Tuesday, December 18, 2012

यह पढ़ाया जा रहा है आपके बच्चों को

यह पढ़ाया जा रहा है आपके बच्चों को.....
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वैदिक काल में विशिष्ट अतिथियों के लिए गोमांस का परोसा जाना सम्मान सूचक माना जाता था।
(कक्षा 6-प्राचीन भारत, पृष्ठ 35, लेखिका-रोमिला थापर)

राम और कृष्ण का कोई अस्तित्व ही नहीं था। वे केवल काल्पनिक कहानियां हैं।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 245, रोमिला थापर)

महमूद गजनवी ने मूर्तियों को तोड़ा और इससे वह धार्मिक नेता बन गया।
(कक्षा 7-मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 28)

1857 का स्वतंत्रता संग्राम एक सैनिक विद्रोह था।
(कक्षा 8-सामाजिक विज्ञान भाग-1, आधुनिक भारत, पृष्ठ 166, लेखक-अर्जुन देव, इन्दिरा अर्जुन देव)

महावीर 12 वर्षों तक जहां-तहां भटकते रहे। 12 वर्ष की लम्बी यात्रा के दौरान उन्होंने एक बार भी अपने वस्त्र नहीं बदले। 42 वर्ष की आयु में उन्होंने वस्त्र का एकदम त्याग कर दिया।
(कक्षा 11, प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

तीर्थंकर, जो अधिकतर मध्य गंगा के मैदान में उत्पन्न हुए और जिन्होंने बिहार में निर्वाण प्राप्त किया, की मिथक कथा जैन सम्प्रदाय की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए गढ़ ली गई।
(कक्षा 11-प्राचीन भारत, पृष्ठ 101, लेखक-रामशरण शर्मा)

जाटों ने, गरीब हो या धनी, जागीरदार हो या किसान, हिन्दू हो या मुसलमान, सबको लूटा।
(कक्षा 12 - आधुनिक भारत, पृष्ठ 18-19, विपिन चन्द्र)
रणजीत सिंह अपने सिंहासन से उतरकर मुसलमान फकीरों के पैरों की धूल अपनी लम्बी सफेद दाढ़ी से झाड़ता था।
(कक्षा 12 -पृष्ठ 20, विपिन चन्द्र)
आर्य समाज ने हिन्दुओं, मुसलमानों, पारसियों, सिखों और ईसाइयों के बीच पनप रही राष्ट्रीय एकता को भंग करने का प्रयास किया।
(कक्षा 12-आधुनिक भारत, पृष्ठ 183, लेखक-विपिन चन्द्र)
तिलक, अरविन्द घोष, विपिनचन्द्र पाल और लाला लाजपतराय जैसे नेता उग्रवादी तथा आतंकवादी थे
(कक्षा 12-आधुनिक भारत-विपिन चन्द्र, पृष्ठ 208)

400 वर्ष ईसा पूर्व अयोध्या का कोई अस्तित्व नहीं था। महाभारत और रामायण कल्पित महाकाव्य हैं।
(कक्षा 11, पृष्ठ 107, मध्यकालीन इतिहास, आर.एस. शर्मा)

वीर पृथ्वीराज चौहान मैदान छोड़कर भाग गया और गद्दार जयचन्द गोरी के खिलाफ युद्धभूमि में लड़ते हुए मारा गया।
(कक्षा 11, मध्यकालीन भारत, प्रो. सतीश चन्द्र)
औरंगजेब जिन्दा पीर थे।
(मध्यकालीन भारत, पृष्ठ 316, लेखक-प्रो. सतीश चन्द्र)

प्रार्थना योग का महत्व

प्रार्थना योग का महत्व

प्रार्थना का प्रचलन सभी धर्मों में है, लेकिन प्रार्थना करने के तरीके अलग-अलग हैं। तरीके कैसे भी हों जरूरी है प्रार्थना करना। प्राथना योग भी अपने आपमे एक अलग ही योग है, लेकिन कुछ लोग इसे योग के तप और ईश्वर प्राणिधान का हिस्सा मानते हैं। प्रार्थना को मानसिक और शारीरिक स्वास्थ प्राप्त करने की एक क्रिया भी माना जाता है।

कैसे करें प्रार्थना : ईश्वर, भगवान, देवी-देवता या प्रकृति के समक्ष प्रार्थना करने से मन और तन को शांति मिलती है। मंदिर, घर या किसी एकांत स्थान पर खड़े होकर या फिर ध्यानमुद्रा में बैठककर दोनों हाथों को नमस्कारमुद्रा में ले आए। अब मन-मस्तिष्क को एकदम शांत और शरीर को पूर्णत: शिथिल कर लें और आंखें बद कर अपना संपूर्ण ध्यान अपने इष्ट पर लगाएं। 15 मिनट तक एकदम शांत इसी मुद्रा में रहें तथा सांस की क्रिया सामान्य कर दें।

प्रार्थना के फायदे : प्रार्थना में मन से जो भी मांगा जाता है वह फलित होता है। ईश्वर प्रार्थना को 'संध्या वंदन' भी कहते हैं। संध्या वंदन ही प्रार्थना है। यह आरती, जप, पूजा या पाठ, तंत्र, मंत्र आदि क्रियाकांड से भिन्न और सर्वश्रेष्ठ है।

प्रार्थना से मन स्थिर और शांत रहता है। इससे क्रोध पर नियंत्रण पाया जा सकता है। इससे स्मरण शक्ति और चेहरे की चमक बढ़ जाती है। प्रतिदिन इसी तरह 15-20 मिनट प्रार्थना करने से व्यक्ति अपने आराध्य से जुड़ने लगता है और धीरे-धीरे उसके सारे संकट समाप्त होने लगते हैं। प्रार्थना से मन में सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है तथा शरीर निरोगी बनता है।

साभार : http://hindi.webdunia.com/yoga-article

Monday, December 17, 2012

फटी एड़ियो का घरेलू उपचार


फटी एड़ियो का उपचार::


शरीर में उष्णता या खुश्की बढ़ जाने, नंगे पैर चलने-फिरने, खून की कमी, तेज ठंड के प्रभाव से तथा धूल-मिट्टी से पैर की एड़ियां फट जाती हैं।



यदि इनकी देखभाल न की जाए तो ये ज्यादा फट जाती हैं और इनसे खून आने लगता है, ये बहुत

दर्द करती हैं। एक कहावत शायद इसलिए प्रसिद्ध है- जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई।


घरेलू इलाज



* अमचूर का तेल 50 ग्राम, मोम 20 ग्राम, सत्यानाशी के बीजों का पावडर 10 ग्राम और शुद्ध घी 25 ग्राम। सबको मिलाकर एक जान कर लें और शीशी में भर लें। सोते समय पैरों को धोकर साफ कर लें और पोंछकर यह दवा बिवाई में भर दें और ऊपर से मोजे पहनकर सो जाएं। कुछ दिनों में बिवाई दूर हो जाएगी, तलवों की त्वचा साफ, चिकनी व साफ हो जाएगी।



* त्रिफला चूर्ण को खाने के तेल में तलकर मल्हम जैसा गाढ़ा कर लें। इसे सोते समय बिवाइयों में लगाने से थोड़े ही दिनों में बिवाइयां दूर हो जाती हैं।



चावल को पीसकर नारियल में छेद करके भर दें और छेद बन्द करके रख दें। 10-15 दिन में चावल सड़ जाएगा, तब निकालकर चावल को पीसकर बिवाइयों में रोज रात को भर दिया करें। इस प्रयोग से भी बिवाइयां ठीक हो जाती हैं।



* गुड़, गुग्गल, राल, सेंधा नमक, शहद, सरसों, मुलहटी व घी सब 10-10 ग्राम लें। घी व शहद को छोड़ सब द्रव्यों को कूटकर महीन चूर्ण कर लें, घी व शहद मिलाकर मल्हम बना लें। इस मल्हम को रोज रात को बिवाइयों पर लगाने से ये कुछ ही दिन में ठीक हो जाती हैं।



