजी) शोभित हो रही हैं।
उन्हें देखकर सब माताएँ अपना जन्म (जीवन) सफल समझकर हर्षित हुईं ॥

(काकभुशुण्डिजी कहते हैं-) हे पक्षीराज गरुड़जी! सुनिए, उस समय ब्रह्माजी, शिवजी और मुनियों के समूह तथा विमानों पर चढ़कर सब देवता आनंदकंद भगवान् के दर्शन करने के लिए आए ॥

प्रभु को देखकर मुनि वशिष्ठजी के मन में प्रेम भर आया।
उन्होंने तुरंत ही दिव्य सिंहासन मँगवाया, जिसका तेज सूर्य के समान था।
उसका सौंदर्य वर्णन नहीं किया जा सकता।
ब्राह्मणों को सिर नवाकर श्री रामचंद्रजी उस पर विराज गए ॥

श्री जानकीजी के सहित रघुनाथजी को देखकर मुनियों का समुदाय अत्यंत ही हर्षित हुआ।
तब ब्राह्मणों ने वेदमंत्रों का उच्चारण किया।
आकाश में देवता और मुनि'जय, हो , जय हो' ऐसी पुकार करने लगे ॥

(सबसे) पहले मुनि वशिष्ठजी ने तिलक किया।
फिर उन्होंने सब ब्राह्मणों को (तिलक करने की ) आज्ञा दी।
पुत्र को राजसिंहासन पर देखकर माताएँ हर्षित हुईं और उन्होंने बार-बार आरती उतारी ॥

उन्होंने ब्राह्मणों को अनेकों प्रकार के दान दिए और संपूर्ण याचकों को अयाचक बना दिया (मालामाल कर दिया)।
त्रिभुवन के स्वामी श्री रामचंद्रजी को (अयोध्या के) सिंहासन पर (विराजित) देखकर देवताओं ने नगाड़े बजाए ॥

आकाश में बहुत से नगाड़े बज रहे हैं।
गन्धर्व और किन्नर गा रहे हैं।
अप्सराओं के झुंड के झुंड नाच रहे हैं।
देवता और मुनि परमानंद प्राप्त कर रहे हैं।
भरत,लक्ष्मण और शत्रुघ्नजी , विभीषण, अंगद, हनुमान् और सुग्रीव आदि सहित क्रमशः छत्र, चँवर, पंखा , धनुष, तलवार, ढाल और शक्ति लिए हुए सुशोभित हैं ॥

श्री सीताजी सहित सूर्यवंश के विभूषण श्री रामजी के शरीर में अनेकों कामदेवों की छबि शोभा दे रही है।
नवीन जलयुक्त मेघों के समान सुंदर श्याम शरीर पर पीताम्बर देवताओं के मन को भी मोहित कर रहा है।
मुकुट, बाजूबंद आदि विचित्र आभूषण अंग-अंग में सजे हुए हैं।
कमल के समान नेत्र हैं, चौड़ी छाती है और लंबी भुजाएँ हैं जो उनके दर्शन करते हैं, वे मनुष्य धन्य हैं ॥

हे पक्षीराज गरुड़जी ! वह शोभा , वह समाज और वह सुख मुझसे कहते नहीं बनता।
सरस्वतीजी , शेषजी और वेद निरंतर उसका वर्णन करते हैं, और उसका रस (आनंद) महादेवजी ही जानते हैं॥

सब देवताअलग-अलग स्तुति करके अपने-अपने लोक को चले गए।
तब भाटों का रूप धारण करके चारों वेद वहाँ आए जहाँ श्री रामजी थे॥

कृपानिधानसर्वज्ञ प्रभु ने (उन्हें पहचानकर) उनका बहुत ही आदर किया।
इसका भेद किसी ने कुछ भी नहीं जाना।
वेद गुणगान करने लगे ॥

सगुण और निर्गुण रूप!
हे अनुपम रूप- लावण्ययुक्त!
हे राजाओं के शिरोमणि! आपकी जय हो।
आपने रावण आदि प्रचण्ड, प्रबल और दुष्ट निशाचरों को अपनी भुजाओं के बल से मार डाला।
आपने मनुष्य अवतार लेकर संसार के भार को नष्ट करके अत्यंत कठोर दुःखों को भस्म कर दिया।
हे दयालु! हे शरणागत की रक्षा करने वाले प्रभो! आपकी जय हो।
मैं शक्ति (सीताजी) सहित शक्तिमान् आपको नमस्कार करता हूँ ॥