* रात को सोते समय चित्त लेट जाएं, हाथ की अंगुली लगभग डेढ़ इंच सरसों के तेल में भिगोकर नाभि में लगाकर 2-3 मिनट तक रगड़ते हुए मालिश करें और तेल को सुखा दें। जब तक तेल नाभि में जज्ब न हो जाए, रगड़ते रहें। यह प्रयोग सिर्फ एक सप्ताह करने पर बिवाइयां ठीक हो जाती हैं और एड़ियां साफ, चिकनी व मुलायम हो जाती हैं। एड़ी पर कुछ भी लगाने की जरूरत नहीं।

Saturday, December 15, 2012

शंख और शंखध्वनी का प्रभाव

शंख और शंखध्वनी का प्रभाव 


 ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है। शंख से कृष्णया लक्ष्मी विग्रह पर जल या पंचामृत अभिषेक करने पर देवता प्रसन्न होते हैं।
 
समुद्र मंथन के समय देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई। जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। जिनमें सर्वप्र
थम पूजित देव गणेश के आकर के गणेश शंख का प्रादुर्भाव हुआ जिसे गणेश शंख कहा जाता है। इसे प्रकृति का चमत्कार कहें या गणेश जी की कृपा की इसकी आकृति और शक्ति हू-ब-हू गणेश जी जैसी है। गणेश शंख प्रकृति का मनुष्य के लिए अनूठा उपहार है। निशित रूप से वे व्यक्ति परम सौभाग्यशाली होते हैं जिनके पास या घर में गणेश शंख का पूजन दर्शन होता है। भगवान गणेश सर्वप्रथम पूजित देवता हैं। यह भारतीय संस्कृति की धरोहर है। विज्ञान के अनुसार शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। उड़ीसा में जगन्नाथपुरी शंख-क्षेत्र कहा जाता है क्योंकि इसका भौगोलिक आकार शंख सदृश है।शंख का सिर्फ़ धार्मिक वा देव लोक तक ही महत्त्व नहीं है। इसका वास्तु के रूप में महत्त्व भी माना जाता है।कहते है कि जिस घर में नियमित शंख ध्वनि होती है वहां कई तरह के रोगों से मुक्ति मिलती है। इनके पूजन से श्री समृद्धि आती है।शास्त्रों के अनुसार श्रीकृष्ण का स्वरूप कहे जाने वाले माह मार्गशीर्ष में उन्हीं के पंचजन्य शंख की पूजा का विशेष महत्त्व है।

हिन्दू धर्म में पूजा स्थल पर शंख रखने की परंपरा है क्यों?

कि शंख को सनातन धर्म का प्रतीक माना जाता है। शंख निधि का प्रतीक है। ऐसा माना जाता है कि इस मंगलचिह्न को घर के पूजास्थल में रखने से अरिष्टों एवं अनिष्टों का नाश होता है और सौभाग्य की वृद्धि होती है। स्वर्गलोक में अष्टसिद्धियों एवं नवनिधियों में शंख का महत्त्वपूर्ण स्थान है। हिन्दू धर्म में शंख का महत्त्व अनादि काल से चला आ रहा है। शंख का हमारी पूजा से निकट का सम्बन्ध है। कहा जाता है कि शंख का स्पर्श पाकर जल गंगाजल के सदृश पवित्र हो जाता है। मन्दिर में शंख में जल भरकर भगवान की आरती की जाती है। आरती के बाद शंख का जल भक्तों पर छिड़का जाता है जिससे वे प्रसन्न होते हैं। जो भगवान कृष्ण को शंख में फूल, जल और अक्षत रखकर उन्हें अर्ध्य देता है, उसको अनन्त पुण्य की प्राप्ति होती है। शंख में जल भरकर ऊँ नमोनारायण का उच्चारण करते हुए भगवान को स्नान कराने से पापों का नाश होता है।

उच्च श्रेणी के श्रेष्ठ शंख कैलाश मानसरोवर,मालद्वीप, लक्षद्वीप, कोरामंडल द्वीप समूह, श्रीलंका एवं भारत में पाये जाते हैं। शंख की आकृति (उदर) के आधार पर इसके प्रकार माने जाते हैं। ये तीन प्रकार के होते हैं - दक्षिणावृत्ति शंख, मध्यावृत्ति शंख तथा वामावृत्ति शंख। जो शंख दाहिने हाथ से पकड़ा जाता है, वह दक्षिणावृत्ति शंख कहलाता है। जिस शंख का मुँह बीच में खुलता है, वह मध्यावृत्ति शंख होता है तथा जो शंख बायें हाथ से पकड़ा जाता है, वह वामावृत्ति शंख कहलाता है। शंख का उदर दक्षिण दिशा की ओर हो तो दक्षिणावृत्त और जिसका उदर बायीं ओर खुलता हो तो वह वामावृत्त शंख है। मध्यावृत्ति एवं दक्षिणावृति शंख सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते हैं। इनकी दुर्लभता एवं चमत्कारिक गुणों के कारण ये अधिक मूल्यवान होते हैं। इनके अलावा लक्ष्मी शंख, गोमुखी शंख, कामधेनु शंख, विष्णु शंख, देव शंख, चक्र शंख, पौंड्र शंख, सुघोष शंख, गरुड़ शंख, मणिपुष्पक शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख आदि प्रकार के होते हैं। हिन्दुओं के 33 करोड़ देवता हैं। सबके अपने- अपने शंख हैं। हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई भी पूजा, हवन, यज्ञ आदि शंख के उपयोग के बिना पूर्ण नहीं माना जाता है। कुछ गुह्य साधनाओं में इसकी अनिवार्यता होती है। शंख साधक को उसकी इच्छित मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते हैं तथा जीवन को सुखमय बनाते हैं। शंख को विजय, समृद्धि, सुख, यश, कीर्ति तथा लक्ष्मी का प्रतीक माना गया है।
शंख हर युग में लोगों को आकर्षित करते रहे है। देव स्थान से लेकर युद्ध भूमि तक, सतयुग से लेकर आज तक शंखों का अपना एक अलग महत्त्व है। पूजा में इसकी ध्वनि जहाँ श्रद्धा वा आस्था का भाव जगाती है वहीं युद्ध भूमि में जोश पैदा करती है। रण भूमि में शंखों का पहली बार उपयोग देव-असुर संग्राम में हुआ था। देव दानवों के इस युद्ध में सभी देव-दानव अपने अपने शंखों के साथ युद्ध भूमि में आए थे। शंखों कि ध्वनि के साथ युद्ध शुरू होता और उसी के साथ ख़त्म होता था। तभी से यह माना जाता है कि हर देवी-देवता का अपना एक अलग शंख होता है।

साधारणत: मंदिर में रखे जाने वाले शंख उल्टे हाथ के तरफ खुलते हैं और बाज़ार में आसानी से ये कहीं भी मिल जाते हैं लेकिन क्या आपने कभी ध्यान से किसी लक्ष्मी के पूराने फोटो को ध्यान से देखा है इन चित्रो में लक्ष्मी के हाथ में जो शंख होता है वो दक्षिणावर्ती अर्थात सीधे हाथ की तरफ खुलने वाले होते हैं। वामावर्ती शंख को जहां विष्णु का स्वरुप माना जाता है और दक्षिणावर्ती शंख को लक्ष्मी का स्वरुप माना जाता है। दक्षिणावृत्त शंख घर में होने पर लक्ष्मी का घर में वास रहता है।

शंख नाद का प्रतीक है। नाद जगत में आदि से अंत तक व्याप्त है। सृष्टि का आरंभ भी नाद से ही होता है और विलय भी उसी में होता है। दूसरे शब्दों में शंख को ॐ का प्रतीक माना जाता है, इसलिए पूजा-अर्चना आदि समस्त मांगलिक अवसरों पर शंख ध्वनि की विशेष महत्ता है। हिन्दू संस्कृति में पूजा और अनुष्ठान के समय शंख बजाने की परंपरा है जो बहुत पुरानी है। जैन, बौद्ध, शाक्त, शैव, वैष्णवआदि सभी संप्रदायों में शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। शंख ध्वनि किसी का ध्यान आकर्षित करने या कोई संकेत देने के लिए की जाती है। दूसरी बात ये कि क्योंकि शंख पानी से निकलता है और पानी को जीवन से जोड़ा जाता है इसलिए इसे जीवन का प्रतीक भी माना जाता है। तीसरा ये कि किसी राजदरबार में राजा के आगमन की सूचना शंख बजाकर दी जाती थी और सबसे प्रचलित शंख ध्वनि युद्ध के प्रारंभ और अंत की सूचना के लिए की जाती थी। महाभारत युद्ध में शंख ध्वनि की विशद चर्चा है। कई योद्धाओं के शंखों के नाम भी गिनाए गए हैं जिसमें कृष्ण के पांचजन्य शंख की विशेष महत्ता बताई गई है। जहां तक तीन बार शंख बजाने की परंपरा है वह आदि, मध्य और अंत से जुड़ी है। वैदिक मान्यता के अनुसार शंख को विजय घोष का प्रतीक माना जाता है। कार्य के आरम्भ करने के समय शंख बजाना शुभता का प्रतीक माना जाता है। इसके नाद से सुनने वाले को सहज ही ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव हो जाता है और मस्तिष्क के विचारों में भी सकारात्मक बदलाव आ जाता है।[4]

हमारे यहां शंख बजाना एक धार्मिक अनुष्ठान है। पूजा आरती, कथा, धार्मिक अनुष्टानों, हवन, यज्ञ आदि के आरंभ व अंत में भी शंख-ध्वनि करने का विधान है। इसके पीछे धार्मिक आधार तो है ही, वैज्ञानिक रूप से भी इसकी प्रामाणिकता सिद्ध हो चुकी है। और शंख बजाने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ भी मिलता है। शंख की पवित्रता और महत्त्व को देखते हुए हमारे यहां सुबह और शाम शंख बजाने की प्रथा शुरू की गई है। मंदिरों में नियमित रूप से और बहुत से घरों में पूजापाठ, धार्मिक अनुष्ठान, व्रत, कथा, जन्मोत्सव आदि अवसरों पर शंख बजाना एक शुभ परम्परा मानी जाती है। कहा जाता है कि शंख बजाने से घर के बाहर की आसुरी शक्तियां घर के भीतर प्रवेश नहीं कर पाती हैं। पारद शिवलिंग, पार्थिव शिवलिंग एवं मंदिरों में शिवलिंगों पर रुद्राभिषेक करते समय शंख-ध्वनि की जाती है। आरती, धार्मिक उत्सव, हवन-क्रिया, राज्याभिषेक, गृह-प्रवेश, वास्तु-शांति आदि शुभ अवसरों पर शंख-ध्वनि से लाभ मिलता है। शंख बजाने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। महाभारत काल में सभी योद्धाओं ने युद्ध घोष के लिए अलग-अलग शंख बजाए थे। महाभारत काल में श्रीकृष्ण द्वारा कई बार अपना पंचजन्य शंख बजाया था। महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण ने पांचजन्य शंख को बजा कर युद्ध का जयघोष किया था। कहते है कि यह शंख जिसके पास होता है उसकी यश गाथा कभी कम नहीं होती। महाभारत के इसी युद्ध में अर्जुन ने देवदत्त नाम का शंख बजाया था। वहीं युधिष्ठिर के पास अनंत विजय नाम का शंख था, जिसे उन्होंने रण भूमि में बजाया था। इस शंख कि ध्वनि की ये विशेषता मानी जाती है कि इससे शत्रु सेना घबराती है और खुद कि सेना का उत्साह बढता है। भीष्म ने पोडरिक नामक शंख बजाया था। इस शंख की आवाज़ से कौरवों की सेना में हलचल मच गई थी। गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 15-19 में इसका वर्णन मिलता है --

पांचजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय। पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर।।
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर। नकुल सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ।।
काश्यश्च परमेष्वास शिखण्डी च महारथ। धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजिताः।।
द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश पृथिवीपते। सौभद्रश्च महाबाहुः शंखान्दध्मुः पृथक्पृथक्।।

अर्थात् श्रीकृष्ण भगवान ने पांचजन्य नामक, अर्जुन ने देवदत्त और भीमसेन ने पौंड्र शंख बजाया। कुंती-पुत्र राजा युधिष्ठिर ने अनंतविजय शंख, नकुल ने सुघोष एवं सहदेव ने मणिपुष्पक नामक शंख का नाद किया। इसके अलावा काशीराज, शिखंडी, धृष्टद्युम्न, राजा विराट, सात्यकि, राजा द्रुपद, द्रौपदी के पाँचों पुत्रों और अभिमन्यु आदि सभी ने अलग-अलग शंखों का नाद किया।

शंख की उत्पत्ति संबंधी पुराणों में एक कथा वर्णित है। सुदामा नामक एक कृष्ण भक्त पार्षद राधा के शाप से शंखचूड़ दानवराज होकर दक्ष के वंश में जन्मा। अन्त में [विष्णु] ने इस दानव का वध किया। शंखचूड़ के वध के पश्चात्‌ सागर में बिखरी उसकी अस्थियों से शंख का जन्म हुआ और उसकी आत्मा राधा के शाप से मुक्त होकर गोलोक वृंदावन में श्रीकृष्ण के पास चली गई।भारतीय धर्मशास्त्रों में शंख का विशिष्ट एवं महत्त्वपूर्ण स्थान है। मान्यता है कि इसका प्रादुर्भाव समुद्र-मंथन से हुआ था। समुद्र-मंथन से प्राप्त 14 रत्नों में से छठवां रत्न शंख था। अन्य 13 रत्नों की भांति शंख में भी वही अद्भुत गुण मौजूद थे। विष्णु पुराण के अनुसार माता लक्ष्मी समुद्रराज की पुत्री हैं तथा शंख उनका सहोदर भाई है। अत यह भी मान्यता है कि जहाँ शंख है, वहीं लक्ष्मी का वास होता है। इन्हीं कारणों से शंख की पूजा भक्तों को सभी सुख देने वाली है। शंख की उत्पत्ति के संबंध में हमारे धर्म ग्रंथ कहते हैं कि सृष्टी आत्मा से, आत्मा आकाश से, आकाश वायु से, वायु आग से, आग जल से और जल पृथ्वी से उत्पन्न हुआ है और इन सभी तत्व से मिलकर शंख की उत्पत्ति मानी जाती है। भागवत पुराण के अनुसार, संदीपन ऋषि आश्रम में श्रीकृष्ण ने शिक्षा पूर्ण होने पर उनसे गुरु दक्षिणा लेने का आग्रह किया। तब ऋषि ने उनसे कहा कि समुद्र में डूबे मेरे पुत्र को ले आओ। कृष्ण ने समुद्र तट पर शंखासुर को मार गिराया। उसका खोल शेष रह गया। माना जाता है कि उसी से शंख की उत्पत्ति हुई। पांचजन्य शंख वही था। पौराणिक कथाओं के अनुसार, शंखासुर नामक असुर को मारने के लिए श्री विष्णु ने मत्स्यावतार धारण किया था। शंखासुर के मस्तक तथा कनपटी की हड्डी का प्रतीक ही शंख है। उससे निकला स्वर सत की विजय का प्रतिनिधित्व करता है।शंख का जल शिव को निषेध बताया गया है। इसी वजह से शिवजी को शंख से जल नहीं चढ़ाया जाता है।

Friday, December 14, 2012

आयुर्वेद के अनुसार किस-किस चीज को साथ नहीं खाना चाहिए और क्यों


क्या खाये और कैसे?