हे हरे! आपकी दुस्तर माया के वशीभूत होने के कारण देवता , राक्षस, नाग, मनुष्य और चर, अचर सभी काल कर्म और गुणों से भरे हुए (उनके वशीभूत हुए)दिन-रात अनन्त भव (आवागमन) के मार्ग में भटक रहे हैं।
हे नाथ! इनमें से जिनको आपने कृपा करके (कृपादृष्टि) से देख लिया , वे (माया जनित) तीनों प्रकार के दुःखों से छूट गए।
हे जन्म-मरण के श्रम को काटने में कुशल श्री रामजी ! हमारी रक्षा कीजिए।
हम आपको नमस्कार करते हैं॥

जिन्होंने मिथ्या ज्ञान के अभिमान में विशेष रूप से मतवाले होकर जन्म-मृत्यु (के भय) को हरने वाली आपकी भक्ति का आदर नहीं किया, हे हरि! उन्हें देव- दुर्लभ(देवताओं को भी बड़ी कठिनता से प्राप्त होने वाले, ब्रह्मा आदि के ) पद को पाकर भी हम उस पद से नीचे गिरते देखते हैं (परंतु), जो सब आशाओं को छोड़कर आप पर विश्वास करके आपके दास हो रहते हैं, वे केवल आपका नाम ही जपकर बिना ही परिश्रम भवसागर से तर जाते हैं।
हे नाथ! ऐसे आपका हम स्मरण करते हैं॥

जो चरण शिवजी और ब्रह्माजी के द्वारा पूज्य हैं, तथा जिन चरणों की कल्याणमयी रज का स्पर्श पाकर (शिला बनी हुई) गौतम ऋषि की पत्नी अहल्या तर गई, जिन चरणों के नख से मुनियों द्वारा वन्दित, त्रैलोक्य को पवित्र करने वाली देवनदी गंगाजी निकलीं और ध्वजा, वज्र अंकुश और कमल, इन चिह्नों से युक्त जिन चरणों में वन में फिरते समय काँटे चुभ जाने से घट्ठे पड़ गए हैं, हे मुकुन्द!
हे राम! हे रमापति! हम आपके उन्हीं दोनों चरणकमलों को नित्य भजते रहते हैं ॥

वेदशास्त्रों ने कहा है कि जिसका मूल अव्यक्त (प्रकृति) है,
जो (प्रवाह रूप से) अनादि है, जिसके चार त्वचाएँ, छह तने, पच्चीस शाखाएँ और अनेकों पत्ते और बहुत से फूल हैं, जिसमें कड़वे और मीठे दो प्रकार के फल लगे हैं, जिस पर एक ही बेल है, जो उसी के आश्रित रहती है, जिसमें नित्य नए पत्ते और फूल निकलते रहते हैं, ऐसे संसार वृक्ष स्वरूप (विश्व रूप में प्रकट) आपको हम नमस्कार करते हैं॥॥

ब्रह्म अजन्मा है, अद्वैत है, केवल अनुभव से ही जाना जाता है और मन से परे है-(जो इस प्रकार कहकर उस) ब्रह्म का ध्यान करते हैं, वे ऐसा कहा करें और जाना करें, किंतु हे नाथ! हम तो नित्य आपका सगुण यश ही गाते हैं।
हे करुणा के धाम प्रभो ! हे सद्गुणों की खान!
हे देव! हम यह वर माँगते हैं कि मन, वचन और कर्म से विकारों को त्यागकर आपके चरणों में ही प्रेम करें॥॥

वेदों ने सबके देखते यह श्रेष्ठ विनती की।
फिर वे अंतर्धान हो गए और ब्रह्मलोक को चले गए ॥

काकभुशुण्डिजी कहते हैं- हे गरुड़जी ! सुनिए, तब शिवजी वहाँ आए जहाँ श्री रघुवीर थे और गद्गद् वाणी से स्तुति करने लगे। उनका शरीर पुलकावली से पूर्ण हो गया-॥॥

हे राम! हे रमारमण (लक्ष्मीकांत)! हे जन्म- मरण के संताप का नाश करने वाले! आपकी जय हो, आवागमन के भय से व्याकुल इस सेवक की रक्षा कीजिए।
हे अवधपति ! हे देवताओं के स्वामी! हे रमापति! हे विभो! मैं शरणागत आपसे यही माँगता हूँ कि हे प्रभो ! मेरी रक्षा कीजिए॥॥