आयुर्वेद के अनुसार किस-किस चीज को साथ नहीं खाना चाहिए और क्यों, जानते हैं :-----

दूध के साथ दही लें या नहीं? दूध और दही दोनों की तासीर अलग होती है। दही एक खमीर वाली चीज है। दोनों को मिक्स करने से बिना खमीर वाला खाना (दूध) खराब हो जाता है। साथ ही,

एसिडिटी बढ़ती है और गैस, अपच व उलटी हो सकती है। इसी तरह दूध के साथ अगर संतरे का जूस लेंगे तो भी पेट में खमीर बनेगा। अगर दोनों को खाना ही है तो दोनों के बीच घंटे-डेढ़ घंटे का फर्क

होना चाहिए क्योंकि खाना पचने में कम-से-कम इतनी देर तो लगती ही है।

दूध के साथ तला-भुना और नमकीन खाएं या नहीं? दूध में मिनरल और विटामिंस के अलावा लैक्टोस शुगर और प्रोटीन होते हैं। दूध एक एनिमल प्रोटीन है और उसके साथ ज्यादा मिक्सिंग करेंगे तो

रिएक्शन हो सकते हैं। फिर नमक मिलने से मिल्क प्रोटींस जम जाते हैं और पोषण कम हो जाता है। अगर लंबे समय तक ऐसा किया जाए तो स्किन की बीमारियां हो सकती हैं। आयुर्वेद के मुताबिक

उलटे गुणों और मिजाज के खाने लंबे वक्त तक ज्यादा मात्रा में साथ खाए जाएं तो नुकसान पहुंचा सकते हैं। लेकिन मॉडर्न मेडिकल साइंस ऐसा नहीं मानती।

सोने से पहले दूध पीना चाहिए या नहीं? आयुर्वेद के मुताबिक नींद शरीर के कफ दोष से प्रभावित होती है। दूध अपने भारीपन, मिठास और ठंडे मिजाज के कारण कफ प्रवृत्ति को बढ़ाकर नींद लाने में

सहायक होता है। मॉडर्न साइंस में भी माना जाता है कि दूध नींद लाने में मददगार होता है। इससे सेरोटोनिन हॉर्मोन भी निकलता है, जो दिमाग को शांत करने में मदद करता है। वैसे, दूध अपने

आप में पूरा आहार है, जिसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन और कैल्शियम होते हैं। इसे अकेले पीना ही बेहतर है। साथ में बिस्किट, रस्क, बादाम या ब्रेड ले सकते हैं, लेकिन भारी खाना खाने से दूध के

गुण शरीर में समा नहीं पाते।

दूध में पत्ती या अदरक आदि मिलाने से सिर्फ स्वाद बढ़ता है, उसका मिजाज नहीं बदलता। वैसे, टोंड दूध को उबालकर पीना, खीर बनाकर या दलिया में मिलाकर लेना और भी फायदेमंद है। बहुत

ठंडे या गर्म दूध की बजाय गुनगुना या कमरे के तापमान के बराबर दूध पीना बेहतर है।

नोट : अक्सर लोग मानते हैं कि सर्जरी या टांके आदि के बाद दूध नहीं लेना चाहिए क्योंकि इससे पस पड़ सकती है, यह गलतफहमी है। दूध में मौजूद प्रोटीन शरीर की टूट-फूट को जल्दी भरने में

मदद करते हैं। दूध दिन भर में कभी भी ले सकते हैं। सोने से कम-से-कम एक घंटे पहले लें। दूध और डिनर में भी एक घंटे का अंतर रखें।

खाने के साथ छाछ लें या नहीं? छाछ बेहतरीन ड्रिंक या अडिशनल डाइट है। खाने के साथ इसे लेने से खाने का पाचन भी अच्छा होता है और शरीर को पोषण भी ज्यादा मिलता है। यह खुद भी आसानी

से पच जाती है। इसमें अगर एक चुटकी काली मिर्च, जीरा और सेंधा नमक मिला लिया जाए तो और अच्छा है। इसमें अच्छे बैक्टीरिया भी होते हैं, जो शरीर के लिए फायदेमंद होते हैं। मीठी लस्सी

पीने से फालतू कैलरी मिलती हैं, इसलिए उससे बचना चाहिए। छाछ खाने के साथ लेना या बाद में लेना बेहतर है। पहले लेने से जूस डाइल्यूट हो जाएंगे।

दही और फल एक साथ लें या नहीं? फलों में अलग एंजाइम होते हैं और दही में अलग। इस कारण वे पच नहीं पाते, इसलिए दोनों को साथ लेने की सलाह नहीं दी जाती। फ्रूट रायता कभी-कभार ले

सकते हैं, लेकिन बार-बार इसे खाने से बचना चाहिए।

आयुर्वेद के मुताबिक परांठे या पूरी आदि तली-भुनी चीजों के साथ दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के पाचन में रुकावट पैदा करता है। इससे फैट्स से मिलनेवाली एनर्जी शरीर को नहीं मिल पाती।

दूध के साथ फल खाने चाहिए या नहीं? दूध के साथ फल लेते हैं तो दूध के अंदर का कैल्शियम फलों के कई एंजाइम्स को एड्जॉर्ब (खुद में समेट लेता है और उनका पोषण शरीर को नहीं मिल पाता)

कर लेता है। संतरा और अनन्नास जैसे खट्टे फल तो दूध के साथ बिल्कुल नहीं लेने चाहिए। व्रत वगैरह में बहुत से लोग केला और दूध साथ लेते हैं, जोकि सही नहीं है। केला कफ बढ़ाता है और दूध

भी कफ बढ़ाता है। दोनों को साथ खाने से कफ बढ़ता है और पाचन पर भी असर पड़ता है। इसी तरह चाय, कॉफी या कोल्ड ड्रिंक के रूप में खाने के साथ अगर बहुत सारा कैफीन लिया जाए तो भी

शरीर को पूरे पोषक तत्व नहीं मिल पाते।

मछली के साथ दूध पिएं या नहीं? दही की तासीर ठंडी है। उसे किसी भी गर्म चीज के साथ नहीं लेना चाहिए। मछली की तासीर काफी गर्म होती है, इसलिए उसे दही के साथ नहीं खाना चाहिए। इससे

गैस, एलर्जी और स्किन की बीमारी हो सकती है। दही के अलावा शहद को भी गर्म चीजों के साथ नहीं खाना चाहिए।

फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, खासकर तरबूज खाने के बाद? फल खाने के फौरन बाद पानी पी सकते हैं, हालांकि दूसरे तरल पदार्थों से बचना चाहिए। असल में फलों में काफी फाइबर

होता है और कैलरी काफी कम होती है। अगर ज्यादा फाइबर के साथ अच्छा मॉइश्चर यानी पानी भी मिल जाए तो शरीर में सफाई अच्छी तरह हो जाती है। लेकिन तरबूज या खरबूज के मामले में यह

थ्योरी सही नहीं बैठती क्योंकि ये काफी फाइबर वाले फल हैं। तरबूज को अकेले और खाली पेट खाना ही बेहतर है। इसमें पानी काफी ज्यादा होता है, जो पाचन रसों को डाइल्यूट कर देता है। अगर कोई

और चीज इसके साथ या फौरन बाद/पहले खाई जाए तो उसे पचाना मुश्किल होता है। इसी तरह, तरबूज के साथ पानी पीने से लूज-मोशन हो सकते हैं। वैसे तरबूज अपने आप में काफी अच्छा फल है।

यह वजन घटाने के इच्छुक लोगों के अलावा शुगर और दिल के मरीजों के लिए भी अच्छा है।

खाने के साथ फल नहीं खाने चाहिए। कार्बोहाइड्रेट और प्रोटींस के पाचन का मिकैनिज्म अलग होता है। कार्बोहाइड्रेट को पचानेवाला स्लाइवा एंजाइम एल्कलाइन मीडियम में काम करता है, जबकि नीबू,

संतरा, अनन्नास आदि खट्टे फल एसिडिक होते हैं। दोनों को साथ खाया जाए तो कार्बोहाइड्रेट या स्टार्च की पाचन प्रक्रिया धीमी हो जाती है। इससे कब्ज, डायरिया या अपच हो सकती है। वैसे भी फलों

के पाचन में सिर्फ दो घंटे लगते हैं, जबकि खाने को पचने में चार-पांच घंटे लगते हैं। मॉडर्न मेडिकल साइंस की राय कुछ और है। उसके मुताबिक, फ्रूट बाहर एसिडिक होते हैं लेकिन पेट में जाते ही

एल्कलाइन हो जाते हैं। वैसे भी शरीर में जाकर सभी चीजें कार्बोहाइड्रेट, फैट, प्रोटीन आदि में बदल जाती हैं, इसलिए मॉडर्न मेडिकल साइंस तरह-तरह के फलों को मिलाकर खाने की सलाह देता है।

मीठे फल और खट्टे फल एक साथ न खाएं आयुर्वेद के मुताबिक, संतरा और केला एक साथ नहीं खाना चाहिए क्योंकि खट्टे फल मीठे फलों से निकलनेवाली शुगर में रुकावट पैदा करते हैं, जिससे

पाचन में दिक्कत हो सकती है। साथ ही, फलों की पौष्टिकता भी कम हो सकती है। मॉडर्न मेडिकल साइंस इससे इत्तफाक नहीं रखती।

खाने के साथ पानी पिएं या नहीं? पानी बेहतरीन पेय है, लेकिन खाने के साथ पानी पीने से बचना चाहिए। खाना लंबे समय तक पेट में रहेगा तो शरीर को पोषण ज्यादा मिलेगा। अगर पानी ज्यादा लेंगे

तो खाना फौरन नीचे चला जाएगा। अगर पीना ही है तो थोड़ा पिएं और गुनगुना या नॉर्मल पानी पिएं। बहुत ठंडा पानी पीने से बचना चाहिए। पानी में अजवाइन या जीरा डालकर उबाल लें। यह खाना पचाने

में मदद करता है। खाने से आधा घंटा पहले या एक घंटा बाद गिलास भर पानी पीना अच्छा है।

लहसुन या प्याज खाने चाहिए या नहीं? लहसुन और प्याज को रोजाना के खाने में शामिल किया जाना चाहिए। लहसुन फैट कम करता है और बैड कॉलेस्ट्रॉल (एलडीएल) घटाकर गुड कॉलेस्ट्रॉल

(एचडीएल) बढ़ाता है। इसमें एंटी-बॉडीज और एंटी-ऑक्सिडेंट गुण होते हैं। प्याज से भूख बढ़ती है और यह खून की नलियों के आसपास फैट जमा होने से रोकता है। लंबे समय तक इसके इस्तेमाल

से सर्दी-जुकाम और सांस संबंधी एलर्जी का मुकाबला अच्छे से किया जा सकता है। लहसुन और प्याज कच्चा या भूनकर, दोनों तरह से खा सकते हैं। लेकिन लहसुन कच्चा खाना बेहतर है। कच्चे

लहसुन को निगलें नहीं, चबाकर खाएं क्योंकि कच्चा लहसुन कई बार पच नहीं पाता। साथ ही, उसमें कई ऐसे तेल होते हैं, जो चबाने पर ही निकलते हैं और उनका फायदा शरीर को मिलता है।

परांठे के साथ दही खाएं या नहीं? आयुर्वेद के मुताबिक परांठे या पूरी आदि तली-भुनी चीजों के साथ दही नहीं खाना चाहिए क्योंकि दही फैट के पाचन में रुकावट पैदा करता है। इससे फैट्स से

मिलनेवाली एनजीर् शरीर को नहीं मिल पाती। दही खाना ही है तो उसमें काली मिर्च, सेंधा नमक या आंवला पाउडर मिला लें। हालांकि रोटी के साथ दही खाने में कोई परहेज नहीं है। मॉडर्न साइंस

कहता है कि दही में गुड बैक्टीरिया होते हैं, जोकि खाना पचाने में मदद करते हैं इसलिए दही जरूर खाना चाहिए।

फैट और प्रोटीन एक साथ खाएं या नहीं? घी, मक्खन, तेल आदि फैट्स को पनीर, अंडा, मीट जैसे भारी प्रोटींस के साथ ज्यादा नहीं खाना चाहिए क्योंकि दो तरह के खाने अगर एक साथ खाए

जाएं, तो वे एक-दूसरे की पाचन प्रक्रिया में दखल देते हैं। इससे पेट में दर्द या पाचन में गड़बड़ी हो सकती है।

दूध, ब्रेड और बटर एक साथ लें या नहीं? दूध को अकेले लेना ही बेहतर है। तब शरीर को इसका फायदा ज्यादा होता है। आयुर्वेद के मुताबिक प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और फैट की ज्यादा मात्रा एक साथ

नहीं लेनी चाहिए क्योंकि तीनों एक-दूसरे के पचने में रुकावट पैदा कर सकते हैं और पेट में भारीपन हो सकता है। मॉडर्न साइंस इसे सही नहीं मानता। उसके मुताबिक यह सबसे अच्छे नाश्तों में से है

क्योंकि यह अपनेआप में पूरा है।

तरह-तरह की डिश एक साथ खाएं या नहीं? एक बार के खाने में बहुत ज्यादा वैरायटी नहीं होनी चाहिए। एक ही थाली में सब्जी, नॉन-वेज, मीठा, चावल, अचार आदि सभी कुछ खा लेने से पेट

में खलबली मचती है। रोज के लिए फुल वैरायटी की थाली वाला कॉन्सेप्ट अच्छा नहीं है। कभी-कभार ऐसा चल जाता है।

खाने के बाद मीठा खाएं या नहीं? मीठा अगर खाने से पहले खाया जाए तो बेहतर है क्योंकि तब न सिर्फ यह आसानी से पचता है, बल्कि शरीर को फायदा भी ज्यादा होता है। खाने के बाद में मीठा

खाने से प्रोटीन और फैट का पाचन मंदा होता है। शरीर में शुगर सबसे पहले पचता है, प्रोटीन उसके बाद और फैट सबसे बाद में।

खाने के बाद चाय पिएं या नहीं? खाने के बाद चाय पीने से कई फायदा नहीं है। यह गलत धारणा है कि खाने के बाद चाय पीने से पाचन बढ़ता है। हालांकि ग्रीन टी, डाइजेस्टिव टी, कहवा या सौंफ,

दालचीनी, अदरक आदि की बिना दूध की चाय पी सकते हैं।

छोले-भठूरे या पिज्जा/बर्गर के साथ कोल्ड ड्रिंक्स लें या नहीं? कोल्ड ड्रिंक में मौजूद एसिड की मात्रा और ज्यादा शुगर फास्ट फूड (पिज्जा, बर्गर, फ्रेंच फ्राइस आदि) में मौजूद फैट के साथ अच्छा

नहीं माना जाता। तला-भुना खाना एसिडिक होता है और शुगर भी एसिडिक होती है। ऐसे में दोनों को एक साथ लेना सही नहीं है। साथ ही बहुत गर्म और ठंडा एक साथ नहीं खाना चाहिए। गर्मागर्म

भठूरे या बर्गर के साथ ठंडा कोल्ड ड्रिंक पीना शरीर के तापमान को खराब करता है। स्नैक्स में मौजूद फैटी एसिड्स शुगर का पाचन भी खराब करते हैं। फास्ट फूड या तली-भुनी चीजों के साथ कोल्ड ड्रिंक

के बजाय जूस, नीबू-पानी या छाछ ले सकते हैं। जूस में मौजूद विटामिन-सी खाने को पचाने में मदद करता है।

भारी काबोर्हाइड्रेट्स के साथ भारी प्रोटीन खाएं या नहीं? मीट, अंडे, पनीर, नट्स जैसे प्रोटीन ब्रेड, दाल, आलू जैसे भारी कार्बोहाइड्रेट्स के साथ न खाएं। दरअसल, हाई प्रोटीन को पचाने के लिए

जो एंजाइम चाहिए, अगर वे एक्टिवेट होते हैं तो वे हाई कार्बो को पचाने वाले एंजाइम को रोक देते हैं। ऐसे में दोनों का पाचन एक साथ नहीं हो पाता। अगर लगातार इन्हें साथ खाएं तो कब्ज की

शिकायत हो सकती है

जाने - दूसरे ग्रह व लोक जहाँ जीवन है

हमारे शास्त्रों में वार्णित दूसरे ग्रह व लोक जहाँ जीवन है.