हे दस सिर और बीस भुजाओं वाले रावण का विनाश करके पृथ्वी के सब महान् रोगों (कष्टों) को दूर करने वाले श्री रामजी! राक्षस समूह रूपी जो पतंगे थे, वे सब आपके बाण रूपी अग्नि के प्रचण्ड तेज से भस्म हो गए॥॥

आप पृथ्वी मंडल के अत्यंत सुंदर आभूषण हैं,
आप श्रेष्ठ बाण, धनुष और तरकस धारण किए हुए हैं।
महान् मद, मोह और ममता रूपी रात्रि के अंधकार समूह के नाश करने के लिए आप सूर्य के तेजोमय किरण समूह हैं ॥॥

कामदेव रूपी भील ने मनुष्य रूपी हिरनों के हृदय में कुभोग रूपी बाण मारकर उन्हें गिरा दिया है।
हे नाथ! हे (पाप- ताप का हरण करने वाले) हरे !
उसे मारकर विषय रूपी वन में भूल पड़े हुए इन पामर अनाथ जीवों की रक्षा कीजिए ॥॥

लोग बहुत से रोगों और वियोगों (दुःखों) से मारे हुए हैं।
ये सब आपके चरणों के निरादर के फल हैं।
जो मनुष्य आपके चरणकमलों में प्रेम नहीं करते, वे अथाह भवसागर में पड़े हैं ॥

जिन्हें आपके चरणकमलों में प्रीति नहीं है वे नित्य ही अत्यंत दीन, मलिन (उदास) और दुःखी रहते हैं और जिन्हें आपकी लीला कथा का आधार है, उनको संत और भगवान् सदा प्रिय लगने लगते हैं॥॥

उनमें न राग (आसक्ति) है, न लोभ, न मान है, न मद।
उनको संपत्ति सुख और विपत्ति (दुःख) समान है।
इसी से मुनि लोग योग (साधन) का भरोसा सदा के लिए त्याग देते हैं और प्रसन्नता के साथ आपके सेवक बन जाते हैं॥॥

वे प्रेमपूर्वक नियम लेकर निरंतर शुद्ध हृदय सेआपके चरणकमलों की सेवा करते रहते हैं और निरादर और आदर को समान मानकर वे सब संत सुखी होकर पृथ्वी पर विचरते हैं ॥॥

हे मुनियों के मन रूपी कमल के भ्रमर! हे महान् रणधीर एवं अजेय श्री रघुवीर! मैं आपको भजता हूँ (आपकी शरण ग्रहण करता हूँ)
हे हरि ! आपका नाम जपता हूँ और आपको नमस्कार करता हूँ।
आप जन्म-मरण रूपी रोग की महान् औषध और अभिमान के शत्रु हैं॥॥

आप गुण, शील और कृपा के परम स्थान हैं।
आप लक्ष्मीपति हैं, मैं आपको निरंतर प्रणाम करता हूँ।
हे रघुनन्दन! (आप जन्म-मरण, सुख- दुःख, राग-द्वेषादि) द्वंद्व समूहों का नाश कीजिए।
हे पृथ्वी का पालन करने वाले राजन्।
इस दीन जन की ओर भी दृष्टि डालिए॥॥

मैं आपसे बार-बार यही वरदान माँगता हूँ कि मुझे आपके चरण कमलों की अचल भक्ति और आपके भक्तों का सत्संग सदा प्राप्त हो।
हे लक्ष्मीपते! हर्षित होकर मुझे यही दीजिए॥

श्री रामचंद्रजी के गुणों का वर्णन करके उमापति महादेवजी हर्षित होकर कैलास को चले गए।
तब प्रभु ने वानरों को सब प्रकार से सुख देने वाले डेरे दिलवाए ॥॥

हे गरुड़जी ! सुनिए यह कथा (सबको) पवित्र करने वाली है, (दैहिक, दैविक, भौतिक) तीनों प्रकार के तापों का और जन्म-मृत्यु के भयका नाश करने वाली है।

महाराज श्री रामचंद्रजी के कल्याणमय राज्याभिषेक का चरित्र (निष्कामभाव से) सुनकर मनुष्य वैराग्य और ज्ञान प्राप्त करते हैं ॥॥