आज के वैज्ञानिक दुसरे ग्रहों पर सभ्यता की निशानियाँ ढूंढ़ रहें है। पर अभी सफलता बहुत दूर है। हमारे सबसे नज़दीक चाँद है ; वहां पर भी अभी सुगमता से नहीं जाया जा सकता। फिर हमारे पडोसी ग्रह शुक्र और मंगल पर जाना तो हमें अभी तक नहीं आया। पर भारतीय ये जानते थे। उनका दुसरे लोक के लोगों से संपर्क था , आना जाना था। तभी तो ग्रंथों में सात लोकों का उल्लेख मिलता है। देव और दानवों के किस्से है।राजा बलि, जो कहते है 
अभी भी जीवित है और साल में एक बार पृथ्वी पर आते है , पाताल लोक में रहते है। 



पर ये मुर्ख विदेशी आक्रमणकारी आये और इन्होने हमारे सारे ग्रन्थ खराब कर दिए , शिक्षा व्यवस्था बंद करा दी और हमें अज्ञान के अंधकार में धकेल दिया।




खुद अभी भी सब खोज रहें है।ये सब हमारे ग्रंथों में हज़ारों वर्ष पहले ही वर्णित है। आज विज्ञान कहता है की पृथ्वी और अन्य ग्रह स्पेस में है। हमारे ग्रंथों में कहा है पृथ्वी "शेष" ने धारण करी है। शेष यानी खाली स्थान।



सात लोक नीचे हैं - 
 १. तल, २. अतल, ३. वितल, ४. तलातल, ५. रसातल, ६. महितल, ७. पाताल। 




 सात लोक ऊपर - भू, भुवः, स्व, मह, जन, तप, सत्य से सात ऊर्ध्व लोक हैं।





 परन्तु जिनमें न श्रद्धा है, न धर्म है, शास्त्र विरुद्ध जो चलते हैं वो नर्क लोक को जाते हैं। और यह नर्क लोक पृथ्वी से नीचे, जल के ऊपर दक्षिण दिशा में हैं।



पुराणों अनुसार सात लोक को मूलत: दो लोक में विभाजित किया गया हैं-


1 कृतक लोक और 2.अकृतक लोक। कृतक लोक में ही प्रलय और उत्पत्ति का चक्र चलता रहता है अकृतक लोक समय और स्थान शून्य है।

सप्त लोक का वर्णन : सात लोक हैं जिसमें से तीन लोक 1.भू लोक (धरती), 2.भुवर्लोक (आकाश), 3.स्वर्लोक (अंतरिक्ष) में ही प्रयल होता है, जबकि 4.महर्लोक, 5.जनलोक, 6.तपलोक और 7.सत्यलोक- उक्त 4 लोक प्रलय से अछूते रहते हैं।

इनमें भी जो 'महर्लोक' हैं वह जनशून्य अवस्था में रहता है जहा आत्माएं स्थिर रहती हैं, यहीं पर महाप्रलय के दौरान सृष्टि भस्म के रूप में विद्यमान रहती है। यह लोग त्रैलोक्य और ब्रह्मलोक के बीच स्थित है।

ब्राह्मांड का स्वरूप : यह ब्रह्मांड अंडाकार है। यह ब्रह्मांड जल या बर्फ और उसके बादलों से घिरा हुआ है। इससे जल से भी दस ‍गुना ज्यादा यह अग्नि तत्व से ‍आच्छादित है और इससे भी दस गुना ज्यादा यह वायु से घिरा हुआ माना गया है।

वायु से दस गुना ज्यादा यह आकाश से घिरा हुआ है और यह आकाश जहाँ तक प्रकाशित होता है वहाँ से यह दस गुना ज्यादा 'तामस अंधकार' से घिरा हुआ है और यह तामस अंधकार भी अपने से दस गुना ज्यादा महत्तत्व से घिरा हुआ है जो असीमित, अपरिमेय और अनंत है। उस अनंत से ही पूर्ण की उत्पत्ति होती है और उसी से उसका पालन होता है और अंतत: यह ब्रह्मांड उस अनंत में ही लीन हो जाता है।

इसे इस तरह समझें : अनंत महत्तत्व से घिरा 'तामस अंधकार' और उससे ही घिरे 'आकाश' को स्थान और समय कहा गया है। इससे ही दूरी और समय का ज्ञान होता है। आकाश से ही वायुतत्व की उत्पत्ति होती है। वायु से ही तेज अर्थात अग्नि की और अग्नि से जल, जल से पृथ्‍वी की सृष्टि हुई। इस धरती पर जो जीवन है वह खुद धरती और आकाश का है।

सृष्टि का विभाजन या भेद :

(A) कृतक लोक :
कृतक त्रैलोक्य जिसे त्रिभुवन या मृत्युलोक भी कहते हैं। इसके बारे में पुराणों की धारणा है कि यह नश्वर है, कृष्ण इसे परिवर्तनशील मानते हैं। इसकी एक निश्‍चित आयु है। उक्त त्रैलोक्य के नाम हैं- भूलोक, भुवर्लोक, स्वर्गलोक। यही लोक पाँच तत्वों से निर्मित है- आकाश, अग्नि, वायु, जल और जड़। इन्हीं पाँच तत्वों को वेद क्रमश: जड़, प्राण, मन, विज्ञान और आनंदमय कोष कहते हैं।

(1)भूलोक : जितनी दूर तक सूर्य, चंद्रमा आदि का प्रकाश जाता है, वह पृथ्वी लोक कहलाता है, लेकिन भूलोक से तात्पर्य जिस भी ग्रह पर पैदल चला जा सकता है।

(2)भुवर्लोक : पृथ्वी और सूर्य के बीच के स्थान को भुवर्लोक कहते हैं। इसमें सभी ग्रह-नक्षत्रों का मंडल है।

(3)स्वर्गलोक : सूर्य और ध्रुव के बीच जो चौदह लाख योजन का अन्तर है, उसे स्वर्गलोक कहते हैं। इसी के बीच में सप्तर्षि का मंडल है।

(B) अकृतक लोक :
जन, तप और सत्य लोक तीनों अकृतक लोक कहलाते हैं। अकृतक त्रैलोक्य अर्थात जो नश्वर नहीं है अनश्वर है। जिसे मनुष्य स्वयं के सद्‍कर्मों से ही अर्जित कर सकता है। कृतक और अकृतक लोक के बीच स्थित है 'महर्लोक' जो कल्प के अंत के प्रलय में केवल जनशून्य हो जाता है, लेकिन नष्ट नहीं होता। इसीलिए इसे कृतकाकृतक लोक कहते हैं।

(4)महर्लोक : ध्रुवलोक से एक करोड़ योजन ऊपर महर्लोक है।
(5)जनलोक : महर्लोक से बीस करोड़ योजन ऊपर जनलोक है।
(6)तपलोक : जनलोक से आठ करोड़ योजन ऊपर तपलोक है।
(7)सत्यलोक : तपलोक से बारह करोड़ योजन ऊपर सत्यलोक है।

जिनके घर में यज्ञ नहीं होता उनके सात लोक नष्ट हो जाते हैं |
सन्ध्या के मन्त्रों में शरीर के सात अंगों का वर्णन:
ओ३म् भू: पूनातु शिरसि |
ओ३म् भुव: पूनातु नेत्रयो:
ओ३म् स्व: पूनातु कण्ठे|
ओ३म् मह: पूनातु हृदये |
ओ३म् जन: पुनातु नाभ्याम |
ओ३म् तप: पुनातु पादयो|
ओ३म् सत्यम् पुनातु पुन: शिरसि |
ओ३म् खं ब्रह्म पुनातु सर्वत्र |

यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे
ब्रह्माण्ड के सात लोक:
१. पृथ्वी
२. वायु
३. अन्तरिक्ष
४. आदित्य
५. चन्द्रमा
६. नक्षत्र
७. ब्रह्म लोक
ये ही लोक हैं जिनमें प्राणी रहा करता है | परन्तु यज्ञ न करने अथवा देव ऋण से उऋण न होने वाले जिस लोक में भी जायेंगे वह उनके लिए शान्ति का स्थान ना होगा| सातवें ब्रह्म लोक में तो अशुभकर्मी जा ही नहीं सकते |




धन्यवाद
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क्यों लगते है हिंदू तिलक?


मस्तक पर तिलक प्रति दिन जरुर करना चाहिए

अपने देश में है मस्तक पर तिलक लगाने की प्रथा प्रचलित है। यह प्राचीन है। मनुष्य के मस्तक के मध्य में विष्णु भगवान का निवास है,इसलिए तिलक इसी स्थान पर लगाया जाना चाहिए है।



स्त्रियां लाल कुंकुम का तिलक लगाती हैं। यह भी बिना प्रयोजन नहीं है। लाल रंग ऊर्जा एवं स्फूर्ति का प्रतीक होता है। तिलक स्त्रियों के सौंदर्य में अभिवृद्धि करता है। तिलक लगाना देवी की आराधना 
से भी जुड़ा है। देवी की पूजा करने के बाद माथे पर तिलक लगाया जाता है। तिलक देवी के आशीर्वाद का प्रतीक माना जाता है।



हिन्दु परम्परा में मस्तक पर तिलक लगाना शूभ माना जाता है इसे सात्विकता का प्रतीक माना जाता है विजयश्री प्राप्त करने के उद्देश्य रोली, हल्दी, चन्दन या फिर कुम्कुम का तिलक या कार्य की महत्ता को ध्यान में रखकर, इसी प्रकार शुभकामनाओं के रुप में हमारे तीर्थस्थानों पर, विभिन्न पर्वो-त्यौहारों, विशेष अतिथि आगमन पर आवाजाही के उद्देश्य से भी लगाया जाता है ।



मस्तिष्क के भ्रु-मध्य ललाट में जिस स्थान पर टीका या तिलक लगाया जाता है यह भाग आज्ञाचक्र है । शरीर शास्त्र के अनुसार पीनियल ग्रन्थि का स्थान होने की वजह से, जब पीनियल ग्रन्थि को उद्दीप्त किया जाता हैं, तो मस्तष्क के अन्दर एक तरह के प्रकाश की अनुभूति होती है । पीनियल ग्रन्थि के उद्दीपन से आज्ञाचक्र का उद्दीपन होगा । इसी वजह से धार्मिक कर्मकाण्ड, पूजा-उपासना व शूभकार्यो में टीका लगाने का प्रचलन है.



उस के उद्दीपन से हमारे शरीर में स्थूल-सूक्ष्म अवयन जागृत हो सकें । इस आसान तरीके से सर्वसाधारण की रुचि धार्मिकता की ओर, आत्मिकता की ओर, तृतीय नेत्र जानकर इसके उन्मीलन की दिशा में किया गया | जिससे आज्ञाचक्र को नियमित उत्तेजना मिलती रहती है ।



तन्त्र शास्त्र के अनुसार माथे को इष्ट इष्ट देव का प्रतीक समझा जाता है . हमारे इष्ट देव की स्मृति हमें सदैव बनी रहे इस तरह की धारणा , ध्यान में रखकर, मन में उस केन्द्रबिन्दु की स्मृति हो सकें । शरीर व्यापी चेतना शनैः शनैः आज्ञाचक्र पर एकत्रित होती रहे । अतः इसे तिलक या टीके के माध्यम से आज्ञाचक्र पर एकत्रित कर, तीसरे नेत्र को जागृत करा सकें ताकि हम परा – मानसिक जगत में प्रवेश कर सकें ।



मनोविज्ञान की दृष्टि से भी तिलक लगाना उपयोगी माना गया है। माथा चेहरे का केंद्रीय भाग होता है उसके मध्य में तिलक लगाकर, दृष्टि को बांधे रखने का प्रयत्न किया जाता है। तिलक हिंदू संस्कृति का पहचान है। तिलक केवल धार्मिक मान्यता नहीं है तिलक लगाने से मन को शांति मिलती है. चन्दन को पत्थर पर घिस कर लगाते है . ऐनक के सामने हमारी मुखमंडल की आभा काफी सौम्य दिखता है. तिलक से मानसिक उतेज़ना पर काफी नियंत्रण पाया जा सकता है.



धन्यवाद

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क्यों हुई माता सीता कि अग्नि परीक्षा?

आज कल बहुत से अर्धज्ञान वाले लोग प्रभु श्री राम द्वारा माता सीता के प्रति संदेह के कारण कि गयी अग्नि परीक्षा को पुरुष प्रधान समाज द्वारा महिला पर अत्याचार होना बताते है.......उनको ये जवाब है.

बहुत से लोग जिन्हें रामायण के बारे में कोई ज्ञान नहीं उसका असली अर्थ नहीं पता हमेशा ये बात कहते हैं कि भगवन श्री राम ने सीता माता को पवित्र होते हुए भी अग्नि परीक्षा देने के लिए क्यों कहा? उनका उद्देश्य बस कुतर्क करके सनातन धर्म कि बुराई करना होता है| बहुत से लोग हैं जिन्हें इस घटना का असली अर्थ पता है पर जिन्हें नहीं पता वे लोग इसे पढ़ें और जिन लोगों को नहीं पता उन्हें यह सत्य बात बता कर उनका ज्ञ
ान बढ़ाएँ|

भगवन श्री राम भगवन विष्णु के अवतार थे| उन्होंने यह जन्म एक मर्यादा पुरूषोत्तम के रूप में लिया| इस अवतार में उन्होंने ऐसा जीवन जीया जिसे हर पुरुष को जीना चाहिए| वह भगवन थे इसलिए उन्हें भविष्य कि हर घटना का ज्ञात था| जब सीता माता के रावण द्वारा अपहरण करने और आगे कि घटनाओं के घटित होने का समय निकट आया तब एक दिन वन में अपनी कुटिया में यह बात सीता माता को बताई और उन्हें कहा कि जनकल्याण के लिए अब उन्हें अपने से दूर करना होगा| परन्तु सीता माता भी धरती माँ कि पुत्री और उनकी भार्या थीं और आगे चलकर उन्हें कई कष्ट सहने थे तब तब प्रभु राम ने अग्नि देव कि
स्तुति कि और उन्हें बताया कि जब तक रावण वध नहीं हो जाता तब तक मैं अपनी पत्नी को आपके सपुर्द करता हूँ और आप सीता का एक प्रतिबिम्ब(Clone) तब तक इनके स्थान पर भेज दीजिए जिससे इन घटनाओं को पूर्ण होने में मेरी सहायता हो जाये|तब अग्नि देव ने सीता माता को सुरक्षित अपने पास बुला लिया और लोगों को दिखे इसलिए सीता माता का एक प्रतिबिम्ब इस संसार में आ गया|

प्रमाण के लिए श्री राम चरित मानस के अरण्य कांड का दोहा न- २३ की चौपाई स.- १ और २ देखे.


रावण वध के बाद जब सीता माता को लंका से वापस अयोध्या लेकर जाना था तब प्रभु को उस प्रतिबिम्ब को वापस अग्नि देव को सुपुर्द करना था तथा सीता माता को सकुशल अपने साथ अयोध्या लेकर लौटना था| यही असल कारण था सीता माता कि अग्नि परीक्षा का तथा इस घटना से समाज के लोगों को यह सन्देश भी देना था कि नारी से पवित्र और कोई नहीं, एक विवाहित नारी के लिए उनका पति ही पूजनीय होता है और वो अपने पति के अलावा और किसी पुरुष के बारे में सोच भी नहीं सकती|नारी को अपनी पवित्रता का प्रमाण देने के लिए चाहे अग्नि परीक्षा देनी पड़े परन्तु वह अपनी पवित्रता कभी नहीं छोडती है|

निम्न प्रश्नों पर विचार


मित्रों

आज मै अपने पेज का औपचारिक प्रारम्भ कर रहा हू.