और जो मनुष्य सकामभाव से सुनते और जो गाते हैं, वे अनेकों प्रकार के सुख और संपत्ति पाते हैं।
वे जगत् में देवदुर्लभ सुखों को भोगकर अंतकाल में श्री रघुनाथजी के परमधाम को जाते हैं ॥॥

इसे जो जीवन्मुक्त, विरक्त और विषयी सुनते हैं, वे (क्रमशः ) भक्ति, मुक्ति और नवीन संपत्ति (नित्य नए भोग) पाते हैं।
हे पक्षीराज गरुड़जी! मैंने अपनी बुद्धि की पहुँच के अनुसार रामकथा वर्णन की है, जो (जन्म- मरण) भय और दुःख हरने वाली है ॥॥

यह वैराग्य, विवेक और भक्ति को दृढ़ करने वाली है तथा मोह रूपी नदी के (पार करने) के लिए सुंदर नाव है।
अवधपुरी में नित नए मंगलोत्सव होते हैं।
सभी वर्गों के लोग हर्षित रहते हैं॥॥

श्री रामजी के चरणकमलों में- जिन्हें श्री शिवजी, मुनिगण और ब्रह्माजी भी नमस्कार करते हैं, सबकी नित्य नवीन प्रीति है।
भिक्षुकों को बहुत प्रकार के वस्त्राभूषण पहनाए गए और ब्राह्मणों ने नाना प्रकार के दान पाए ॥

Saturday, April 6, 2013

हनुमान् जी के स्वरूप का परिचय

हनुमान् जी के स्वरूप का परिचय
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आजकल बुद्धिजीवी कहलाने वाले लोग शंका करते हैं कि क्या हनुमान् जी वानर थे ?इस विषय पर कुछ निर्णय देने के पूर्व हम यह बतलाना चाहेंगे कि किसी वस्तु केविषय में हम उसका स्वरूप या गुण आदि किसी न किसी प्रमाण के आधार परनिश्चित करते हैं ।जैसे किसी व्यक्ति के रूप का परिचय पाने के लिए हमें नेत्ररूपी प्रमाणकीआवश्यकता होती है ।अब उसका रूप काला है या गोरा ? इसका निश्चय कान, घ्राण,श्रोत्र आदि इन्द्रियरूपी प्रमाण नही करा सकते । यह तो नेत्र से ही ज्ञात होगा कि रूप काला हैया गोरा ।ठीक इसी प्रकार हमें हनुमान् जी के विषय में समझना होगा । कि उनका ज्ञान हमेंकिस प्रमाण से हुआ ?प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द -- प्रसिद्ध इन चारों प्रमाणों में शब्द प्रमाणको छोड़कर कोई दूसरा प्रमाण ऐसा नही है जो उनका ज्ञान हमें करा सके ।उस शब्दप्रमाण में वेदावतार वाल्मीकि रामायण जो परम आप्त महर्षि वाल्मीकिप्रणीत है । उस शब्दप्रमाणीभूत रामायण से हमें सर्वप्रथम हनुमान् जी का ज्ञानहोता है ।वाल्मीकि रामायण के प्रथम सर्ग में हनुमान् जी का प्रथम परिचय हमें उस समय मिलता है जब श्रीराम उनसे पम्पा सरोवर के समीप मिलते हैं ।उस समय उनका स्वरूप निरूपित करते हुए महर्षि कहते हैं कि श्रीराम हनुमान् नामक वानर से मिले --

पम्पातीरे हनुमता संगतो वानरेण ह।। -1/58,
जिस प्रमाण से हमें हनुमान् जी का ज्ञान हो रहा है ,उसी से वे वानर भी सिद्ध हो रहे हैं ,जैसे रूप के काले या गोरे होने की सिद्धि चक्षुरूपी प्रमाण से ।जब मारुति लंका में जानकी जी का अन्वेषण करते हुए मन्दोदरी को देखते है तब वे उसे सीता समझकर प्रसन्नता के कारण अपनी पूछ चूमते है और खम्भे पर चढकर नीचे कूदते है तथा अपने वानरोचित स्वभाव को दिखलाते हैं --

आस्फोटयामास चुचुम्ब पुच्छं ननन्द चिक्रीड जगौ जगाम ।

स्तम्भानरोहन्निपपात भूमौ निदर्शयन्स्वां प्रकृतिं कपीनाम् ।।

[वा0रा0सुन्दरकाण्ड--10/54,]
इससे ये वानर सिद्ध होते हैं ।किन्तु आजकल के वानरों की भांति लड्डू चुराने वाले प्रवृत्ति वाला वानर समझने की भूल मत कर बैठना ।ये समस्त सिद्धियों से सम्पन्न महातेजस्वी, बालि सुग्रीव की अपेक्षया अप्रमेय बलशाली हैं ।

अशोकवाटिका में इनके अद्भुत कार्यों की बात सुनकर लंकापति रावण व्यथित
होकर कहता है कि मैं उसके कार्यों पर विचारकर यही मानता हूं कि वह वानर नही है ----
नह्यहं तं कपिं मन्ये कर्मणा प्रतितर्कयन् ।

सर्वथा तन्महद्भूतं महाबल परिग्रहम् । ।

[सुन्दरकाण्ड-46/6.]

रावण कहता है कि मैने बालि सुग्रीव जाम्बवान् सेनिपति नील जैसे विपुल बलशाली वानरों को देखा है --

दृष्टा हि हरयः पूर्वं मया विपुलविक्रमाः ।

बाली च सह सुग्रीवो जाम्बवाश्च महाबलाः ।। 46/12,

किन्तु उन सबकी गति इतनी भयंकर नही थी ,न ऐसा तेज और पराक्रम ही था।उनमें इसके जैसा बल उत्साह बुद्धि और रूप बदलने की ऐसी शक्ति भी नही थी--

नैव तेषां गतिर्भीमा न तेजो न पराक्रमः ।।
न मतिर्न बलोत्साहो न रूप परिकल्पनम् ।
महत्सत्वमिदं ज्ञेयं कपिरूपं व्यवस्थितम् । ।
--[ सु0का046/13-14,]

जब रावण जैसा विद्वान् हनुमान् जी की अद्भुत कार्यक्षमता परम पराक्रम आदि
को देखकर वानर मानने को तैयार नही है ।तो आजकल के बुद्धिजीवी उन्हे वानर मानने में सन्देह करें तो क्या आश्चर्य!
रावण का मन्त्री भी सभा में मारुति से कहता है कि तुम्हारा तेज वानरों जैसा नहीहै केवल रूप ही वानर का है --

नहि ते वानरं तेजो रूपमात्रं हि वानरम् । --50/10/

पर हनुमान् जी का जब रावण आदि को दर्शन होता है तब वे सब उन्हें वानर
मानने को विवश हो जाते हैं ।अत एव रावण उनके लिए आगे वानर शब्द का ही प्रयोग करता है--
तस्मादिमं वधिष्यामि वानरं पापकारिणम् । --52/11,

हनुमान् जी माँ जानकी को अपना परिचय रामदूत के रूप में अपने को वानर कहत हुए ही देते हैं ---

वानरोऽहं महाभागे दूतो रामस्य धीमतः ।

[सुन्दरकाण्ड--36/2,]
अतः हनुमान् जी वानर ही थे ।उन्हे मानव या अन्य जातीय माना शास्त्रप्रमाण विरुद्ध है ।किन्तु ये साधारण वानर नही अपितु उपदेव हैं ।जिनके कुल में शिक्षा आदि का प्रचुर प्रचलन था । अत एव ये " गायत्रीजापक "नाम से अभिहित किये गये हैं ।ये साक्षात् भगवान् शंकर तथा कालके भी काल हैं --
नूमांस्तु महादेवः कालकालः सदाशिवः।

------रुद्रयामल, हनुमत्सहस्रनाम,8,

विनयपत्रिका में इन्हे " वानराकार विग्रह पुरारी" कहा गया है ।ये वानर रूप में साक्षात्महाकाल भगवान् शंकर हैं ।किन्तु ये देवेन्द्रवन्दित होने के साथ ही गायत्रीजापक रामनाममय तथा 7 करोड़महामन्त्र से युक्त विग्रह वाले हैं ।-----

सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवः प्रभुः |
-[-ह्० स०नाम् --७]
इनके सहस्रनाम में इनका एक नाम "भक्तांहःसहनो" आया है । जिसका अर्थ है---"भक्तों का अपराध सहन करने वाले" ।नारियां भी इनकी उपासना मन्त्र आदि का जप कर सकती हैं ---"नागकन्याभयध्वंसी" "सप्तमातृनिषेवितः" ये दोनों नाम तथा लोपामुद्रा को अगस्त्य जी द्वारा प्रदत्त कवच, पार्वती जी को भगवान् शिव से प्राप्त कवच इस कथन में प्रमाण है ।

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