मै अपने उद्देश्य को पुनः स्पष्ट कर रहा हू - "मेरा उद्देश्य
१. विभिन्न विधर्मि  मतों व पंथो द्वारा दुष्प्रचार कर सनातन हिंदू धर्मं का नुक्सान रोकना है.
२. धर्मं के सही अर्थ को समझ कर हिन्दूओ को जाग्रत करना है.
३. हिन्दुओ का एकीकरण करना है.
४. प्रत्येक हिंदू को धर्मं के ऐसे तर्क देना है जिससे वे सनातन धर्मं के शत्रुओं को ना केवल सही उत्तर दे पाए बल्कि अपनी बात सिद्ध कर अपने धर्मं कि स्थापन कर सके."
५. कुल मिलाकर उँगलियों को 'मुट्ठी' बनने का उद्देश्य है .

मै निम्न प्रश्नों पर विचार करूँगा  -

++++++++++++++ प्रथम चरण में +++++++++++++++++++

१. धर्मं क्या है? धार्मिक होना क्या है? धार्मिक होने से हिन्दुओ कि एकता का क्या सम्बन्ध है?

२. धार्मिक होने के क्या लाभ है?

३. धार्मिक होने के क्या लक्षण है?

४. क्या धार्मिक होने का अर्थ ज्यादा पूजा-पाठ करना है?

५. क्या धार्मिक होने का मतलब ज्यादा हिंसक होना है?

+++++++++++++++++ दूसरे चरण में +++++++++++++++++

६. हमारे सनातन हिंदू धर्मं के विभिन्न धर्मग्रंथों का विकास क्रम?

७. हमारे सनातन हिंदू धर्मं के पतन के प्रमुख कारण?

८. हमारे सनातन हिंदू धर्मं के प्रमुख शत्रु?

९. हमारे सनातन हिंदू धर्मं में "भगवान के अवतार" लेने का क्या मतलब है?

१०. हमारी संस्कृति "यज्ञ  प्रधान " क्यों है? क्या ये वैज्ञानिक है?

+++++++++++++++++ तीसरे चरण में +++++++++++++++++++

११. क्या हमारे धर्मं में भी मुसलमानों व अंग्रजो कि तरह एक देव-इश्वर , एक धर्मग्रंथ  होता तो ज्यादा ठीक होता?

१२. हमारी संस्कृति में जो विभिन्न बहु देव-देवी उपासना पद्धतियाँ है वे वरदान है या शाप?

१३. परमात्मा के साकार और निराकार होना क्या है. दोनों में क्या भेद है?

१४. परमात्मा के सगुण और निर्गुण होना क्या है. दोनों में क्या भेद है?

++++++++++++++++++ चौथा चरण +++++++++++++++++++++++

१५. हिंदू धर्मं में हिंसा ?

१६. भगवान श्री कृष्ण के १६१०८ विवाह के रहस्य ?

१७. भगवान श्री कृष्ण द्वारा गोपियों के वस्त्र चुराना क्या काम वासना था?

१८. वास्तविक गुरु कौन ?


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जय हिंद . जय राष्ट्र . जय श्री राम.

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Sunday, December 9, 2012

प्रश्न - धर्म है क्या ...?

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प्रश्न - धर्म है क्या ...?

सामान्य उत्तर --

धर्मं वो होता है जो धारण किया जा सके . धारण का सरल अर्थ अपनाना होता है. जो आपकी मान्यताएं है वो आपकी धरना है. वो सही और गलत दोनों हो सकती है. ये आपको समाज में अलग पहचान करवाते है. आपके कर्मों से आपके धर्म कि पहचान होती है. इसलिए धर्मं वो होना चाहिए जिससे समाज सुखी हो ना कि दुखी.

मासाहार से पाप क्यों?


sawal - sanatan dharm me bataya gaya hai ki chota ya bada jiv jiv hota hai kisi ko marne se hume paap hota hai...
aur duniya me hr khane layk chez chote chote lakho jivo se bani hoti hai... vo chahe ko anda ho koi murgi ho ya fir koi sabji ho...
hum jo bhi khate hai vo kisi na kisi jivo se bana hota hai aur humare khane se vo marta hai...
to fir masahar khane se hume paap hota hai aur sakahar khane se kyu paap nhi hota ????


मासाहार से पाप क्यों?
आपका यह प्रश्न ही गलत है. और यही तो मेरी पीड़ा भी है कि हिंदू धर्मं के केवल और केवल बाहरी आवरण में उलझा हुआ है और धर्मं का वास्तविक अर्थ के प्रति उदासीन रहता है. खैर मेरा उद्देश्य भी यही है कि इस स्थिति में सुधर हो.
अब सुने -
१. आपका ये मनना गलत है कि हर एक खाने कि वस्तु में प्राणधारी जीव होते है इसलिए सब्जी खाना मासाहार कि श्रेणी में नहीं आता .
२. अगर आप ये मानते है कि वस्तु अनु परमाणु से बनती है और वो जीव है, तो भी आप गलत है. इस स्तिथि में भी केवल वस्तु के अण आपके शारीर के अनुओ से जा मिलती है, जो एक सामान्य जैविक क्रिया है.
३. अब इस संबंध में शास्त्र मत सुने - गीता में भगवन श्री कृष्ण कहते है भक्षय पदार्थ तीन प्रकार के होते है. जो जिसप्रकार का अन्न खता है वो वैसा हो जाता है. मासाहार तम प्रकृति का होता है तो तामस गुण को देता है. तामस गुण परमात्मा प्राप्ति में बाधक होता है. चुकी परमात्मा प्राप्ति सर्वोपरि उद्देश्य है इसलिए मासाहार कि पाप बताकर निषेध कर रखा है शास्त्रों में. असल में भगवन ने पाप नहीं बताया उन्होंने तो विकल्प दिया है. चयन तो हमें करना है अपने उद्देश्य और लक्ष्य के अनुसार.
असल में पाप तो मानव को डराने के लिए और पुण्य मानव के लोभ के लिए होता है. ये धर्मं के बहरी आवरण है. असली लक्ष्य परमात्मा है.
जय श्री राम

UnderstandHinduDharma


प्रिय मित्र

मेरा नाम पंडित गौरव शर्मा है. मै हरिद्वार से हू. मैंने एक पेज बनाया है.

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इसका उद्देश्य सनातन धर्मं से संबंधित प्रश्नों का उत्तर देना है . आम तौर पर देखा गया है की फसबूक पर मुल्ले व कई अन्य मतों के लोग हमारे धर्मं का मजाक बनाते है | हमारे धर्मं की बुराई करके जाकिर नाईक जैसे लोग तो हिन्दुओ का धर्मं परिवर्तन करा रहे है.मेरा अनुभव ये रहा है की हम हिंदू अपने धर्मं को सही अर्थ में नहीं जानते बल्कि जो हमरे समाज ने हमें जो बता दिया वो हमने मान लिया . ये सब रीती रिवाज़ हो सकते है धर्मं नहीं. धर्मं तो वो होता है जिसकी आगया शास्त्र ने दी है.

जब अनेक मुसलमान हमारे धर्मं का मजाक बनाते है. हम केवल उनको गलिया देते है और चूप हो जाते है. हम सही तर्कपूर्ण उत्तर नहीं दे पते क्यों की हम खुद नहीं जानते. दोस्तों इसी बात को धयान में रखकर मैंने एक पेज बनाया है जिसपर मै धर्मं से जुड़े हुए प्रश्न के उत्तर दूँगा ताकि भ्रम दूर हो सके.

आप इस पेज को शेयर कर के प्रचार करे व् लोगो को इसपर जुड़ने के लिए निवेदन करे.

आप मझे ये भी बताये की इसे कैसे जयादा से जयादा प्रसारित किया जा सके.

धर्मप्रेमी

पंडित गौरव शर्मा, हरिद्वार

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